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हनुमान जी को मिला था शक्ति भूलने का श्राप, इसके पीछे की पौराणिक कहानी

नई दिल्ली। मंगलवाल का दिन हनुमान जी की पूजा अर्चना के लिए बहुत ही खास होता है। इस दिन व्रत रहने से आपके ऊपर उनकी कृपा बानी रहती है। कहा जाता हैं कि, बचपन से ही हनुमान जी को कई सिद्धियां और चमत्कारी शक्तियां प्राप्त थीं। उनके पास असीम शक्तियां थीं। वे पहाड़ उठा सकते थे, समुद्र लांघ सकते थे और सूरज को निगल सकते थे।लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ कि वो अपनी शक्तियां को ही भूल गए तो चलिए इससे जुड़ी कथा जानते हैं। हनुमान जी को मिला था ऐसा श्रापपौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हनुमान जी बचपन से ही अत्यंत शक्तिशाली, तेजस्वी और चंचल स्वभाव के थे। वे अपनी दिव्य शक्तियों का प्रयोग खेल-खेल में ही करने लगते थे। कभी वे ऋषि-मुनियों के आश्रमों में पहुंच जाते, तो कभी उनकी साधना में बाधा डालते। एक बार कई महान ऋषि-मुनि वन में तपस्या कर रहे थे। तभी बाल स्वरूप हनुमान जी वहां पहुंचे और अपनी चंचलता के कारण उन्होंने ऋषियों को परेशान करना शुरू कर दिया।ऋषियों ने पहले तो उन्हें समझाने का प्रयास किया, लेकिन जब वे नहीं माने, तब उन्हें क्रोध आ गया।तब ऋषियों ने हनुमान जी को श्राप दिया कि वे अपनी सारी दिव्य शक्तियों को भूल जाएंगे। श्राप का ये था तोड़यह श्राप पूर्ण रूप से दंड देने के लिए नहीं था, बल्कि उनके हित में ही था। ऋषियों ने यह भी कहा कि जब कोई उन्हें उनकी शक्तियों की याद दिलाएगा, तब वे पुनः अपनी शक्ति को पहचान लेंगे और उसका उपयोग धर्म के कार्यों में करेंगे। नारद मुनि और जामवंत ने याद दिलाई थी शक्तियांजब भगवान राम की सेवा का समय आया और सीता माता की खोज के लिए समुद्र पार करना था, तब हनुमान जी अपनी शक्ति को भूल चुके थे। उस समय नारद मुनि और जामवंत ने उन्हें उनकी शक्तियों का स्मरण कराया। तभी हनुमान जी को अपनी अपार शक्ति का बोध हुआ और उन्होंने विशाल रूप धारण कर समुद्र लांघ लिया। इसके बाद उन्होंने राम भगवान की।

देवदूत बने जवान मैहर में ट्रेन हादसा टला, महिला को प्लेटफॉर्म के नीचे जाने से बचाया गया

