आर्थिक चुनौतियों के बावजूद कंपनियों की कमाई में जोरदार उछाल, ऊर्जा और मटेरियल सेक्टर बने विकास के प्रमुख इंजन

नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता और लागत संबंधी चुनौतियों के बावजूद भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र ने वित्त वर्ष 2026 का समापन मजबूत वित्तीय प्रदर्शन के साथ किया है। नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, बीएसई 500 कंपनियों के संयुक्त शुद्ध मुनाफे में चौथी तिमाही के दौरान सालाना आधार पर लगभग 14 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यह प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि भारतीय कंपनियां बदलती आर्थिक परिस्थितियों के बीच भी अपनी परिचालन क्षमता और लाभप्रदता बनाए रखने में सफल रही हैं। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट के मुताबिक, मजबूत राजस्व वृद्धि, बेहतर नकदी प्रवाह, संतुलित बैलेंस शीट और विभिन्न क्षेत्रों की व्यापक भागीदारी ने भारतीय कॉरपोरेट जगत को मजबूती प्रदान की है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वित्त वर्ष 2027 में कंपनियों की आय वृद्धि की संभावनाएं और अधिक मजबूत दिखाई दे रही हैं। विशेष रूप से गैर-वित्तीय कंपनियों ने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। इन कंपनियों की कुल राजस्व वृद्धि बढ़कर 12.3 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि पिछली तिमाही में यह 9.2 प्रतिशत थी। यह सुधार दर्शाता है कि मांग में बढ़ोतरी और कारोबारी गतिविधियों के विस्तार का लाभ कंपनियों को व्यापक स्तर पर मिला है। हालांकि परिचालन लाभ मार्जिन यानी ईबीआईटीडीए मार्जिन मामूली रूप से घटकर 16.4 प्रतिशत रह गया, फिर भी कंपनियों की कमाई की गुणवत्ता मजबूत बनी रही। रिपोर्ट के अनुसार, चौथी तिमाही के दौरान लाभ वृद्धि केवल चुनिंदा कंपनियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका असर व्यापक रूप से विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई दिया। बीएसई 500 की लगभग 59 प्रतिशत कंपनियों ने अपने मुनाफे में 10 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की, जबकि 39 प्रतिशत कंपनियों का लाभ 25 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ा। यह आंकड़े संकेत देते हैं कि भारतीय कॉरपोरेट क्षेत्र में कमाई का सुधार व्यापक और टिकाऊ स्वरूप ले रहा है। कंपनियों के वित्तीय नतीजे बाजार के अनुमान से भी बेहतर रहे। निफ्टी की लगभग 48 प्रतिशत कंपनियों ने विश्लेषकों की अपेक्षाओं से अधिक प्रदर्शन किया, जबकि पिछली तिमाही में यह आंकड़ा केवल 32 प्रतिशत था। इससे निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है और यह संकेत मिला है कि कंपनियों की बुनियादी स्थिति अनुमान से कहीं अधिक सुदृढ़ बनी हुई है। क्षेत्रवार प्रदर्शन की बात करें तो उपभोक्ता विवेकाधीन क्षेत्र ने सबसे प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की। इस क्षेत्र की आय में 18 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जिसे बेहतर उपभोक्ता मांग और खर्च में वृद्धि का समर्थन मिला। वहीं उपभोक्ता आवश्यक वस्तु क्षेत्र ने भी 15 प्रतिशत से अधिक की आय वृद्धि दर्ज कर स्थिर मांग का संकेत दिया। वैश्विक तकनीकी क्षेत्र में चुनौतियों के बावजूद भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों ने 13.4 प्रतिशत की आय वृद्धि हासिल की। वित्तीय क्षेत्र ने भी अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखते हुए 13.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की और बाजार की कुल कमाई में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऊर्जा और मटेरियल सेक्टर इस तिमाही के सबसे बड़े प्रदर्शनकर्ता बनकर उभरे। ऊर्जा क्षेत्र की आय में 23.8 प्रतिशत और मटेरियल क्षेत्र की आय में 23.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इससे स्पष्ट होता है कि उत्पादन और बुनियादी ढांचे से जुड़े क्षेत्रों में गतिविधियां मजबूत बनी हुई हैं। कंपनियों के आकार के आधार पर देखें तो मिडकैप कंपनियों ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। इन कंपनियों के मुनाफे में सालाना आधार पर 34.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि लार्जकैप और स्मॉलकैप कंपनियों का लाभ क्रमशः 10.3 प्रतिशत और 10.4 प्रतिशत बढ़ा। यह प्रदर्शन बताता है कि मध्यम आकार की कंपनियां वर्तमान कारोबारी माहौल में तेजी से अवसरों का लाभ उठाने में सफल रही हैं और निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं।
