ईरान जंग का असर: कतर ने भारत को LNG सप्लाई में 40% तक कटौती की, ऊर्जा बाजार में बढ़ी हलचल

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव का सीधा असर अब भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर दिखाई देने लगा है। भारत को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देश कतर ने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात में 10 से 40 प्रतिशत तक की कटौती कर दी है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच संघर्ष तेज हो चुका है और खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा हालात बिगड़ गए हैं। हमलों के बाद प्लांट बंद, सप्लाई प्रभावितईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। साथ ही दुनिया के सबसे बड़े LNG हब में से एक रास लफ़्फ़ान इंडस्ट्रियल सिटी और मेसाईद इंडस्ट्रियल सिटी पर ड्रोन और मिसाइल हमले किए गए। इन हमलों के बाद कतर को एहतियातन LNG उत्पादन रोकना पड़ा। नतीजतन वैश्विक गैस आपूर्ति पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। भारत कतर से LNG खरीदने वाले सबसे बड़े ग्राहकों में शामिल है। देश हर साल करीब 27 मिलियन टन LNG आयात करता है, जिसमें लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा कतर से आता है। इस गैस का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उर्वरक निर्माण, CNG वितरण और पाइप्ड कुकिंग गैस नेटवर्क जैसे अहम क्षेत्रों में होता है। पेट्रोनेट ने दी सप्लाई रुकने की सूचनाभारत की प्रमुख गैस आयातक कंपनी पेट्रोनेट LNG लिमिटेड ने गैस मार्केटर्स को सूचित किया है कि कतर ने उत्पादन रोक दिया है। इसके बाद GAIL लिमिटेड और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को भी सप्लाई बाधित होने की जानकारी दी गई। बताया जा रहा है कि CNG रिटेलिंग के लिए फ्लो रेट बनाए रखते हुए औद्योगिक इकाइयों को गैस आपूर्ति में कटौती की गई है। सूत्रों के अनुसार यह कटौती 10 प्रतिशत से लेकर 40 प्रतिशत तक हो सकती है। पेट्रोनेट का कतर से हर साल 8.5 मिलियन टन LNG खरीदने का दीर्घकालिक अनुबंध है, जबकि कुछ मात्रा स्पॉट मार्केट से भी ली जाती है। होर्मुज जलडमरूमध्य बना संकट की जड़तनाव का बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट है, जिस पर ईरान का नियंत्रण है। यह समुद्री मार्ग भारत के लिए बेहद अहम है, क्योंकि लगभग 50 प्रतिशत कच्चा तेल और 54 प्रतिशत LNG आपूर्ति इसी रास्ते से होकर गुजरती है। यही मार्ग कतर और UAE से आने वाली गैस के लिए मुख्य ट्रांजिट रूट है। हमलों के बाद इस मार्ग से तेल और LNG शिपमेंट लगभग ठप पड़ गई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा कीमतों में उछाल आ गया है और युद्ध जोखिम बीमा व शिपिंग लागत भी बढ़ गई है। स्पॉट मार्केट में कीमतें दोगुनीGAIL और IOC कमी की भरपाई के लिए स्पॉट मार्केट से LNG खरीदने पर विचार कर रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। स्पॉट मार्केट में LNG की कीमत अब 25 अमेरिकी डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट तक पहुंच गई है, जो दीर्घकालिक अनुबंध दर से लगभग दोगुनी है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है तो भारत समेत कई आयातक देशों के लिए गैस आपूर्ति और कीमतों का संकट और गहरा सकता है।
मिडिल ईस्ट तनाव का असर! सोने की चमक बढ़ी, लगातार पांचवें दिन दाम चढ़े