मैहर । मध्यप्रदेश के मैहर रेलवे स्टेशन पर उस समय बड़ा हादसा टल गया जब चलती ट्रेन में चढ़ने का प्रयास कर रही एक महिला अचानक संतुलन खो बैठी और प्लेटफॉर्म के किनारे से नीचे गिरने लगी। यह पूरा घटनाक्रम कुछ ही सेकेंड में हुआ लेकिन मौके पर मौजूद GRP और RPF जवानों की तत्परता ने एक बड़ी दुर्घटना को होने से रोक दिया। उनकी सूझबूझ और तेजी से लिए गए निर्णय ने महिला की जान बचा ली। यह घटना ट्रेन संख्या 11754 रीवा–इतवारी एक्सप्रेस के जनरल कोच के पास हुई। जानकारी के अनुसार योगिता श्रीवास उम्र 38 वर्ष अपने पति के साथ यात्रा कर रही थीं और ट्रेन में चढ़ने का प्रयास कर रही थीं। इसी दौरान उनका पैर फिसल गया और वह असंतुलित होकर प्लेटफॉर्म और ट्रेन के बीच खतरनाक स्थिति में पहुंच गईं। कुछ ही पल में स्थिति बेहद गंभीर हो गई थी। इसी दौरान ड्यूटी पर तैनात GRP आरक्षक 104 दिनेश कुमार पटेल और RPF आरक्षक प्रमोद मिश्रा ने स्थिति को देखते ही बिना देरी किए कार्रवाई की। दोनों जवानों ने तेजी से दौड़कर महिला को पकड़ लिया और खींचकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। अगर कुछ सेकेंड की भी देरी होती तो यह घटना जानलेवा साबित हो सकती थी। लेकिन उनकी तत्परता से एक बड़ा हादसा टल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार यह घटना बेहद डरावनी थी और आसपास मौजूद यात्री भी कुछ समय के लिए स्तब्ध रह गए थे। लेकिन जवानों की बहादुरी के बाद सभी ने राहत की सांस ली और उनकी सराहना की। यह घटना एक बार फिर रेलवे सुरक्षा और यात्रियों की लापरवाही की ओर ध्यान खींचती है। अक्सर देखा जाता है कि यात्री चलती ट्रेन में चढ़ने या उतरने की कोशिश करते हैं जो बेहद खतरनाक होता है और कई बार जानलेवा साबित हो सकता है। रेलवे प्रशासन लगातार यात्रियों से अपील करता है कि ट्रेन पूरी तरह रुकने के बाद ही उसमें चढ़ें या उतरें। थोड़ी सी लापरवाही बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। मैहर की यह घटना इस बात का उदाहरण है कि सतर्कता और समय पर की गई कार्रवाई से जान बचाई जा सकती है।

दिग्विजय के बाद खाली सीट पर बढ़ी खींचतान कांग्रेस में जातीय समीकरण बने सिरदर्द

भोपाल । मध्यप्रदेश में राज्यसभा की एक सीट को लेकर कांग्रेस के भीतर सियासी हलचल तेज हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का कार्यकाल समाप्त होने के बाद खाली हुई इस सीट ने पार्टी के अंदर नई खींचतान को जन्म दे दिया है। खास बात यह है कि यह विवाद अब केवल राजनीतिक नहीं रहा बल्कि जातीय समीकरणों के इर्दगिर्द घूमता नजर आ रहा है जहां अलग अलग वर्ग अपनी दावेदारी मजबूत करने में जुटे हैं। शुरुआत में अनुसूचित जाति वर्ग की ओर से मांग उठी थी कि इस बार राज्यसभा में दलित नेता को मौका दिया जाए। इस मांग को कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने प्रमुखता से उठाया और पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा जैसे नेताओं का भी समर्थन मिला। इसके बाद विंध्य क्षेत्र के ब्राह्मण नेताओं ने भी सक्रियता दिखाई और उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी दावेदारी रखी। हाल ही में विंध्य क्षेत्र के प्रतिनिधिमंडल ने जीतू पटवारी और उमंग सिंघार से मुलाकात कर यह तर्क दिया कि क्षेत्र में ब्राह्मण समाज का प्रभाव काफी अधिक है और उन्हें राज्यसभा में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। इस मुलाकात के बाद यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी के भीतर जातीय संतुलन का मुद्दा अब और गहराता जा रहा है। इसी बीच अब सिंधी समाज की एंट्री ने इस पूरी प्रक्रिया को और दिलचस्प बना दिया है। रीवा शहर कांग्रेस कमेटी के महामंत्री दिलीप ठारवानी ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पत्र लिखकर सिंधी समाज से प्रतिनिधि भेजने की मांग की है। उन्होंने मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को संबोधित पत्र में अपने लंबे राजनीतिक अनुभव और पार्टी के प्रति समर्पण का उल्लेख करते हुए खुद को एक योग्य दावेदार बताया है। ठारवानी का कहना है कि सिंधी समाज का कांग्रेस के प्रति वर्षों से जुड़ाव रहा है और पार्टी को इस वर्ग को भी प्रतिनिधित्व देने पर विचार करना चाहिए। उनका मानना है कि यदि उन्हें मौका मिलता है तो वे संसद में पार्टी की विचारधारा और जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाएंगे और प्रदेशभर में संगठन को और मजबूत करेंगे। इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के भीतर जातीय समीकरणों को त्रिकोणीय बना दिया है जहां दलित ब्राह्मण और सिंधी समाज तीनों अपनी अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। ऐसे में पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाने की होगी ताकि किसी भी वर्ग की नाराजगी सामने न आए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राज्यसभा जैसी अहम सीट पर उम्मीदवार का चयन केवल योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक और क्षेत्रीय समीकरणों को ध्यान में रखकर किया जाता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस हाईकमान किस वर्ग को प्राथमिकता देता है और किस तरह इस आंतरिक दबाव को संतुलित करता है। फिलहाल यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में राज्यसभा की यह एक सीट कांग्रेस के लिए केवल एक राजनीतिक अवसर नहीं बल्कि संगठनात्मक संतुलन की परीक्षा भी बन चुकी है। आने वाले दिनों में इस पर फैसला पार्टी की रणनीति और भविष्य की राजनीति दोनों को प्रभावित कर सकता है।

