अप्रैल 2026 में विवाह और मांगलिक कार्य के शुभ मुहूर्त: जानें कौन से दिन करें शादी और गृह प्रवेश

नई दिल्ली। अप्रैल 2026 में विवाह और अन्य मांगलिक कार्यों की तैयारी कर रहे लोगों के लिए शुभ समाचार है। सनातन धर्म में खरमास को विशेष रूप से शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। खरमास साल में दो बार आता है और जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब यह अवधि शुरू होती है। यह पूरे एक महीने तक चलता है और इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, सगाई, मुंडन और नए व्यापार या संपत्ति की खरीद जैसी मांगलिक गतिविधियों से बचने की सलाह दी जाती है। ज्योतिष के अनुसार, सूर्य ग्रह को पिता पक्ष का प्रतिनिधि और ग्रहों का राजा माना गया है। जब सूर्य मीन या धनु राशि में होते हैं, तो उनका तेज कम हो जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य का तेज मांगलिक कार्यों के लिए शुभ फल देने के लिए आवश्यक है। इसलिए खरमास के दौरान कोई भी शुभ कार्य करने से उसका परिणाम अनिश्चित या अशुभ माना जाता है। इस बार अप्रैल 2026 में खरमास 14 अप्रैल को समाप्त हो जाएगा। इस दिन सूर्य देव मेष राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्य का राशि परिवर्तन होते ही खरमास का प्रभाव समाप्त हो जाएगा और 15 अप्रैल से विवाह, मुंडन, नामकरण, गृह प्रवेश और नए कार्य जैसे मांगलिक कार्य फिर से शुभ और फलदायक हो जाएंगे। विवाह के लिए अप्रैल में कुल 8 शुभ मुहूर्त उपलब्ध हैं। ये तिथियां हैं: 15, 20, 21, 25, 26, 27, 28 और 29 अप्रैल 2026। वहीं गृह प्रवेश के लिए अप्रैल में केवल एक मुहूर्त उपलब्ध है, जो 21 अप्रैल 2026 को पड़ रहा है। इस दिन गृह प्रवेश करने से घर में सुख, समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इस प्रकार, अप्रैल के दूसरे भाग से मांगलिक कार्यों की योजना बनाने वालों के लिए समय अत्यंत अनुकूल है। विवाह, गृह प्रवेश या अन्य मांगलिक कार्यक्रमों की तैयारी करने वाले परिवारों को इस अवधि का लाभ उठाना चाहिए। इस समय सूर्य का तेज पूर्ण रूप से प्रभावी होने के कारण सभी शुभ कार्य सफलता और मंगल की प्राप्ति के साथ संपन्न होंगे। अप्रैल 2026 के शुभ मुहूर्तों का पालन कर योजना बनाना न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह आपके कार्यक्रम को सफल और सौभाग्यपूर्ण बनाने में भी मदद करेगा।
राज्य सरकार हर घड़ी किसानों के साथ, तय वक्त पर प्रारंभ होगी गेहूं खरीदी: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश के किसानों का हर तरह से कल्याण हमारी प्रतिबद्धता है। हमारी सरकार हर घड़ी किसानों के साथ है। प्रदेश में तय वक्त पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीदी प्रारंभ कर दी जाएगी। उपार्जन पोर्टल पर पंजीयन कराने वाले सभी किसानों का गेहूं खरीदा जाएगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव रविवार देर शाम अपने निवास स्थित समत्व भवन में गेहूं उपार्जन कार्य के संबंध में सरकार द्वारा गठित मंत्री समूह के सदस्य एवं कृषक प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उपार्जन प्रक्रिया में पहले छोटे किसानों का गेहूं खरीदा जाएगा। इसके बाद मध्यम एवं बड़े किसानों के गेहूं की खरीदी की जाएगी। स्लॉट बुकिंग वाले सभी किसानों का गेहूं चरणबद्ध रूप से खरीदा जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदेश में बारदाने की कोई कमी नहीं है। सरकार सभी व्यवस्थाएं कर रही हैं। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि राज्य सरकार किसानों के हितों की सुरक्षा के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है। गेहूं उपार्जन में बारदान की उपलब्धता निरंतर बनाए रखने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। प्रदेश में गेहूं खरीदी में किसानों को किसी भी प्रकार से बारदाने की समस्या नहीं आने दी जाएगी। केन्द्र सरकार, जूट कमिश्नर सहित अन्य बारदान प्रदाय एजेंसियों से बारदान आपूर्ति के लिए राज्य सरकार लगातार सम्पर्क बनाए हुए है। उपार्जन शुरू होने से पहले कराएं तौल केन्द्रों का निरीक्षणमुख्यमंत्री ने कहा कि गेहूं उपार्जन व्यवस्था को सरल, सहज और सुविधाजनक बनाया जाये। किसानों को उपार्जन केन्द्र तक आने और गेहूं बेचने में किसी भी तरह की कठिनाई न होने पाये। उन्होंने उपार्जन व्यवस्था पर नियमित रूप से निगरानी के लिए एक राज्य स्तरीय एवं कृषि उपज मंडियों में भी कंट्रोल रूम बनाने के निर्देश खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि गेहूं उपार्जन के दृष्टिगत प्रदेश के सभी तौल केंद्रों का 10 अप्रैल से पहले गहन निरीक्षण करा लिया जाए, जिससे किसानों