त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी केन्द्रीय बजट

-डॉ. महेन्द्र सिंह केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए संसद में पेश किया गया गया बजट देश के त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी बजट है। इस बजट में समाहित प्रस्तावों में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने और उसे निरन्तर बनाये रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही, लोककल्याण के लिए बजट प्रस्तावों पर भी पर्याप्त बल दिया गया है। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में तीन कर्तव्यों को उजागर किया। ये हैं : (ⅰ) अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के प्रति लचीलेपन में वृद्धि करते हुए आर्थिक विकास को गति प्रदान करना और उसे बनाये रखना; (ii) जन आकाँक्षाओं की पूर्ति और उनकी क्षमताओं का वर्द्धन करना एवं (iii) देश के प्रत्येक परिवार, समुदाय, क्षेत्र और वर्ग तक संसाधनों, सुविधाओं तथा अवसरों की पहुंच को सुनिश्चित करना। इस तरह ये कर्तव्य मोदी सरकार की सर्वसमावेशी एवं पोषणीय विकास की रणनीति को सुस्पष्ट रूप में परिभाषित करते हैं। ध्यातव्य है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के केन्द्र में एक ओर आर्थिक संवृद्धि की गति को तेज करना रहा है वहीं दूसरी तरफ सापेक्षतया वंचित लोगों एवं क्षेत्रों को उनकी क्षमता व सामर्थ्य को बढ़ाते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में शामिल करना रहा है। इस दृष्टि से यह कहना समीचीन है कि ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास एवं सबका प्रयास’ का ध्येय वाक्य लोकनीतियों के प्रतिपादन एवं कार्यान्वयन का नाभिकेन्द्र रहा है। इसमें आर्थिक समृद्धि एवं लोककल्याण में वृद्धि स्वतः विहित रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा संरचनात्मक आर्थिक सुधारों का मूल विचार ‘रिफार्म, परफार्म व ट्रॉन्सफार्म’ रहा है। इस बजट में भी, बजट प्रावधानों को अधिक परिणामोन्मुखी बनाने के लिए सुधारों के क्रम को जारी रखा गया है। ‘विकसित भारत’ के महालक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस बजट में कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, एमएसएमई, ओडीओपी, रिन्यूबल व न्यूक्लियर एनर्जी, सेमिकंडक्टर, आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स, जलमार्ग व रेल विकास, डिकार्बनाइजेशन, निर्यात संवर्द्धन, रक्षा क्षेत्र इत्यादि संभावनापूर्ण क्षेत्रों एवं तत्सम्बन्धी क्रियाओं के संवर्द्धन व विकास के लिए वित्तमंत्री द्वारा प्राथमिकता के आधार पर अपेक्षित आवंटन किए गये हैं। साथ ही, मानव पूँजी के निर्माण से सम्बन्धित क्षेत्रों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला, युवा और दिव्यांग सशक्तिकरण पर पर्याप्त बल दिया गया है। वस्तुतः, मानव पूँजी के बेहतर विकास से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी तथा जनकल्याण में वृद्धि होगी। वित्तमंत्री ने इस बजट में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को जारी रखते हुए इस पर विशेष बल दिया है। हाल के वर्षों में जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा में निरन्तर गिरावट से इस बात की पुष्टि होती है कि मोदी सरकार का राजकोषीय प्रबन्धन सम्बन्धी निष्पादन श्लाधनीय रहा है। वर्ष 2021-22 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.7 प्रतिशत; 2022-24 में 6.5 प्रतिशत 2023-24 में 5.5 प्रतिशत; 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं 2025-26 में 4.4 प्रतिशत था। इसे 2026-27 के बजट में कम करके 4.3 प्रतिशत पर रख गया है। ये प्रवृत्तियाँ राजकोषीय व्यवस्था की मजबूती की परिचायक हैं। मोदी सरकार की