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फीमेल पार्टनर से बहस के बाद कंक्रीट की सीढ़ियों पर मायूस बैठा दिखा 13 साल का गोरिल्ला

नई दिल्ली । सोशल मीडिया के इस दौर में वन्य जीवों के कई ऐसे वीडियो सामने आते हैं जो इंसानों को हैरान कर देते हैं, लेकिन जापान के एक चिड़ियाघर से सामने आया ताजा मामला बेहद अनोखा और गुदगुदाने वाला है। यहां रहने वाले 13 साल के एक नर गोरिल्ला, जिसका नाम ‘कियोमासा’ है, का एक वीडियो इन दिनों इंटरनेट पर तेजी से सुर्खियां बटोर रहा है। इस वीडियो में गोरिल्ला अपनी फीमेल पार्टनर के साथ हुए एक घरेलू विवाद के बाद जिस तरह गहरे तनाव और दार्शनिक अंदाज में बैठा नजर आ रहा है, उसने पूरी दुनिया के सोशल मीडिया यूजर्स का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, चिड़ियाघर के बाड़े में कियोमासा और उसकी मादा साथी के बीच किसी बात को लेकर जोरदार बहस हो गई थी। हालांकि, चिड़ियाघर के प्रबंधकों और अधिकारियों का कहना है कि वन्यजीवों के बीच इस तरह के छोटे-मोटे मतभेद बेहद सामान्य हैं, लेकिन कियोमासा इस मामूली झगड़े को कुछ ज्यादा ही दिल पर ले बैठा। इस नोकझोंक के तुरंत बाद का जो नजारा कैमरे में कैद हुआ, उसने वैज्ञानिकों से लेकर आम जनता तक को अचंभित कर दिया है, क्योंकि गोरिल्ला का यह व्यवहार हूबहू किसी परेशान इंसान जैसा था। विवाद शांत होने के बाद, कियोमासा अपनी मादा साथी से दूर पिंजरे में बनी कंक्रीट की सीढ़ियों पर जाकर बिल्कुल अकेला बैठ गया। करीब 62 सेकंड के इस वायरल क्लिप में साफ देखा जा सकता है कि वह किसी गहरे सदमे या आत्मचिंतन में डूबा हुआ है। सबसे मजेदार बात यह है कि उसने किसी दार्शनिक या गंभीर संकट में फंसे इंसान की तरह अपनी ठुड्डी पर हाथ रख रखा है। वह रह-रहकर अपना सिर खुजलाता है, अपने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में जोड़ता है और शून्य में एकटक घूरने लगता है, जैसे वह अपनी जिंदगी के किसी बहुत बड़े और जटिल फैसले के बारे में विचार कर रहा हो। कियोमासा के इस अद्भुत और इंसानी अंदाज को देखकर इंटरनेट जगत में मजेदार टिप्पणियों और मीम्स की बाढ़ आ गई है। सोशल मीडिया यूजर्स इस वीडियो को विशेष रूप से शादीशुदा पुरुषों की वास्तविक पारिवारिक परिस्थितियों और उनके आपसी वैवाहिक विवादों से जोड़कर देख रहे हैं। कई यूजर्स ने मजाकिया लहजे में टिप्पणी करते हुए लिखा कि यह गोरिल्ला निश्चित रूप से अपने दिमाग में उस पूरी लड़ाई को दोबारा रीप्ले कर रहा है और यह समझने की कोशिश कर रहा है कि आखिर उससे ऐसी क्या गलती हो गई, जिससे उसकी पार्टनर इतनी ज्यादा नाराज हो गई। कुछ लोगों ने तो कियोमासा की इस गहरी सोच को देखते हुए उसका नया नाम ‘गोरिलियो द फिलॉस्फर’ तक रख दिया है। इस पूरे घटनाक्रम ने जीव वैज्ञानिकों को भी एक बार फिर इस विषय पर सोचने के लिए प्रेरित किया है कि गोरिल्ला इंसानों के कितने करीब हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, गोरिल्ला को इंसानों का सबसे नजदीकी रिश्तेदार माना जाता है और उनका लगभग 98 प्रतिशत डीएनए पूरी तरह से इंसानों से मेल खाता है। वे अत्यधिक संवेदनशील और सामाजिक प्राणी होते हैं, जो इंसानों की ही तरह क्रोध, ईर्ष्या, प्रेम, दुख, अवसाद और पछतावे जैसी जटिल मानसिक भावनाओं को गहराई से महसूस करने और उन्हें अपनी शारीरिक मुद्राओं के माध्यम से प्रदर्शित करने की क्षमता रखते हैं।

मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने पर कांग्रेस का मौन सत्याग्रह, लोकतंत्र पर हमले का लगाया आरोप