में किसी भी तरह का संशय न रहे। उन्होंने कहा कि प्रदेश की सभी कृषि उपज मंडियों के वर्तमान ढांचे में क्रमबद्ध सुधार किया जाये। सभी मंडियों को वैश्विक जरुरतों के मुताबिक अपग्रेड कर इन्हें वर्ल्ड क्लास मंडी की तरह तैयार किया जाये। मुख्यमंत्री ने कहा कि गेहूं उपार्जन केंद्रों में आने वाले किसानों को सभी प्रकार की बुनियादी सुविधाएं जैसे बिजली, पीने का पानी, बैठक, छाया, प्रसाधन एवं पार्किंग सुविधा उपलब्ध कराई जाये। किसी को भी किसी भी प्रकार की प्रक्रियागत या व्यवस्थागत असुविधा का सामना न करना पड़े। किसी भी केन्द्र में किसानों/ट्रेक्टर-ट्राली की लंबी-लंबी कतारें न लगें, सभी किसानों का सहजता से गेहूं तुल जाये, ऐसी व्यवस्थाएं की जाएं। जिन किसानों से गेहूं खरीदा जाये, कम से कम समय में उनके खातों में भुगतान कर देने की व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की जाएं। 10 अप्रैल से प्रारंभ हो जाएगी गेहूं खरीदीखाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग की अपर मुख्य सचिव रश्मि अरुण शमी ने बताया कि राज्य सरकार द्वारा प्रदेश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी के लिए सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। प्रदेश में इंदौर, उज्जैन, भोपाल एवं नर्मदापुरम संभाग में 10 अप्रैल से एवं अन्य सभी संभागों में 15 अप्रैल से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं का उपार्जन प्रारंभ होने जा रहा है। उन्होंने बताया कि जिन संभागों में 10 अप्रैल से गेहूं खरीदी शुरू होनी है, उनके लिए आगामी मंगलवार, 7 अप्रैल से पंजीकृत किसानों की स्लॉट बुकिंग प्रारंभ हो जायेगी। शुक्रवार, 10 अप्रैल से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीदी प्रारंभ कर दी जाएगी। उपार्जन वर्ष 2026-27 में गेहूं उपार्जन के लिए प्रदेश के 19 लाख 4 हजार 644 किसानों ने अपना पंजीयन कराया है। गेहूं उपार्जन के लिए इस वर्ष प्रदेश में कुल 3627 उपार्जन केंद्र बनाये गये हैं। बीते उपार्जन वर्ष 2025-26 में 15 लाख 44 हजार 55 किसानों ने गेहूं उपार्जन के लिए पंजीयन कराया था। इस उपार्जन वर्ष के लिए गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,625 रुपये प्रति क्विंटल तय किया गया है। राज्य सरकार प्रदेश के किसानों को गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य के अतिरिक्त 40 रूपए प्रति क्विंटल बोनस का लाभ भी इस वर्ष देने जा रही है। अपर मुख्य सचिव ने बताया कि प्रदेश में 78 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन होना अनुमानित है। इसके लिए 3 लाख 12 हजार गठान बारदानों की आवश्यकता होगी। प्रदेश में गेहूं खरीदी आरंभ करने के लिए आवश्यक बारदान का पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। केन्द्र सरकार की ओर से लिमिट भी तय कर दी गई है। राज्य सरकार को केन्द्र से हर जरूरी सहयोग भी मिल रहा है। जूट कमिश्नर कार्यालय सहित अन्य बारदाना प्रदायकर्ताओं से भी बारदान सामग्री प्राप्त की जा रही है। इसके साथ ही गेहूं उपार्जन के लिए गठित मंत्री-मंडलीय समिति के निर्देश पर अतिरिक्त बारदान खरीदने की प्रक्रिया भी तेजी से जारी है। बैठक में राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा, कृषि मंत्री एदल सिंह कंषाना, खाद्य मंत्री गोविन्द सिंह राजपूत, पशुपालन राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) लखन पटेल, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल सहित कृषक प्रतिनिधि और खाद्य, सहकारिता एवं अन्य विभागीय अधिकारी भी उपस्थित थे।
काशी की पावन धरा पर सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य का हुआ भव्य समापन

भोपाल। धर्म, संस्कृति और ज्ञान की अविनाशी नगरी काशी के बीएलडब्ल्यू मैदान में पिछले तीन दिनों से चल रहे सांस्कृतिक महाकुंभ (सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य) का रविवार की शाम गौरवमयी समापन हुआ। महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य के मंचन के अंतिम दिन बाबा विश्वनाथ के हजारों भक्तों, कला रसिकों, कला प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों ने भरपूर आनंद लिया। मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा उत्तर प्रदेश सरकार के विशेष सहयोग से आयोजित महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ के अंतिम दिन वाराणसी की जनता का उत्साह अपने चरम पर रहा। समापन समारोह में उत्तर प्रदेश के वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए। विक्रमादित्य नायक जन-जन के हृदय में लोकमान्यउत्तर प्रदेश के मंत्री सुरेश कुमार ने कहा कि भारत की माटी में भगवान श्रीराम और युगावतार श्रीकृष्ण के बाद यदि कोई नायक जन-जन के हृदय में लोकमान्य हुआ है, तो वे उज्जैन के अधिपति सम्राट विक्रमादित्य ही थे। उन्होंने कहा कि “इतिहास के पन्नों में सम्राट विक्रमादित्य ने दुर्दांत विदेशी आक्रांताओं को भारत की सीमाओं से खदेड़कर निर्णायक विजय प्राप्त की थी, जिसके उपलक्ष्य में गौरवशाली ‘विक्रम सम्वत्’ का प्रवर्तन हुआ।