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ऊर्जा कीमतों में उछाल के बीच सोना एक बार फिर निवेशकों का पसंदीदा सुरक्षित ठिकाना बन गया है। वैश्विक बाजारों में मंगलवार को सोने की कीमतों में लगातार पांचवें सत्र में तेजी दर्ज की गई। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और महंगाई की आशंकाओं ने कीमती धातुओं में जोरदार खरीदारी को बढ़ावा दिया है। एमसीएक्स पर रिकॉर्ड उछालभारत के Multi Commodity Exchange of India (एमसीएक्स) पर अप्रैल डिलीवरी वाला सोना सोमवार को 2.53 प्रतिशत चढ़कर 1,66,199 रुपये प्रति 10 ग्राम पर पहुंच गया। वहीं मई डिलीवरी वाली चांदी 0.90 प्रतिशत गिरकर 2,80,090 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई। होली के कारण मंगलवार को पहले सत्र में एमसीएक्स पर कारोबार बंद रहा और शाम 5 बजे से ट्रेडिंग दोबारा शुरू होनी है। वैश्विक बाजारों में भी तेजीअंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड 0.8 प्रतिशत बढ़कर 5,360 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी गोल्ड फ्यूचर्स में करीब 1 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई। स्पॉट सिल्वर लगभग 1.9 प्रतिशत उछलकर 91.11 डॉलर प्रति औंस पर पहुंच गया। हालांकि डॉलर इंडेक्स 0.19 प्रतिशत बढ़कर 98.57 पर पहुंच गया, जिससे डॉलर आधारित सोना विदेशी खरीदारों के लिए महंगा हो गया और तेजी की रफ्तार पर कुछ हद तक अंकुश लगा। तनाव की आग में घी का काम कर रहा तेलअमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जरूरत पड़ने तक जारी रहेगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, तेहरान ने सऊदी अरब में तेल और गैस ढांचे को निशाना बनाया है और रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को नुकसान पहुंचाने की चेतावनी दी है। इसके जवाब में इजरायल ने ईरान के कमांड केंद्रों पर ‘हमलों की नई लहर’ शुरू करने की घोषणा की। इस बढ़ते टकराव से ऊर्जा आपूर्ति बाधित होने की आशंका गहरा गई है। अमेरिकी कच्चा तेल वायदा 1.4 प्रतिशत बढ़कर 72.23 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 1.87 प्रतिशत की तेजी के साथ 79.2 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा। तेल की बढ़ती कीमतें महंगाई की चिंताओं को और हवा दे रही हैं, जिससे सोने की मांग मजबूत हो रही है। फेड की नीति पर नजरनिवेशक अब अमेरिका के विनिर्माण और गैर-विनिर्माण पीएमआई, एडीपी नॉन-फार्म रोजगार आंकड़े और बेरोजगारी दर जैसे संकेतकों पर नजर टिकाए हुए हैं। इन आंकड़ों से Federal Reserve की आगे की मौद्रिक नीति का संकेत मिल सकता है। यदि महंगाई दबाव बना रहता है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो सोने की कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। हालांकि अनिश्चितता के माहौल में निवेशक फिलहाल सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर झुकाव दिखा रहे हैं। 2026 में 25% चढ़ चुका है सोनासाल 2026 में अब तक सोने की कीमतों में करीब 25 प्रतिशत की तेजी आ चुकी है। पिछले वर्ष भी सोना लगभग 64 प्रतिशत चढ़ा था। इस तेजी के पीछे केंद्रीय बैंकों की मजबूत खरीदारी, एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ETF) में बढ़ता निवेश और फेडरल रिजर्व की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएं प्रमुख कारण रही हैं। विश्लेषकों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में हालात सामान्य नहीं होते और ऊर्जा बाजार स्थिर नहीं होता, तब तक सोने में मजबूती बनी रह सकती है। हालांकि मजबूत डॉलर और ऊंची ब्याज दरें इसकी रफ्तार को सीमित कर सकती हैं।
होर्मुज संकट: भारत की तेल रणनीति में रूस और सऊदी की अहम भूमिका..