भारत में हाई-नेट-वर्थ व्यक्तियों की संख्या और संपत्ति दोनों में दर्ज हुई उल्लेखनीय वृद्धि

नई दिल्ली । भारत में आर्थिक गतिविधियों की मजबूती और निवेश बाजारों के बेहतर प्रदर्शन का असर देश के संपन्न वर्ग पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2025 के दौरान देश में उच्च संपत्ति वाले व्यक्तियों यानी हाई-नेट-वर्थ इंडिविजुअल्स की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इसके साथ ही उनकी कुल वित्तीय संपत्ति भी नए स्तर पर पहुंच गई है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की बढ़ती क्षमता और निवेश माहौल की मजबूती को दर्शाती है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में भारत में उच्च संपत्ति वाले लोगों की संख्या सालाना आधार पर लगभग 3 प्रतिशत बढ़कर 3.9 लाख के करीब पहुंच गई। इसी अवधि में उनकी कुल वित्तीय संपत्ति में भी 4.6 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह आंकड़ा लगभग 1.64 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह वृद्धि केवल संपत्ति मूल्य में बढ़ोतरी का परिणाम नहीं है, बल्कि देश में निवेश के बढ़ते अवसरों और आर्थिक विस्तार का भी संकेत है। भारतीय अर्थव्यवस्था ने वर्ष 2025 में मजबूत प्रदर्शन किया। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 7.6 प्रतिशत रहने से उद्योग, विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को व्यापक समर्थन मिला। आर्थिक गतिविधियों में तेजी के कारण निवेशकों का भरोसा बढ़ा और पूंजी बाजारों में सकारात्मक माहौल बना रहा। इसका सीधा लाभ उन निवेशकों को मिला जिनकी बड़ी हिस्सेदारी शेयर बाजार और अन्य वित्तीय परिसंपत्तियों में थी। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि निवेशकों की प्राथमिकताओं में तेजी से बदलाव हो रहा है। पारंपरिक निवेश विकल्पों के साथ-साथ अब व्यक्तिगत जरूरतों के अनुरूप निवेश समाधान, वैकल्पिक परिसंपत्तियां और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित वेल्थ मैनेजमेंट सेवाएं लोकप्रिय हो रही हैं। वित्तीय सलाह और निवेश रणनीति में तकनीक की बढ़ती भूमिका ने संपत्ति प्रबंधन के तरीके को भी बदल दिया है। वैश्विक स्तर पर भी वर्ष 2025 संपन्न वर्ग के लिए काफी सकारात्मक रहा। दुनिया भर के उच्च संपत्ति वाले लोगों की कुल संपत्ति में 8.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई और यह रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई। एशिया-प्रशांत क्षेत्र इस वृद्धि का प्रमुख केंद्र बनकर उभरा, जहां संपत्ति और उच्च संपत्ति वाले लोगों की संख्या दोनों में सबसे तेज बढ़ोतरी दर्ज की गई। जापान, चीन, भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने इस क्षेत्रीय वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया। विशेषज्ञों का कहना है कि शेयर बाजारों में मजबूती, महंगाई में नरमी और तकनीकी कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन ने वैश्विक संपत्ति निर्माण में अहम भूमिका निभाई। विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों में आई तेजी ने निवेशकों को उल्लेखनीय लाभ पहुंचाया। इसका असर भारत समेत कई देशों में संपन्न वर्ग की वित्तीय स्थिति पर दिखाई दिया। रिपोर्ट के अनुसार अत्यधिक उच्च संपत्ति वाले व्यक्तियों को इस वृद्धि का सबसे अधिक लाभ मिला क्योंकि उनके निवेश सार्वजनिक बाजारों और बेहतर प्रदर्शन करने वाली निजी परिसंपत्तियों में केंद्रित रहे। वहीं निवेश पोर्टफोलियो में शेयरों और निश्चित आय वाले निवेश साधनों की हिस्सेदारी भी बढ़ी है, जो निवेशकों की संतुलित रणनीति को दर्शाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास गति बनी रहती है और पूंजी बाजारों में स्थिरता कायम रहती है, तो आने वाले वर्षों में देश में संपन्न वर्ग की संख्या और उनकी कुल संपत्ति दोनों में और वृद्धि देखने को मिल सकती है। यह रुझान भारत को वैश्विक संपत्ति निर्माण के प्रमुख केंद्रों में शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है।
डॉलर में कमजोरी और पश्चिम एशिया तनाव से चमकी कीमती धातुएं, सोना रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंचा, चांदी में भी उछाल हेडलाइन विकल्प 2:

नई दिल्ली । वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच गुरुवार को घरेलू कमोडिटी बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में मजबूती देखने को मिली। डॉलर में आई कमजोरी और सुरक्षित निवेश विकल्पों की बढ़ती मांग ने कीमती धातुओं को समर्थन प्रदान किया। निवेशकों ने जोखिम वाले परिसंपत्तियों से दूरी बनाते हुए सोने और चांदी की ओर रुख किया, जिसके चलते दोनों धातुओं के वायदा भाव में उल्लेखनीय बढ़त दर्ज की गई। मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (एमसीएक्स) पर सोने के अगस्त वायदा अनुबंध में कारोबार के दौरान अच्छी तेजी देखी गई। शुरुआती सत्र से ही पीली धातु मजबूत रुख के साथ कारोबार करती रही और दिन के दौरान ऊंचे स्तर तक पहुंच गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक स्तर पर निवेशकों की सतर्कता और डॉलर की कमजोरी ने सोने को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशक आमतौर पर सोने को सुरक्षित निवेश के रूप में प्राथमिकता देते हैं। चांदी की कीमतों में भी दिनभर उतार-चढ़ाव के बीच मजबूती बनी रही। कारोबार के शुरुआती चरण में चांदी ने ऊंचे स्तर को छुआ, हालांकि बाद में कुछ मुनाफावसूली देखने को मिली। इसके बावजूद कुल मिलाकर चांदी के भाव सकारात्मक दायरे में बने रहे। बाजार विश्लेषकों के अनुसार औद्योगिक मांग और सुरक्षित निवेश दोनों कारणों से चांदी को भी समर्थन मिल रहा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। हालिया सैन्य गतिविधियों और अमेरिका तथा ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने निवेशकों को सतर्क कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किसी भी संभावित संघर्ष या अस्थिरता का सीधा प्रभाव कमोडिटी बाजारों पर पड़ता है, विशेषकर सोने जैसी सुरक्षित परिसंपत्तियों पर। यही कारण है कि हाल के दिनों में कीमती धातुओं में निवेश बढ़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच संभावित कूटनीतिक समाधान से जुड़ी खबरों पर भी नजर बनाए हुए है। यदि तनाव कम करने की दिशा में कोई सकारात्मक प्रगति होती है तो सोने और चांदी की कीमतों में कुछ दबाव देखने को मिल सकता है। वहीं यदि अनिश्चितता बनी रहती है तो सुरक्षित निवेश की मांग और बढ़ सकती है। इस बीच अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई है। तेल बाजार में नरमी से वैश्विक मुद्रास्फीति संबंधी चिंताओं में कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन भू-राजनीतिक जोखिम अभी भी निवेशकों की प्राथमिक चिंता बने हुए हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में डॉलर की चाल, अमेरिकी आर्थिक आंकड़े और पश्चिम एशिया की स्थिति सोने-चांदी की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। विश्लेषकों के अनुसार, तकनीकी दृष्टि से भी सोना और चांदी महत्वपूर्ण स्तरों के आसपास कारोबार कर रहे हैं। यदि ये धातुएं अपने प्रमुख प्रतिरोध स्तरों को पार कर स्थिर होती हैं तो आगे और तेजी की संभावना बन सकती है। हालांकि निवेशकों को वर्तमान अस्थिर माहौल में सावधानी बरतने और वैश्विक घटनाक्रमों पर नजर बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
थिंकटेक इंडिया पर धोखाधड़ी के आरोपों का साया: CEO गिरफ्तार, 700 से अधिक कर्मचारियों का भविष्य अधर में

नई दिल्ली । पुणे के प्रमुख आईटी केंद्र हिंजेवाड़ी में संचालित थिंकटेक इंडिया से जुड़ा विवाद लगातार गहराता जा रहा है। कंपनी के अचानक संचालन बंद कर देने और उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी की गिरफ्तारी के बाद 700 से अधिक कर्मचारी और इंटर्न गंभीर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के नौकरी से वंचित कर दिया गया, जबकि उनके वेतन, स्टाइपेंड और कंपनी के पास जमा सुरक्षा राशि अब भी फंसी हुई है। मामला उस समय सामने आया जब एक इंटर्न ने कंपनी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में वित्तीय अनियमितताओं, भुगतान रोकने और कर्मचारियों से धन लेने के आरोप लगाए गए थे। इसके बाद जांच एजेंसियों ने मामले को गंभीरता से लेते हुए कंपनी की गतिविधियों की पड़ताल शुरू की। शुरुआती जांच के दौरान कई अन्य कर्मचारियों और इंटर्न ने भी समान शिकायतें दर्ज कराईं, जिससे मामला और व्यापक हो गया। जांच के क्रम में पुलिस ने कंपनी के सीईओ हर्षल ठाकरे को गिरफ्तार कर लिया। अधिकारियों के अनुसार, गिरफ्तारी कथित वित्तीय घोटाले और धोखाधड़ी से जुड़े आरोपों के आधार पर की गई है। पुलिस अब कंपनी के वित्तीय रिकॉर्ड, बैंक लेनदेन और कारोबारी गतिविधियों की विस्तृत जांच कर रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कर्मचारियों के साथ हुए कथित वित्तीय नुकसान के पीछे वास्तविक परिस्थितियां क्या थीं। कर्मचारियों का कहना है कि कंपनी ने अप्रैल महीने में अचानक अपना संचालन बंद कर दिया। कई कर्मचारी नियमित रूप से कार्यालय पहुंचे, लेकिन वहां पहुंचने पर उन्हें पता चला कि दफ्तर बंद है और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों या प्रबंधन से संपर्क संभव नहीं हो पा रहा है। इस स्थिति ने कर्मचारियों के सामने न केवल रोजगार का संकट खड़ा कर दिया, बल्कि उनकी आर्थिक सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए। विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू कर्मचारियों और इंटर्न से ली गई सुरक्षा जमा राशि को लेकर भी है। कर्मचारियों का दावा है कि कंपनी ने आधिकारिक लैपटॉप और अन्य उपकरण उपलब्ध कराने के नाम पर प्रत्येक कर्मचारी से लगभग 15 हजार रुपये जमा कराए थे। अब कंपनी के संचालन बंद होने के बाद यह राशि वापस नहीं की गई है, जिससे कर्मचारियों की चिंता और बढ़ गई है। बताया जा रहा है कि कंपनी शुरुआती दौर में समय पर वेतन और स्टाइपेंड का भुगतान करती थी, जिससे कर्मचारियों का भरोसा बना रहा। हालांकि, इस वर्ष जनवरी से भुगतान में अनियमितता शुरू हुई और बाद में वेतन पूरी तरह रुक गया। कई कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि बकाया भुगतान के लिए कंपनी ने उन्हें चेक जारी किए, लेकिन इनमें से अनेक चेक बैंक में प्रस्तुत करने पर बाउंस हो गए। इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति और प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। जांच एजेंसियों ने इस मामले में कंपनी के ट्रेनिंग एवं डेवलपमेंट विभाग के प्रमुख तथा एक एचआर प्रबंधक के खिलाफ भी मामला दर्ज किया है। अधिकारियों का कहना है कि मामले के सभी पहलुओं की गहन जांच की जा रही है और संबंधित दस्तावेजों को खंगाला जा रहा है। यह मामला देश के आईटी क्षेत्र में कार्यरत पेशेवरों और नए रोजगार तलाश रहे युवाओं के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। फिलहाल प्रभावित कर्मचारी अपने बकाया भुगतान और जमा राशि की वापसी की उम्मीद में जांच प्रक्रिया के नतीजों का इंतजार कर रहे हैं, जबकि पुलिस वित्तीय लेनदेन से जुड़े तथ्यों को जुटाने में लगी हुई है।
पीएम मोदी और जेन फ्रेजर की अहम बैठक, निवेश, एआई और हरित ऊर्जा में भारत की संभावनाओं पर हुआ विस्तृत मंथन

नई दिल्ली । भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और वैश्विक निवेश केंद्र के रूप में उभरती भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिटीग्रुप की चेयरपर्सन और मुख्य कार्यकारी अधिकारी जेन फ्रेजर के साथ महत्वपूर्ण बैठक की। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच आर्थिक विकास, निवेश अवसरों, वैश्विक पूंजी प्रवाह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और स्वच्छ ऊर्जा जैसे रणनीतिक विषयों पर विस्तृत चर्चा हुई। मुंबई में आयोजित इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने देश के दीर्घकालिक विकास रोडमैप ‘विकसित भारत 2047’ के संबंध में अपना दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की दिशा में जारी आर्थिक सुधारों, बुनियादी ढांचा विकास और निवेश-अनुकूल वातावरण पर प्रकाश डाला। बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत की विकास यात्रा में वैश्विक वित्तीय संस्थानों की भूमिका को और मजबूत बनाना था। चर्चा के दौरान भारत में विदेशी निवेश और पूंजी प्रवाह को बढ़ाने के उपायों पर विशेष ध्यान दिया गया। साथ ही भारतीय कंपनियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उपलब्ध अवसरों तथा उनके वैश्विक विस्तार में वित्तीय संस्थानों की संभावित भूमिका पर भी विचार-विमर्श हुआ। दोनों पक्षों ने इस बात पर सहमति जताई कि भारत की आर्थिक क्षमता और बाजार का आकार वैश्विक निवेशकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। बैठक में वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्र भी प्रमुख एजेंडा रहा। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और अन्य स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों के विकास को लेकर मौजूद संभावनाओं पर चर्चा की गई। भारत सरकार द्वारा ऊर्जा संक्रमण और कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए उठाए जा रहे कदमों को वैश्विक निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इस क्षेत्र में निजी निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने पर भी विचार हुआ। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से जुड़े विषयों पर भी दोनों पक्षों के बीच सार्थक संवाद हुआ। बातचीत में एआई तकनीक के जिम्मेदार उपयोग, नियामकीय ढांचे और आर्थिक विकास में इसकी भूमिका जैसे मुद्दे शामिल रहे। यह माना गया कि भविष्य की अर्थव्यवस्था में एआई उत्पादकता, नवाचार और प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने का एक प्रमुख माध्यम बन सकता है। इस अवसर पर सिटी इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के. बालासुब्रमण्यम भी उपस्थित रहे। उन्होंने भारत में सिटी की लगभग 125 वर्षों की उपस्थिति का उल्लेख करते हुए देश के प्रति संस्था की दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दोहराया। उन्होंने बताया कि भारत न केवल कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार है, बल्कि वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में भी उसकी भूमिका लगातार मजबूत हो रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की उच्चस्तरीय बैठकों से वैश्विक निवेशकों के बीच भारत की सकारात्मक छवि और मजबूत होती है। पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय समावेशन, डिजिटल भुगतान, बैंकिंग सुधार और कारोबारी सुगमता से जुड़े कदमों ने देश को निवेश के लिए अधिक आकर्षक बनाया है। यही कारण है कि दुनिया के प्रमुख वित्तीय संस्थान भारत की विकास यात्रा में अपनी भागीदारी बढ़ाने में रुचि दिखा रहे हैं। गौरतलब है कि सिटीग्रुप मुंबई में 3 से 5 जून तक ‘सिटी इंडिया कॉन्फ्रेंस’ का आयोजन कर रही है, जिसमें दुनिया भर से 1,500 से अधिक निवेशक और ग्राहक शामिल हो रहे हैं। इस मंच के माध्यम से भारत से जुड़े निवेश अवसरों को वैश्विक पूंजी के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है। वर्ष 2027 में भारत में सिटी की 125वीं वर्षगांठ भी पूरी होने जा रही है, जो देश के साथ उसके लंबे आर्थिक संबंधों का प्रतीक है।
सेबी की सख्त कार्रवाई से राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में भूचाल, 5% गिरकर लोअर सर्किट पर पहुंचे; वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार में गुरुवार को राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों में भारी दबाव देखने को मिला। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा कंपनी और उसके प्रमोटर राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किए जाने के बाद निवेशकों की चिंता बढ़ गई, जिसके परिणामस्वरूप कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत की गिरावट के साथ लोअर सर्किट पर पहुंच गया। बाजार खुलते ही कंपनी के शेयरों में बिकवाली का दबाव दिखाई दिया और यह बीएसई पर अपने पिछले बंद स्तर 110.15 रुपये से गिरकर 104.65 रुपये पर पहुंच गया। सेबी की ओर से जारी आदेश में कंपनी की वित्तीय रिपोर्टिंग और कारोबारी लेन-देन को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। नियामक ने प्रारंभिक जांच के आधार पर संकेत दिए हैं कि कंपनी द्वारा घोषित कुल राजस्व का लगभग 97 से 99 प्रतिशत हिस्सा वास्तविकता से अधिक दिखाया गया हो सकता है। सेबी ने इन निष्कर्षों को बेहद गंभीर और अभूतपूर्व बताते हुए तत्काल हस्तक्षेप को आवश्यक माना है। आदेश में कहा गया है कि जांच के दौरान सामने आई अनियमितताएं सामान्य कारोबारी त्रुटियों से कहीं अधिक गंभीर प्रतीत होती हैं। सेबी के पूर्णकालिक सदस्य कमलेश चंद्र वर्ष्णेय ने स्पष्ट किया कि निवेशकों के हितों की रक्षा और बाजार की पारदर्शिता बनाए रखने के लिए नियामक कदम उठाना जरूरी था। इसी के तहत प्रमोटर राजेश मेहता को कंपनी के शेयरों की खरीद, बिक्री अथवा किसी भी प्रकार के लेन-देन से अस्थायी रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है। यह मामला मार्च 2024 में प्राप्त एक शेयरधारक की शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत में कंपनी की बैलेंस शीट में दर्ज बड़े व्यापारिक देयकों और वित्तीय आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद सेबी ने अप्रैल 2020 से मार्च 2024 तक की अवधि की विस्तृत जांच शुरू की और स्वतंत्र फॉरेंसिक ऑडिट के लिए बीडीओ इंडिया सर्विसेज को नियुक्त किया। जांच के दौरान फॉरेंसिक ऑडिटर को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। सेबी के अनुसार कंपनी ने कई अवसरों पर आवश्यक लेखा प्रणालियों, वित्तीय रिकॉर्ड और प्रमुख दस्तावेजों तक पूर्ण पहुंच उपलब्ध नहीं कराई। इसके कारण ऑडिटर कई महत्वपूर्ण लेन-देन और वित्तीय दावों का स्वतंत्र सत्यापन नहीं कर सका। केवल सीमित दस्तावेज उपलब्ध कराए गए, जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हुई। नियामक ने कंपनी की विदेशी सहायक और अप्रत्यक्ष सहायक इकाइयों की भी समीक्षा की। सिंगापुर और स्विट्जरलैंड स्थित कुछ इकाइयों के वित्तीय लेन-देन और रिपोर्टिंग पैटर्न को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। सेबी का मानना है कि कुछ वित्तीय संरचनाओं का उपयोग धन के वास्तविक स्रोत और अंतिम गंतव्य को छिपाने के लिए किया गया हो सकता है। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो कंपनी की वित्तीय पारदर्शिता और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स को निर्देश दिया है कि वह जांचकर्ताओं द्वारा मांगी गई सभी लंबित जानकारियां 30 दिनों के भीतर उपलब्ध कराए। साथ ही कंपनी के खातों और लेन-देन की विस्तृत समीक्षा के लिए नए फॉरेंसिक ऑडिटर की नियुक्ति का भी आदेश दिया गया है। इस घटनाक्रम का असर केवल राजेश एक्सपोर्ट्स तक सीमित नहीं रहा। कंपनी में करीब 10 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के शेयरों पर भी दबाव देखा गया और कारोबार के दौरान उसके शेयरों में लगभग 1 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में जांच की दिशा और निष्कर्ष निवेशकों की धारणा तथा कंपनी के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।
पश्चिम एशिया संकट पर राहत के संकेत, कच्चा तेल 1 प्रतिशत से अधिक फिसला; वैश्विक बाजारों में फिर भी बनी रही अनिश्चितता

नई दिल्ली । पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की संभावनाओं ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को राहत दी है। इजरायल और लेबनान के बीच युद्धविराम लागू करने पर सहमति बनने के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि क्षेत्र में जारी संघर्ष के बीच यह घटनाक्रम निवेशकों के लिए सकारात्मक संकेत लेकर आया है और इससे व्यापक कूटनीतिक समाधान की उम्मीदें मजबूत हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड और अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट दोनों प्रमुख तेल बेंचमार्क में गिरावट देखी गई। हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और संभावित आपूर्ति बाधाओं की आशंका के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल आया था। हालांकि युद्धविराम की दिशा में बढ़ते कदमों ने बाजार की चिंताओं को कुछ हद तक कम कर दिया है, जिससे कीमतों पर दबाव देखने को मिला। बाजार विश्लेषकों के अनुसार तेल की कीमतें केवल मांग और आपूर्ति के आधार पर नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक घटनाक्रमों से भी गहराई से प्रभावित होती हैं। पश्चिम एशिया विश्व ऊर्जा आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष या अस्थिरता वैश्विक ऊर्जा बाजारों में तुरंत असर डालती है। हालिया गिरावट इसी धारणा को दर्शाती है कि निवेशक अब स्थिति के शांतिपूर्ण समाधान की संभावना को महत्व दे रहे हैं। इस बीच अमेरिका और ईरान के बीच जारी कूटनीतिक संपर्कों पर भी वैश्विक बाजारों की नजर बनी हुई है। अमेरिकी नेतृत्व की ओर से बातचीत में प्रगति के संकेत दिए गए हैं, जबकि ईरान की तरफ से भी संवाद पूरी तरह समाप्त न होने की बात कही गई है। हालांकि दोनों पक्षों ने अभी तक किसी ठोस समझौते की पुष्टि नहीं की है, लेकिन बातचीत जारी रहने को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इसके विपरीत खाड़ी क्षेत्र में कुछ घटनाओं ने अनिश्चितता को पूरी तरह समाप्त नहीं होने दिया है। हालिया सैन्य गतिविधियों और हमलों के कारण निवेशकों के बीच सतर्कता बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि क्षेत्रीय तनाव फिर से बढ़ता है तो तेल बाजार में उतार-चढ़ाव दोबारा तेज हो सकता है। इसलिए निवेशक फिलहाल हर कूटनीतिक और सैन्य घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। तेल बाजार की नरमी का असर वैश्विक वित्तीय बाजारों पर भी देखने को मिला। एशिया के कई प्रमुख शेयर बाजार दबाव में रहे और निवेशकों ने जोखिम वाले निवेशों से दूरी बनाए रखी। जापान, हांगकांग, दक्षिण कोरिया और इंडोनेशिया के प्रमुख सूचकांकों में गिरावट दर्ज की गई। अमेरिकी बाजारों में भी कमजोरी देखने को मिली, जिससे वैश्विक निवेश भावना पर असर पड़ा। घरेलू बाजार भी इस वैश्विक माहौल से अछूते नहीं रहे। भारतीय शेयर बाजारों में कारोबार की शुरुआत गिरावट के साथ हुई और कई प्रमुख सेक्टरों में बिकवाली का दबाव देखने को मिला। निवेशकों का ध्यान अब पश्चिम एशिया की स्थिति, वैश्विक कूटनीतिक प्रयासों और ऊर्जा बाजार की आगामी दिशा पर केंद्रित है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्धविराम स्थायी रूप लेता है और क्षेत्रीय तनाव में और कमी आती है तो कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता देखने को मिल सकती है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियों में बाजार अभी भी सतर्क है और किसी भी नए घटनाक्रम का प्रभाव तेल तथा वैश्विक वित्तीय बाजारों पर तुरंत दिखाई दे सकता है।
