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विंड एनर्जी से आगे बढ़ेगी सुजलॉन, FY31 तक 10 GW सेल्स और 70 GW एसेट मैनेजमेंट का महत्वाकांक्षी लक्ष्य

नई दिल्ली । भारत के रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर में तेजी से बदलते परिदृश्य के बीच सुजलॉन एनर्जी ने अपने विकास की नई रणनीति ‘Suzlon 2.0’ का ऐलान किया है। इस नई योजना के तहत कंपनी केवल विंड टरबाइन निर्माता की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि विंड, सोलर, बैटरी एनर्जी स्टोरेज और एसेट मैनेजमेंट जैसी सेवाओं को एकीकृत करते हुए खुद को फुल-स्टैक रिन्यूएबल एनर्जी सॉल्यूशंस कंपनी के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। कंपनी का लक्ष्य स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में व्यापक उपस्थिति दर्ज कराते हुए आने वाले वर्षों में अपनी कारोबारी क्षमता को कई गुना बढ़ाना है। कंपनी द्वारा प्रस्तुत रोडमैप के अनुसार वित्त वर्ष 2031 तक वार्षिक रिन्यूएबल एनर्जी बिक्री को 10 गीगावाट तक पहुंचाने और एसेट अंडर मैनेजमेंट को बढ़ाकर 70 गीगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही कंपनी भारतीय पवन ऊर्जा बाजार में अपनी हिस्सेदारी को और मजबूत करने की योजना पर काम कर रही है। वर्तमान में कंपनी देश के विंड एनर्जी बाजार में महत्वपूर्ण उपस्थिति रखती है और आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र को अपना प्रमुख विकास इंजन बनाए रखने का इरादा रखती है। नई रणनीति के तहत कंपनी चार प्रमुख व्यावसायिक स्तंभों पर ध्यान केंद्रित करेगी। इनमें विंड-फर्स्ट ऊर्जा समाधान, परियोजना विकास, ऊर्जा परियोजनाओं का निष्पादन और एसेट मैनेजमेंट सेवाएं शामिल हैं। कंपनी का उद्देश्य ग्राहकों को एक ही मंच पर संपूर्ण रिन्यूएबल एनर्जी समाधान उपलब्ध कराना है, जिससे परियोजनाओं के विकास और संचालन की जटिलताओं को कम किया जा सके। इसके जरिए कंपनी बड़े पैमाने पर स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं को अधिक तेज, प्रभावी और भरोसेमंद तरीके से लागू करने की योजना बना रही है। सुजलॉन का मानना है कि भविष्य में केवल ऊर्जा उत्पादन ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि ऊर्जा के भंडारण और प्रबंधन की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। इसी सोच के तहत कंपनी ने बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम क्षेत्र में प्रवेश करने की घोषणा की है। कंपनी की योजना आने वाले वर्षों में बैटरी स्टोरेज विनिर्माण सुविधाएं विकसित करने और भारतीय बिजली ग्रिड की जरूरतों के अनुरूप उन्नत ऊर्जा भंडारण समाधान उपलब्ध कराने की है। इससे सौर और पवन ऊर्जा जैसी अस्थिर स्रोतों से उत्पन्न बिजली को अधिक विश्वसनीय तरीके से उपयोग में लाया जा सकेगा। विंड एनर्जी कंपनी के विकास का मुख्य आधार बनी रहेगी। सुजलॉन ने इस क्षेत्र में अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ाने और उच्च क्षमता वाले आधुनिक टरबाइन विकसित करने की योजना भी सामने रखी है। कंपनी का मानना है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है और इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचार भविष्य की प्रतिस्पर्धा तय करेंगे। इसी उद्देश्य से अगली पीढ़ी के उच्च क्षमता वाले विंड टरबाइन विकसित किए जा रहे हैं, जो ऊर्जा उत्पादन की दक्षता बढ़ाने में मदद करेंगे। कंपनी ने परियोजना विकास और एसेट मैनेजमेंट को भी अपनी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है। इसके तहत भूमि अधिग्रहण, ग्रिड कनेक्टिविटी, नियामकीय मंजूरियां और परियोजना निष्पादन जैसी प्रक्रियाओं को एकीकृत तरीके से संचालित किया जाएगा। इससे परियोजनाओं की तैयारी और क्रियान्वयन की गति बढ़ाने में सहायता मिलने की उम्मीद है। ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा की मांग आने वाले वर्षों में तेज गति से बढ़ेगी। ऐसे में सुजलॉन की नई रणनीति उसे केवल पवन ऊर्जा कंपनी के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक रिन्यूएबल एनर्जी समाधान प्रदाता के रूप में स्थापित कर सकती है। यदि निर्धारित लक्ष्य समय पर हासिल होते हैं तो कंपनी देश के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में और अधिक मजबूत स्थिति हासिल कर सकती है।

मंदसौर में दो बाइकों की आमने-सामने भिड़ंत: पलवई फंटे पर देर रात हादसा, 2 लोग गंभीर घायल