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सरकारें मिलकर अपनी गौरवशाली विरासत को विकास की मुख्यधारा से जोड़ रही हैं। काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित उज्जैन की ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी’ इसी सांस्कृतिक सेतु का जीवंत प्रमाण है। महानाट्य का सजीव मंचन: आँखों के सामने जीवंत हुआ इतिहाससमापन की संध्या पर ‘विशाला’ संस्था उज्जैन के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ ने दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया। भव्य त्रि-आयामी मंच पर जब सैकड़ों कलाकारों ने एक साथ सम्राट के पराक्रम और उनके सुशासन को जीवंत किया, तो पूरा मैदान ‘जय श्री महाकाल’ के जयघोष से गूँज उठा। नाटक के निर्देशक संजीव मालवीय के कुशल निर्देशन में सम्राट की न्यायप्रियता, ‘सिंहासन बत्तीसी’ के प्रसंग और विदेशी शत्रुओं के दमन के दृश्यों को जिस भव्यता के साथ प्रस्तुत किया गया, उसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पार्श्व संगीत, युद्ध के सजीव दृश्य और प्रभावशाली संवादों ने यह सिद्ध कर दिया कि हमारी गौरवशाली संस्कृति आज भी जन-मानस के हृदय में धड़कती है। अभूतपूर्व प्रदर्शनी: सम्राट विक्रमादित्य और अयोध्या का अटूट संबंधमंचन के साथ-साथ आयोजन स्थल पर मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर केंद्रित एक विशेष प्रदर्शनी भी लगाई गई। इस प्रदर्शनी ने वाराणसी के विद्वानों और आमजन को एक चौंकाने वाले ऐतिहासिक तथ्य से परिचित कराया कि अयोध्या में प्रभु श्रीराम के मंदिर का प्राचीन निर्माण सम्राट विक्रमादित्य द्वारा ही संपन्न कराया गया था। प्रदर्शनी में भारतीय ऋषि और विज्ञान, शिव पुराण और मध्य प्रदेश के पवित्र स्थलों की विस्तृत जानकारी दी गई। प्रदर्शनी देखने आए विद्यार्थियों और शोधार्थियों ने इसे ‘ज्ञान का खजाना’ बताया। कक्षा दसवीं की छात्रा रोहिणी यादव ने साझा किया कि उसे पहली बार अपनी समृद्ध वैज्ञानिक परंपरा और विक्रमादित्य के अयोध्या दर्शन के बारे में इतनी गहराई से पता चला। ‘माँ गंगा से नर्मदा तक’: पर्यटन और संस्कृति का ऐतिहासिक एमओयूइस आयोजन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच हुआ एमओयू रहा, जिसकी थीम माँ गंगा से नर्मदा तक” रखी गई। इसके माध्यम से काशी विश्वनाथ (वाराणसी) और महाकालेश्वर (उज्जैन) के बीच धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की योजना बनाई गई है। मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के स्टॉल्स पर काशीवासियों को ‘लघु मध्य प्रदेश’ का अनुभव हुआ। व्हीआर बॉक्स के माध्यम से लोगों ने काशी में बैठे-बैठे ही ओरछा, सांची और खजुराहो की गलियों की यात्रा की। वहीं ‘माँ की रसोई’ में परोसे गए मालवा की प्रसिद्ध थाली, इंदौरी पोहा-जलेबी और कुल्हड़ चाय का स्वाद चखने के लिए लोगों का तांता लगा रहा। लोक कलाओं का मनोहारी संगममहानाट्य के मुख्य मंचन से पूर्व मध्य प्रदेश के लोक कलाकारों ने अपनी अद्भुत कला से काशी को सराबोर कर दिया। मालवा का मटकी नृत्य, निमाड़ का गणगौर, डिंडोरी का गुदम्बबाजा और उज्जैन के डमरू दल की गूँज ने दोनों राज्यों के साझा सांस्कृतिक डीएनए को प्रदर्शित किया। कार्यक्रम के अंत में अतिथियों का सम्मान विक्रम पंचांग और अंगवस्त्र भेंट कर किया गया। इस अवसर पर पंडित नरेश शर्मा, डॉ. राजेश कुशवाहा और राजा भोज शोध प्रभाग के निदेशक संजय यादव ने इस आयोजन को भारतीय गौरव को विश्व पटल पर लाने का एक ‘सांस्कृतिक अनुष्ठान’ बताया। जय महाकाल और जय बाबा विश्वनाथ के नारों के साथ इस ऐतिहासिक त्रिवार्षिक उत्सव का समापन हुआ, जिसने काशी और उज्जैन के बीच के सदियों पुराने आध्यात्मिक संबंधों को और भी प्रगाढ़ कर दिया।
MP: उज्जैन में महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का समापन

