इन्हीं परिवारों में से एक हैं राम प्रसाद बैगा जो अपनी बुजुर्ग मां के साथ एक टूटी-फूटी झोपड़ी में रहते हैं। दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह दो वक्त की रोटी जुटाने वाले राम प्रसाद वर्षों से प्रधानमंत्री आवास के लिए आवेदन कर रहे हैं। नगर परिषद से लेकर जिला मुख्यालय तक कई बार चक्कर काट चुके हैं लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है। उनकी वृद्ध मां की आंखों में एक ही सपना है मौत से पहले अपने सिर पर एक पक्की छत देखना। लेकिन समय बीतता जा रहा है और उनका सपना अब भी अधूरा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि क्षेत्र में ऐसे प्रभावशाली और संपन्न लोगों को भी पीएम आवास का लाभ मिल चुका है जिनके पास पहले से पक्के मकान वाहन और अन्य संसाधन मौजूद हैं। जबकि वास्तविक जरूरतमंद बैगा परिवार सूची में नाम होने के बावजूद लाभ से वंचित हैं। इससे योजना की पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे हैं। बैगा समाज के लोगों का कहना है कि उन्होंने जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से कई बार शिकायत की लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हुई। अब वे संभागीय मुख्यालय तक गुहार लगा रहे हैं फिर भी अफसरशाही की चुप्पी उनकी उम्मीदों को तोड़ रही है।
प्रधानमंत्री आवास योजना का उद्देश्य समाज के सबसे कमजोर वर्ग को सम्मानजनक जीवन देना है लेकिन बरगंवा अमलाई में यह उद्देश्य अधूरा नजर आ रहा है। जिन परिवारों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए वे आज भी असुरक्षित और अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर हैं। सवाल यह है कि क्या योजना का लाभ सही मायनों में जरूरतमंदों तक पहुंचेगा या फिर कागजों में ही सीमित रह जाएगा। बैगा परिवारों की पथराई आंखें आज भी अपने हक की छत का इंतजार कर रही हैं।