नई दिल्ली :भारत का कच्चे तेल आयात रणनीति India पिछले कुछ महीनों में काफी बदल गया है। हालाँकि भारत ने रूस से तेल की खरीद कम कर दी है, लेकिन रूस अभी भी सबसे बड़ा सप्लायर बना हुआ है। फरवरी में सऊदी अरब से क्रूड की सप्लाई में 30 फीसदी की वृद्धि हुई और यह रोजाना 10 लाख बैरल के स्तर तक पहुंच गई, जो जनवरी में 7.7 लाख बैरल थी। ग्लोबल डेटा सर्विस प्रोवाइडर Kpler के अनुसार, पिछले कुछ सालों में सऊदी से आयात रोजाना 6-7 लाख बैरल के आसपास था, लेकिन फरवरी में यह छह साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। वहीं रूस से तेल का आयात जनवरी में 11 लाख और दिसंबर में 12 लाख बैरल था, जबकि फरवरी में यह करीब 10 लाख बैरल प्रति दिन रहा। पश्चिम एशिया से भारत की सप्लाई बढ़ने के कारण गल्फ क्षेत्र से आने वाले क्रूड की हिस्सेदारी इम्पोर्ट बास्केट में बढ़ी है। लेकिन ईरान संकट और होर्मुज की खाड़ी में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से यह स्थिति अस्थिर हो गई है। भारत के पास वर्तमान में केवल 18 दिन का क्रूड स्टॉक उपलब्ध है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ईरान संकट लंबा खिंचता है तो भारतीय रिफाइनरी कंपनियों को वैकल्पिक स्रोतों से तेल खरीदना होगा। रूस से अतिरिक्त सप्लाई की संभावना मौजूद है क्योंकि उसके कई जहाज समुद्र में हैं जिन्हें भारत की तरफ मोड़ा जा सकता है। इस बीच भारत ने होर्मुज की खाड़ी में ट्रांजिट कर रहे 25-27 लाख बैरल तेल पर भी नजर रखी है, जो ईराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से आ रहा है। संकट की स्थिति में भारत की ऊर्जा सुरक्षा और रिफाइनिंग आपूर्ति बनाए रखने के लिए रूस और सऊदी से तेल की खरीद बढ़ाना पड़ सकता है।इस रणनीति से भारत न केवल आपूर्ति संकट से निपटने में सक्षम होगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच स्थिरता भी बनाए रख सकेगा।
EPFO ने पेंशन, बीमा और ट्रस्टों के लिए एमनेस्टी स्कीम की मंजूरी दी, PF ब्याज दर जारी

नई दिल्ली :रिटायरमेंट फंड के संचालन वाली संस्था EPFO ने वित्त वर्ष 2025-26 के लिए भविष्य निधि (EPF) पर ब्याज दर 8.25 प्रतिशत तय की है। यह लगातार तीसरे साल ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं है। सोमवार को केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में हुई सेंट्रल बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज (CBT) की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए। सबसे प्रमुख घोषणा ट्रस्टों के लिए छह महीने की ‘माफी योजना’ (एमनेस्टी स्कीम) है। यह उन ट्रस्टों पर लागू होगी जो अब तक EPF कानून के दायरे में नहीं आए हैं। योजना का उद्देश्य कंपनियों और ट्रस्टों को नियमों में लाना और कर्मचारियों के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। पहले से नियमों के अनुसार लाभ दे रहे ट्रस्टों का जुर्माना और ब्याज माफ कर दिया जाएगा। बैठक में नई सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को भी मंजूरी मिली। ‘सोशल सिक्योरिटी कोड 2020’ के तहत EPF, EPS 2026 और EDLI 2026 योजनाओं को लागू किया जाएगा। इन नई योजनाओं से पीएफ, पेंशन और बीमा लाभ देने के लिए एक मजबूत कानूनी आधार मिलेगा और पुराने नियमों से नए नियमों में संक्रमण आसान होगा। बंद पड़े खातों (इनऑपरेटिव) को लेकर भी बोर्ड ने पायलट प्रोजेक्ट की मंजूरी दी। इसके तहत जिन