राजकोषीय प्रवीणता एवं बेहतर वित्तीय प्रबंधन का ही परिणाम है कि जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा निरन्तर घटा है। साथ ही, वित्तमंत्री इस बात में भी सफल रही हैं कि उन्होंने इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष केन्द्र सरकार के ऋण को 55.6 प्रतिशत पर रखा है। यह वर्ष 2025-26 के लिए 56.1 प्रतिशत रखा गया था। साथ ही, इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष राजस्व घाटा एवं प्राथमिक घाटा में भी कमी आई है। घटते घाटे एवं ऋण से निजी पूँजी निवेश में वृद्धि होगी। इस बजट में, राजस्व में सतत वृद्धि; पूँजीगत व्यय में वृद्धि और राजकोषीय पारदर्शिता में सुधार के संकेतकों से भी देश की राजकोषीय सुदृढ़ता की पुष्टि होती है। पूँजीगत खर्च के जरिये अवस्थापना क्षेत्र के विकास ने विकास को तेज करने और रोजगार को बढ़ाने में उल्लेखनीय तौर पर योगदान दिया है। इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक विकास में धमनियों का कार्य करता है। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर मोदी सरकार द्वारा किया गया निवेश लगातार विकास का इंजन बना हुआ है। एक ओर जहाँ केन्द्र सरकार स्वयं पूंजीगत व्यय को बढ़ा रही है; वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारों को भी अनुदान व ऋण देकर उनके पूँजीगत खर्च को बढ़ाने में मदद कर रही है। वर्ष 2025-26 की तुलना में 2026-27 के बजट में पूँजीगत आवंटन में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यदि राज्यों को दी जाने वाली अनुदान राशि को भी जोड़ लिया जाय तब प्रभावी पूँजीगत व्यय की वृद्धि 22 प्रतिशत बैठती है। इस तरह मोदी सरकार की यह विचारणा सुस्पष्ट होती है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूती आर्थिक उन्नति का मूलाधार है। इस बजट में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों क्षेत्रों में पूँजीगत व्यय की वृद्धि दरें इस तरह हैं: टेलीकॉम 97 प्रतिशत; रक्षा 18 प्रतिशत; रेलवे 10 प्रतिशत; सड़क व हाईवे 8 प्रतिशत एवं आवास व नगरीय विकास 6 प्रतिशत। यह तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि बेहतर राजकोषीय प्रबन्धन से अब विकासगामी क्रियाओं के लिए अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। जीडीपी के सापेक्ष सरकारी ऋण भार को घटाकर 2030-31 तक 50 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। स्पष्ट है कि इससे आगामी वर्षों में अवस्थापना के विकास के लिए और अधिक ‘फिस्कल स्पेस’ मिल सकेगा। उल्लेखनीय है कि पूँजीगत व्यय में मोदी सरकार द्वारा की गई वृद्धि से आय में तो कई गुना वृद्धि होती ही है, इससे रोजगार में भी उल्लेखनीय तौर पर वृद्धि होती है। इस बजट में छोटे, मझोले एवं धार्मिक नगरों के विकास के लिए भी प्रावधान किए गये हैं। नगरीय क्षेत्रों में जन सुविधाओं के बेहतर विकास से जनजीवन सुगम व स्वस्थ होगा। साथ ही, इसके विकास से कारोबार सुगम होगा, इसमें वृद्धि होगी। धार्मिक व साँस्कृतिक स्थलों के उन्नयन से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा देश-विदेश से पर्यटकों की आवाजाही से आर्थिकी सशक्त होगी। इस बजट में हास्पिटेलिटी तथा हेल्थ टूरिज्म से भी लोगों की आजीविका के स्रोतों में वृद्धि, रेल एवं जलमार्गों के विकास एवं अपग्रेडेशन से लाजिस्टिक्स की लागतें घटेंगी। इससे व्यापार में वृद्धि तो होगी ही, साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी और अर्थव्यवस्था की स्पर्धात्मकता में वृद्धि से निर्यात-प्रेरित निवेश होगा। इस बात का उल्लेख करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस बजट में अवस्थापना क्षेत्र के विकास के लिए 12.20 लाख
रक्षा बजट 2026-27 से बढ़ेगी सैन्य क्षमता और आत्मनिर्भरता.

नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता दी गई है। वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों, क्षेत्रीय चुनौतियों और चल रहे अभियानों को ध्यान में रखते हुए रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि भारत की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति, आत्मनिर्भरता और तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में एक मजबूत कदम है। इसके बारे में यही कहना होगा कि यह बजट देश की सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ भारत को वैश्विक सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने की आधारशिला भी रखता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष के 6.81 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 15.19 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बजट को आधुनिकरण, स्वदेशीकरण और मानव संसाधन विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह सुरक्षा, विकास और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन स्थापित करता है। यदि सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में देखा जाए, तो यह रक्षा आवंटन अनुमानित जीडीपी का लगभग 2.0 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष के 1.9 प्रतिशत से अधिक है। भारत पहले ही दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तेजी से तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में रक्षा क्षेत्र में यह निवेश देश की वैश्विक स्थिति को और मजबूत करता है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के बाद भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा खर्च करने वाले देशों में शामिल है। यह तथ्य भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं और उसकी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण पर केंद्रित है। इसके लिए 2.1 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.84 प्रतिशत अधिक है। यह राशि नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों, आधुनिक युद्धपोतों, पनडुब्बियों, ड्रोन और डिजिटल युद्ध प्रणाली के विकास एवं खरीद पर खर्च की जाएगी। भारतीय वायुसेना और नौसेना के लिए अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया गया है, क्योंकि ये तकनीकी रूप से अधिक महंगे और जटिल होते हैं। इसके साथ ही, वेतन, भत्ते, ईंधन, गोला-बारूद और रखरखाव के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपये का राजस्व बजट निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है। इससे सैनिकों के मनोबल को मजबूत करने और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायता मिलेगी। रक्षा पेंशन के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे लगभग 34 लाख रक्षा एवं नागरिक कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। वन रैंक वन पेंशन योजना में सुधार के माध्यम से सरकार ने पूर्व सैनिकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के लिए 29,100 करोड़ रुपये, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के लिए 7,394 करोड़ रुपये और पूर्व सैनिक कल्याण योजनाओं के लिए 12,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। ये सभी आवंटन यह दर्शाते हैं कि सरकार केवल हथियारों पर ही नहीं, बल्कि सैनिकों के जीवन, बुनियादी ढांचे और भविष्य की आवश्यकताओं पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। स्वदेशीकरण इस बजट का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। पूंजीगत अधिग्रहण के लिए 1,85,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें से 75 प्रतिशत राशि घरेलू उद्योग से रक्षा उपकरण खरीदने पर खर्च की जाएगी। इससे भारत की आत्मनिर्भर भारत नीति को मजबूती मिलेगी और देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा प्राप्त होगी। निजी क्षेत्र की भागीदारी और अनुसंधान एवं विकास में निवेश के कारण इस वर्ष रक्षा निर्यात से लगभग 30,000 करोड़ रुपये की आय होने की संभावना है। यह न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित भी करता है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की