मध्यप्रदेश। राज्यसभा चुनाव को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में जारी हलचल के बीच कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त होने का मामला लगातार तूल पकड़ता जा रहा है। इसी कड़ी में मंगलवार को उज्जैन में कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने मौन प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कराया। पार्टी ने नामांकन निरस्त किए जाने की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए चिंताजनक बताया। उज्जैन के टॉवर चौक स्थित डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष आयोजित इस मौन प्रदर्शन में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, पदाधिकारी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता शामिल हुए। दोपहर एक बजे शुरू हुए कार्यक्रम में नेता प्रतिपक्ष रवि राय, कांग्रेस नेता अजित सिंह, महिला कांग्रेस, सेवा दल, यूथ कांग्रेस, एनएसयूआई, आईटी सेल, ब्लॉक अध्यक्ष, ब्लॉक प्रभारी, पार्षद और अन्य संगठनात्मक इकाइयों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेताओं ने हाथों में तख्तियां लेकर शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जताया। नेताओं का कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता सर्वोपरि होती है तथा किसी भी उम्मीदवार के नामांकन से जुड़े निर्णयों में सभी संवैधानिक प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। नेता प्रतिपक्ष रवि राय ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि कांग्रेस उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन निरस्त किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस फैसले से न केवल पार्टी के उम्मीदवार को चुनावी प्रक्रिया से बाहर किया गया, बल्कि कांग्रेस के विधायकों के मतदान अधिकार भी प्रभावित हुए। उन्होंने यह भी दावा किया कि यदि नामांकन पत्र में किसी प्रकार की तकनीकी या प्रक्रियागत कमी थी तो उसे नियमानुसार दूर करने का अवसर दिया जा सकता था। कांग्रेस नेता अजित सिंह ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पार्टी इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से देख रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि नामांकन निरस्त किए जाने के पीछे सुनियोजित प्रयास हो सकते हैं। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित पक्ष की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रदर्शनकारियों ने डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा के समक्ष संविधान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की बात कही। कांग्रेस नेताओं ने संकेत दिया कि यदि उनकी मांगों पर उचित विचार नहीं किया गया तो पार्टी आगे भी विभिन्न लोकतांत्रिक माध्यमों से विरोध दर्ज कराएगी। राज्यसभा चुनाव के इस घटनाक्रम ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है। एक ओर कांग्रेस चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है, वहीं दूसरी ओर निर्वाचन संबंधी प्रक्रियाओं और नियमों को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बना रह सकता है। फिलहाल उज्जैन में हुआ यह मौन प्रदर्शन कांग्रेस के उस व्यापक विरोध अभियान का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके माध्यम से पार्टी नामांकन निरस्त किए जाने के फैसले के खिलाफ अपनी आपत्ति दर्ज करा रही है।

चिड़ियों की बीट से बने 'गुआनो' फॉस्फेट ने रातों-रात चमका दी थी किस्मत: अंधाधुंध खनन और गलत वित्तीय फैसलों से तबाह हो गई पूरी अर्थव्यवस्था

नई दिल्ली । वैश्विक इतिहास में किसी राष्ट्र के आर्थिक उत्थान और पतन की कई कहानियां दर्ज हैं, लेकिन प्रशांत महासागर के एक छोटे से द्वीप देश नाउरू का किस्सा दुनिया में सबसे अनोखा और अप्रत्याशित माना जाता है। दुनिया के नक्शे पर एक सूक्ष्म बिंदु के समान दिखने वाले इस देश ने किसी तेल के कुएं या सोने की खदान के दम पर नहीं, बल्कि केवल और केवल समुद्री चिड़ियों की बीट (पॉटी) के जरिए वह रूतबा हासिल किया था, जिसे देखकर दुनिया के बड़े और शक्तिशाली देश भी दंग रह गए थे। प्रशांत महासागर के माइक्रोनेशिया क्षेत्र में स्थित नाउरू दुनिया का सबसे छोटा स्वतंत्र गणराज्य है, जिसका क्षेत्रफल इतना सीमित है कि कोई भी व्यक्ति कुछ ही घंटों में पैदल चलकर इसकी सीमा नाप सकता है। इस नन्हे से द्वीप की कायापलट के पीछे एक बेहद दिलचस्प प्राकृतिक वैज्ञानिक कारण रहा है। दरअसल, इस सुदूर द्वीप पर हजारों सालों से लाखों की संख्या में प्रवासी और स्थानीय समुद्री पक्षी आते थे। इन पक्षियों की बीट सालों-साल एक के ऊपर एक जमा होती रही, जिसने कालांतर में एक बेहद सख्त और कड़क चट्टान का रूप धारण कर लिया। वैज्ञानिक भाषा में इस विशेष प्राकृतिक जमाव को ‘गुआनो’ कहा जाता है, जो उच्च गुणवत्ता वाले फास्फेट से पूरी तरह समृद्ध था। इस गुआनो फॉस्फेट में फास्फोरस की प्रचुर मात्रा होने के कारण यह दुनिया का सबसे बेहतरीन और मांग में रहने वाला प्राकृतिक उर्वरक यानी खाद बन गया, जिसकी वैश्विक कृषि बाजार में भारी मांग थी। साल 1968 में जब नाउरू को औपनिवेशिक नियंत्रण से स्वतंत्रता मिली, तो इस नई सरकार ने अपने इस प्राकृतिक फॉस्फेट खनन का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की बढ़ती कीमतों के बीच नाउरू की किस्मत रातों-रात पूरी तरह बदल गई। दुनिया भर के देश अपनी खेती को बेहतर बनाने के लिए इस बेहतरीन प्राकृतिक खाद को ऊंचे दामों पर खरीदने लगे, जिससे नाउरू पर विदेशी मुद्रा की अंधाधुंध बारिश होने लगी। कुछ ही वर्षों के भीतर यह छोटा सा द्वीप प्रति व्यक्ति आय के मामले में खाड़ी के तेल उत्पादक देशों को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का दूसरा सबसे अमीर देश बन गया। अचानक आई इस अकूत संपत्ति ने वहां के नागरिकों की जीवनशैली को पूरी तरह से विलासिता में बदल दिया। जिस द्वीप पर कभी यातायात के सामान्य साधन भी उपलब्ध नहीं थे, वहां लगभग हर परिवार के पास कई महंगी विदेशी स्पोर्ट्स कारें आ गईं। लोग सामान्य खरीदारी करने के लिए भी सीधे निजी विमानों से विदेशों का रुख करने लगे। सरकार ने अपनी जनता के लिए पूरी तरह से टैक्स फ्री व्यवस्था लागू कर दी और शिक्षा, चिकित्सा जैसी सभी बुनियादी सुविधाएं पूरी दुनिया में सर्वश्रेष्ठ और मुफ्त कर दीं। तत्कालीन समय में पैसे की कोई कमी न होने के कारण दूरदर्शिता को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया और अंधाधुंध खर्च का दौर शुरू हो गया। हालांकि, प्रकृति के इस अनमोल खजाने पर टिकी यह विलासिता लंबे समय तक नहीं चल सकी। धन के अत्यधिक लालच में आकर द्वीप की पूरी जमीन का बिना किसी वैज्ञानिक और भविष्य की योजना के अंधाधुंध खनन किया गया। अत्यधिक खुदाई के कारण पूरा द्वीप एक बंजर और पथरीले मरुस्थल में तब्दील हो गया, जिससे वहां की उपजाऊ मिट्टी पूरी तरह नष्ट हो गई और खेती करना असंभव हो गया। धीरे-धीरे फॉस्फेट का यह सीमित खजाना पूरी तरह समाप्त हो गया। जब मुख्य आय का स्रोत बंद हुआ, तो देश की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह गई। फॉस्फेट के दौर में सरकार द्वारा किए गए तमाम गलत अंतरराष्ट्रीय निवेश भी पूरी तरह डूब गए, जिससे देश भारी विदेशी कर्ज के जाल में फंस गया और आज अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए पूरी तरह अन्य देशों की सहायता पर निर्भर है।