भोपाल। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में स्थित तारामंडल में तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम’ का रविवार देर शाम आयोजित पैनल चर्चा ‘वे फॉरवर्ड’ सत्र के साथ समापन हुआ। इस सत्र में देश के प्रमुख वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों ने अंतरिक्ष अनुसंधान, खगोल विज्ञान, स्वदेशी तकनीक, स्टार्टअप्स और भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका पर अपने विचार रखे। मानव संसाधन और स्टार्टअप की भूमिका रही महत्वपूर्णपीआरएल, डीओएस अहमदाबाद के निदेशक प्रो. अनिल भारद्वाज ने सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रमों की सफलता के लिए कुशल मानव संसाधन सबसे महत्वपूर्ण आधार है। चंद्रमा पर मानव मिशन जैसे लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भौतिकी, रसायन विज्ञान, गणित, जीव विज्ञान, चिकित्सा और इंजीनियरिंग जैसे विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी। उन्होंने अंतरिक्ष चिकित्सा, जैव विज्ञान और खाद्य प्रौद्योगिकी जैसे उभरते क्षेत्रों के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने शिक्षा संस्थानों और अनुसंधान संगठनों के बीच बेहतर समन्वय और सूचना के आदान-प्रदान को आवश्यक बताते हुए कहा कि देश में विकसित हो रहे स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र की जटिल चुनौतियों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। स्वदेशी तकनीक और उद्योग सहभागिता पर जोरएनसीआरए-टीआईएफआर, एसपीपी परिसर पुणे के निदेशक प्रो. यशवंत गुप्ता ने खगोल विज्ञान की बड़ी परियोजनाओं में तकनीकी आत्मनिर्भरता और उद्योगों की भागीदारी को जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि पहले कई तकनीकों के लिए भारत को विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन जीएमआरटी जैसे प्रोजेक्ट्स ने देश की तकनीकी क्षमता को साबित किया है। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक परियोजनाओं में विकसित तकनीकों का साझा उपयोग किया जा सकता है, जिससे लागत कम होगी और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच मजबूत तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने की आवश्यकता बताई। स्पेस साइंस की शिक्षा का विस्तार आवश्यकआईआईएसटी के कुलपति प्रो. दीपांकर बनर्जी ने बतायाकि पिछले कुछ वर्षों में स्पेस साइंस क्षेत्र में 300 से अधिक स्टार्टअप सामने आए हैं, जो इस क्षेत्र की बढ़ती संभावनाओं को दर्शाता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान में एस्ट्रोनॉमी और एस्ट्रोफिजिक्स की शिक्षा सीमित संस्थानों तक ही केंद्रित है, इसलिए इस ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की आवश्यकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि स्पेस साइंस और एस्ट्रोनॉमी जैसे विषयों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थी प्रारंभ से ही इस क्षेत्र के प्रति प्रेरित हो सकें। प्रो. बनर्जी शिक्षा, उद्योग, तकनीक और अनुसंधान संस्थानों के संयुक्त प्रयासों को भविष्य के लिए आवश्यक बताया। भारतीय ज्ञान परंपरा और इतिहास के पुनर्पाठ पर बलइंडोलॉजिस्ट एवं चिंतक, पद्मश्री डॉ. भगवती लाल राजपुरोहित ने भारतीय इतिहास और ज्ञान परंपरा के प्रमाण आधारित अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने उज्जैन और मालवा क्षेत्र की कालगणना एवं खगोल विज्ञान की समृद्ध परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इतिहास को तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर पुनः समझने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि उज्जैन प्राचीन काल से समय गणना और खगोल अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है और इस विरासत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुनः स्थापित करने की आवश्यकता है। युवाओं के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अपार अवसरपैनल विशेषज्ञों ने कहा कि भारत का अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है और इसमें युवाओं के लिए रोजगार और अनुसंधान की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। यदि शिक्षा, अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच समन्वित प्रयास किए जाएं, तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ सकता है। सम्मेलन ने उज्जैन की प्राचीन कालगणना परंपरा को आधुनिक अंतरिक्ष विज्ञान से जोड़ते हुए विज्ञान, इतिहास और भारतीय ज्ञान प्रणाली के समन्वय का एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।
MP: ग्वालियर के गांधी उद्यान में सफेद बाघिन मीरा ने दिए 3 शावकों को जन्म

ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर स्थित गांधी प्राणी उद्यान (चिड़ियाघर) में रविवार को सफेद बाघिन मीरा ने तीन शावकों को जन्म दिया है। इनमें दो रॉयल बंगाल और एक सफेद टाइगर शावक शामिल हैं। इस जन्म के साथ ही चिड़ियाघर में बाघों की कुल संख्या 10 हो गई है। चिड़ियाघर के प्रभारी डॉ. उपेंद्र यादव ने बताया कि रविवार दोपहर करीब दो बजे बाघिन मीरा ने तीन शावकों को जन्म दिया। सभी शावक स्वस्थ हैं और उनकी मां मीरा भी सुरक्षित है। उन्होंने पुष्टि की कि जन्मे शावकों में दो रॉयल बंगाल (पीले) और एक सफेद टाइगर है। प्रसव के बाद से मीरा और उसके शावकों की लगातार निगरानी की जा रही है। गांधी उद्यान के क्यूरेटर गौरव परिहार ने बताया कि नवजात शावकों को सुरक्षा और स्वास्थ्य कारणों से आइसोलेशन में रखा गया है। उन्हें बाहरी संपर्क से दूर रखा जाएगा और विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम नियमित रूप से उनके स्वास्थ्य की जांच कर रही है। मीरा को भी बेहतर रिकवरी के लिए हल्का और पौष्टिक आहार दिया जा रहा है। तीन नए शावकों के जन्म के बाद गांधी प्राणी उद्यान में बाघों की कुल संख्या 10 हो गई है। इनमें चार सफेद और छह रॉयल बंगाल टाइगर शामिल हैं। कुल संख्या में 4 नर, 3 मादा और 3 नवजात शावक हैं। ग्वालियर नगर निगम आयुक्त संघ प्रिय के निर्देश पर चिड़ियाघर प्रशासन को विशेष सतर्कता बरतने के लिए कहा गया है। नवजात शावकों की देखभाल के लिए अतिरिक्त व्यवस्थाएं की गई हैं और सभी आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा निर्धारित स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों का भी कड़ाई से पालन किया जा रहा है।
डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय है अदृश्य भारत की पहचान और उम्मीदों का नया द्वार

– कैलाश चन्द्रभारत की स्वाधीनता को 77 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी स्वतंत्र पहचान के लिए संघर्ष कर रहा है—ये हैं डिनोटिफाइड, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू समुदाय, जिन्हें हम डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदाय के नाम से जानते हैं। अनुमान लगाया जाता है कि इनकी जनसंख्या आठ से ग्यारह करोड़ के बीच है, पर विडंबना यह है कि भारत की किसी भी राष्ट्रीय जनगणना ने इन्हें कभी अलग श्रेणी में नहीं गिना। इसी कारण 2027 की प्रस्तावित जनगणना को लेकर इन समुदायों में नई आशा जन्मी है, क्योंकि पहली बार उनकी पहचान साफ़-साफ़ दर्ज होने की संभावना बन रही है। इन समुदायों की पीड़ा इतिहास की धूल में दबी पड़ी है। 1871 के क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट ने लगभग 150–200 समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया था। 1952 में यह कानून भले ही खत्म हुआ, लेकिन समाज की नज़रों में अपराधीकरण का दाग अब तक नहीं मिटा। आज भी कई जगह पुलिस निगरानी, सामाजिक भेदभाव और अविश्वास का सामना उन्हें करना पड़ता है। स्वतंत्र भारत की जनगणनाओं में इन समुदायों के लिए अलग जगह न होना भी एक और बड़ी कमी रही है। सरकार का तर्क यह रहा कि इनकी पहचान राज्य-वार सूचियों में पहले से मौजूद है, लेकिन विशेषज्ञ इसे नीति की अस्पष्टता और प्रशासनिक सुस्ती बताते हैं। स्थिति इतनी जटिल है कि एक ही समुदाय एक राज्य में अनुसूचति जाति (एससी), दूसरे में अनुसूचित जनजाति (एसटी), तीसरे में ओबीसी और कहीं-कहीं किसी भी सूची में नहीं मिलता। नतीजतन योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आरक्षण और पुनर्वास में भारी असमानताएँ पैदा होती हैं। वस्तुत: कई आयोगों ने तो यहाँ तक उल्लेख किया है कि इन समुदायों के नाम पर आने वाला फंड अक्सर उनसे पहले ही किसी और द्वारा खपा लिया जाता है। स्थायी पते की कमी ने इन्हें पहचान-पत्रों, राशन कार्डों, बैंकिंग सुविधाओं और स्वास्थ्य योजनाओं से भी दूर रखा है। ‘रेन्के कमीशन’ ने कहा था कि सरकारी संसाधन इन समुदायों तक शायद ही पहुँच पाते हैं। दो बड़े आयोग, रेनके (2008) और इदाते (2018) ने विस्तृत अध्ययन कर कई महत्वपूर्ण सिफारिशें कीं, पर उनका क्रियान्वयन आज भी बेहद सीमित है। सुप्रीम कोर्ट भी इस विषय को सरकार की नीति का हिस्सा मानकर हस्तक्षेप से पीछे हट गया है, जिससे इन समुदायों की निगाहें अब पूरी तरह केंद्र सरकार के निर्णय पर टिकी हैं। दुखद यह है कि भारत के मीडिया और राष्ट्रीय विमर्श में भी ये समुदाय लगभग अदृश्य बने हुए हैं। जहाँ सामाजिक न्याय की बहसें अक्सर एससी/एसटी/ओबीसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं, वहीं डीएनटी, एनटी, एसएनटी समुदायों का उल्लेख मुश्किल से देखने को मिलता है। विशेषज्ञ इसे “भारत का अदृश्य सामाजिक वर्ग” कहते हैं, लेकिन इस अँधेरे में भी आशा की किरण है। 