मंदसौर। जिले के पलवई फंटे पर मंगलवार देर रात करीब 11:30 बजे एक भीषण सड़क हादसा हो गया, जब दो मोटरसाइकिलों की आमने-सामने जोरदार भिड़ंत हो गई। टक्कर इतनी तेज थी कि दोनों बाइक सवार गंभीर रूप से घायल हो गए और मौके पर अफरा-तफरी का माहौल बन गया। स्थानीय लोगों की सूचना पर परिजन मौके पर पहुंचे और घायलों को निजी वाहनों की मदद से तुरंत जिला अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज जारी है। दोनों बाइक सवार गंभीर रूप से घायलहादसे में घायल पहले बाइक सवार की पहचान हेमंत शर्मा (50 वर्ष), पिता रामगोपाल शर्मा, निवासी गुर्जरबर्डिया के रूप में हुई है। वह अपने गांव से बासाखेड़ी की ओर जा रहे थे। वहीं दूसरी बाइक को सुनील दमामी (40 वर्ष), पिता मांगीलाल, निवासी नेतावली चला रहे थे, जो गुर्जरबर्डिया की ओर जा रहे थे। पलवई फंटे के मोड़ पर दोनों बाइकों की आमने-सामने जोरदार टक्कर हो गई। टक्कर के बाद सड़क पर गिरे सवार, मचा हड़कंपप्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दोनों बाइक सवार हवा में उछलकर सड़क पर गिर पड़े। घटना के बाद मौके पर लोगों की भीड़ जमा हो गई और तुरंत राहत कार्य शुरू किया गया। दोनों घायलों को गंभीर हालत में अस्पताल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें सर्जिकल वार्ड में भर्ती कर लिया है। सिर में गंभीर चोटें, कई टांके लगाए गएडॉक्टरों के अनुसार दोनों घायलों के सिर, हाथ और पैरों में गंभीर चोटें आई हैं। सिर में गहरे घाव होने के कारण कई टांके लगाने पड़े हैं। फिलहाल दोनों की हालत पर डॉक्टरों की टीम लगातार नजर बनाए हुए है। स्थानीय लोगों में चिंता का माहौलइस हादसे के बाद क्षेत्र में सड़क सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि पलवई फंटे पर रात के समय अक्सर अंधेरा और मोड़ के कारण दुर्घटनाएं होती रहती हैं, जिससे सुरक्षा व्यवस्था मजबूत किए जाने की जरूरत है।

समान नागरिक संहिता पर जनमत संग्रह की तैयारी, रतलाम में समिति करेगी संवाद

रतलाम। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर राज्य सरकार द्वारा गठित उच्च स्तरीय समिति गुरुवार को रतलाम पहुंचेगी। समिति का उद्देश्य आम जनता, विशेषज्ञों और विभिन्न सामाजिक संगठनों से राय एवं सुझाव प्राप्त करना है, जिन्हें आगे राज्य सरकार को भेजा जाएगा। यह महत्वपूर्ण बैठक 4 जून को शासकीय डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडेय मेडिकल कॉलेज के ऑडिटोरियम में सुबह 11 बजे से आयोजित की जाएगी। विभिन्न वर्गों से मांगे जाएंगे सुझावइस बैठक में समिति के सदस्य उज्जैन के प्रोफेसर डॉ. गोपाल शर्मा और इंदौर की शोभा पैठनकर शामिल होंगे। बैठक में जिले के सांसद, विधायक, मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, शांति समिति के सदस्य, रेडक्रॉस सोसायटी के पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता संघ के सदस्य तथा राजनीति विज्ञान और समाजशास्त्र के प्रोफेसर सहित विभिन्न वर्गों के नागरिक शामिल होंगे। समिति सभी प्रतिभागियों से समान नागरिक संहिता से जुड़े मुद्दों पर विचार और सुझाव एकत्र करेगी, ताकि एक व्यापक दृष्टिकोण तैयार किया जा सके। सुझाव सीधे राज्य सरकार को भेजे जाएंगेबैठक में प्राप्त सभी सुझावों को संकलित कर राज्य शासन को भेजा जाएगा। इसके आधार पर आगे की नीति निर्माण प्रक्रिया में सहायता मिलेगी। अधिकारियों के अनुसार, यह प्रक्रिया पारदर्शी और व्यापक जनभागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जा रही है। प्रशासन ने की तैयारियां तेजबैठक की तैयारियों को लेकर जिला प्रशासन ने व्यापक इंतजाम किए हैं। अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी (एडीएम) डॉ. शालिनी श्रीवास्तव ने बैठक स्थल का निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया और संबंधित अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए। निरीक्षण के दौरान बैठक व्यवस्था, पार्किंग, सुरक्षा, पेयजल, विद्युत व्यवस्था सहित सभी जरूरी सुविधाओं की समीक्षा की गई। इस अवसर पर शहर एसडीएम आर्ची हरित, नगर निगम आयुक्त अनिल भाना और तहसीलदार शहर ऋषभ ठाकुर सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।

मेंस अंडर-18 एशिया कप: आशीष की हैट्रिक, चीनी ताइपे को 13-1 से हराकर भारत सेमीफाइनल में