Dacoit की बॉक्स ऑफिस पर सुस्त चाल, नहीं पकड़ पा रही रफ्तार

नई दिल्ली। ‘मृणाल ठाकुर’ (Mrunal Thakur) और अदिवि शेष (Adivi Sesh) की फिल्म फिल्म ‘डकैत’ (Dacoit) इस समय सुर्खियों में है। अब तक फिल्म को रिलीज हुए 4 दिन हो गए हैं लेकिन फिल्म कुछ खास कमाल नहीं दिखा पा रही है। 10 अप्रैल को सिनेमाघरों में रिलीज हुई। इस फिल्म को मिले-जुले रिव्यू थे, लेकिन इसके बावजूद इसने अपने पहले दिन अच्छी कमाई की थी। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर ठीक-ठाक शुरुआत की है और अब इसके तीसरे दिन का कलेक्शन क्या है चलिए उसके बारे में बताते हैं। चार दिन में फिल्म का ये रहा कलेक्शनSacnilk के मुताबिक ‘डकैत’ ने बॉक्स ऑफिस पर पहले दिन 6.55 करोड़ का कलेक्शन किया था. वहीं, फिल्म ने दूसरे दिन 6.85 करोड़ का कलेक्शन किया और तीसरे दिन 6.40 करोड़ की कमाई की थीं। वहीं अब चौथे दिन का भी कलेक्शन सामने आ गया है फिल्म ने चौथे दिन 2.70 करोड़ का कलेक्शन किया है। देखा जाए तो फिल्म बिल्कुल भी रफ्तार में नहीं है फिल्म का कलेक्शन दिन पर दिन कम होते ही जा रहा है। बजट से बहुत दूर है डकैतआपको बता दें की इस फिल्म का बजट रिपोर्ट्स के मुताबिक 70-80 करोड़ रुपये का माना जा रहा है। लेकिन फिल्म अब तक अपना बजट निकलने में संघर्ष क्र रही है।अब तक फिल्म ने कुछ खास कमाल नहीं दिखाया हैं। मतलब कि फिल्म अपने पहले वीकेंड में बजट का आधा भी नहीं कमा सकी है। अब लोग आने वाले वीकेंड का ही इंतजार कर रहे हैं। डकैत की कहानीशेनिल देव पहली बार निर्देशन कर रहे उनके द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आदिवी शेष एक इंस्पेक्टर की भूमिका में हैं। कहानी दो पुराने प्रेमियों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिन्हें मिलकर कई चोरियां करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसमें ये दिखाया गया है कि उनकी जिंदगी में बार बार कैसे बदलाव आते है। इस फिल्म में प्रकाश राज और अनुराग कश्यप भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। सुप्रिया यारलागड्डा द्वारा प्रोड्यूस की गई फिल्म ‘डकैत’ को सुनील नारंग ने को-प्रेजेंट किया है और अन्नपूर्णा स्टूडियोज ने इसे प्रेजेंट किया है।