2027 की जनगणना यदि इन्हें अलग पहचान दे दे, तो पहली बार देश को इनके वास्तविक आँकड़े मिलेंगे, नीतियाँ सटीक बनेंगी, फंडिंग का लक्ष्यीकरण बेहतर होगा और सदियों पुरानी उपेक्षा को दूर करने की दिशा में निर्णायक कदम उठाया जा सकेगा। यही कारण है कि इन समुदायों का कहना है, “पहचान ही अधिकार का पहला कदम है।” इन सबके बीच एक सकारात्मक पहलू यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घुमंतू–अर्धघुमंतू समुदायों के बीच गहरा और निरंतर काम किया है। संघ के स्वयंसेवकों ने प्रशासन के साथ मिलकर 50,000 से अधिक परिवारों को आधार कार्ड, राशन कार्ड और पहचान-पत्र उपलब्ध कराए, जिससे वे पहली बार सरकारी योजनाओं और जनकल्याण व्यवस्था से जुड़ सके। संघ द्वारा संचालित कौशल विकास कार्यक्रमों, जैसे सिलाई, बढ़ईगीरी, हस्तशिल्प, कृषि तकनीक, मोबाइल रिपेयरिंग और लोककला प्रशिक्षण ने अनेक परिवारों में आत्मनिर्भरता का नया भाव जगाया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, नशामुक्ति और सामाजिक समरसता से जुड़े कार्यक्रमों ने समुदायों का आत्मविश्वास बढ़ाया है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस पूरे परिदृश्य में एक बात स्पष्ट है कि भारत का यह बड़ा और बहु-आयामी सामाजिक वर्ग अब भी मान्यता और सम्मान की प्रतीक्षा में है। 2027 की जनगणना उनके लिए सिर्फ आँकड़ों का सवाल नहीं है, यह तो उनकी पहचान और सम्मान की पहली सीढ़ी है। देश यह कदम कब और कैसे उठाता है, यही आने वाले समय में इन समुदायों के भविष्य का निर्धारण करेगा। (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता एवं स्तम्भकार हैं)
गिल की कमी महसूस हुई! साई सुदर्शन ने टीम को संभाला, अश्विन का बड़ा बयान

नई दिल्ली।आईपीएल मुकाबले में शुभमन गिल की गैरमौजूदगी गुजरात टाइटंस के लिए बड़ा झटका साबित हुई, लेकिन युवा बल्लेबाज साई सुदर्शन ने शानदार जिम्मेदारी निभाते हुए टीम को मजबूत शुरुआत दिलाई। भारत के पूर्व स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने सुदर्शन की पारी की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने परिस्थितियों को समझते हुए परिपक्व बल्लेबाजी का प्रदर्शन किया। अश्विन ने बातचीत के दौरान कहा कि सुदर्शन को यह अच्छी तरह पता था कि गिल टीम में नहीं हैं, इसलिए उन्हें खुद आगे बढ़कर जिम्मेदारी उठानी होगी। उन्होंने जिस तरह पारी की शुरुआत की, उससे साफ दिखा कि वह अपनी ताकत और खेल के क्षेत्रों को बखूबी समझते हैं। अश्विन के मुताबिक, सुदर्शन ने गेंद की गति का शानदार इस्तेमाल किया, थर्ड मैन की दिशा में शॉट खेले और फ्रंट फुट पर बेहतरीन कवर ड्राइव लगाकर अपनी तकनीक का प्रदर्शन किया। स्पिन के खिलाफ भी दिखाया दमअश्विन ने खासतौर पर इस बात पर जोर दिया कि सुदर्शन ने स्पिन के खिलाफ भी आत्मविश्वास से खेल दिखाया। रविंद्र जडेजा जैसे अनुभवी गेंदबाज के अटैक में आने के बाद भी उन्होंने संयम नहीं खोया। पहले पेस का इस्तेमाल किया और फिर शानदार स्लॉग स्वीप लगाकर अपने इरादे जाहिर किए। अश्विन का मानना है कि यही सुदर्शन की ताकत है और उन्हें इसी अंदाज में आगे भी बल्लेबाजी करनी चाहिए। 73 रनों की शानदार पारी, फिर भी टीम को हारदरअसल, राजस्थान रॉयल्स के खिलाफ मुकाबले में साई सुदर्शन ने 44 गेंदों में 73 रनों की बेहतरीन पारी खेली। उन्होंने ओपनिंग करते हुए टीम को मजबूत शुरुआत दी, लेकिन इसके बावजूद गुजरात टाइटंस को 6 रन से करीबी हार का सामना करना पड़ा। राजस्थान ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 210 रन बनाए थे, जिसके जवाब में गुजरात की टीम 204 रन ही बना सकी। गिल की वापसी से मजबूत होगी टीमअश्विन ने यह भी कहा कि गिल का टीम में न होना निश्चित रूप से बड़ा नुकसान है, क्योंकि वह टीम के कप्तान होने के साथ-साथ भरोसेमंद बल्लेबाज भी हैं। हालांकि, सुदर्शन ने जिस तरह जिम्मेदारी निभाई, वह टीम के लिए सकारात्मक संकेत है। उन्होंने उम्मीद जताई कि जब शुभमन गिल वापसी करेंगे, तो सुदर्शन के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी टीम को और मजबूती देगी। बता दें कि शुभमन गिल मांसपेशियों में ऐंठन के कारण इस मुकाबले में नहीं खेल पाए थे और उनकी गैरमौजूदगी में राशिद खान ने टीम की कप्तानी संभाली।
स्किन के जिद्दी दाग हटाना हुआ आसान! चेचक के निशानों के लिए ट्राय करें ये टिप्स