नई दिल्ली। भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने एक बार फिर अपने आक्रामक खेल से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर धमाल मचा दिया है। मेंस अंडर-18 एशिया कप 2026 के अपने आखिरी पूल ए मुकाबले में भारत ने चीनी ताइपे को 13-1 के बड़े अंतर से हराकर सेमीफाइनल में शानदार एंट्री कर ली। इस एकतरफा मुकाबले में भारतीय टीम पूरी तरह हावी रही और शुरुआत से ही गोलों की बारिश कर दी। भारत की इस धमाकेदार जीत के हीरो रहे आशीष तानी पूर्ति, जिन्होंने शानदार हैट्रिक लगाकर टीम की जीत में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा भारतीय खिलाड़ियों ने सामूहिक प्रदर्शन करते हुए विपक्षी टीम को कोई मौका नहीं दिया।  शुरुआत से ही भारत का दबदबा, पहले ही क्वार्टर में बढ़तमैच की शुरुआत से ही भारत ने आक्रामक रुख अपनाया। 7वें मिनट में करण गौतम ने पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदलकर खाता खोला। इसके बाद प्रेमचंद सोय (11’) ने फील्ड गोल दागकर बढ़त दोगुनी कर दी। कप्तान केतन कुशवाहा (13’) ने तीसरा गोल दागकर पहले क्वार्टर में ही भारत को मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया।  दूसरे क्वार्टर में भी गोलों की रफ्तार जारीदूसरे क्वार्टर में भी भारतीय टीम का दबदबा कायम रहा। राहुल यादव (20’) ने चौथा गोल किया, जबकि आशीष तानी पूर्ति (27’) ने पेनाल्टी कॉर्नर पर गोल करके स्कोर 5-0 कर दिया। इसके बाद सिद्धार्थ बेन (30’) ने शानदार फील्ड गोल दागकर बढ़त और मजबूत कर दी। हालांकि हाफ टाइम से पहले चीनी ताइपे ने एक गोल जरूर किया, लेकिन भारत पहले ही भारी बढ़त ले चुका था।  तीसरे क्वार्टर में आशीष की हैट्रिक, भारत का दबदबा चरम परब्रेक के बाद भी भारतीय टीम ने आक्रामक खेल जारी रखा। 35वें मिनट में आशीष ने अपना दूसरा गोल दागा और फिर 42वें मिनट में पेनाल्टी कॉर्नर से हैट्रिक पूरी की। इसी बीच गाजी खान (40’ और 44’) ने भी दो गोल कर भारत की बढ़त को और विशाल बना दिया।  आखिरी क्वार्टर में भी नहीं रुका गोलों का सिलसिलाचौथे क्वार्टर में भी भारत ने गति कम नहीं की। वरिंदर सिंह (50’) ने पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में बदला। सिद्धार्थ बेन (52’) और राहुल यादव (54’) ने अपने-अपने दूसरे गोल दागकर भारत की 13-1 की ऐतिहासिक जीत सुनिश्चित कर दी।  पूल स्टेज में शानदार प्रदर्शन, सेमीफाइनल में मजबूत दावेदारीभारत ने पूल स्टेज में कजाकिस्तान, कोरिया और चीनी ताइपे के खिलाफ जीत दर्ज की, जबकि मेजबान जापान के खिलाफ उसे हार का सामना करना पड़ा। कुल 9 अंकों के साथ भारत ने सेमीफाइनल में जगह पक्की कर ली है। भारतीय अंडर-18 हॉकी टीम का यह प्रदर्शन न सिर्फ उसकी आक्रामक क्षमता को दिखाता है, बल्कि भविष्य की मजबूत टीम का संकेत भी देता है। 13-1 की यह जीत भारत के आत्मविश्वास को और मजबूत करेगी, खासकर सेमीफाइनल जैसे बड़े मुकाबले से पहले।

दुनिया भर में मिली लोकप्रियता पर बोले राम चरण, कहा- सबसे बड़ी ताकत अपने देश और दर्शकों का समर्थन

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के प्रमुख अभिनेताओं में शामिल राम चरण का मानना है कि किसी भी कलाकार के लिए सबसे बड़ा सम्मान और पहचान अपने देश तथा अपने लोगों से मिलती है। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता और प्रशंसा हासिल करना निश्चित रूप से गर्व की बात है, लेकिन उसकी वास्तविक शुरुआत अपने दर्शकों के विश्वास और समर्थन से होती है। अभिनेता ने स्पष्ट किया कि उनके लिए वैश्विक सफलता से पहले अपने घर और अपने लोगों का प्यार सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। हाल ही में एक बातचीत के दौरान राम चरण ने अपनी वैश्विक पहचान, भारतीय सिनेमा की बढ़ती पहुंच और दर्शकों से मिलने वाले समर्थन को लेकर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि किसी भी कलाकार के करियर की बुनियाद उसके अपने समाज और देश में बनती है। यदि अपने लोग किसी कलाकार के काम को स्वीकार करते हैं और उसे लगातार प्रोत्साहन देते हैं, तभी वह आगे बढ़कर दुनिया के बड़े मंचों तक पहुंच सकता है। राम चरण ने कहा कि उन्होंने अपने करियर की शुरुआत से लेकर आज तक दर्शकों से जो प्यार और समर्थन प्राप्त किया है, वही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। उनके अनुसार, किसी भी उपलब्धि का वास्तविक मूल्य तभी होता है जब उसे अपने लोगों का आशीर्वाद और स्वीकार्यता प्राप्त हो। उन्होंने यह भी कहा कि वह हमेशा उसी स्नेह और विश्वास के साथ जुड़े रहना चाहते हैं, जिसने उन्हें एक अभिनेता के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अभिनेता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय फिल्मों को मिल रही लोकप्रियता पर भी खुशी व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जब दूसरे देशों के दर्शक भारतीय फिल्मों और कलाकारों के काम की सराहना करते हैं, तो यह पूरे भारतीय फिल्म उद्योग के लिए गर्व का विषय होता है। विभिन्न देशों में भारतीय फिल्मों को मिल रही सकारात्मक प्रतिक्रिया यह दर्शाती है कि भारतीय कहानियां और संस्कृति अब वैश्विक दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंच रही हैं। राम चरण का मानना है कि भारतीय सिनेमा की बढ़ती वैश्विक पहचान देश के फिल्म उद्योग के लिए नए अवसर पैदा कर रही है। आज भारतीय फिल्में केवल घरेलू बाजार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों में भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रही हैं। इससे भारतीय कलाकारों और तकनीशियनों को अपनी प्रतिभा को व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इन दिनों राम चरण अपनी आगामी फिल्म ‘पेड्डी’ को लेकर चर्चा में हैं। यह एक स्पोर्ट्स एक्शन ड्रामा फिल्म है, जिसमें वह एक ऐसे खिलाड़ी की भूमिका निभा रहे हैं जो विभिन्न खेलों में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करता है। फिल्म में खेल, संघर्ष, मेहनत और सफलता की कहानी को प्रमुखता से दिखाया गया है। दर्शकों के बीच फिल्म को लेकर उत्सुकता लगातार बढ़ रही है और इसके प्रदर्शन को लेकर उद्योग जगत में भी सकारात्मक उम्मीदें जताई जा रही हैं। फिल्म में कई अनुभवी और चर्चित कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई देंगे। निर्माता और निर्देशक को उम्मीद है कि यह फिल्म दर्शकों को मनोरंजन के साथ प्रेरणा भी देगी। राम चरण ने भी फिल्म को अपने करियर की महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक बताया है। उनका कहना है कि किसी भी कलाकार के लिए नई चुनौतियों को स्वीकार करना और अलग-अलग तरह के किरदार निभाना बेहद जरूरी होता है। अभिनेता के इस बयान ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वैश्विक सफलता और लोकप्रियता के बावजूद वह अपने दर्शकों और अपनी जड़ों से जुड़े रहने को सबसे अधिक महत्व देते हैं। उनके अनुसार, दुनिया की किसी भी उपलब्धि से पहले अपने लोगों का विश्वास और प्यार ही किसी कलाकार की सबसे बड़ी ताकत होती है।