TET परीक्षा पर नए आदेश जल्द, कौन शिक्षक देंगे एग्जाम तय करेगा विभाग

नई दिल्ली। मध्यप्रदेश में टीचर्स एलिजिबिलिटी टेस्ट (TET) को लेकर बड़ा फैसला जल्द सामने आ सकता है। स्कूल शिक्षा विभाग नए सिरे से आदेश जारी करने की तैयारी में है, जिसमें यह स्पष्ट किया जाएगा कि किन शिक्षकों के लिए TET अनिवार्य होगा और किन्हें छूट या सरलीकरण मिलेगा। इस संबंध में लोक शिक्षण आयुक्त अभिषेक सिंह ने अधिकारियों को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं। नए आदेश में तय होगी अनिवार्यता और छूटआयुक्त ने कहा कि प्रस्तावित आदेश में यह बिंदु स्पष्ट रूप से शामिल किया जाएगा कि किन श्रेणी के शिक्षकों को परीक्षा देना जरूरी होगा। साथ ही नियमों के तहत कुछ शिक्षकों को राहत देने के प्रावधानों को भी परिभाषित किया जाएगा, जिससे भ्रम की स्थिति खत्म हो सके। सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका की तैयारीमामले को लेकर विभाग शासकीय अधिवक्ता से कानूनी राय ले रहा है। राय मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करने पर निर्णय लिया जाएगा। इससे पहले कोर्ट ने सख्त निर्देश देते हुए सेवा में बने रहने और प्रमोशन के लिए TET पास करना अनिवार्य कर दिया था। बैठक में कई अहम प्रशासनिक निर्णयसोमवार को आयोजित बैठक में शिक्षक संगठनों और अधिकारियों के साथ चर्चा के दौरान कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इनमें लंबित वेतनवृद्धि और समयमान वेतनमान से जुड़े मामलों को जल्द निपटाने पर सहमति बनी। प्रशिक्षण और मार्गदर्शन कार्यक्रम की तैयारीयदि न्यायालय के निर्देश यथावत रहते हैं, तो TET में शामिल होने वाले शिक्षकों के लिए तहसील और विकासखंड स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इसमें सिलेबस आधारित मार्गदर्शन दिया जाएगा ताकि शिक्षक परीक्षा की बेहतर तैयारी कर सकें। DPI स्तर पर परामर्श बैठक का निर्णयलंबित समस्याओं के समाधान के लिए डीपीआई स्तर पर एक परामर्शदात्री बैठक आयोजित की जाएगी, जिसमें विभिन्न शिक्षक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इसका उद्देश्य सभी पक्षों को साथ लेकर समाधान निकालना है। शिक्षक संगठनों में असंतोषहालांकि इस बैठक को लेकर कुछ शिक्षक संगठनों ने असंतोष जताया है। उनका कहना है कि सभी प्रभावित संगठनों को शामिल नहीं किया गया, जिससे लिए गए निर्णयों की वैधता पर सवाल उठते हैं। कुछ संगठनों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे अधिकृत प्रतिनिधिमंडल के साथ ही चर्चा को मान्यता देंगे। क्या है TET परीक्षा?TET यानी Teacher Eligibility Test एक राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा है, जिसे राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा 2010 में अनिवार्य किया गया था। यह परीक्षा कक्षा 1 से 8 तक के शिक्षकों की योग्यता निर्धारित करती है और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के तहत इसकी वैधानिकता तय की गई है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख1 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जिन शिक्षकों की सेवा अवधि 5 वर्ष से अधिक शेष है, उन्हें TET पास करना अनिवार्य होगा। अन्यथा उन्हें सेवा छोड़नी पड़ सकती है या अनिवार्य सेवानिवृत्ति का सामना करना पड़ सकता है।