नई दिल्ली। आज के समय में हर कोई चाहता है कि उसका चेहरा काफी अच्छा रहे। लेकिन जब चेहरे में दाग धब्बे और चेचक के दाग काफी ज्यादा होते हैं तो हम काफी अनकंफर्टेबल महसूस करते हैं जहां भी जाते हैं हम अपने चेहरे को छुपाने की कोशिश करते हैं। ज्यादा लोगों से बात नहीं करते हैं कि वह हमारे और हमारे चेहरे के बारे में क्या सोचेंगे और अगर आप भी चेचक के दाग से काफी परेशान रहती हैं तो अब आप उन्हें घर पर ही ठीक कर सकते हैं। क्या सच में चेचक का दाग है सकता हैचेचक के दाग त्वचा के ‘कोलेजन’ (Collagen) को नुकसान पहुंचाने के कारण बनते हैं। हालांकि बहुत गहरे गड्ढों को भरने में समय लगता है, लेकिन सही देखभाल और प्राकृतिक उपचारों के नियमित इस्तेमाल से इन निशानों को 70% से 90% तक हल्का किया जा सकता है। नारियल तेलनारियल तेल में ‘लौरिक एसिड’ और विटामिन-E होता है जो नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है। हर रात सोने से पहले प्रभावित हिस्से पर गुनगुने नारियल तेल से मसाज करें। ऐसा करने से आपके चेहरे में निखार आता है और दाग धब्बे भी धीरे-धीरे दूर होने रखते हैं। एलोवेरा जेलआपके चेहरे के लिए काफी अच्छा है। ताजा एलोवेरा जेल न केवल त्वचा को ठंडक देता है, बल्कि इसमें मौजूद ‘एलोइसिन’ निशानों को हल्का करने और त्वचा को समतल बनाने में सहायक है। चेचक के निशान हटाने के लिए रोजाना चेहरे पर ताजे एलोवेरा का जेल लगाएं। एलोवेरा वैसे भी आपके चेहरे पर निखार लाता है। इसे अगर आप सही ढंग से उपयोग करेंगी तो जल्द ही आपके चेहरे से सारे दाग धब्बे दूर हो जाएंगे और आपका चेहरा खिला-खिला और अच्छा बन जाएगा। नींबू और शहदनींबू एक प्राकृतिक ब्लीचिंग एजेंट है जो दागों को हल्का करता है, जबकि शहद त्वचा को हाइड्रेटेड रखता है ताकि वह जल्दी रिकवर हो सके। आप हफ्ते में तीन दिन दोनों को मिलाकर चेहरे पर लगा सकते हैं। इसे लगाने से आपके चेहरे में रंगत आएगी। और दाग धब्बे भी धीरे-धीरे दूर होने लगेंगे।
सनातन धर्म: चेतना, परंपरा और लोकसंस्कार

दीपक कुमार द्विवेदी सनातन धर्म केवल एक आस्था का विषय नहीं बल्कि जीवन की सबसे सूक्ष्म अनुभूति है। यह धर्म न तो किसी एक किताब में समाया है न ही किसी एक व्यक्ति की वाणी में न ही किसी एक विचारधारा तक सीमित है। यह तो एक प्रवाह है जो अनादि काल से बहता आ रहा है और अनंत काल तक बहता रहेगा। यह किसी समय विशेष की रचना नहीं बल्कि स्वयं समय से परे एक सनातन सत्य है। भारत में धर्म केवल किसी देवता की मूर्ति तक सीमित नहीं है। यहाँ ईश्वर न केवल मंदिरों में बल्कि कण-कण में समाया हुआ है। वह लोक में भी है शास्त्र में भी मूर्ति में भी निराकार में भी पीपल के वृक्ष में भी बहती नदी में भी खेतों की हरियाली में भी और आकाश में उड़ते पंछियों में भी। यही कारण है कि भारत में केवल ग्रंथों की पूजा नहीं होती बल्कि लोक-परंपराएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। गाँव-गाँव में अलग-अलग लोकदेवता पूजे जाते हैं डीह बाबा डीह चौरा माई संन्यासी बाबा बरम बाबा कुल देवता स्थान देवता ग्राम देवता। यहाँ हर नदी माँ है हर पर्वत देवता है हर वृक्ष में ईश्वर का वास है। और यही सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है वह हर जगह है वह हर किसी के लिए है और वह हर किसी के भीतर है। ऊपर वाला या सर्वव्याप्त परमात्मा? हमने अक्सर सुना होगा ऊपर वाला सब देख रहा है। लेकिन क्या कभी यह विचार आया कि ईश्वर केवल ऊपर ही क्यों? क्या वह केवल आसमान में बैठा कोई शासक है जो वहाँ से हमें नियंत्रित कर रहा है? क्या वह केवल किसी सिंहासन पर बैठा न्यायाधीश है जो हमें आदेश देता है और हमारे कर्मों का लेखा-जोखा रखता है? नहीं। यह अवधारणा हमारे धर्म की नहीं है। यह धारणा उन अब्राहमिक विचारधारा की है जो ईश्वर को केवल एक राजा के रूप में देखती हैं जो सातवें आसमान में बैठा शासन कर रहा है। लेकिन सनातन धर्म में ईश्वर केवल ऊपर वाला नहीं बल्कि भीतर वाला भी है बाहर वाला भी है आगे वाला भी है पीछे वाला भी है। वह दिशाओं से परे है वह स्थान से परे है वह समय से परे है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अर्थात् मैं प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हूँ। तो फिर यह ऊपर वाला वाली मानसिकता कहाँ से आई? यह हमारी परंपरा में नहीं थी। यह धीरे-धीरे उन अब्राहमिक मतों के प्रभाव से आई जो ईश्वर को केवल एक सत्ताधारी के रूप में देखते हैं। यदि हमारे चित्त में यह बात नहीं उभरती कि ईश्वर केवल ऊपर नहीं बल्कि हर कण-कण में है तो इसका अर्थ यही है कि हिन्दू चित्त पर अहिन्दू प्रभाव पड़ चुका है। लोकपरंपरा: धर्म की आत्मा यह भूमि केवल शास्त्रों की भूमि नहीं यह केवल वेदों और उपनिषदों की भूमि नहीं यह केवल दर्शन और तर्क की भूमि नहीं। यह लोक की भूमि है यह आस्था की भूमि है यह श्रद्धा की भूमि है। यहाँ धर्म केवल गूढ़ ग्रंथों तक सीमित नहीं बल्कि लोकगीतों में गूंजता है नृत्य में थिरकता है मेले-ठेलों में उमड़ता है खेतों-खलिहानों में महकता है। यही कारण है कि लोकपरंपरा में धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं वह जीवन का उत्सव है। गाँवों में देवी-देवताओं की पूजा किसी एक विशेष विधि से नहीं होती। कहीं पीपल के नीचे दीप जलते हैं कहीं नदी किनारे मन्नतें मांगी जाती हैं कहीं किसी वृक्ष को रक्षा सूत्र बांधा जाता है कहीं अनाज की पहली गठरी देवता को अर्पित