रुपये को संभालने के लिए ब्याज दरें बढ़ाना आत्मघाती: टैक्स नियमों में सुधार ही असली इलाज

जनक राज जनक राजतेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा बाजार में भारी बिकवाली से रुपया दबाव में आ गया है। रुपये की गिरती साख के बीच मीडिया में यह सुझाव आता रहा है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को ब्याज दरें बढ़ाकर भारतीय मुद्रा संभालनी चाहिए। इस सुझाव के पीछे मुख्य तर्क यह है कि ब्याज दरें ऊंची रहने से उधार लेना अधिक महंगा हो जाता है जिससे सट्टेबाजी कम हो जाती है और विदेशी निवेश लाने में आसानी होती है। ब्याज दर का इस्तेमाल आरबीआई मूल्य स्थिरता का लक्ष्य हासिल करने के लिए करता है। मशहूर टिनबर्गेन सिद्धांत के मुताबिक एक साधन का इस्तेमाल केवल एक लक्ष्य हासिल करने के लिए जाना चाहिए। विनिमय दर नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल बाजारों में भ्रम की स्थिति पैदा कर सकता है और मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की विश्वसनीयता को चोट पहुंचा सकता है। दूसरा बात, यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि ब्याज दर बढ़ाने से रुपये में गिरावट थम जाएगी। वर्ष 2013 में ‘टेपर टैंट्रम’ के दौरान (जब अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने घोषणा की कि वह भविष्य में नरमी के कदमों को वापस लेगा) तब ब्याज दर से बचाव रुपये को स्थिर नहीं कर पाया था। बाजार में सुधार अन्य उपायों से दिखा, खासकर बैंकों के लिए आरबीआई की रियायती विदेशी मुद्रा अप्रवासी (बैंक) जमा स्वैप विंडो के जरिये जुटाई गई 34 अरब डॉलर रकम से काफी मदद मिली थी। इस बात के कई ठोस सबूत हैं कि ब्याज दरों के जरिये विनिमय दर नियंत्रित करना शायद ही कभी कारगर होता है। अपवाद के तौर पर गंभीर आर्थिक संकट के दौरान ऐसा किया जा सकता है मगर तब भी ब्याज दरों में बहुत अधिक वृद्धि की जरूरत होती है। भारत में ऐसे हालात अभी नहीं हैं। रुपये पर दबाव मुख्य रूप से तेल की बढ़ती कीमतों के कारण है जिससे चालू खाता घाटा बढ़ रहा है जबकि विदेशी निवेश (एफपीआई) निकलने से रकम की उपलब्धता कम हो रही है। नीतिगत दरों के माध्यम से विनिमय दर नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति समिति को इसमें भारी भरकम बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है जिससे वास्तविक अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। मुद्रा की कमजोरी का मुकाबला करने के लिए ब्याज दरों के इस्तेमाल के गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं। यही कारण है कि दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक इस उपाय का इस्तेमाल करने से हिचकते हैं और ऐसा करते भी हैं तो सतर्क रहते हैं। नीतिगत दर मुद्रास्फीति नियंत्रण का एक माध्यम है। चूंकि, विनिमय दर में गिरावट मुद्रास्फीति को प्रभावित करती है इसलिए नीतिगत दर तभी बढ़ाई जानी चाहिए जब मुद्रास्फीति लक्ष्य से अधिक हो जाए। मौजूदा हालात 2018 जैसे ही हैं। अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति के सामान्यीकरण और तेल की बढ़ती कीमतों के कारण चालू खाता घाटा बढ़ने से विदेशी रकम निकलने लगी जिससे रुपया दबाव में आ गया। तब भी मीडिया में कुछ लोगों ने रुपये की गिरावट रोकने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की वकालत की थी। ऐसी अटकल थी कि एमपीसी सितंबर 2018 में निर्धारित बैठक के दौरान दरें बढ़ाने का फैसला लेगी। हालांकि, कारोबारियों को तब निराशा हाथ लगी जब एमपीसी ने अपनी निर्धारित अक्टूबर की बैठक में दरें अपरिवर्तित रखीं। इसके बाद अगले तीन दिनों में रुपये में एक फीसदी की भारी गिरावट आई क्योंकि यह स्पष्ट हो गया कि एमपीसी विनिमय दर बनाए रखने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल नहीं करेगी। खास बात यह है कि विदेशी निवेशकों ने ज्यादातर शेयरों से अपनी रकम निकाली है। चूंकि, ब्याज दरों में बढ़ोतरी से आम तौर पर शेयरों का मूल्यांकन कम हो जाता है और कंपनियों के लिए पूंजी की लागत बढ़ जाती है इसलिए रुपया संभालने के लिए ब्याज दरों का इस्तेमाल बिकवाली रोकने के बजाय उसे और बढ़ा सकता है। रुपये पर दबाव तो साफ दिख रहा है। हालांकि, इसे बचाने के लिए नीतिगत रीपो दर का उपयोग करने से मौद्रिक नीति का विनिमय दर प्रबंधन के साथ घालमेल हो जाता है। असली चुनौती ऐसे उपाय लागू करना है जो एफपीआई निकासी पर अंकुश लगाए और पूंजी वापस लाने के लिए माहौल दोबारा बनाए। एफपीआई 2025 और 2026 में लगातार शुद्ध बिकवाल रहे। एफपीआई ने वर्ष 2025 में लगभग 19 अरब डॉलर और 2026 में अब तक 24 अरब डॉलर की बिकवाली की है। फरवरी को छोड़कर इस साल हर महीने एफपीआई शुद्ध बिकवाल रहे हैं। इस संदर्भ में यह समझना महत्त्वपूर्ण है कि विदेशी निवेशक भारत से पैसा क्यों निकाल रहे हैं। अमेरिका बॉन्ड पर अब 4.6 फीसदी से अधिक रिटर्न मिल रहा है और रुपये पर भारी दबाव है। इसे देखते हुए विदेशी निवेशकों को भारतीय परिसंपत्तियों से बहुत ज़्यादा रिटर्न की जरूरत होती है, ताकि वे डॉलर के हिसाब से उतना ही कमा सकें जितना वे कहीं और कमा सकते हैं। वैश्विक जोखिम लेने की प्रवृत्ति कम होने पर भारत के प्रति उनका झुकाव कम हो जाता है। एक प्रमुख कारण भारत में पूंजीगत लाभ कर है। विदेशी निवेशक भारतीय शेयरों से अल्पकालिक लाभ पर 20 फीसदी और दीर्घकालिक लाभ पर 12.5 फीसदी कर का भुगतान करते हैं। दूसरी तरफ सिंगापुर, हॉन्ग कॉन्ग, मलेशिया और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्द्धी बाजार विदेशी निवेशकों के पूंजीगत लाभ पर कोई कर नहीं लगाते हैं। कमजोर रुपया और अमेरिका में ऊंची दरों के कारण रिटर्न पहले से ही दबाव में हैं और उस पर करों में यह अंतर विदेशी निवेशकों को भारत के बजाय दूसरे अधिक कर अनुकूल देशों की तरफ धकेल देता है। घरेलू निवेशकों ने विदेशी निवेशकों द्वारा भारी बिकवाली के दबाव से शेयर बाजार को सहारा दिया है। हालांकि, आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद रुपये में पांच महीनों में 5.4 फीसदी की गिरावट आई है और यह नए निचले स्तर पर पहुंच गया है। यह एक दुष्चक्र है। रुपये के और अधिक कमजोर होने की आशंका से विदेशी निवेशक (एफपीआई) अधिक बिकवाली करने लगते हैं जिससे रुपया और कमजोर हो जाता है। यह पूरा चक्र काफी चिंता की बात है, साथ ही कमजोर रुपये से तेल एवं दूसरी वस्तुओं के आयात पर लागत बढ़ने से मुद्रास्फीति भी बढ़ती है। इसे रोकने के लिए पूंजी निकासी थामने के उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इसका