अमित शाह के रोड शो के बाद दुर्गापुर में भड़की राजनीतिक हिंसा, बीजेपी और टीएमसी कार्यकर्ताओं की झड़प में दो घायल, पूरे इलाके में तनाव

नई दिल्ली :पश्चिम बंगाल  अमित शाह के रोड शो के बाद दुर्गापुर में बीजेपी और टीएमसी कार्यकर्ताओं के बीच भड़की हिंसक झड़प, राजनीतिक तनाव के बीच दो लोग घायल, इलाके में भारी पुलिस बल तैनात पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के रोड शो के बाद राजनीतिक माहौल अचानक तनावपूर्ण हो गया, जब भारतीय जनता पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़प हो गई। यह घटना बांकुरा मोड़ इलाके में हुई, जहां दोनों दलों के समर्थकों के बीच पहले कहासुनी हुई और देखते ही देखते मामला हिंसा में बदल गया। इस झड़प में दोनों पक्षों के एक एक कार्यकर्ता घायल हो गए, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शुरुआत में दोनों पक्षों के बीच हल्की नोकझोंक हुई थी, लेकिन कुछ ही समय में स्थिति बेकाबू हो गई और हाथापाई शुरू हो गई। घटना के बाद इलाके में अफरा तफरी का माहौल बन गया और स्थानीय लोगों ने स्थिति को शांत करने की कोशिश की। हालांकि तब तक दोनों पक्षों को चोटें लग चुकी थीं। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और स्थिति को नियंत्रण में लिया गया। इलाके में अतिरिक्त पुलिस बल तैनात कर दिया गया है ताकि किसी भी तरह की आगे की हिंसा को रोका जा सके। प्रशासन ने पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की गई है। घायलों को तुरंत दुर्गापुर के सब डिविजनल अस्पताल ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है। इस घटना के बाद राजनीतिक स्तर पर भी आरोप प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। एक पक्ष ने दूसरे पर हमले का आरोप लगाते हुए कहा कि रोड शो के बाद बढ़ी भीड़ से विपक्षी दल असहज हो गया था, जिसके कारण यह झड़प हुई। वहीं दूसरे पक्ष की ओर से भी इस घटना को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। घटना के बाद स्थानीय राजनीतिक नेताओं ने अस्पताल पहुंचकर घायलों का हाल जाना और स्थिति का जायजा लिया। इस दौरान दोनों दलों के समर्थकों के बीच तनाव का माहौल बना रहा। इलाके में फिलहाल स्थिति सामान्य लेकिन संवेदनशील बनी हुई है। पुलिस प्रशासन इस पूरे मामले की जांच में जुटा है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि झड़प की शुरुआत किस कारण से हुई और इसमें कौन कौन शामिल थे। अधिकारियों का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