खातों में 1,000 रुपये या उससे कम की राशि पड़ी है, उनका ऑटो-सेटलमेंट शुरू होगा। यह सुविधा सफल होने के बाद बड़ी रकम वाले खातों पर भी लागू की जाएगी। निवेश और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए बोर्ड ने नई SOP (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) को मंजूरी दी। इसका उद्देश्य EPFO निवेश की निगरानी और प्रबंधन को और मजबूत करना है। इन घोषणाओं से EPFO का वित्तीय ढांचा और अधिक मजबूत होगा, खाताधारकों को स्थिर और बेहतर रिटर्न मिलेगा और कंपनियों/ट्रस्टों को कानून के दायरे में लाने में मदद मिलेगी।
बाजार की गिरावट में छिपा है कमाई का मौका? एक्सपर्ट्स ने बताया क्यों नहीं घबराना चाहिए और क्या हो अगली रणनीति

नई दिल्ली :भारतीय शेयर बाजार के लिए पिछला कुछ समय काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक स्तर पर अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर भी देखने को मिला। पिछले मात्र दो सत्रों में सेंसेक्स और निफ्टी में 2.5 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे निवेशकों की करीब 11 लाख करोड़ रुपये की संपत्ति पलक झपकते ही साफ हो गई। सोमवार को सेंसेक्स जहाँ 1,000 अंकों से ज्यादा टूटा, वहीं निफ्टी में भी 300 अंकों की बड़ी गिरावट आई। बाजार में घबराहट का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ‘इंडिया विक्स’ (India VIX) इंडेक्स 25 फीसदी से ज्यादा उछलकर 17.13 पर पहुंच गया, जो निकट भविष्य में तेज उतार-चढ़ाव का स्पष्ट संकेत है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि शॉर्ट टर्म में गिरावट की आशंका बनी हुई है, लेकिन भारत की बुनियादी स्थिति यानी ‘मैक्रो स्टोरी’ अभी भी बहुत मजबूत है। आनंद राठी शेयर एंड स्टॉक ब्रोकर की तन्वी कंचन और पीएल कैपिटल के विक्रम कसाट जैसे जानकारों का कहना है कि जनवरी में 1.71 लाख करोड़ रुपये का शानदार जीएसटी कलेक्शन और सरकारी बैंकों के मजबूत तिमाही नतीजे इस बात के सबूत हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था सही दिशा में है। श्रीराम वेल्थ के नवल कगलवाला के अनुसार, पश्चिम एशिया का संकट भारत के लिए एक अवसर भी बन सकता है। जब वैश्विक बाजार असुरक्षित महसूस करते हैं, तो भारत जैसे मजबूत घरेलू मांग वाले देश ‘सेफ हेवन’ बनकर उभरते हैं। पिछले शुक्रवार के आंकड़े बताते हैं कि जहाँ विदेशी निवेशकों ने बिकवाली की, वहीं घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 12,293 करोड़ रुपये की बड़ी खरीदारी करके बाजार को सहारा देने की कोशिश की। मौजूदा हालातों में एक्सपर्ट्स निवेशकों को संयम और अनुशासन बरतने की सलाह दे रहे हैं। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि यह घबराहट में आकर अपनी होल्डिंग्स बेचने का समय नहीं है। निवेशकों को सलाह दी गई है कि वे अपने पोर्टफोलियो की समीक्षा करें, कर्ज लेकर निवेश (लेवरेज पोजीशन) करने से बचें और अपने रिस्क मैनेजमेंट पर ध्यान केंद्रित करें। एसआईपी SIP के माध्यम से निवेश करने वालों के लिए यह संदेश है कि वे अपना निवेश जारी रखें, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से ऐसी ही गिरावटें लंबी अवधि में संपत्ति निर्माण Wealth Creation का आधार बनती हैं। रेलिगेयर ब्रोकिंग के अजित मिश्रा ने भी निवेशकों को सावधानी बरतने और फिलहाल अपनी पोजीशन को हल्का रखने की सलाह दी है।