डिजिटल इंडिया को मिलेगी नई रफ्तार, पब्लिक वाई-फाई बन सकता है देश के ब्रॉडबैंड नेटवर्क का मजबूत सहारा

नई दिल्ली । भारत में डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार और इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की लगातार बढ़ती संख्या के बीच पब्लिक वाई-फाई नेटवर्क को देश के ब्रॉडबैंड इंफ्रास्ट्रक्चर का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने की मांग तेज हो रही है। दूरसंचार और डिजिटल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि केवल मोबाइल नेटवर्क के भरोसे देश की भविष्य की डिजिटल आवश्यकताओं को पूरा करना आसान नहीं होगा। ऐसे में पब्लिक वाई-फाई व्यवस्था इंटरनेट पहुंच को अधिक किफायती, व्यापक और प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है। इसी दिशा में उद्योग जगत ने सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क के विस्तार को लेकर एक व्यापक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करने की आवश्यकता पर जोर दिया है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में शामिल हो चुका है और आने वाले वर्षों में डेटा की खपत और भी तेजी से बढ़ने वाली है। शिक्षा, स्वास्थ्य, ई-गवर्नेंस, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन सेवाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीकों के बढ़ते उपयोग के कारण इंटरनेट की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में पब्लिक वाई-फाई नेटवर्क मोबाइल ब्रॉडबैंड का पूरक बनकर बेहतर कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सकता है। इससे मोबाइल नेटवर्क पर ट्रैफिक का दबाव कम होगा और उपयोगकर्ताओं को अधिक स्थिर इंटरनेट अनुभव मिल सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि पब्लिक वाई-फाई विशेष रूप से उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है जहां मोबाइल नेटवर्क की गुणवत्ता सीमित है या इनडोर कनेक्टिविटी अपेक्षाकृत कमजोर रहती है। सार्वजनिक स्थानों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों, बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और ग्रामीण क्षेत्रों में वाई-फाई हॉटस्पॉट का विस्तार लाखों लोगों को सस्ती इंटरनेट सुविधा उपलब्ध करा सकता है। इससे डिजिटल सेवाओं तक पहुंच बढ़ेगी और डिजिटल विभाजन को कम करने में भी मदद मिलेगी। इस दिशा में सुझाव दिया गया है कि सार्वजनिक वाई-फाई नेटवर्क को देश में पहले से विकसित हो रहे डिजिटल और फाइबर नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ जोड़ा जाए। यदि विभिन्न सार्वजनिक डिजिटल परियोजनाओं, फाइबर नेटवर्क और स्मार्ट सिटी पहलों के साथ वाई-फाई हॉटस्पॉट्स का एकीकरण किया जाता है तो देशभर में इंटरनेट पहुंच का दायरा काफी तेजी से बढ़ सकता है। इससे छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी उच्च गुणवत्ता वाली इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराना आसान होगा। तकनीकी विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पब्लिक वाई-फाई के सफल विस्तार के लिए केवल तकनीकी ढांचा ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना भी आवश्यक है। बड़ी संख्या में उपभोक्ता अभी भी सार्वजनिक वाई-फाई सेवाओं की उपयोगिता, सुरक्षा और विश्वसनीयता को लेकर पूरी तरह जागरूक नहीं हैं। इसलिए व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाकर लोगों को इसके लाभों के बारे में जानकारी देना जरूरी माना जा रहा है। इससे छोटे व्यवसायों, स्थानीय उद्यमियों और स्टार्टअप्स को भी नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं। भविष्य की तकनीकों को ध्यान में रखते हुए वाई-फाई 6ई और वाई-फाई 7 जैसी अगली पीढ़ी की प्रणालियों के लिए भी राष्ट्रीय स्तर पर रोडमैप तैयार करने की जरूरत बताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेज गति, कम विलंबता और अधिक क्षमता वाली ये तकनीकें आने वाले वर्षों में डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इसके लिए सस्ते उपकरणों की उपलब्धता, घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा और आधुनिक डिजिटल ढांचे का विकास भी आवश्यक होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक वाई-फाई केवल इंटरनेट सुविधा का माध्यम नहीं है, बल्कि यह डिजिटल समावेशन और आर्थिक विकास का महत्वपूर्ण उपकरण भी बन सकता है। दूरदराज और कम विकसित क्षेत्रों में इसकी पहुंच बढ़ाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाओं और रोजगार के अवसरों को मजबूत किया जा सकता है। यदि केंद्र, राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, दूरसंचार कंपनियां और निजी क्षेत्र मिलकर इस दिशा में काम करते हैं तो भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सकती है और देश की डिजिटल महत्वाकांक्षाओं को मजबूत आधार प्राप्त हो सकता है।