बिना काम के मिलता रहा वेतन: नगर निगम में फर्जी उपस्थिति पर जांच शुरू

नई दिल्ली। ग्वालियर नगर निगम में सफाई व्यवस्था से जुड़ी बड़ी अनियमितता सामने आई है। बिना उपस्थिति दर्ज किए एक कर्मचारी को वेतन भुगतान किए जाने के मामले में निगमायुक्त संघप्रिय ने कड़ा रुख अपनाते हुए नोटिस, स्थानांतरण और जांच के आदेश जारी किए हैं। लंबे समय से अनुपस्थित कर्मचारी को मिलता रहा वेतनमामला वार्ड क्रमांक-65 का है, जहां पदस्थ सफाई संरक्षक शीला लंबे समय से ड्यूटी पर उपस्थित नहीं थीं। इसके बावजूद उनकी हाजिरी ऑफलाइन दर्ज कर वेतन जारी किया जाता रहा। इस खुलासे के बाद प्रशासन में हड़कंप मच गया। पोर्टल पर नाम नहीं, फिर भी दर्ज होती रही उपस्थितिजांच में यह भी सामने आया कि संबंधित कर्मचारी का नगर निगम के ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीयन तक नहीं था, फिर भी नियमित रूप से उनकी उपस्थिति दर्ज की जाती रही। यह गंभीर प्रशासनिक लापरवाही और संभावित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है। दो अधिकारियों को कारण बताओ नोटिसनिगमायुक्त ने वार्ड हेल्थ ऑफिसर रवि चिंडालिया को कारण बताओ नोटिस जारी कर 20 अप्रैल शाम 6 बजे तक जवाब देने के निर्देश दिए हैं। वहीं जोन क्रमांक-25 के प्रभारी जोनल हेल्थ ऑफिसर अर्जुन दास को भी नोटिस थमाया गया है। उन पर फर्जी हाजिरी दर्ज कराने के लिए दबाव बनाने और भ्रामक शिकायत करने के आरोप हैं। तत्काल स्थानांतरण, नई जिम्मेदारी सौंपी गईकार्रवाई के तहत रवि चिंडालिया का तत्काल प्रभाव से स्थानांतरण कर दिया गया है। उन्हें वार्ड 39 में उनके मूल पद विनियमित सफाई कर्मी के रूप में पदस्थ किया गया है। वहीं वार्ड 65 का अतिरिक्त प्रभार अस्थायी रूप से दिनेश गौहर को सौंपा गया है। तीन दिन में रिपोर्ट देने के निर्देशपूरे मामले की प्राथमिक जांच स्वच्छता अधिकारी दीपेन्द्र सेंगर को सौंपी गई है। उन्हें तीन दिनों के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए हैं, ताकि जिम्मेदारों के खिलाफ आगे की कार्रवाई तय की जा सके। भ्रष्टाचार पर सख्त रुख, प्रशासन का संदेशनगर निगम प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि लापरवाही और भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर बख्शा नहीं जाएगा। यह कार्रवाई अन्य कर्मचारियों के लिए भी एक सख्त संदेश के रूप में देखी जा रही है।

