रिपोर्ट के मुताबिक फरवरी 2014 में 13 पदों की मांग भेजी गई थी और उसी आधार पर परीक्षा आयोजित कर अगस्त 2016 में 13 अभ्यर्थियों की अनुशंसा की गई। दिसंबर 2016 में इन अभ्यर्थियों को नियुक्ति भी दे दी गई। हालांकि इसी बीच सितंबर 2014 में 13 पदों की मांग फिर से भेजे जाने से परीक्षा पुनः आयोजित कर दी गई और दिसंबर 2016 में 13 और अभ्यर्थियों की अनुशंसा कर दी गई। लेकिन इस दूसरी अनुशंसा पर कभी नियुक्ति नहीं दी गई। बाद में मामला कोर्ट तक जा पहुंचा।
2018 में शासन ने परिवहन विभाग के 19 पदों में से 9 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी लेकिन इस प्रक्रिया ने भर्ती की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े कर दिए। CAG की रिपोर्ट स्पष्ट तौर पर कहती है कि भर्ती के लिए भेजे गए दावों और मांग पत्रों की जांच का कोई ठोस तंत्र नहीं था जिसके चलते विभाग द्वारा एक ही पद के लिए दो अलग-अलग मांग भेजे जाने के बावजूद दोनों चयन प्रक्रियाएं आगे बढ़ गईं। यह एक गंभीर चूक और व्यवस्था की विफलता है।
ऑडिट में यह भी संकेत मिला है कि एमपीपीएससी मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग तथा विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण भी यह स्थिति उत्पन्न हुई जहाँ मांगों की वैधता और भर्ती के नियमानुसार परिणाम सुनिश्चित करने में दोनों पक्ष विफल रहे। CAG ने कहा कि विभाग और आयोग के अंदर आंतरिक नियंत्रण प्रणाली कमजोर थी और इस वजह से भर्ती प्रक्रिया में अनियमितताएं सामने आईं।
विशेष रूप से रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि बजाय कि पदों की संख्या यथावत रखी जाए भर्ती प्रक्रिया में दोगुनी संख्या 26 चयन हो गई जिससे चयन प्रक्रिया के नियमों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए। CAG ने भर्ती की पद्धति और दस्तावेज़ों की समीक्षा के लिए ठोस तंत्र ना होने को एक बड़ी चूक बताया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की गड़बड़ियों से भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर भारी असर पड़ता है खासकर युवा उम्मीदवारों के भरोसे को कमजोर करता है। विभाग की तरफ से इस मामले पर फिलहाल कोई विस्तृत बयान सार्वजनिक नहीं किया गया है लेकिन CAG की रिपोर्ट के बाद इस भर्ती प्रक्रिया की जांच और स्पष्टता की मांग बढ़ती दिखाई दे रही है।