सरकारी डेटा लीक हुआ तो किससे करें शिकायत? जानिए आपके अधिकार

नई दिल्ली ।  सीबीएसई के लाखों छात्रों के लिए शुरू किया गया री-इवैल्यूएशन पोर्टल इन दिनों चर्चा में है। रिपोर्ट्स के मुताबिक पोर्टल के पेमेंट सिस्टम में तकनीकी गड़बड़ी और कथित साइबर हमले के कारण कुछ छात्रों को सिस्टम पर अनधिकृत पहुंच मिल गई थी। इसके चलते कई मामलों में री-इवैल्यूएशन फीस की राशि सामान्य शुल्क की जगह 1 रुपये से लेकर 67-68 हजार रुपये तक दिखाई देने लगी। मामला सामने आने के बाद शिक्षा मंत्रालय, तकनीकी विशेषज्ञों और संबंधित एजेंसियों ने इसकी जांच शुरू कर दी है। इस घटना ने सरकारी पोर्टलों पर डेटा सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। डेटा लीक होने पर नागरिकों के क्या हैं अधिकार?सरकारी पोर्टल या किसी संस्था से डेटा लीक होने की स्थिति में नागरिकों के अधिकार क्या हैं, इसे लेकर लोगों में कई सवाल हैं। भारत में अब डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए विशेष कानून लागू है, जो नागरिकों को कई महत्वपूर्ण अधिकार देता है। क्या है डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2023?भारत सरकार ने डिजिटल डेटा की सुरक्षा के लिए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट 2023 लागू किया है। यह देश का पहला व्यापक डेटा संरक्षण कानून है। इस कानून का उद्देश्य नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी को सुरक्षित रखना और यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी संस्था उनकी अनुमति के बिना उनके डेटा का गलत इस्तेमाल न कर सके। इस कानून के दायरे में आने वाली जानकारी में शामिल हैंमोबाइल नंबरआधार नंबरबैंकिंग जानकारीईमेल आईडीऑनलाइन रिकॉर्डअन्य डिजिटल व्यक्तिगत जानकारीडेटा लीक होने पर मिलते हैं ये अधिकार DPDP एक्ट के तहत नागरिकों को अपने डेटा पर कई महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं। डेटा की जानकारी मांगने का अधिकारकोई भी व्यक्ति यह जान सकता है कि उसका डेटा किस उद्देश्य से एकत्र किया गया है और उसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है। डेटा में सुधार करवाने का अधिकारअगर किसी व्यक्ति की जानकारी गलत है तो वह उसे अपडेट या सही करवाने की मांग कर सकता है। डेटा हटाने का अधिकारजरूरत पड़ने पर व्यक्ति अपने व्यक्तिगत डेटा को हटाने की मांग भी कर सकता है। डेटा लीक की सूचना पाने का अधिकारयदि किसी संस्था से डेटा लीक होता है तो प्रभावित व्यक्ति को इसकी जानकारी देना संस्था की जिम्मेदारी होती है। डेटा लीक होने पर संस्था को क्या करना होगा?कानून के अनुसार डेटा उल्लंघन होने पर संबंधित संस्था को बिना अनावश्यक देरी के प्रभावित लोगों को सूचना देनी होगी। इस सूचना में यह बताना जरूरी होगा डेटा लीक कैसे हुआ, इससे क्या नुकसान हो सकता है समस्या को ठीक करने के लिए कौन से कदम उठाए गए हैं नागरिक खुद को कैसे सुरक्षित रख सकते हैं। किन संस्थाओं पर लागू होता है यह कानून?यह कानून उन सभी संस्थाओं पर लागू होता है जो भारतीय नागरिकों का डिजिटल डेटा एकत्र करती हैं या उसका उपयोग करती हैं। इनमें शामिल हैं सरकारी विभाग, बैंक, अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मोबाइल ऐप, निजी कंपनियां, भारत के बाहर मौजूद वे संगठन भी इस कानून के दायरे में आ सकते हैं, जो भारतीय नागरिकों को सेवाएं देते हैं और उनका डेटा प्रोसेस करते हैं। डेटा लीक होने पर कितना लग सकता है जुर्माना?डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट में डेटा सुरक्षा को लेकर सख्त प्रावधान किए गए हैं। 250 करोड़ रुपये तक का जुर्मानायदि कोई संस्था पर्याप्त सुरक्षा उपाय लागू करने में विफल रहती है और इसके कारण डेटा लीक होता है, तो उस पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। 200 करोड़ रुपये तक की सजायदि कोई संस्था डेटा उल्लंघन की जानकारी समय पर नहीं देती या बच्चों के डेटा से जुड़े नियमों का उल्लंघन करती है, तो उस पर 200 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। डिजिटल युग में डेटा सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो गई है। CBSE पोर्टल से जुड़ी हालिया घटना ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि सरकारी और निजी संस्थाओं को साइबर सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। वहीं नागरिकों को भी अपने अधिकारों की जानकारी होना जरूरी है, ताकि किसी भी डेटा लीक की स्थिति में वे उचित कार्रवाई कर सकें।

