फिल्म के मेकर्स की ओर से अभी तक आधिकारिक रूप से विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन विवाद के कारण यह फिल्म चर्चा के केंद्र में आ गई है। भारतीय सिनेमा में यह कोई नया घटनाक्रम नहीं है। जब भी कहानी जाति, धर्म या सामाजिक पहचान जैसे विषयों को छूती है, तो संवेदनशीलता और विरोध साथ-साथ चलते हैं। इससे पहले भी कई फिल्में इसी तरह के आरोपों और प्रदर्शनों का सामना कर चुकी हैं।
पद्मावत इसका प्रमुख उदाहरण है। फिल्म के निर्माण के दौरान ही राजपूत संगठनों और करणी सेना ने यह आरोप लगाया था कि रानी पद्मावती के चरित्र को गलत ढंग से चित्रित किया जाएगा और ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की जाएगी। विरोध इतना तीव्र हुआ कि सेट पर तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं और बाद में फिल्म में कुछ बदलाव भी किए गए। इसी तरह सैराट ने भी अंतरजातीय प्रेम कहानी को पर्दे पर उतारा, जिसमें एक दलित लड़के और मराठा लड़की के रिश्ते को दिखाया गया था। इस पर कुछ मराठा संगठनों ने आपत्ति जताई और प्रदर्शन किए।
आर्टिकल 15 ने जाति आधारित भेदभाव और सामाजिक अन्याय के मुद्दे को उठाया था। फिल्म को सराहना के साथ-साथ विरोध भी झेलना पड़ा, क्योंकि कुछ संगठनों का मानना था कि इसमें समाज के एक वर्ग की छवि नकारात्मक रूप में पेश की गई है। वहीं जय भीम को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ, जब वन्नियार समुदाय के कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि फिल्म में उनके समाज को गलत तरीके से दर्शाया गया है। मामला कानूनी नोटिस और सार्वजनिक बहस तक पहुंच गया।
महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के जीवन पर आधारित फुले को भी महाराष्ट्र में कुछ ब्राह्मण संगठनों के ोविरोध का सामना करना पड़ा था। आरोप लगाया गया कि फिल्म इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करती है और एक समुदाय विशेष को नकारात्मक रूप में दिखाती है।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सिनेमा जब सामाजिक यथार्थ को छूता है, तो वह सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं रहता, बल्कि बहस और टकराव का कारण भी बन जाता है। यादव जी की लव स्टोरी का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करेगा कि मेकर्स और विरोध कर रहे समूहों के बीच संवाद स्थापित होता है या नहीं। फिलहाल इतना तय है कि फिल्म ने रिलीज से पहले ही समाज और सिनेमा के रिश्ते पर एक नई बहस छेड़ दी है।