गली क्रिकेट से प्रो लेवल तक: प्रफुल हिंगे की प्रेरणादायक और चौंकाने वाली कहानी

नई दिल्ली। Praful Hinge ने अपने आईपीएल डेब्यू मैच में ऐसा प्रदर्शन किया, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया। Indian Premier League में पहली बार खेलने उतरे इस युवा खिलाड़ी ने पहले ही मैच में 4 विकेट लेकर सनसनी मचा दी और “प्लेयर ऑफ द मैच” का खिताब अपने नाम किया। डेब्यू मैच में ही दिखाया जलवाSunrisers Hyderabad और Rajasthan Royals के बीच खेले गए मुकाबले में हिंगे ने गेंदबाजी से मैच का रुख ही बदल दिया। सनराइजर्स ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 216 रन बनाए थे, जिसके बाद राजस्थान की टीम मुकाबले में मजबूत नजर आ रही थी। लेकिन जैसे ही दूसरी पारी शुरू हुई, हिंगे ने पहले ही ओवर में 3 बड़े बल्लेबाजों को आउट कर मैच को एकतरफा बना दिया। पहले से ही लिखकर रखा था लक्ष्यमैच के बाद Praful Hinge ने बताया कि उन्होंने पहले ही लिखकर रखा था कि वह अपने डेब्यू मैच में 4 से 5 विकेट लेंगे। उन्होंने कहा, “मैंने सोचा था कि पावरप्ले में दबाव बनाऊंगा और विकेट लूंगा। मुझे भरोसा था कि मैं ऐसा कर सकता हूं।” 13 साल की उम्र तक नहीं देखी थी लेदर बॉलहिंगे की कहानी और भी दिलचस्प है। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने 13 साल की उम्र में क्रिकेट शुरू किया, तब उन्हें यह भी नहीं पता था कि लेदर बॉल क्रिकेट क्या होता है। शुरुआत में उनके पिता ने क्लब जॉइन करने से मना कर दिया था, लेकिन बाद में मौका मिला और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वैभव सूर्यवंशी का विकेट रहा खासVaibhav Suryavanshi का विकेट हिंगे के लिए सबसे खास रहा। उन्होंने पहले ही कहा था कि वह बाउंसर डालकर उन्हें आउट करेंगे—और उन्होंने वैसा ही किया। इसके अलावा उन्होंने Riyan Parag को भी आउट किया। हिंगे ने अपने 4 ओवर के स्पेल में 34 रन देकर 4 विकेट लिए। उनके पहले ओवर के तीन विकेट ने ही मैच का नतीजा लगभग तय कर दिया था। इस शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें “प्लेयर ऑफ द मैच” चुना गया। हिंगे ने इस सफलता का श्रेय अपने परिवार और टीम के कोच को दिया। उन्होंने खासतौर पर बॉलिंग कोच Varun Aaron का धन्यवाद किया, जिन्होंने रणनीति बनाने में उनकी मदद की। प्रफुल्ल हिंगे की यह कहानी बताती है कि अगर आत्मविश्वास और मेहनत हो, तो कोई भी सपना सच हो सकता है। 13 साल की उम्र में लेदर बॉल से अनजान रहने वाला खिलाड़ी आज आईपीएल में छा गया है और यह तो बस शुरुआत है।

कितनी पढ़ाई की डॉ. अंबेडकर ने? जानिए उनके जीवन के ऐतिहासिक योगदान

नई दिल्ली। Dr. BR Ambedkar भारतीय इतिहास के सबसे शिक्षित और प्रभावशाली नेताओं में से एक माने जाते हैं। उन्होंने न सिर्फ उच्च शिक्षा हासिल की, बल्कि अपने ज्ञान और संघर्ष से देश के सामाजिक और संवैधानिक ढांचे को मजबूत किया। डॉ. अंबेडकर ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी पढ़ाई की। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय से ग्रेजुएशन किया और इसके बाद अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में मास्टर्स और पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके अलावा उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से भी डॉक्टरेट और कानून की पढ़ाई (Barrister-at-Law) पूरी की। उस दौर में इतनी उच्च शिक्षा हासिल करना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। डॉ. अंबेडकर जयंती के मौके पर पीएम मोदी ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।Dr. BR Ambedkar ने कितनी पढ़ाई की और क्यों माने जाते हैं सबसे शिक्षित नेताडॉ. अंबेडकर ने कुल मिलाकर कई उच्च डिग्रियां हासिल की थीं, जिनमें अर्थशास्त्र, कानून और राजनीति जैसे विषय शामिल थे। वे पहले भारतीयों में से थे जिन्होंने विदेश जाकर इतनी ऊंची शिक्षा प्राप्त की। उनकी पढ़ाई सिर्फ डिग्री तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्होंने समाज को समझने और सुधारने के लिए अपने ज्ञान का इस्तेमाल किया। शिक्षा को वे सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा हथियार मानते थे और उन्होंने दलितों व पिछड़े वर्गों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। संविधान निर्माण से लेकर सामाजिक सुधार तक योगदानडॉ. अंबेडकर का सबसे बड़ा योगदान भारतीय संविधान के निर्माण में रहा। उन्हें संविधान सभा की ड्राफ्टिंग कमेटी का चेयरमैन बनाया गया था और उन्होंने देश को एक मजबूत लोकतांत्रिक ढांचा दिया। इसके अलावा उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए लंबा संघर्ष किया। उन्होंने छुआछूत और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में समानता की नींव रखी। उन्होंने श्रम कानूनों, महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण काम किए। रिजर्वेशन नीति और सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने में उनका योगदान बेहद अहम रहा। कुल मिलाकर, डॉ. भीमराव अंबेडकर न सिर्फ एक महान विद्वान थे, बल्कि ऐसे समाज सुधारक भी थे, जिन्होंने अपने ज्ञान और संघर्ष से भारत को नई दिशा दी।