पुष्पा झुकेगा नहीं’ लिखी पिकअप से सागौन तस्करी: खंडवा में वन विभाग की बड़ी कार्रवाई

खंडवा। जिले के कालीभीत वन क्षेत्र में सागौन तस्करी का हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जहां फिल्मी अंदाज में ‘पुष्पा झुकेगा नहीं साला’ जैसे डायलॉग लिखी पिकअप गाड़ी से अवैध लकड़ी की तस्करी का खुलासा हुआ। वन विभाग की टीम ने मंगलवार देर रात घेराबंदी कर वाहन को पकड़ लिया, हालांकि अंधेरे का फायदा उठाकर तस्कर मौके से फरार हो गए। जांच में वाहन से करीब 3 घनमीटर सागौन लकड़ी बरामद की गई, जिसकी अनुमानित कीमत लगभग पौने दो लाख रुपये बताई जा रही है। इस कार्रवाई के बाद पूरा मामला क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गया है। जंगल में रोशनी देखकर बढ़ा शक, फिर शुरू हुई कार्रवाईमामला पश्चिम कालीभीत वन परिक्षेत्र के सिरालिया सब रेंज के भुरकुला जंगल क्षेत्र का है। नियमित गश्त के दौरान वनकर्मियों को जंगल के अंदर संदिग्ध वाहन की रोशनी दिखाई दी। देर रात जंगल में वाहन की मौजूदगी संदिग्ध लगने पर तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी गई। इसके बाद वन विभाग की टीम ने इलाके की घेराबंदी कर वाहन को रोका। जैसे ही टीम नजदीक पहुंची, तस्करों ने वन विभाग की गाड़ियों की रोशनी देख वाहन छोड़कर जंगल में भागने में सफलता पा ली। गाड़ी से मिला सागौन का बड़ा जखीराघेराबंदी के बाद जब वाहन की जांच की गई तो वह लॉक मिला। वन विभाग ने लॉक तोड़कर जब तलाशी ली तो अंदर सागौन के करीब 20 लट्ठे भरे हुए पाए गए। इसके बाद वाहन और लकड़ी दोनों को जब्त कर लिया गया। वन विभाग की कार्रवाई के बाद पिकअप पर लिखे फिल्मी डायलॉग भी सुर्खियों में आ गए हैं, जिससे यह मामला सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है। पहले से संदिग्ध थी गाड़ी की गतिविधियांवन परिक्षेत्र अधिकारी विक्रम सिंह भदौरिया ने बताया कि यह वाहन पहले भी कई बार रात के समय जंगल क्षेत्र में संदिग्ध रूप से घूमता देखा गया था। हालांकि तब पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के कारण कार्रवाई संभव नहीं हो सकी थी। इस बार वाहन को सागौन लकड़ी के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया है, जिससे तस्करी की पुष्टि हो गई है। अब विभाग इस पूरे नेटवर्क की जांच में जुट गया है। तस्करी नेटवर्क की जांच तेज, मालिक से पूछताछ की तैयारीप्रारंभिक जांच में यह पिकअप वाहन वनग्राम कोटवारिया निवासी रामकिशन पाटिल के नाम पर दर्ज बताया जा रहा है। वन विभाग अब वाहन मालिक सहित अन्य संदिग्धों से पूछताछ कर तस्करी के पूरे नेटवर्क का खुलासा करने की कोशिश कर रहा है। अज्ञात आरोपियों के खिलाफ वन अधिनियम की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर आगे की जांच शुरू कर दी गई है।

खोखला होता देश, मौन समाज: नशे के खिलाफ अब आर-पार की जंग जरूरी..