सोमवती अमावस्या पर भूलकर भी न करें इन 5 विशेष वस्तुओं का दान: पुण्य की जगह लग सकता है दोष, घर में आ सकती है दरिद्रता

नई दिल्ली । सनातन धर्म में अमावस्या तिथि को पितरों के तर्पण, पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य के लिए बेहद पवित्र और फलदायी माना गया है। इस वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या सोमवार के दिन पड़ने के कारण यह सोमवती अमावस्या का विशेष योग बना रही है। इस बार की सोमवती अमावस्या ज्योतिषीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दिन कई बड़े और दुर्लभ ग्रहों के संयोग बन रहे हैं। जहां एक ओर सूर्य देव वृषभ राशि में प्रवेश कर रहे हैं जिससे वृषभ संक्रांति का निर्माण हो रहा है, वहीं दूसरी ओर ज्येष्ठ अधिक मास का समापन भी इसी दिन हो रहा है। धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणना के अनुसार, इस सोमवती अमावस्या पर वृद्धि योग, सर्वार्थसिद्धि योग और अमृत सिद्धि योग का एक साथ त्रिवेणी संगम हो रहा है। इस दौरान सूर्य देव की कृपा से युक्त वृद्धि योग और शाम तक रहने वाले सर्वार्थसिद्धि व अमृत सिद्धि योग में किए गए कार्यों को अक्षय फल देने वाला माना गया है। शास्त्रों में उल्लेख है कि इस शुभ बेला में किए गए दान से कुंडली के विभिन्न ग्रहों की पीड़ा शांत होती है और जीवन से नकारात्मक ऊर्जा का नाश होता है। हालांकि, ज्योतिषियों का कहना है कि अमावस्या के दिन दान करते समय कुछ विशेष सावधानियां बरतना अनिवार्य है, क्योंकि गलत चीजों का दान पुण्य की जगह दोष का भागी बना सकता है। शास्त्रों के अनुसार, सोमवती अमावस्या पर वस्त्र दान महादान की श्रेणी में आता है, लेकिन इस दिन किसी को भी फटे, मैले या अत्यंत पुराने वस्त्र देने से बचना चाहिए। ऐसी अनुपयोगी वस्तुओं का दान करने से शुभ फलों की प्राप्ति नहीं होती और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसी प्रकार, पितरों की तृप्ति के लिए अन्न दान का विशेष महत्व है, परंतु दान में दिया जाने वाला अनाज पूरी तरह साफ, शुद्ध और खाने योग्य होना चाहिए। कीड़े लगे या पूरी तरह बेकार हो चुके अनाज का दान करने से पूर्वज रुष्ट हो जाते हैं, जिससे परिवार को पितृदोष का सामना करना पड़ सकता है। इस पावन तिथि पर नमक के दान को भी पूरी तरह वर्जित माना गया है। शास्त्रों के अनुसार, अमावस्या के दिन किसी अन्य व्यक्ति को नमक का दान करने से घर की संचित लक्ष्मी चली जाती है और परिवार में दरिद्रता का वास होने लगता है। इसके साथ ही, इस दिन शनि देव से जुड़ी धातु यानी लोहे का दान भी सामान्य लोगों को नहीं करना चाहिए। लोहे के साथ-साथ इस दिन सरसों के तेल का दान करने से भी बचने की सलाह दी जाती है, हालांकि सरसों के तेल का उपयोग पूजा-पाठ और दीप प्रज्वलन के लिए किया जा सकता है। अक्सर देखा जाता है कि लोग अपने घरों में पड़े फटे-पुराने या टूटे हुए जूते-चप्पल अमावस्या के दिन किसी जरूरतमंद को दे देते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सोमवती अमावस्या जैसी पवित्र तिथि पर फटे या अनुपयोगी जूते-चप्पल दान करने से कुंडली में शनि देव का अशुभ प्रभाव तेजी से बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को कार्यक्षेत्र में बड़ी बाधाओं और आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, इस महासंयोग पर केवल साफ, उपयोगी और सात्विक वस्तुओं का ही दान करना श्रेयस्कर रहता है।