क्षमताओं में पिछले कुछ वर्षों में लगातार वृद्धि हुई है। भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित और प्रशिक्षित सेनाओं में से एक मानी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्यों से लेकर अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों तक, भारतीय सशस्त्र बलों ने हर क्षेत्र में अपनी दक्षता और समर्पण साबित किया है। सेना का तकनीकी रूपांतरण, महिला सैनिकों की बढ़ती भागीदारी और अत्याधुनिक प्रशिक्षण प्रणाली भारतीय सैन्य शक्ति को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है। इसके अलावा, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे न केवल सेना की तैनाती और रसद व्यवस्था मजबूत होती है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों का सामाजिक और आर्थिक विकास भी तेज होता है। रक्षा बजट का प्रभाव सुरक्षा तक सीमित न रहते हुए यह राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रक्षा उद्योग से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। स्वदेशी हथियारों और उपकरणों का निर्माण देश के औद्योगिक विकास को गति देता है। यह बजट तकनीकी नवाचार, स्टार्टअप और अनुसंधान संस्थानों के लिए भी नए अवसर पैदा करता है। आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि साइबर युद्ध, सूचना युद्ध और अंतरिक्ष आधारित सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। इस बजट में इन उभरते क्षेत्रों में निवेश का संकेत मिलता है, जिससे भारत भविष्य के युद्धों के लिए तैयार हो सकेगा। तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और एकीकृत युद्ध क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। भारत के यूरोप और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग से उसकी सामरिक स्थिति और मजबूत हुई है। बहु-क्षेत्रीय अभियानों, दीर्घकालिक युद्ध क्षमता और सीमाओं की सुरक्षा के लिए यह बजट एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि भारतीय सशस्त्र बल आतंकवाद से लेकर पारंपरिक युद्ध तक हर प्रकार की चुनौती का सामना करने में सक्षम हों। यदि इस रक्षा बजट को आम नागरिक के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह राष्ट्र की सुरक्षा के लिए एक प्रकार का बीमा है। यह देश के भविष्य को सुरक्षित करने, सैनिकों के मनोबल को मजबूत करने और भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित करने की
पत्थर के देवता- डॉ. नारायण व्यास: ये हैं समय, शिला और सभ्यता के मौन साधक

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्य प्रदेश की धरती पर जब भी पत्थरों की भाषा पढ़ी जाती है, शिलाओं पर उकेरे गए आदिम मनुष्य के सपने समझे जाते हैं और गुफाओं की दीवारों पर जब सांस लेते इतिहास को अनुभूत किया जाता है, तब अनायास ही एक नाम सामने आता है; भारत के महान पुरातत्त्वविद्, चित्रकार, इतिहासकार और सांस्कृतिक शोधकर्ता डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर का। डॉ. नारायण व्यास उन्हीं के शिष्य हैं, इसलिए पुरातत्व के इस तपस्वी को जब 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया, तो यह सम्मान उन अनगिनत पत्थरों, शैलचित्रों और अनसुनी कथाओं का सम्मान था, जिन्हें उन्होंने जीवन भर सहेजा। सच; आज के संदर्भ में देखें तो सच्चे अर्थों में ‘पत्थर के देवता’ हैं, क्योंकि उनके लिए पत्थर जड़ नहीं, जीवंत इतिहास हैं। मध्य प्रदेश की धरती पर फैली पहाड़ियां, गुफाएं और शैलाश्रय सिर्फ प्राकृतिक संरचनाएं नहीं हैं, वे मानव सभ्यता की सबसे पुरानी स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन पत्थरों की भाषा को जिसने पढ़ा, समझा और दुनिया को सुनाया, उनमें आज डॉ. नारायण व्यास का नाम अग्रणी है। मालवांचल से जुड़े डॉ. नारायण व्यास का जीवन पुरातत्व और सांस्कृतिक संरक्षण की ऐसी प्रेरक कहानी है, जिसमें यश से अधिक कर्म और प्रचार से अधिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में सीनियर और बाद में सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में उन्होंने 2009 तक सेवा की। यह वह समय था, जब पुरातत्व कार्य आसान नहीं था। सीमित संसाधन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और