Iran-Israel War ने बढ़ाई आयातकों की टेंशन… गैस टैंकरों का किराया एक ही दिन में हुआ दोगुना

तेहरान। अटलांटिक बेसिन (Atlantic Basin) में एलएनजी टैंकरों (LNG Tankers) के किराए में जबरदस्त उछाल देखने को मिला है। मामले से वाकिफ सूत्रों के मुताबिक, जहाज मालिक और ब्रोकर (Shipowner and Broker) अब इन टैंकरों के लिए 200,000 डॉलर प्रतिदिन से अधिक की मांग कर रहे हैं, जो कि 24 घंटे से भी कम समय पहले मांगे जा रहे किराए से लगभग दोगुना है। कतर में उत्पादन ठप होने से बढ़ी मांगब्लूमबर्ग की खबर के मुताबिक किराए में यह उछाल ईरान के साथ चल रहे संघर्ष के बढ़ने के कारण कतर द्वारा अपना एलएनजी उत्पादन बंद करने के बाद आया है। इस घटनाक्रम ने क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा दिया है। हालांकि, जानकारों का कहना है कि इतनी ऊंची दरों पर अभी तक किसी भी सौदे के होने की पुष्टि नहीं हुई है। पिछले दरों के मुकाबले तीन गुना ज्यादायह ऑफर की जा रही दरें शिपिंग फर्म स्पार्क कमोडिटीज द्वारा सोमवार की शुरुआत में एलएनजी टैंकर के लिए आंकलित अंतिम दर 61,500 डॉलर से कम से कम तीन गुना अधिक हैं। यह भारी उछाल बाजार में अस्थिरता और अनिश्चितता को दर्शाता है। विशेषज्ञों की राय में अभी संभलकर चलने की जरूरतप्रिसिजन एलएनजी कंसल्टिंग एलएलसी के सलाहकार रिचर्ड प्रैट का मानना है कि अगर कतर और अबू धाबी जैसी जगहों पर उत्पादन में लंबे समय तक कटौती नहीं होती है, तो टैंकरों की दरों में यह भारी उछाल वास्तविक लेन-देन में तब्दील होने की संभावना नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका से एशिया तक जहाजों को चलने के लिए आवश्यक अतिरिक्त दूरी भी किराए पर दबाव बनाने में एक भूमिका निभा सकती है। शिपिंग कंपनियों ने लगाया इमर्जेंसी चार्जखबर यह भी है कि हमलों से बढ़े खतरे के चलते शिपिंग कंपनियों ने खाड़ी और पश्चिम एशियाई देशों को जाने वाले और वहां से आने वाले माल पर 2000 डॉलर से लेकर 4000 डॉलर प्रति कंटेनर इमर्जेंसी कॉनफ्लिक्ट चार्जेज लगा दिए हैं। यह चार्जेज 2 मार्च से ही लागू हो गए हैं। यह खबर रूरल वॉयस सरकार में उच्च पदस्थ सूत्रों के हवाले से दी है। रूरल वॉयस के मुताबिक शिपिंग कंपनियों ने कहा कि शिपिंग के लिए होने वाली बुकिंग पर इमर्जेंसी कॉनफ्लिक्ट चार्जेज लागू होंगे। इराक, बहरीन, कुवैत, यमन, कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), किंगडम ऑफ सऊदी अरब, जार्डन, मिस्र (पोर्ट ऑफ आइन सोखाना), दजिबुती, सूडान और इरिटिया के पोर्ट के लिए भारत से होने वाले निर्यात या इन देशों से भारत के आयात की लोडिंग पर इमर्जेंसी चार्जेज लागू होंगे। इमर्जेंसी चार्जेज के तहत 20 फीट के ड्राई कंटेनर पर 2000 डॉलर, 40 फीट के कंटेनर पर 3000 डॉलर और रीफर या स्पेशल इक्विपमेंट पर 4000 डॉलर प्रति कंटेनर का चार्ज फ्रेट रेट में जोड़ा जाएगा।
मिडिल ईस्ट संकट का असर, दुबई एयरपोर्ट तीन दिन से बंद-3,000 से अधिक फ्लाइट रद्द