जेल कॉलोनी हत्याकांड का खुलासा: फॉरेंसिक सबूतों ने खोली साजिश की परतें, दोषियों को मिली फांसी

मध्यप्रदेश। भोपाल की एक सुरक्षित मानी जाने वाली जेल कॉलोनी में वर्ष 1996 में हुई नाबालिग बालिका की हत्या का मामला मध्य प्रदेश के चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल रहा है। प्रारंभिक जांच में यह एक रहस्यमयी घटना प्रतीत हो रही थी, लेकिन पुलिस की पड़ताल, गवाहों के बयान और फॉरेंसिक साक्ष्यों ने धीरे-धीरे पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठा दिया। अंततः अदालत ने मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए दोषियों को फांसी की सजा सुनाई। घटना के बाद जब पुलिस ने जांच शुरू की तो आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ की गई। इसी दौरान कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां सामने आईं, जिन्होंने जांच को नई दिशा दी। प्रत्यक्ष और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को जोड़ते हुए पुलिस ने संदिग्धों से पूछताछ की और उनके बयानों में कई विरोधाभास पाए। जांच आगे बढ़ने पर एक महत्वपूर्ण बरामदगी ने मामले को स्पष्ट करने में बड़ी भूमिका निभाई। पुलिस को ऐसी वस्तु मिली जिसने घटनास्थल और आरोपियों के बयानों के बीच संबंध स्थापित किया। इसके बाद संदिग्धों से गहन पूछताछ की गई, जिसमें महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए। फॉरेंसिक जांच इस मामले की सबसे अहम कड़ी साबित हुई। वैज्ञानिक परीक्षणों के दौरान घटनास्थल और बरामद सामग्री से मिले साक्ष्यों का विश्लेषण किया गया। रिपोर्ट में ऐसे प्रमाण मिले जिन्होंने अपराध की गंभीरता और आरोपियों की संलिप्तता को मजबूत आधार प्रदान किया। विशेषज्ञों की राय और वैज्ञानिक परीक्षणों के निष्कर्षों ने जांच एजेंसियों को अदालत में मजबूत केस प्रस्तुत करने में मदद की। जांच में यह भी सामने आया कि अपराध के बाद कथित रूप से सबूतों को छिपाने और घटनाक्रम को भ्रमित करने की कोशिश की गई थी। हालांकि पुलिस और फॉरेंसिक टीम ने उपलब्ध साक्ष्यों को सुरक्षित कर उनकी वैज्ञानिक जांच कराई, जिससे मामले की कई महत्वपूर्ण कड़ियां जुड़ती चली गईं। मामला अदालत पहुंचने पर अभियोजन पक्ष ने गवाहों के बयान, बरामद सामग्री, वैज्ञानिक रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा। अदालत ने सभी तथ्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि प्रस्तुत साक्ष्य आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और विश्वसनीय हैं। न्यायालय ने अपने निर्णय में अपराध की प्रकृति और परिस्थितियों को अत्यंत गंभीर माना। 18 फरवरी 1997 को सत्र न्यायालय ने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए मृत्युदंड की सजा सुनाई। बाद में मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में भी हुई, जहां निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया। न्यायालय ने इसे दुर्लभतम श्रेणी अर्थात ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों में शामिल माना। यह मामला आज भी इस बात का उदाहरण माना जाता है कि जटिल आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक जांच, फॉरेंसिक साक्ष्य और सुसंगत पुलिस पड़ताल किस प्रकार न्यायिक प्रक्रिया को मजबूत आधार प्रदान कर सकती है। साथ ही यह भी दर्शाता है कि गंभीर अपराधों में न्यायालय साक्ष्यों के आधार पर कठोरतम दंड देने से पीछे नहीं हटता।

काहिरा हवाई अड्डे पर जब उमड़ा था 'महानायक' के प्रशंसकों का जनसैलाब: खुद अमिताभ बच्चन ने 1991 के उस दौर को बताया था 'राष्ट्रीय संकट'