की जाती है। छठ पूजा हो कांवड़ यात्रा हो गणेशोत्सव हो दुर्गा पूजा हो रामलीला हो ये सब केवल त्योहार नहीं बल्कि धर्म की जीवंत धारा हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी बहती आ रही हैं। विविधता में एकता ही सनातन की पहचानसनातन धर्म किसी एक किताब किसी एक व्यक्ति किसी एक विचारधारा पर निर्भर नहीं। यह विविधताओं का संगम है। यहाँ कोई मूर्ति पूजता है कोई निराकार ब्रह्म की उपासना करता है कोई ध्यान करता है कोई कीर्तन करता है कोई वेदों का अध्ययन करता है कोई लोकदेवताओं की पूजा करता है लेकिन सबका मार्ग एक ही सत्य की ओर जाता है। यही सनातन की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहाँ हर मार्ग स्वीकृत है हर साधना मान्य है हर भक्ति स्वीकार्य है। यहाँ कोई यह नहीं कहता कि यही एकमात्र सत्य है और बाकी सब असत्य। यहाँ हर कोई अपनी प्रकृति के अनुसार अपने मार्ग पर चल सकता है। कोई कर्मयोग से कोई ज्ञानयोग से कोई भक्तियोग से कोई ध्यान से कोई मंत्र से कोई साधना से लेकिन अंततः सबका गंतव्य वही है। अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी जड़ों को पहचानें। हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल कर्मकांडों तक सीमित नहीं बल्कि वह एक जीवंत चेतना है जो हर व्यक्ति के भीतर है। हमें अपने लोकदेवताओं को पुनः स्मरण करना होगा हमें अपनी परंपराओं को पुनः जागृत करना होगा हमें यह समझना होगा कि ईश्वर केवल सातवें आसमान में नहीं बैठा बल्कि वह हमारे चारों ओर है हमारे भीतर है हमारी साँसों में है हमारी चेतना में है। यदि हम अपनी परंपराओं को भूलते गए यदि हमने अपनी लोकपरंपराओं को छोड़ दिया यदि हमने अपने कुलदेवताओं को विस्मृत कर दिया यदि हमने अपने ग्रामदेवताओं का आदर करना बंद कर दिया यदि हमने यह मान लिया कि ईश्वर केवल ऊपर वाला है तो यह हमारी सबसे बड़ी हार होगी। हमें अपनी चेतना को जागृत करना होगा हमें अपनी परंपराओं को पुनः स्थापित करना होगा हमें यह समझना होगा कि हिन्दू धर्म केवल ग्रंथों में नहीं बल्कि जीवन के हर क्षण में है। ईश्वर हर जगह है हर किसी के लिए हैसनातन धर्म की यह व्यापकता ही उसकी महानता है। यह केवल पूजा-पद्धति नहीं यह केवल दर्शन नहीं यह केवल कर्मकांड नहीं यह संपूर्ण जीवन का सत्य है। यह हमें यह नहीं कहता कि ईश्वर केवल ऊपर है यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही मार्ग सत्य है यह हमें यह नहीं कहता कि केवल एक ही ग्रंथ अंतिम सत्य है। यह हमें यह सिखाता है कि ईश्वर हर कण में
Ravivar Mantra: सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए अपनाएं ये आसान पूजा विधि

नई दिल्ली। सूर्य भगवान की पूजा अर्चना करने से आपके जीवन में चल रही सभी परे दिन सूर्य भगवान की पूजा अर्चना करके उनकी कृपा प्राप्त कर लें। ज्योतिष शास्त्र में भी बताया गया है कि जो जातक सूर्य देव की पूजा अर्चना करेंगे उनका व्रत रहेंगे उनके घर परिवार में हमेशा सुख समृद्धि बनी रहेगी। सूर्य भगवान की कृपा से रुका हुआ काम भी बनने लगता है आपकी कई परेशानियां खत्म हो जाती है। आज के दिन आपको उनके कुछ चमत्कारी मंत्रों का भी जाप करना चाहिए। पूजा विधिआपको सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कर लेना चाहिए। इसके बाद तांबे के लोटे में सिंदूर अक्षत और लाल फूल डालकर आप सूर्य भगवान को जल अर्पित करें। इसके बाद पूजा के चौकी में लाल रंग का कपड़ा रखकर सूर्य देव की तस्वीर स्थापित करें। भगवान को रोली, अक्षत, सुपारी, फूल आदि चढ़ाएं। फल व मिष्ठान का भोग लगाएं और फिर धूप दिखाएं।अब रविवार की व्रत कथा पढ़े या सुने। अंत में सूर्य देव की आरती जरूर करें। इन मंत्रों का करें जापॐ ह्रां भानवे नम: ॐ हृों खगाय नम: ॐ हृां मित्राय नम: ॐ हृीं रवये नम: ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः। ॐ ह्रां हिरण्यगर्भाय नमः ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय सहस्रकिरणराय मनोवांछित फलम् देहि देहि स्वाहा।। ॐ ऐहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपयेमां भक्त्या, गृहाणार्घय दिवाकर:। ॐ ह्रीं घृणिः सूर्य आदित्यः क्लीं ॐ। ऊं घृणिं सूर्य्य: आदित्य:। इस प्रकार करें सूर्य भगवान को प्रसन्नसूर्य भगवान को प्रसन्न करने के लिए आज के दिन आपको लाल कपड़ा पहनना चाहिए ऐसा माना जाता है कि सूर्य भगवान को लाल कपड़ा अधिक प्रिय है। इससे उनकी कृपा आपके ऊपर बनी रहती है। वहीं अगर आपका कोई भी काम नहीं बन रहा है तो आप सूर्य देव को अर्घ्य देते समय गुलहड़ का एक फूल लेकर सूर्य भगवान का मंत्र उच्चारण करके जल में डालकर अर्घ्य दें। इससे भगवान की कृपा पर बनी रहती है। इसके अलावा आज के दिन जरूरतमंदों को दान भी देना चाहिए।