नई दिल्ली। सोमवार को दुनिया भर में हवाई यात्रा पर संकट जारी रहा। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई के बाद सैकड़ों उड़ानें रद्द की गईं, जिससे लाखों यात्री प्रभावित हुए। शुरुआती आंकड़ों के अनुसार सोमवार सुबह तक 1,239 उड़ानें पहले ही रद्द हो चुकी थीं। शनिवार को लगभग 2,800 और रविवार को 3,156 उड़ानें रद्द हुई थीं। फ्लाइट रेडार 24 के अनुसार ईरान, इराक, कुवैत, इज़राइल, बहरीन, यूएई और कतर के ऊपर हवाई क्षेत्र लगभग खाली दिख रहा था। दुबई और खाड़ी के हवाई अड्डों पर सबसे बड़ा असर मध्य पूर्व के प्रमुख हवाई अड्डों को सबसे अधिक झटका लगा है। दुबई एयरपोर्ट तीसरे दिन भी बंद रहा। अबू धाबी और दोहा के एयरपोर्ट या तो पूरी तरह बंद रहे या सीमित सेवाओं के साथ ही संचालित हुए। एमिरेट्स ने दुबई से सभी निर्धारित उड़ानें निलंबित कर दीं, एतिहाद एयरवेज ने अबू धाबी के लिए सेवाएं रोक दीं, और कतर एयरवेज ने कतर के हवाई क्षेत्र बंद होने के कारण उड़ान संचालन स्थगित किया। इन तीनों एयरलाइंस ने मिलकर सैकड़ों फ्लाइट्स रद्द कीं। भारत और एशिया पर असर संकट का असर भारत पर भी पड़ा। एयर इंडिया ने दिल्ली, मुंबई और अमृतसर से यूरोप और उत्तरी अमेरिका जाने वाली कई उड़ानें रद्द कर दीं। यूरोप और एशिया तक कनेक्टिंग फ्लाइट्स बाधित होने से यात्री बाली से फ्रैंकफर्ट तक फंसे हुए हैं। रविवार को दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से 100 उड़ानें रद्द की गईं। अनिश्चितता और विमानन उद्योग पर दबाव विश्लेषकों का कहना है कि जैसे-जैसे संघर्ष लंबा खिंचेगा, विमानन उद्योग को वित्तीय नुकसान बढ़ता जाएगा। पायलट और क्रू अलग-अलग देशों में फंसे हुए हैं, जिससे हवाई क्षेत्र खुलने के बाद भी सेवाओं को तुरंत बहाल करना चुनौतीपूर्ण होगा। लेबनान तक संघर्ष फैलने और बेरूत में हवाई हमलों के कारण क्षेत्र का बड़ा हिस्सा बंद हवाई क्षेत्र में तब्दील हो गया। वैश्विक प्रभाव मिडिल ईस्ट में भू-राजनीतिक टकराव, बंद हवाई क्षेत्र और बढ़ती अनिश्चितता ने वैश्विक हवाई यात्रा को फिर अस्थिर कर दिया है। यात्रियों और एयरलाइंस दोनों के लिए यह कोविड-19 महामारी के बाद का सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। इस संकट की लंबी अवधि में वैश्विक यात्रा की नियमितता पर गंभीर असर पड़ सकता है, और उद्योग को वित्तीय तथा परिचालन दोनों प्रकार के दबावों का सामना करना पड़ेगा।
फार्मा सेक्टर को बूस्ट! FY28 तक भारत का API बाजार 5–7% बढ़ने का अनुमान

नई दिल्ली। भारतीय एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट (API) उद्योग को लेकर ताजा रिपोर्ट में सकारात्मक तस्वीर उभरकर सामने आई है। रेटिंग एजेंसी CARE Ratings के अनुसार, वर्तमान में 15-16 अरब डॉलर के आकार वाला भारत का एपीआई बाजार वित्त वर्ष 27 और 28 तक 5-7 प्रतिशत की कंपाउंडेड एनुअल ग्रोथ रेट (CAGR) से बढ़ सकता है। यह वृद्धि सरकारी प्रोत्साहन, संरचनात्मक बदलाव और बढ़ती घरेलू व वैश्विक मांग के दम पर संभव मानी जा रही है। बेसिक से कॉम्प्लेक्स एपीआई की ओर बढ़ता कदमरिपोर्ट के मुताबिक भारतीय फार्मा कंपनियां अब कम मार्जिन वाले बेसिक एपीआई से हटकर जटिल और हाई-पोटेंसी एपीआई की ओर रुख कर रही हैं। इसका मकसद है-कीमतों में गिरावट के दबाव को कम करना, मुनाफा बढ़ाना और वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा मजबूत करना। विनियमित बाजारों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारतीय कंपनियों की पैठ लगातार गहरी हो रही है, जिससे निर्यात अवसर भी बढ़ रहे हैं। चीन पर निर्भरता चिंता, लेकिन सुधार के संकेत रिपोर्ट में प्रमुख कच्चे माल के लिए चीन पर आयात निर्भरता को अभी भी जोखिम माना गया है। हालांकि सरकार की उत्पादन-संबंधी प्रोत्साहन (PLI) योजना और बल्क ड्रग पार्क पहल से हालात में सुधार के संकेत मिले हैं। रिपोर्ट के अनुसार 30 से अधिक परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं और कई कंपनियों ने नई उत्पादन क्षमताएं शुरू कर दी हैं। बल्क ड्रग पार्क से बदलेगा परिदृश्य सरकार समर्थित बल्क ड्रग पार्क परियोजनाएं एपीआई निवेश के अगले चरण को दिशा दे रही हैं। आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में 20 से 40 अरब रुपये की लागत वाली बड़ी सुविधाएं स्थापित की जा रही हैं। इनका उद्देश्य घरेलू उत्पादन बढ़ाना, लागत घटाना और आयात पर निर्भरता कम करना है। करीब 80 प्रतिशत चल रही परियोजनाएं इसी पहल से जुड़ी बताई गई हैं। दीर्घकालीन मांग के मजबूत आधार रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि आने वाले वर्षों में उम्रदराज आबादी की बढ़ती संख्या, स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच, बीमा कवरेज का विस्तार और पुरानी बीमारियों में वृद्धि से दवाओं की मांग बढ़ेगी। इसके अलावा पेटेंट समाप्ति और उभरते बाजारों में विस्तार भी भारतीय एपीआई उद्योग के लिए अवसर पैदा करेगा। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जटिल एपीआई परियोजनाओं का पूर्ण व्यावसायीकरण होने और बड़े स्तर पर उत्पादन शुरू होने में अभी 2–4 वर्ष लग सकते हैं। लेकिन संकेत साफ हैं भारतीय एपीआई उद्योग धीरे-धीरे वैल्यू चेन में ऊपर की ओर बढ़ रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका और मजबूत हो सकती है।
जंग से कांपा बाजार, डिफेंस शेयरों ने भरी उड़ान! HAL-BEL समेत ड्रोन स्टॉक्स में तेजी

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर हमले के बाद बढ़े भू-राजनीतिक तनाव का असर सोमवार को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखा। हफ्ते के पहले कारोबारी दिन 30 शेयरों वाला Bombay Stock Exchange सेंसेक्स 1,500 अंकों से ज्यादा टूटकर 78,543.73 के दिन के निचले स्तर तक पहुंच गया। वहीं 50 शेयरों वाला National Stock Exchange of India निफ्टी50 भी करीब 500 अंकों की गिरावट के साथ 24,645.10 तक फिसल गया। अधिकतर सेक्टर लाल निशान में रहे और निवेशकों की संपत्ति में भारी गिरावट दर्ज की गई। गिरते बाजार में डिफेंस बना सहाराजहां ऑटो, बैंकिंग और एविएशन जैसे सेक्टर दबाव में दिखे, वहीं डिफेंस सेक्टर ने मजबूती दिखाई। बढ़ते वैश्विक सैन्य तनाव के बीच रक्षा खर्च में संभावित बढ़ोतरी की उम्मीद ने इस सेक्टर में निवेशकों का भरोसा मजबूत किया। सरकारी रक्षा कंपनी Bharat Electronics Limited (बीईएल) और Hindustan Aeronautics Limited (एचएएल) मजबूत बढ़त के साथ कारोबार करते नजर आए। इन दिग्गज कंपनियों की तेजी ने पूरे डिफेंस इंडेक्स को सहारा दिया। ड्रोन कंपनियों में निवेशकों की होड़आधुनिक युद्ध में ड्रोन और सर्विलांस तकनीक की बढ़ती भूमिका ने ड्रोन से जुड़ी कंपनियों को चर्चा में ला दिया है। कारोबार के दौरान Paras Defence and Space Technologies, ideaForge Technology और Tejas Networks के शेयरों में जबरदस्त उछाल देखा गया। कुछ शेयरों में 10 से 15 प्रतिशत तक की तेजी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का मानना है कि निगरानी, रडार, संचार उपकरण और ड्रोन तकनीक की मांग आने वाले समय में और बढ़ सकती है। रक्षा बजट बढ़ने की उम्मीद से बढ़ा भरोसाबाजार जानकारों के मुताबिक, जब भी वैश्विक स्तर पर युद्ध या सैन्य तनाव बढ़ता है तो देशों के रक्षा बजट में इजाफा होने की संभावना प्रबल हो जाती है। भारत पहले से ही आत्मनिर्भरता की दिशा में रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दे रहा है और बजट आवंटन में लगातार वृद्धि कर रहा है। ऐसे में यदि मौजूदा संघर्ष लंबा खिंचता है तो घरेलू रक्षा कंपनियों को नए ऑर्डर मिलने की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। अस्थिरता बनी रह सकती हैहालांकि विशेषज्ञों ने चेताया है कि निकट अवधि में बाजार में उतार-चढ़ाव जारी रह सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से एविएशन और ऑटो सेक्टर पर दबाव बन सकता है। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रम और डिफेंस सेक्टर की अगली चाल पर टिकी हुई है।
जंग का झटका बाजार को! सेंसेक्स 80 हजार से नीचे, ऑटो-कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर धराशायी

नई दिल्ली। Israel–Iran युद्ध के बीच वैश्विक अनिश्चितता ने भारतीय शेयर बाजार को झटका दिया है। दोपहर 12:30 बजे तक सेंसेक्स 1,486 अंक यानी 1.83% टूटकर 79,806 पर आ गया, जबकि निफ्टी 453 अंक (1.80%) गिरकर 24,725 पर कारोबार करता दिखा। निवेशकों की घबराहट साफ नजर आई, खासकर उन सेक्टरों में जो कच्चे तेल की कीमतों और उपभोक्ता मांग से सीधे जुड़े हैं। ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सबसे ज्यादा प्रभावित सेक्टोरल इंडेक्स में सबसे ज्यादा गिरावट ऑटो और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स में रही। निफ्टी ऑटो और निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स करीब 3-3% टूटे। इसके अलावा निफ्टी इन्फ्रा, रियल्टी, ऑयल एंड गैस और एनर्जी इंडेक्स भी 2% से ज्यादा गिरावट के साथ लाल निशान में रहे। लार्जकैप के साथ मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में भी बिकवाली तेज रही। निफ्टी स्मॉलकैप 100 इंडेक्स 2.14% और निफ्टी मिडकैप 100 इंडेक्स 2.03% नीचे कारोबार करता दिखा। यह संकेत है कि गिरावट व्यापक रही, सिर्फ चुनिंदा शेयरों तक सीमित नहीं। सेंसेक्स पैक में चुनिंदा शेयर संभले, बाकी दबाव में सेंसेक्स की 30 कंपनियों में से अधिकांश में गिरावट रही। बीईएल, सन फार्मा और भारती एयरटेल जैसे कुछ शेयर ही हरे निशान में दिखे। वहीं एलएंडटी, इंडिगो, मारुति सुजुकी, एमएंडएम, एशियन पेंट्स, टाइटन, बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एसबीआई समेत कई दिग्गज शेयरों में तेज गिरावट दर्ज की गई। बाजार पूंजीकरण की बात करें तो बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 9 लाख करोड़ रुपये घटकर 454 लाख करोड़ रुपये पर आ गया। कच्चे तेल और डॉलर का दबाव, सोना-चांदी में चमकयुद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आया है। Brent Crude करीब 9% चढ़कर 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया, जबकि WTI Crude भी 8% की तेजी के साथ 72 डॉलर प्रति बैरल पर रहा। दूसरी ओर सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने और चांदी में जोरदार तेजी देखी गई। सोना 3% से ज्यादा उछल गया, जबकि चांदी में भी लगभग 2.7% की बढ़त रही। डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी ने भी बाजार पर अतिरिक्त दबाव डाला है।आगे क्या? विश्लेषकों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतें स्थिर नहीं होतीं, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। फिलहाल निवेशकों की नजर वैश्विक घटनाक्रम और केंद्रीय बैंकों की संभावित प्रतिक्रिया पर टिकी है।