नई दिल्ली । बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की लोकप्रियता केवल भारत की सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके प्रशंसकों की संख्या करोड़ों में है। अस्सी के दशक में जब इंटरनेट और सोशल मीडिया का नामोनिशान नहीं था, तब भी सात समंदर पार मिडिल ईस्ट के देशों में उनकी दीवानगी चरम पर थी। विशेष रूप से मिस्र यानी इजिप्ट में अमिताभ बच्चन को लेकर ऐसा असाधारण क्रेज देखा गया कि वहां की तात्कालिक सरकार के लिए यह चिंता का विषय बन गया था और अंततः उन्हें एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाना पड़ा था। साल 1980 के दौर में मिस्र के सिनेमाघरों में जब भी अमिताभ बच्चन की कोई फिल्म लगती थी, तो टिकट खिड़कियों पर मील लंबी लाइनें लग जाती थीं। इस अभूतपूर्व दीवानगी का सीधा नुकसान मिस्र के स्थानीय फिल्म उद्योग को उठाना पड़ रहा था क्योंकि वहां के क्षेत्रीय सिनेमाघरों में दर्शकों की भारी कमी हो गई थी और सन्नाटा पसरने लगा था। अपनी घरेलू फिल्म इंडस्ट्री को मंदी से उबारने और उसे संरक्षण देने के उद्देश्य से मिस्र की सरकार ने एक कड़ा आर्थिक और सांस्कृतिक फैसला लेते हुए अमिताभ बच्चन की फिल्मों के प्रदर्शन पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया था। इस सरकारी प्रतिबंध के बावजूद वहां के आम नागरिकों के दिलों से अमिताभ बच्चन का जादू कम नहीं किया जा सका। मिस्र के लोग उनकी फिल्में देखने के लिए नए-नए रास्ते निकालने लगे और वहां के छोटे-छोटे निजी थिएटरों व बंद कमरों में चोरी-छिपे इन फिल्मों का प्रदर्शन किया जाने लगा। उस दौर में जिन लोगों के पास फिल्में देखने के साधन या टेप रिकॉर्डर उपलब्ध नहीं थे, वे हर गुरुवार को स्थानीय कैफे में बड़ी संख्या में एकत्र होते थे और केवल अमिताभ बच्चन की फिल्मों के ऑडियो गाने सुनकर ही अपनी दीवानगी पूरी किया करते थे। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि मिस्र की एक स्थानीय फिल्म में अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्म ‘गिरफ्तार’ के एक मुख्य दृश्य को हूबहू कॉपी किया गया था। मिस्र में अमिताभ बच्चन के इस दबदबे का सबसे बड़ा नजारा साल 1991 में देखने को मिला जब वे काहिरा इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने के लिए अफ्रीकी महाद्वीप पहुंचे थे। काहिरा हवाई अड्डे पर उनके स्वागत और एक झलक पाने के लिए इतनी विशाल और बेकाबू भीड़ उमड़ पड़ी कि वहां की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। हवाई अड्डे से लेकर शहर की सड़कों तक हालात इस कदर बेकाबू हो गए थे कि खुद अमिताभ बच्चन ने बाद में अपने एक साक्षात्कार में उस माहौल को एक ‘राष्ट्रीय संकट’ जैसी स्थिति के रूप में याद किया था। जिस देश की सरकार ने कभी अपनी स्थानीय फिल्म इंडस्ट्री के अस्तित्व को बचाने के लिए अमिताभ बच्चन की फिल्मों को प्रतिबंधित कर दिया था, उसी देश को आखिरकार वैश्विक कला और उनके अभिनय के सामने नतमस्तक होना पड़ा। इस ऐतिहासिक दीवानगी और सांस्कृतिक प्रभाव को स्वीकार करते हुए मिस्र सरकार ने साल 2001 में अमिताभ बच्चन को आधिकारिक तौर पर आमंत्रित किया। वहां उन्हें सिनेमा जगत के सर्वोच्च सम्मानों में से एक ‘एक्टर ऑफ द सेंचुरी’ के खिताब से नवाजा गया, जो यह साबित करता है कि कला को किसी भी देश की भौगोलिक और प्रशासनिक सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता।

बिजली बिल अपडेट के नाम पर रिटायर्ड अधिकारी से साइबर ठगी, खाते से उड़ाए लाखों रुपए