वैश्विक तनाव और कमजोर संकेतों से शेयर बाजार पर दबाव, सेंसेक्स 227 अंक टूटा; आईटी, रियल्टी और बैंकिंग शेयरों में बिकवाली

नई दिल्ली । वैश्विक बाजारों से मिले कमजोर संकेतों और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच भारतीय शेयर बाजार गुरुवार को गिरावट के साथ खुला। शुरुआती कारोबार में निवेशकों ने सतर्क रुख अपनाया, जिसके चलते प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी दोनों दबाव में दिखाई दिए। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी देखने को मिला। कारोबार की शुरुआत में बीएसई सेंसेक्स अपने पिछले बंद स्तर से 400 अंकों से अधिक टूटकर खुला, जबकि एनएसई निफ्टी में भी शुरुआती कमजोरी दर्ज की गई। हालांकि शुरुआती झटके के बाद बाजार ने कुछ रिकवरी दिखाई, लेकिन दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में ही कारोबार करते रहे। सुबह के सत्र में सेंसेक्स करीब 227 अंक और निफ्टी लगभग 80 अंक की गिरावट के साथ ट्रेड करता नजर आया। बाजार में सबसे अधिक दबाव आईटी, रियल्टी, मेटल और प्राइवेट बैंकिंग सेक्टर के शेयरों पर दिखाई दिया। प्रमुख आईटी कंपनियों और निजी बैंकों में बिकवाली का माहौल रहा, जबकि कुछ चुनिंदा उपभोक्ता वस्तु, तेल एवं गैस तथा एफएमसीजी कंपनियों के शेयरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। दूसरी ओर मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में सीमित बढ़त दर्ज होने से यह संकेत मिला कि व्यापक बाजार में निवेशकों की रुचि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। विश्लेषकों के अनुसार, बाजार की मौजूदा कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ती अनिश्चितता है। हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव तथा क्षेत्र में सैन्य गतिविधियों ने वैश्विक निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। इसके साथ ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली भी भारतीय बाजार पर दबाव बना रही है। विदेशी निवेशक हाल के सत्रों में भारतीय इक्विटी बाजार से पूंजी निकालते दिखाई दिए हैं, जिससे निवेशकों की धारणा कमजोर हुई है। घरेलू स्तर पर निवेशकों की नजर अब भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक के नतीजों पर टिकी हुई है। शुक्रवार को आने वाले फैसले से ब्याज दरों और आर्थिक गतिविधियों को लेकर नई दिशा मिल सकती है। ऐसे में बड़े निवेशक फिलहाल आक्रामक दांव लगाने से बचते हुए सतर्क रणनीति अपना रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया में तनाव कम नहीं होता और वैश्विक स्तर पर स्थिरता के संकेत नहीं मिलते, तब तक बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। विदेशी निवेशकों की डेरिवेटिव बाजार में बढ़ती शॉर्ट पोजिशन भी निकट भविष्य में कमजोरी की आशंका को मजबूत करती है। हालांकि यदि अंतरराष्ट्रीय हालात में सुधार होता है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है, तो बाजार की धारणा तेजी से बदल सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि मौजूदा अस्थिरता के दौर में अल्पकालिक ट्रेडिंग जोखिमपूर्ण साबित हो सकती है। वहीं लंबी अवधि के निवेशकों के लिए यह समय गुणवत्ता वाले शेयरों में निवेश के अवसर भी प्रदान कर सकता है। बैंकिंग, फार्मा, ऑटो और ऑटो एंसिलरी सेक्टर के कई मजबूत शेयर हालिया गिरावट के कारण आकर्षक मूल्यांकन पर उपलब्ध हैं, जो भविष्य में बेहतर रिटर्न देने की क्षमता रखते हैं।
पेट्रोल-डीजल कीमतों पर नजर: वैश्विक गिरावट के बावजूद भारत में क्यों नहीं घट रहे रेट?

नई दिल्ली । दुनिया के कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत देखने को मिल रही है। जून 2026 की शुरुआत के साथ पाकिस्तान, चीन, नेपाल और म्यांमार जैसे भारत के पड़ोसी देशों में ईंधन की कीमतों में कमी दर्ज की गई है। हालांकि भारत में फिलहाल पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर बने हुए हैं और निकट भविष्य में बड़ी राहत मिलने की संभावना कम मानी जा रही है। ग्लोबल पेट्रोल प्राइस के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आने के बाद वैश्विक स्तर पर पेट्रोल की औसत कीमत में गिरावट दर्ज हुई है। इसके बावजूद भारत में पेट्रोल की औसत कीमत लगभग 108.71 रुपये प्रति लीटर बनी हुई है। पड़ोसी देशों की बात करें तो पाकिस्तान में पेट्रोल की औसत कीमत में उल्लेखनीय गिरावट आई है और यह 130 रुपये प्रति लीटर के आसपास पहुंच गई है। चीन में भी पेट्रोल के दाम में मामूली कमी दर्ज की गई है। वहीं नेपाल और म्यांमार में भी ईंधन सस्ता हुआ है। इसके विपरीत बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिली है। डीजल के मोर्चे पर भी कुछ देशों में राहत मिली है। पाकिस्तान, नेपाल और चीन में डीजल की कीमतें घटी हैं, जबकि श्रीलंका, भूटान और म्यांमार में इसके दाम बढ़े हैं। भारत में कीमतें कम क्यों नहीं हो रहीं, इसे लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और भू-राजनीतिक तनाव के दौरान सरकार ने करों में राहत देकर उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ को सीमित रखने की कोशिश की थी। बाद में कीमतों में चरणबद्ध बढ़ोतरी भी की गई। वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि तेल विपणन कंपनियों पर बढ़ते दबाव और लागत को देखते हुए निकट भविष्य में कीमतों में कटौती की संभावना सीमित है। कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया है कि यदि कंपनियों के घाटे बढ़ते हैं तो कीमतों में और वृद्धि की आवश्यकता पड़ सकती है। हालांकि, यदि वैश्विक स्तर पर तनाव कम होता है और कच्चे तेल की कीमतें लगातार नीचे आती हैं, तो भारत में भी पेट्रोल-डीजल की कीमतों में राहत का रास्ता खुल सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार कच्चे तेल का भाव 70 से 80 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में स्थिर होने पर उपभोक्ताओं को फायदा मिलने की संभावना बढ़ सकती है। फिलहाल भारतीय उपभोक्ताओं को ईंधन कीमतों में तत्काल राहत मिलने की उम्मीद कम है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार की दिशा आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल के दाम तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।
लोन लेने से पहले EMI के ये नियम जरूर जान लें: छोटी गलती बढ़ा सकती है बड़ा आर्थिक बोझ

नई दिल्ली। आज के समय में घर, कार, शिक्षा और व्यक्तिगत जरूरतों को पूरा करने के लिए लोग तेजी से बैंक लोन का सहारा ले रहे हैं। आसान प्रोसेस और डिजिटल बैंकिंग के चलते लोन लेना पहले की तुलना में सरल जरूर हो गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि EMI से जुड़े नियमों की अनदेखी भविष्य में गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर सकती है। वित्तीय विशेषज्ञों के अनुसार, लोन लेने से पहले अपनी मासिक आय, खर्च और EMI क्षमता का सही आकलन करना बेहद जरूरी है। गलत योजना से न केवल बजट बिगड़ सकता है, बल्कि लंबे समय तक आर्थिक दबाव भी बना रह सकता है। EMI आय का 35-40% से ज्यादा नहीं होनी चाहिएविशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि किसी भी व्यक्ति की कुल EMI उसकी मासिक आय के 35 से 40 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि EMI इससे ज्यादा हो जाती है, तो रोजमर्रा के खर्च, बचत और आपातकालीन जरूरतों पर सीधा असर पड़ता है। बैंकों द्वारा भी लोन मंजूरी से पहले आवेदक की आय, मौजूदा कर्ज और खर्च का विस्तृत आकलन किया जाता है ताकि डिफॉल्ट का जोखिम कम किया जा सके। ब्याज दर का सही चुनाव बेहद जरूरीलोन लेते समय सबसे महत्वपूर्ण पहलू ब्याज दर होता है। ग्राहकों को यह समझना चाहिए कि फ्लोटिंग और फिक्स्ड ब्याज दर में बड़ा अंतर होता है। फ्लोटिंग रेट में बाजार की स्थिति के अनुसार EMI बढ़ या घट सकती है, जिससे भविष्य में भुगतान अनिश्चित हो सकता है। वहीं फिक्स्ड रेट में EMI पूरी अवधि के लिए स्थिर रहती है, जिससे बजट प्लानिंग आसान हो जाती है। लोन अवधि का सीधा असर EMI परलोन की अवधि भी EMI को सीधे प्रभावित करती है। लंबी अवधि चुनने पर EMI कम हो जाती है, जिससे मासिक दबाव कम महसूस होता है, लेकिन कुल मिलाकर ब्याज अधिक देना पड़ता है। वहीं कम अवधि के लोन में EMI ज्यादा होती है, लेकिन कुल ब्याज कम चुकाना पड़ता है। ऐसे में वित्तीय विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि लोन अवधि का चुनाव अपनी आय और खर्च के संतुलन को ध्यान में रखकर करना चाहिए। क्रेडिट स्कोर और अतिरिक्त चार्ज पर ध्यान जरूरीलोन लेने से पहले क्रेडिट स्कोर की जांच करना भी जरूरी है, क्योंकि अच्छा क्रेडिट स्कोर होने पर कम ब्याज दर पर लोन मिलने की संभावना बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रोसेसिंग फीस, प्रीपेमेंट चार्ज और अन्य छिपे हुए शुल्कों की जानकारी भी पहले से लेना जरूरी है, ताकि बाद में कोई अतिरिक्त आर्थिक बोझ न पड़े। सही योजना से ही बनती है वित्तीय स्थिरताविशेषज्ञों का कहना है कि लोन लेना गलत नहीं है, लेकिन बिना योजना के लिया गया कर्ज भविष्य में आर्थिक परेशानी का कारण बन सकता है। सही EMI प्लानिंग और समझदारी से लिया गया निर्णय व्यक्ति को वित्तीय स्थिरता की ओर ले जाता है।