ललित गर्ग:- भारत आज विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। देश की लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा शक्ति भारत की सबसे बड़ी सामर्थ्य, सबसे बड़ी पूंजी और उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला है। विज्ञान, तकनीक, उद्योग, शिक्षा, खेल और नवाचार के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियों के पीछे इसी युवा शक्ति का योगदान है। किंतु विडंबना यह है कि आज यही युवा वर्ग नशे के बढ़ते जाल में फंसता जा रहा है। नशा अब केवल व्यक्तिगत कमजोरी या स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक स्थिरता, आर्थिक विकास और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। देश के विभिन्न भागों में समय-समय पर करोड़ों और अरबों रुपये मूल्य के मादक पदार्थों की बरामदगी यह प्रमाणित करती है कि नशे का कारोबार संगठित अपराध का एक विशाल अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क बन चुका है। विशेष रूप से पंजाब, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, गुजरात तथा पूर्वोत्तर राज्यों में सीमापार से होने वाली तस्करी ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा लगातार हेरोइन, अफीम, चरस, कोकीन तथा सिंथेटिक ड्रग्स की बड़ी खेपों को पकड़ा जाना इस बात का संकेत है कि भारत को नशे के बड़े बाजार के रूप में देखा जा रहा है।राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो तथा विभिन्न सरकारी रिपोर्टों के अनुसार देश में लाखों युवा किसी न किसी प्रकार के मादक पदार्थों के सेवन के आदी हैं। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा कराए गए एक व्यापक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया था कि करोड़ों भारतीय तंबाकू, शराब और अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं तथा उनमें बड़ी संख्या युवाओं की है। चिंता की बात यह है कि स्कूल और कॉलेज स्तर तक नशे की पहुंच बढ़ रही है। अनेक राज्यों में ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां किशोरों को ड्रग्स के वितरण और तस्करी में इस्तेमाल किया गया। नशे के बढ़ते संकट का एक राष्ट्रीय सुरक्षा पक्ष भी है। अनेक सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान प्रत्यक्ष युद्ध में लगातार असफल होने के बाद भारत को अस्थिर करने के लिए आतंकवाद, नकली मुद्रा और नशे की तस्करी जैसे छद्म युद्ध के हथियारों का उपयोग करता रहा है। पंजाब में लंबे समय से सीमा पार से ड्रोन और अन्य माध्यमों द्वारा मादक पदार्थों की तस्करी के मामले सामने आते रहे हैं। अब जम्मू-कश्मीर में भी नशे के बढ़ते प्रभाव को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा रहा है। आतंकवाद की कम होती गतिविधियों के बीच नशे का फैलाव एक नए खतरे के रूप में उभर रहा है, जिसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को कमजोर करना और समाज की ऊर्जा को नष्ट करना है।इसी संदर्भ में जम्मू-कश्मीर में प्रारंभ किया गया ‘नशामुक्त जम्मू-कश्मीर’ अभियान महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के नेतृत्व में चल रहा यह अभियान प्रशासनिक कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक सहभागिता पर भी बल देता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शैक्षणिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक समूहों तथा आम नागरिकों को जोड़ने का प्रयास किया गया है। कुलगाम सहित कई क्षेत्रों में विभिन्न समुदायों द्वारा इस अभियान को समर्थन दिया जाना इस बात का संकेत है कि नशे जैसी समस्या का समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। वास्तव में नशे का सबसे दुखद और भयावह प्रभाव युवा पीढ़ी पर पड़ता है। युवा जीवन ऊर्जा, सृजन और सपनों का प्रतीक होता है, किंतु नशा इन सभी संभावनाओं को नष्ट कर देता है। एक बार नशे की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति धीरे-धीरे अपनी शारीरिक क्षमता, मानसिक संतुलन, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा खोने लगता है। उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है और वह अवसाद, तनाव तथा अपराध की दुनिया की ओर बढ़ सकता है। यही कारण है कि नशा केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे परिवार को प्रभावित करता है। परिवार की आर्थिक स्थिति बिगड़ती है, पारिवारिक संबंध टूटते हैं और सामाजिक जीवन में अस्थिरता बढ़ती है।नशे के विस्तार के पीछे केवल तस्करी जिम्मेदार नहीं है। इसके सामाजिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। बेरोजगारी, भविष्य की अनिश्चितता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, पारिवारिक तनाव, सामाजिक विघटन, अकेलापन, मानसिक अवसाद और गलत संगति युवाओं को नशे की ओर धकेलती है। आधुनिक उपभोक्तावादी संस्कृति ने भी कृत्रिम सुख और त्वरित आनंद की मानसिकता को बढ़ावा दिया है। जब जीवन में लक्ष्य, दिशा और सकारात्मक प्रेरणा का अभाव होता है, तब व्यक्ति नशे जैसे विनाशकारी विकल्पों की ओर आकर्षित हो सकता है। नशे और अपराध का संबंध भी अत्यंत गहरा है। अनेक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि चोरी, लूट, हिंसा, सड़क दुर्घटनाओं और अन्य अपराधों के पीछे नशे की भूमिका बढ़ती जा रही है। नशे की डोज प्राप्त करने के लिए युवा अपराध की राह पर उतर जाते हैं। इससे कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है और समाज में असुरक्षा का वातावरण बनता है। सरकारें इस चुनौती से निपटने के लिए अनेक स्तरों पर प्रयास कर रही हैं। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो, राष्ट्रीय जांच एजेंसी, सीमा सुरक्षा बल तथा राज्य पुलिस की संयुक्त कार्रवाइयों से कई बड़े ड्रग नेटवर्क ध्वस्त किए गए हैं। पंजाब, राजस्थान, गुजरात और जम्मू-कश्मीर में विशेष अभियान चलाकर तस्करों पर शिकंजा कसा गया है।इस संदर्भ में सामाजिक और आध्यात्मिक आंदोलनों की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून भय पैदा कर सकता है, लेकिन जीवन में सकारात्मक परिवर्तन केवल जागरूकता और आत्मानुशासन से ही आता है। आचार्य तुलसी ने अणुव्रत आंदोलन के माध्यम से नशामुक्ति को एक व्यापक सामाजिक अभियान का स्वरूप दिया था। उन्होंने संयम, सदाचार और आत्मनियंत्रण के आधार पर लाखों लोगों को व्यसनमुक्त जीवन की प्रेरणा दी। अनेक क्षेत्रों में उनके अभियान ने उल्लेखनीय परिणाम दिए। आचार्य महाश्रमण ने भी अपनी ऐतिहासिक अहिंसा यात्रा के दौरान भारत और पड़ोसी देशों में लाखों लोगों को नशा त्यागने की प्रेरणा दी। उनकी पदयात्राओं का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य समाज में नैतिक चेतना जगाना और युवाओं को व्यसनमुक्त जीवन की ओर प्रेरित करना रहा। हजारों किलोमीटर की यात्राओं में उन्होंने गांव-गांव और शहर-शहर जाकर लोगों को यह संदेश दिया कि नशामुक्ति केवल स्वास्थ्य की सुरक्षा नहीं, बल्कि आत्मविकास, पारिवारिक सुख और राष्ट्र निर्माण का आधार है।आज आवश्यकता इस बात की है कि नशे के विरुद्ध बहुआयामी रणनीति अपनाई जाए। सीमाओं पर