आस्था या खतरा नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध से बढ़ा प्रदूषण जलीय जीवन पर संकट

भोपाल । मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने की घटना अब गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय बन गई है। धार्मिक आस्था के तहत किए गए इस आयोजन के बाद विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इसका असर केवल तत्काल नहीं बल्कि लंबे समय तक देखने को मिलेगा। विशेष रूप से इसका दूसरा चरण जिसे सेकेंड फेज कहा जा रहा है वह और भी खतरनाक साबित हो सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे के अनुसार इतनी बड़ी मात्रा में दूध नदी में जाने से पानी का संतुलन तेजी से बिगड़ जाता है। शुरुआत में सबसे बड़ा असर घुलित ऑक्सीजन के स्तर पर पड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में पानी में ऑक्सीजन का स्तर 6 से 8 mg प्रति लीटर होता है लेकिन दूध के मिश्रण के बाद यह घटकर 1 से 3 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है। इससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जीवन संकट खड़ा हो जाता है और उनकी मौत शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी मात्रा में दूध को वैज्ञानिक दृष्टि से डेयरी वेस्ट माना जाता है जो सामान्य सीवेज से भी अधिक खतरनाक होता है। दूध में मौजूद कार्बनिक तत्व पानी में घुलकर तेजी से बैक्टीरिया की वृद्धि को बढ़ावा देते हैं जिससे प्रदूषण का स्तर कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का स्तर सामान्य 3 mg प्रति लीटर से बढ़कर 1000 से 1300 mg प्रति लीटर तक पहुंच सकता है जो बेहद खतरनाक स्थिति है। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर पहलू सेकेंड फेज में सामने आता है। पहले चरण में जहां ऑक्सीजन की कमी से जलीय जीव मरते हैं वहीं दूसरे चरण में उनके सड़ने से पानी में बैक्टीरिया और फंगस की मात्रा तेजी से बढ़ती है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है जिसमें पानी की गुणवत्ता लगातार गिरती जाती है और प्रदूषण लंबे समय तक बना रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका असर महीनों तक देखा जा सकता है। इसका प्रभाव केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहता बल्कि जहां दूध प्रवाहित किया गया वहां से कई किलोमीटर डाउनस्ट्रीम तक पानी पीने योग्य नहीं रहता। इससे आसपास के गांवों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। नर्मदा का पानी सामान्यतः क्षारीय प्रकृति का होता है लेकिन दूध के अम्लीय गुण इसके संतुलन को बिगाड़ सकते हैं जिससे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि नदियों के प्रदूषण का मुख्य कारण मानव गतिविधियां ही हैं चाहे वे धार्मिक हों या सामाजिक। पूजा सामग्री फल फूल और अन्य वस्तुओं का विसर्जन भी नदी की सेहत को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है। कानूनी रूप से भी इस तरह की गतिविधियों पर रोक है। जल निवारण एवं प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1974, राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम 2010 और जैविक विविधता अधिनियम 2002 के तहत जल संसाधनों को व्यवस्थित करना दंडनीय है लेकिन जमीनी स्तर पर सख्ती की कमी के कारण ऐसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं बल्कि जागरूकता और जिम्मेदारी से संभव है। आस्था और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है ताकि धार्मिक परंपराएं भी निभें और प्रकृति को नुकसान भी न पहुंचे। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में नर्मदा जैसी महत्वपूर्ण नदी की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।