मध्यप्रदेश। इंदौर में साइबर अपराधियों ने एक बार फिर आम नागरिकों को निशाना बनाते हुए ऑनलाइन ठगी की वारदात को अंजाम दिया है। इस बार ठगों के जाल में जिला पंजीयक कार्यालय से सेवानिवृत्त अधिकारी फंस गए। बिजली बिल अपडेट नहीं होने और कनेक्शन काटने की चेतावनी देकर साइबर ठगों ने उनके मोबाइल में कथित रूप से एप डाउनलोड करवाए और बैंक खाते से बड़ी राशि निकाल ली। मामले की शिकायत मिलने के बाद कनाड़िया थाना पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार संचार नगर निवासी रमेश कुंबारे, जो जिला पंजीयक कार्यालय से सेवानिवृत्त हैं, इस साइबर ठगी का शिकार हुए हैं। घटना 2 जून की रात की बताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक उनकी पत्नी ज्योति के मोबाइल नंबर पर एक कॉल आया। कॉल करने वाले व्यक्ति ने स्वयं को बिजली विभाग का कर्मचारी बताते हुए अपना नाम राकेश बताया। फोन पर उसने कहा कि मई माह का बिजली बिल विभाग के सिस्टम में अपडेट नहीं हुआ है। साथ ही उसने व्हाट्सएप पर भी संदेश भेजा। इसके बाद रमेश कुंबारे ने उसी नंबर पर संपर्क कर बताया कि बिजली बिल का भुगतान पहले ही किया जा चुका है और भुगतान संबंधी संदेश भी उनके पास मौजूद है। आरोप है कि कॉल करने वाले व्यक्ति ने उन्हें विश्वास में लेते हुए कहा कि विभाग के रिकॉर्ड में भुगतान दिखाई नहीं दे रहा है। उसने यह भी कहा कि यदि तुरंत अपडेट नहीं कराया गया तो बिजली कनेक्शन काट दिया जाएगा। इसके बाद कथित रूप से दो मोबाइल एप डाउनलोड करने और 12 रुपए का अपडेट शुल्क जमा करने की बात कही गई। ठग ने व्हाट्सएप पर एक फॉर्म भेजा और उसे खोलने के लिए कहा। शिकायत के अनुसार जैसे ही फॉर्म खोला गया, मोबाइल स्क्रीन कुछ समय के लिए बंद हो गई। शुरुआत में इसे तकनीकी समस्या समझा गया, लेकिन बाद में जब मोबाइल दोबारा चालू किया गया तो उसमें ‘Electricity Online Customer Support’ नाम के दो एप डाउनलोड मिले। कुछ ही देर बाद मोबाइल पर बैंक खाते से राशि कटने के संदेश आने लगे। पहले 24 हजार 500 रुपए की निकासी का संदेश मिला। जब खाते की जानकारी जांची गई तो पता चला कि खाते से कई अलग-अलग ट्रांजेक्शन किए जा चुके हैं। शिकायत के अनुसार 25-25 हजार रुपए के तीन ट्रांजेक्शन के अलावा 24 हजार और 68 हजार रुपए की राशि भी खाते से निकाल ली गई। घटना के बाद पीड़ित ने पुलिस से संपर्क कर शिकायत दर्ज कराई। कनाड़िया थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर साइबर ठगों की पहचान और रकम के ट्रांजेक्शन से जुड़े तकनीकी पहलुओं की जांच शुरू कर दी है। पुलिस और साइबर विशेषज्ञ लगातार लोगों को सलाह देते हैं कि बिजली बिल, केवाईसी अपडेट, बैंक सत्यापन या किसी अन्य सेवा के नाम पर आने वाले संदिग्ध कॉल और लिंक से सावधान रहें। किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर मोबाइल में एप डाउनलोड न करें और न ही स्क्रीन शेयरिंग या रिमोट एक्सेस की अनुमति दें। थोड़ी सी सावधानी साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय साबित हो सकती है।

बॉक्स ऑफिस पर जब 'पार्टनर' ने मचाया था कोहराम: 28 करोड़ के बजट में 100 करोड़ कमाकर सलमान और गोविंदा के डूबते करियर को मिला था नया जीवन

