पीओके के मुजफ्फरराबाद, डड्याल, रावलकोट और मीरपुर जैसे प्रमुख शहरों में स्थानीय अवाम अपनी बुनियादी जरूरतों जैसे आटा, चावल और सस्ती बिजली की मांग को लेकर सड़कों पर उतरी है। इस शांतिपूर्ण नागरिक प्रदर्शन को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना और सरकार द्वारा अत्यधिक दमनकारी नीतियां अपनाई जा रही हैं। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए सैन्य बलों ने प्रमुख पुलों और रास्तों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और भीड़ पर सीधे गोलीबारी की है। इस सैन्य कार्रवाई में अब तक दर्जनों लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं और कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है, जिससे क्षेत्र में आक्रोश की अग्नि और अधिक धधक गई है।
वर्तमान में पीओके के भीतर जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे काफी हद तक 1971 के घटनाक्रम से मेल खाती हैं। उस दौर में जिस प्रकार तत्कालीन केंद्र सरकार पूर्वी पाकिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उसे पश्चिमी हिस्से के विकास में लगाती थी, ठीक वैसा ही व्यवहार आज पीओके के साथ किया जा रहा है। क्षेत्र में स्थित जलविद्युत बांधों से बड़े पैमाने पर बिजली का उत्पादन तो किया जाता है, परंतु उसका लाभ स्थानीय निवासियों को देने के बजाय पाकिस्तान के अन्य प्रांतों को भेज दिया जाता है, जिससे पूरा पीओके अक्सर अंधेरे में डूबा रहता है।
इस दमन और शोषण के विरुद्ध लड़ रहे लोगों की आवाज को संगठित करने के लिए वहां ‘ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी’ (JAAC) नामक संस्था प्रमुख भूमिका निभा रही है, जिसकी तुलना जानकार 1971 की ‘मुक्ति वाहिनी’ से कर रहे हैं। हालांकि, इस ऐतिहासिक घटनाक्रम और वर्तमान आंदोलन में एक बड़ा वैचारिक अंतर भी साफ देखा जा सकता है। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान एक स्वतंत्र राष्ट्र की मांग कर रहा था, जबकि आज पीओके की जनता न केवल पाकिस्तान से पूर्ण मुक्ति चाहती है, बल्कि वे सार्वजनिक रूप से भारत के पक्ष में नारे लगाते हुए भारत सरकार से सैन्य व कूटनीतिक हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे हैं।
इस बेहद गंभीर मानवीय संकट के बावजूद, वैश्विक स्तर पर मानवाधिकारों का ढोल पीटने वाले कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और प्रमुख पश्चिमी मीडिया संस्थानों ने इस विषय पर पूरी तरह से चुप्पी साध रखी है। कश्मीर के नाम पर अक्सर भारत के खिलाफ नकारात्मक प्रचार करने वाले वैश्विक मंच और समाचार एजेंसियां पीओके में हो रहे इस दमन पर मौन हैं। दूसरी ओर, भारत का रुख इस मामले पर हमेशा से अत्यंत स्पष्ट रहा है कि संपूर्ण जम्मू-कश्मीर और पीओके भारत का अभिन्न अंग है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी की उपेक्षा के बीच एलओसी के उस पार से उठ रही यह पुकार आने वाले समय में दक्षिण एशिया की भू-राजनीति को एक नया मोड़ दे सकती है।