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मनोरंजन जगत में 'ब्रेक' का दौर: जब सितारों ने सफलता के शोर से ज्यादा सुकून को चुना


नई दिल्ली । बॉलीवुड और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में इन दिनों एक अजीब सा लेकिन दिलचस्प पैटर्न देखने को मिल रहा है। जहां पहले कलाकार साल में पांच-पांच फिल्में करके स्क्रीन पर छाए रहने की होड़ में रहते थे वहीं अब पंकज त्रिपाठी विक्रांत मैसी और जाकिर खान जैसे मंझे हुए कलाकार अचानक ‘ब्रेक’ की घोषणा कर रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि सफलता के शिखर पर बैठे ये सितारे खुद ही लाइमलाइट से दूर जा रहे हैं? इसका जवाब केवल काम की कमी नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति और निजी सुकून की तलाश है।

इस ट्रेंड की नींव अनजाने में ही सही लेकिन शाहरुख खान ने रखी थी। ‘जीरो’ की असफलता के बाद किंग खान ने चार साल का लंबा वनवास काटा। उस वक्त कयास लगाए जा रहे थे कि उनका दौर खत्म हो गया लेकिन 2023 में ‘पठान’ और ‘जवान’ के साथ उन्होंने जो वापसी की उसने पूरी इंडस्ट्री की सोच बदल दी। एक्टर्स को समझ आ गया कि स्क्रीन से गायब रहने का मतलब स्टारडम का खत्म होना नहीं बल्कि वापसी की भूख जगाना है।

दूसरी ओर पंकज त्रिपाठी और आर. माधवन जैसे कलाकारों के लिए ब्रेक का अर्थ ‘क्रिएटिव रिफ्रेशमेंट’ है। माधवन ने खुद स्वीकार किया कि जब रोल एक जैसे होने लगें तो रिसर्च और खुद पर काम करना जरूरी हो जाता है। वहीं पंकज त्रिपाठी का साफ कहना है कि वे केवल ईएमआई (EMI) भरने के लिए मशीन की तरह काम नहीं करना चाहते। वे अपनी ऊर्जा केवल उन्हीं किरदारों में लगाना चाहते हैं जो दर्शकों और उनके भीतर के कलाकार को संतुष्ट कर सकें। अब कलाकार ‘क्वांटिटी’ से ज्यादा ‘क्वालिटी’ को अहमियत दे रहे हैं।

कोरोना काल के बाद दर्शकों का मिजाज भी बदला है। अब फिल्में स्टार पावर से नहीं बल्कि ठोस कहानी से चलती हैं। अक्षय कुमार और आमिर खान जैसे बड़े सितारों की फिल्मों का फ्लॉप होना इस बात का सबूत है कि दर्शक अब कुछ नया चाहते हैं। यही वजह है कि विक्रांत मैसी और जाकिर खान जैसे कलाकार मेंटल हेल्थ और फैमिली टाइम को प्राथमिकता दे रहे हैं। विक्रांत अपनी व्यक्तिगत और पेशेवर जिंदगी में संतुलन चाहते हैं तो जाकिर खान ने अपनी शारीरिक और मानसिक सेहत के लिए 2030 तक का लंबा ब्रेक लेकर सबको चौंका दिया है।

अंत में आर्थिक सुरक्षा भी एक बड़ा कारण है। आज के दौर में एक्टर्स केवल एक्टिंग पर निर्भर नहीं हैं। सुनील शेट्टी के स्टार्टअप्स और प्रीति जिंटा की आईपीएल टीम जैसे उदाहरण बताते हैं कि कलाकार अब बिजनेस माइंडेड हो चुके हैं। उनके पास आय के कई स्रोत हैं जो उन्हें यह लग्जरी देते हैं कि वे काम का चुनाव अपनी शर्तों पर करें न कि मजबूरी में। कुल मिलाकर यह ‘ब्रेक’ इंडस्ट्री के एक मैच्योर परिपक्व दौर की शुरुआत है जहां कलाकार खुद को एक प्रोडक्ट नहीं बल्कि एक इंसान के तौर पर देख रहे हैं।

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