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो न सिर्फ बॉक्स ऑफिस के समीकरण बदलती हैं, बल्कि डूबते हुए सितारों के करियर को भी एक नया जीवनदान दे देती हैं। वर्ष 2007 में रिलीज हुई निर्देशक डेविड धवन की फिल्म ‘पार्टनर’ को आज भी एक ऐसी ही कल्ट कॉमेडी फिल्म के रूप में याद किया जाता है। इस फिल्म ने न केवल दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया, बल्कि उस दौर में बॉक्स ऑफिस पर संघर्ष कर रहे बॉलीवुड के दो दिग्गज अभिनेताओं, सलमान खान और गोविंदा के स्टारडम को फिल्म इंडस्ट्री में दोबारा मजबूती से स्थापित किया। यदि उस दौर के परिदृश्य पर नजर डालें तो नब्बे के दशक में सिनेमाई पर्दे पर राज करने वाले गोविंदा का करियर बेहद चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा था। सक्रिय राजनीति में कदम रखने के कारण उनका अभिनय से ध्यान भटक गया था और उनकी लगातार कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर असफल साबित हुई थीं। फिल्म इंडस्ट्री उन्हें लगभग बिसरा चुकी थी। दूसरी तरफ, सलमान खान की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी। इस फिल्म के प्रदर्शन से ठीक पहले आई उनकी बड़े बजट की फिल्में जैसे ‘सलाम-ए-इश्क’, ‘जान-ए-मन’, ‘सांवरिया’ और ‘मैरीगोल्ड’ दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में नाकाम रही थीं। ऐसे नाजुक मोड़ पर दोनों ही कलाकारों को एक बड़ी व्यावसायिक सफलता की सख्त दरकार थी। निर्देशक डेविड धवन ने इस भांपते हुए महज 28 करोड़ रुपये के सीमित बजट में ‘पार्टनर’ का निर्माण किया। फिल्म ने सिनेमाघरों में आते ही बॉक्स ऑफिस पर ऐसा तहलका मचाया कि पहले ही सप्ताह में घरेलू बाजार में 30 करोड़ रुपये का आंकड़ा पार कर लिया। यह उस समय के भारतीय सिनेमाई इतिहास की दूसरी सबसे बड़ी डोमेस्टिक ओपनिंग दर्ज कराने वाली फिल्म बनी। दुनिया भर के बॉक्स ऑफिस पर इस फिल्म ने कुल 103 करोड़ रुपये से अधिक की शानदार कमाई की। इस ऐतिहासिक सफलता के लिए सलमान खान को जहां 15 करोड़ रुपये की भारी-भरकम फीस दी गई थी, वहीं उनके जोड़ीदार बने गोविंदा को 4 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। व्यावसायिक सफलता के बीच इस फिल्म की कहानी को लेकर एक बड़ा विवाद भी खड़ा हुआ था। दरअसल, ‘पार्टनर’ की पूरी पटकथा वर्ष 2005 में आई हॉलीवुड की सुपरहिट फिल्म ‘हिच’ से प्रेरित थी, जिसमें विल स्मिथ ने एक लव गुरु की भूमिका निभाई थी। चूंकि भारतीय निर्माताओं ने हॉलीवुड फिल्म के आधिकारिक रीमेक राइट्स नहीं खरीदे थे, इसलिए ‘हिच’ की निर्माता कंपनी सोनी पिक्चर्स एंटरटेनमेंट ने ‘पार्टनर’ के मेकर्स पर 30 मिलियन डॉलर का कानूनी मुकदमा ठोकने की तैयारी कर ली थी। इस बड़े अंतरराष्ट्रीय कानूनी विवाद को कोर्ट पहुंचने से पहले ही आपसी सहमति से सुलझा लिया गया, जिसके तहत सोनी पिक्चर्स को इस फिल्म के वर्ल्डवाइड एक्सक्लूसिव सैटेलाइट ब्रॉडकास्टिंग राइट्स हमेशा के लिए सौंप दिए गए। फिल्म की सफलता में इसके संगीत का भी बहुत बड़ा योगदान था, जिसे संगीतकार जोड़ी साजिद-वाजिद ने तैयार किया था। फिल्म का मुख्य गीत ‘सोनी दी नखरे’ आज भी विवाह समारोहों और पार्टियों की मुख्य पसंद बना हुआ है। बेहद दिलचस्प बात यह है कि यह गाना वर्ष 1989 के मशहूर विदेशी ट्रैक ‘पंप अप द जैम’ से प्रेरित था। गोविंदा नब्बे के दशक में अपने अंतरराष्ट्रीय दौरों और स्टेज शोज के दौरान अक्सर इसी मूल अंग्रेजी गाने पर नृत्य किया करते थे। सालों बाद उन्हें उसी धुन के हिंदी रूपांतरण पर बड़े पर्दे पर थिरकने का मौका मिला, जिसने उनके इस कमबैक को भारतीय दर्शकों के लिए हमेशा-कहा के लिए यादगार बना दिया।

IET हॉस्टल बवाल: 17 में से सिर्फ 8 छात्रों ने भरी पेनाल्टी, बाकी को रिजल्ट का इंतजार

मध्यप्रदेश। इंदौर स्थित देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (डीएवीवी) के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (IET) हॉस्टल में हाल ही में हुए उत्पात और तोड़फोड़ के मामले में प्रशासन की कार्रवाई जारी है। हॉस्टल में अनुशासनहीनता और विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप में चिन्हित किए गए 17 छात्रों में से अब तक केवल 8 छात्रों ने ही निर्धारित पेनाल्टी राशि जमा कराई है। शेष छात्रों द्वारा पेनाल्टी जमा नहीं किए जाने के कारण उनके परिणाम रोक दिए गए हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार संबंधित छात्रों पर 25-25 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया था। यह निर्णय हॉस्टल परिसर में हुई तोड़फोड़, अनुशासनहीन व्यवहार और संस्थान की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटना के बाद लिया गया था। प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक छात्र निर्धारित पेनाल्टी जमा नहीं करेंगे, तब तक उनके परीक्षा परिणाम जारी नहीं किए जाएंगे। गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले IET हॉस्टल में फाइनल ईयर के छात्रों द्वारा कथित रूप से जमकर उत्पात मचाया गया था। घटना के दौरान छात्रों ने हॉस्टल परिसर में हंगामा किया, अनुशासनहीन गतिविधियां कीं और कई जगहों पर तोड़फोड़ कर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया। वायरल हुए वीडियो में हॉस्टल परिसर में अव्यवस्था और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के दृश्य सामने आए थे, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल कार्रवाई की थी। प्रारंभिक जांच के बाद प्रशासन ने 17 छात्रों की पहचान की और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कदम उठाए। संबंधित छात्रों को हॉस्टल खाली करने के निर्देश दिए गए थे। साथ ही जिन छात्रों की परीक्षाएं शेष थीं, उन्हें परीक्षा में शामिल होने से भी रोक दिया गया था। इस बीच हॉस्टल में हुए नुकसान की भरपाई और मरम्मत का कार्य भी शुरू कर दिया गया है। टूटे हुए दरवाजों, खिड़कियों, कांच और अन्य क्षतिग्रस्त हिस्सों को दुरुस्त किया जा रहा है ताकि हॉस्टल को दोबारा सामान्य स्थिति में लाया जा सके। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि संस्थान की संपत्ति की सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखना सभी छात्रों की जिम्मेदारी है। सूत्रों के अनुसार जिन छात्रों को परीक्षा देने से रोका गया था, उनके लिए विशेष परीक्षा आयोजित करने पर भी विचार किया जा रहा है। संभावना है कि यह परीक्षा 15 जून के आसपास आयोजित की जाए, हालांकि अभी तक इसकी आधिकारिक तारीख घोषित नहीं की गई है। वहीं कुछ अभिभावकों ने विश्वविद्यालय प्रशासन से संपर्क कर आर्थिक कठिनाइयों का हवाला दिया है और पेनाल्टी जमा करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा है। इस संबंध में IET के डायरेक्टर प्रतोष बंसल ने कहा है कि पेनाल्टी जमा करना अनिवार्य है और इसके बाद ही संबंधित छात्रों को उनका परिणाम उपलब्ध कराया जाएगा। फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन अनुशासनात्मक कार्रवाई और हॉस्टल की मरम्मत दोनों मोर्चों पर काम कर रहा है। आने वाले दिनों में पेनाल्टी जमा करने वाले छात्रों की संख्या बढ़ने और परीक्षा कार्यक्रम को लेकर स्पष्टता आने की संभावना है।

