लोकतंत्र की 'बीमारी': 4 हजार से ज्यादा मुकदमों में फंसे नेता, सिस्टम को 'इलाज' की दरकार
सुप्रीम कोर्ट की ताजा रिपोर्ट ने राजनीतिक सिस्टम की कलई खोल दी है। 28 राज्यों के 14 मुख्यमंत्री और लोकसभा के 170 सांसद मामलों का सामना कर रहे हैं। 4,192 पेंडिंग मुकदमों से निपटने के लिए विशेष अदालतों की मांग की गई है।
हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को जो “बीमारी” दागी नेताओं से लगती जा रही है, उसका पूरा हेल्थ बुलेटिन सुप्रीम कोर्ट में पेश की गई एक रिपोर्ट ने बता दिया है, या यूं कहें कि उठा कर सामने रख दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक 28 राज्यों का सिस्टम गंभीर रूप से प्रभावित है, जहाँ 14 मुख्यमंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित हैं, ठीक इसी बीच सिस्टम को सबसे बड़ा झटका तेलंगाना से लगा है। वहां सीएम ए. रेवंत रेड्डी के खिलाफ 89 मामलों की पुष्टि हुई है। अब इस व्यवस्था को सुधारने और मुकदमों के बोझ को कम करने के लिए आपातकालीन न्यायिक मैनेजमेंट की जरूरत, जैसी बातें की जा रही हैं।
सिस्टम के “महत्वपूर्ण अंग” और मुकदमों का संक्रमण
न्यायिक रिपोर्ट में कहा गया है कि मुकदमों का यह संक्रमण कई बड़े नेताओं तक फैल चुका है। सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ 29 मामले दर्ज हैं, और इसी तरह डीके शिवकुमार और चंद्रबाबू नायडू के पास 19-19 मुकदमों का बैकलॉग बताया गया है। वी.डी. सतीशन 18, हेमंत सोरेन 5, देवेंद्र फडणवीस 4 और सुखविंदर सिंह 4 मुकदमों के साथ सूची में हैं। कुछ और मुख्यमंत्रियों पर भी 1-2 केस लंबित बताए गए हैं, कुल मिलाकर आंकड़े थोड़े चिंतित करने वाले हैं।
विधानसभाओं और संसद की “हेल्थ रिपोर्ट”
राज्यों की विधानसभाओं की स्थिति भी कमाल की नहीं मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल के 292 में से 170 विधायकों पर गंभीर मामले दर्ज बताए गए हैं। केरल (57%) , आंध्र प्रदेश (56%) और तेलंगाना (49%) में विधायकों के खिलाफ गंभीर मुकदमों की पुष्टि भी रिपोर्ट में है। बिहार, महाराष्ट्र, झारखंड और ओडिशा की विधानसभाओं का हाल भी इसी तरह की परेशानी वाला बताया गया है। देश की सबसे बड़ी पंचायत, 543 सीटों वाली लोकसभा में 170 सांसद (करीब 31%) दागी बताए गए हैं, और इनमें तेलंगाना, केरल और बिहार के प्रतिनिधि शामिल हैं। राज्यसभा के 233 में से 75 सदस्यों पर केस बताए गए हैं, जिनमें 40 को गंभीर मानकर रिपोर्ट में रखा गया है।
4,192 केस का “इमरजेंसी” बैकलॉग और समाधान
जुलाई 2026 के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा और पूर्व माननीयों के खिलाफ 4,192 मामले ट्रायल के स्तर पर अटके हैं। इसमें यूपी का सिस्टम सबसे ज्यादा दबा है, जहाँ 1,171 मामलों का बोझ दर्ज किया गया है। इस भारी बैकलॉग को मैनेज करने की खातिर सुप्रीम कोर्ट में विशेष अदालतों के गठन और हाईकोर्ट की निगरानी (Rescue & Management) की मांग रखी गई है। हालांकि, न्यायिक बुलेटिन यह भी साफ करता है कि जब तक अंतिम फैसला न आ जाए, सिर्फ केस लंबित होने भर से किसी को दोषी करार, नहीं दिया जाता।