कोर्ट में कथित फर्जीवाड़े के दो मामले उजागर, महिला डॉक्टर समेत दो आरोपियों पर एफआईआर

मध्यप्रदेश। इंदौर में जिला न्यायालय से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने न्यायिक प्रक्रिया में दस्तावेजों की सत्यता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दोनों मामलों में अदालत को कथित रूप से भ्रामक जानकारी और दस्तावेज प्रस्तुत करने के आरोप सामने आए हैं। न्यायालय के निर्देश पर एमजी रोड थाना पुलिस ने प्रकरण दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पहला मामला एक महिला डॉक्टर से जुड़ा है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने एक आपराधिक प्रकरण में आरोपी की जमानत के लिए ऐसी संपत्ति को आधार बनाया, जिसका विक्रय पहले ही किया जा चुका था। पुलिस के अनुसार शिकायत शासन की ओर से अली असलम अंसारी निवासी एमटीएच कम्पाउंड द्वारा दर्ज कराई गई है। एफआईआर के मुताबिक डॉक्टर आसमा (30), निवासी मैजेस्टिक नगर, खजराना ने एक मामले में जमानतदार के रूप में अपनी संपत्ति के दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए थे। बाद में दस्तावेजों की जांच के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित संपत्ति पहले ही किसी अन्य व्यक्ति को बेची जा चुकी थी। आरोप है कि इसके बावजूद उसी संपत्ति को आधार बनाकर आरोपी गुलाब की जमानत लेने का प्रयास किया गया। मामले की सुनवाई के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (जेएमएफसी) इंदौर रवि कुमार साहू ने उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड का परीक्षण किया। प्रारंभिक तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने इसे गंभीर मानते हुए 5 जून 2026 को संबंधित जमानतदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश जारी किए। पुलिस अब पूरे मामले की जांच कर रही है और दस्तावेजों की वैधानिक स्थिति की पड़ताल की जा रही है। दूसरा मामला एक जब्त वाहन को छुड़ाने के प्रयास से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार आरोपी अनिल पुत्र सीताराम सिसोदिया, निवासी जगजीवनराम नगर ने स्वयं को वाहन से संबंधित अधिकार रखने वाला व्यक्ति बताते हुए न्यायालय में दस्तावेज प्रस्तुत किए। आरोप है कि उसने वाहन स्वामी शिवनारायण पुत्र शंकर सिंह गौर के नाम से दस्तावेज पेश कर सुपुर्दगी आदेश प्राप्त करने का प्रयास किया। शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपी ने कथित रूप से वाहन मालिक के नाम से तैयार सुपुर्दगीनामा न्यायालय में जमा किया, जिस पर शिवनारायण के हस्ताक्षर दर्शाए गए थे। पहचान के लिए आधार कार्ड सहित अन्य दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए। हालांकि दस्तावेजों की जांच के दौरान कथित विसंगतियां सामने आने पर मामला उजागर हो गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार दोनों मामलों में दर्ज शिकायतों और न्यायालय के आदेश के आधार पर जांच की जा रही है। दस्तावेजों की सत्यता, संबंधित व्यक्तियों की भूमिका तथा कथित फर्जीवाड़े के पूरे घटनाक्रम की पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने वाले दस्तावेजों की विश्वसनीयता न्यायिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण आधार होती है। ऐसे मामलों में यदि किसी प्रकार की गड़बड़ी या भ्रामक जानकारी सामने आती है तो यह न्याय व्यवस्था को प्रभावित करने वाला गंभीर विषय माना जाता है। फिलहाल दोनों मामलों में पुलिस जांच जारी है और जांच के निष्कर्षों का इंतजार किया जा रहा है।