लंबी फील्ड यात्राएं इस पेशे का हिस्सा थीं। लेकिन डॉ. व्यास के लिए यह सब चुनौतियां एक नया अवसर दे रही थीं क्योंकि उनके लिए पुरातत्व नौकरी नहीं, जीवन-धर्म था। डॉ. व्यास की पहचान का सबसे उज्ज्वल अध्याय भीमबेटका से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव की जीवन-शैली, कला और सोच का सबसे प्रामाणिक साक्ष्य है। गुफाओं की दीवारों पर बने शैलचित्र हजारों वर्ष पुराने हैं, जिनमें शिकार, नृत्य, सामाजिक गतिविधियां और प्रकृति से मनुष्य का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के सान्निध्य में भीमबेटका की रॉक पेंटिंग्स का गहन अध्ययन किया और उनके संरक्षण के लिए वर्षों तक काम किया। डॉ. वाकणकर, जिन्हें भारतीय रॉक आर्ट का पितामह कहा जाता है से मिली दृष्टि और अनुशासन ने डॉ. व्यास को इस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया। 2003 में जब भीमबेटका को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला, तब उसके पीछे डॉ. व्यास जैसे शोधकर्ताओं की वर्षों की मेहनत छिपी हुई दिखाई दी। भीमबेटका के अलावा सांची स्तूपों के संरक्षण और अध्ययन में भी डॉ. व्यास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सांची केवल स्थापत्य का उदाहरण होने के साथ विश्व भर के लिए आज बौद्ध दर्शन, अहिंसा और शांति का प्रतीक है। इन स्तूपों और उनसे जुड़े बौद्ध स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में डॉ. व्यास ने उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सांची की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रहे और आने वाली पीढ़ियां इसे उसी गरिमा के साथ देख सकें। डॉ. व्यास का शोध कार्य गुजरात स्थित रानी की वाव तक भी फैला। रानी की वाव पर उन्होंने अपना पीएचडी शोध पूरा किया। यह बावड़ी भारतीय जल-संरचना, स्थापत्य कला और धार्मिक प्रतीकों का अद्भुत उदाहरण है। रानी की वाव को 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया और इसके वैश्विक स्तर पर स्थापित होने में डॉ. व्यास के शोध और संरक्षण प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन तीनों स्थलों भीमबेटका, सांची और रानी की वाव के संरक्षण में योगदान देना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है, जो बहुत कम पुरातत्वविदों के हिस्से आती है। मध्य भारत में प्रागैतिहासिक औजारों और शैलचित्रों पर डॉ. व्यास का कार्य उन्हें विशेष स्थान दिलाता है। उन्होंने प्रारंभिक मानव द्वारा उपयोग किए गए 500 से अधिक प्रागैतिहासिक औजारों का संग्रह तैयार किया, जिसे उन्होंने शोध और शिक्षा के उद्देश्य से संरक्षित किया है। यह संग्रह असम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है और पुरातत्व जगत में इसे एक दुर्लभ उपलब्धि माना जाता है। यह संग्रह इस बात का भी प्रमाण है कि डॉ. व्यास के लिए पुरातत्व अध्ययन के साथ विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी है। शैक्षणिक दृष्टि से भी डॉ. व्यास का योगदान व्यापक है। उन्होंने मध्य भारत के रॉक आर्ट स्थलों पर पोस्ट-डॉक्टरेट डी.लिट. किया, जिससे उनकी विशेषज्ञता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। स्पेन जैसे देशों के साथ उनका सहयोग इस बात का संकेत है कि भारतीय रॉक आर्ट और प्रागैतिहासिक अध्ययन वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में दिए गए उनके व्याख्यानों से शोधार्थियों के साथ ही आम लोगों को भी इतिहास के प्रति संवेदनशील बनाया है। डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. वाकणकर की स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए दिल्ली में दीर्घा निर्माण में भी सहयोग किया है। यह कार्य उनकी उस सोच को दर्शाता है, जिसमें ज्ञान परंपरा और गुरु-शिष्य संबंध को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण उन्हें पुरातत्व जगत में “मध्य भारत का पुरातत्व पुरोधा” और “ग्रैंड ओल्ड मैन” कहा जाता है। यह उपाधियां किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि सम्मान और अनुभव से मिलती हैं। ऐसे में कहना यही होगा कि वर्ष 2026 में पद्मश्री सम्मान मिलना बताता है कि पुरातत्व अतीत की खुदाई और उसे जानने के अर्थ में तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही ये सांस्कृतिक चेतना और अपने जड़ों की पहचान की रक्षा का माध्यम भी है। आज भी एक लम्बी उम्र पार करने के बाद भी डॉ. नारायण व्यास उतने ही सक्रिय दिखाई देते हैं, जितने कि किसी शोधार्थी युवा को देखा जा सकता है। वे शोध, लेखन, संवाद और मार्गदर्शन के माध्यम से युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का सतत कार्य कर रहे हैं। उनका काम इस बात का प्रमाण है कि पत्थर जड़ नहीं होते, वे बोलते हैं, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं, वे हंसते और रोते भी हैं। इस तरह देखें तो उनमें समय की स्मृति, मानव और प्रकृति की तमाम कहानियां और सभ्यता की चेतना बसती है। डॉ. व्यास आज भी पत्थरों की भाषा को समझा रहे हैं। इसी अर्थ में वे वास्तव में “पत्थर के देवता” हैं, जिनकी साधना ने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत
नई नौकरियां, मजबूत अर्थव्यवस्था: 2026 में भारत में पीएमआई 59.5

– रवि रंजन सिंह भारत की अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में अभूतपूर्व गति पकड़ी है। जनवरी 2026 के एचएसबीसी फ्लैश पीएमआई डेटा (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) ने इसकी पुष्टि की है, जहां मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टरों में तेजी दर्ज की गई। यह न केवल आर्थिक विकास की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि रोजगार सृजन के व्यापक अवसरों की नींव भी रखता है। विवेचनात्मक दृष्टि से देखें तो ये आंकड़े बताते हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच भी लचीलापन दिखा रहा है। सरकारी नीतियां जैसे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ ने उत्पादन और सेवा क्षेत्रों को गति दी है, जिसका असर रोजगार पर स्पष्ट दिख रहा है। इस लेख में हम इन आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे। पीएमआई डेटा और आर्थिक गतिविधियों में उछालएचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई इंडेक्स जनवरी में 59.5 पर पहुंच गया, जो दिसंबर के 57.8 से काफी ऊपर है। एसएंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित यह डेटा मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों क्षेत्रों में सुधार को रेखांकित करता है। एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के अनुसार, वृद्धि की गति दोनों क्षेत्रों में तेज हुई, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 2025 के औसत से नीचे रहा। दिसंबर में थोड़ी गिरावट के बाद नए ऑर्डर्स में तेज उछाल आया, जो मांग में सुधार का संकेत है। विवेचना करें तो इनपुट लागतों में बढ़ोतरी के बावजूद महंगाई मध्यम स्तर पर रही। मैन्युफैक्चरर्स पर इसका दबाव अधिक था, लेकिन सेवा प्रदाताओं ने बेहतर तरीके से प्रबंधन किया। निजी क्षेत्र की गतिविधियों में तेजी का मुख्य कारण नए व्यवसायों की बढ़ोतरी थी। सर्वे में शामिल लोगों ने बढ़ती मांग और आक्रामक विपणन को जिम्मेदार ठहराया। मैन्युफैक्चरिंग ने सर्विसेज से अधिक तेजी दिखाई, जो निर्यात-केंद्रित नीतियों का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स में पिछले चार महीनों की सबसे मजबूत वृद्धि दर्ज हुई, जिसमें एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व प्रमुख बाजार बने। यह भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति को प्रमाणित करता है। दिसंबर में स्थिर रहने के बाद जनवरी में निजी क्षेत्र में भर्तियां फिर शुरू हुईं। कंपनियां व्यावसायिक गतिविधियों के 12 महीने के दृष्टिकोण पर आशावादी हैं। ये संकेत आर्थिक विकास को रोजगार से जोड़ते हैं, जहां जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर बनी रहने की उम्मीद है। अवसरों में 2026 में नई भूमिकाओं का विस्तारनौकरीडॉटकॉम के द्विवार्षिक सर्वेक्षण से और सकारात्मक खबरें आई हैं। 1,250 से अधिक रोजगार प्रदाताओं के इनपुट के आधार पर, 76 प्रतिशत नियोक्ता 2026 की पहली छमाही में नई नौकरियां पैदा करेंगे। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र 88 प्रतिशत नई भूमिकाओं के साथ अग्रणी है, जो उम्रदराज आबादी और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत का परिणाम है। मैन्युफैक्चरिंग में 79 प्रतिशत, बीएफएसआई में 70 प्रतिशत और आईटी में 76 प्रतिशत नई नौकरियां होंगी। निश्चित ही यह आंकड़ा भारत की युवा आबादी (65 प्रतिशत से अधिक 35 वर्ष से कम आयु के) के लिए वरदान है। विवेचनात्मक रूप से देखें तो आर्थिक सुधार रोजगार-सघन विकास की ओर बढ़ रहे हैं। प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया है, जबकि पीएलआई योजना ने मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही एक तथ्य यह भी सामने आया है कि 87 प्रतिशत नियोक्ताओं ने माना है कि एआई से नौकरियों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत, 18 प्रतिशत का कहना है कि एआई नई भूमिकाएं सृजित कर रहा है, खासकर आईटी, एनालिटिक्स और मार्केटिंग में। ये निरंतर कौशल विकास की आवश्यकता पर जोर देता है। उदाहरणस्वरूप, चैटजीपीटी जैसे टूल्स ने कोडिंग और डेटा एनालिसिस में मांग बढ़ाई है। भर्ती में मध्य स्तर (4-7 वर्ष अनुभव) के पेशेवरों की मांग बढ़ेगी, जहां आईटी के 69 प्रतिशत प्रदाता इन्हें प्राथमिकता देंगे। स्वास्थ्य सेवा में 65 प्रतिशत नियोक्ता शुरुआती स्तर (0-3 वर्ष) को लक्षित करेंगे, जो नए स्नातकों के लिए राहत है। मैन्युफैक्चरिंग और आईटी मध्य स्तर में अग्रणी होंगे। आज देश में स्वास्थ्य सेवा में 88 प्रतिशत नई नौकरियां पैदा हुई हैं। महामारी के बाद निवेश बढ़ा है। टेलीमेडिसिन और डायग्नोस्टिक्स में विस्तार लगातार इस सेक्टर में होता हुआ दिख रहा है।मैन्युफैक्चरिंग में 79 प्रतिशत का उछाल है- इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल में निर्यात बढ़ा। पीएमआई में अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स की मजबूती इसका प्रमाण है। आईटी और बीएफएसआई में भी पिछली तुलना में 76-70 प्रतिशत बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। डिजिटल बैंकिंग और क्लाउड कंप्यूटिंग ड्राइवर में भारी उत्साह नजर आ रहा है। इसके साथ ही अन्य में विशेष तौर पर रिन्यूएबल एनर्जी और ई-कॉमर्स में अप्रत्यक्ष वृद्धि दिखती है। निश्चित ही ये आंकड़े बताते हैं कि विविधीकरण हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां रोजगार फैला रही हैं, जो असमानता कम करेगी (लेखक आर्थक मामलों के विश्लेषक हैं)
स्क्रीन के उजाले में बुझती युवा संवेदनाएं

– डॉ. संध्या एस चौकसे आज का भारत युवाओं का भारत है। यही युवा देश की रीढ़ हैं और भविष्य की नींव भी, किंतु विडंबना यह है कि जिन हाथों में कलम किताबें औजार और रचनात्मकता होनी चाहिए, उन्हीं हाथों में आज हर पल एक चमकती हुई स्क्रीन दिखाई देती है। मोबाइल फोन! जिसने दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया, वही अब हमारी संवेदनाओं संबंधों और संतुलन को चुपचाप निगलता जा रहा है। ऐसे में आज मोबाइल आधुनिकता का प्रतीक भर नहीं रहा है, वह घटती मानवीय संवेदनशीलता का सबसे स्पष्ट चेहरा बन चुका है। डिजिटल क्रांति ने शिक्षा संचार और सूचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु जब उपयोग की सीमा टूटती है तब वही साधन विनाश का कारण बन जाता है। भारत में आज युवा वर्ग मोबाइल लत का सबसे बड़ा शिकार है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 50 प्रतिशत युवा किसी न किसी रूप में मोबाइल पर निर्भरता या लत के लक्षण दिखा रहे हैं। विश्व स्तर पर लगभग 6.9 प्रतिशत आबादी स्मार्टफोन लत से ग्रस्त मानी जाती है जिसमें भारतीय युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ये आंकड़े आज उस गहरी सामाजिक समस्या की चेतावनी हैं जो हमारे सामने खड़ी है। हाल के वर्षों में मोबाइल से जुड़ी हिंसक और आत्मघाती घटनाएँ समाज को झकझोरने वाली हैं। ओडिशा के जगतसिंहपुर में 21 वर्षीय छात्र द्वारा मोबाइल देखने से रोके जाने पर अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर देना। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में किशोर का अपने माता-पिता पिता द्वारा हर वक्त मोबाइल में डूबे रहने से मना किए जाने पर लोहे की छड़ से उन पर हमला कर देना, जिसमें कि पिता की जान किसी तरह बच सकी, लेकिन मां की जान चली गई। राजस्थान के जयपुर में तेरह साल की एक बच्ची को उसके माता-पिता ने मोबाइल देखने से मना किया और इससे गुस्साई उस बच्ची ने पहले अपने हाथ की नस काट ली, तो उसके अभिभावकों ने इलाज करा कर उसे बचा लिया। मगर अगले ही दिन उसने नदी में कूद कर जान दे दी। छत्तीसगढ़ और सरगुजा की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि मोबाइल अब आदत नहीं रहा बल्कि कई युवाओं के लिए भावनात्मक नियंत्रण का केंद्र बन चुका है। जब मोबाइल उनसे दूर होता है तो उन्हें लगता है जैसे उनका अस्तित्व ही छिन गया हो। युवा अवस्था लक्ष्य अनुशासन और निर्माण की होती है। परंतु मोबाइल की अंतहीन दुनिया युवाओं को लक्ष्यहीनता की ओर धकेल रही है। घंटों तक रील्स गेम्स और चैट में उलझे रहना पढ़ाई कौशल विकास और शारीरिक गतिविधियों का समय छीन रहा है। अध्ययनों के अनुसार औसतन भारतीय युवा प्रतिदिन चार से छह घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिताते हैं जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन किशोरों के लिए दो घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम को हानिकारक मानता है। इस असंतुलन का परिणाम है एकाग्रता में कमी धैर्य का अभाव और त्वरित आनंद की मानसिकता। मानसिक स्वास्थ्य पर मोबाइल का प्रभाव अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है। सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली तथाकथित परफेक्ट लाइफ की तस्वीरें युवाओं को निरंतर तुलना के जाल में फँसा देती हैं। लाइक और फॉलोअर्स आत्म मूल्यांकन का पैमाना बन जाते हैं। शोध बताते हैं कि जो किशोर प्रतिदिन चार घंटे से अधिक मोबाइल का उपयोग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण 60 प्रतिशत तक अधिक पाए जाते हैं। मोबाइल लत चिंता अवसाद और नींद विकारों की संभावना को दो से तीन गुना तक बढ़ा देती है। अनिद्रा चिड़चिड़ापन और निर्णय लेने में कठिनाई आज सामान्य समस्याएँ बन चुकी हैं। सामाजिक अलगाव इस संकट का दूसरा गंभीर पहलू है। आभासी संवाद ने वास्तविक रिश्तों की जगह ले ली है। एक सर्वे के अनुसार मोबाइल के कारण माता पिता और बच्चों के बीच औसत संवाद समय घटकर मात्र दो मिनट रह गया है। जब परिवार में संवाद टूटता है तो भावनात्मक सुरक्षा भी कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि मोबाइल लत से ग्रस्त किशोरों में सामाजिक समर्थन की कमी 25 से 30 प्रतिशत अधिक पाई गई है। यह कमी उन्हें आत्मघाती विचारों और आत्म हानि की ओर धकेल सकती है। शारीरिक स्वास्थ्य भी इस डिजिटल लत से अछूता नहीं है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों में जलन सिरदर्द गर्दन और पीठ दर्द आम समस्याएँ बन गई हैं। देर रात तक मोबाइल उपयोग से नींद का चक्र बिगड़ता है जिससे हार्मोनल असंतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है। खेलकूद और शारीरिक श्रम की जगह बैठकर मोबाइल चलाने की आदत मोटापा आलस्य और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को बढ़ावा दे रही है। नैतिक और भावनात्मक स्तर पर मोबाइल का प्रभाव और भी चिंताजनक है। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध अश्लीलता हिंसा और नकारात्मक सामग्री युवाओं की सोच को प्रभावित कर रही है। बार-बार हिंसक दृश्य देखने से संवेदनशीलता घटती जाती है और दूसरों के दुख दर्द के प्रति सहानुभूति कम होती है। साइबर बुलिंग ट्रोलिंग और नफरत भरे संदेश युवाओं को आक्रामक और असहिष्णु बना रहे हैं। त्वरित संतुष्टि की आदत धैर्य जिम्मेदारी और त्याग जैसे मूल्यों को कमजोर कर रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी मोबाइल दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर ऑनलाइन संसाधनों ने सीखने को आसान बनाया है वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित उपयोग पढ़ाई में बाधा बन रहा है। नोटिफिकेशन और चैट के बीच गहन अध्ययन संभव नहीं रह जाता। कॉपी पेस्ट संस्कृति मौलिक सोच और विश्लेषण क्षमता को नुकसान पहुँचा रही है। इससे दीर्घकालीन बौद्धिक विकास प्रभावित हो रहा है और युवा शॉर्टकट की मानसिकता के शिकार बनते जा रहे हैं। साइबर अपराध भी युवाओं के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। फर्जी प्रोफाइल ऑनलाइन ठगी डेटा चोरी और ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाएँ युवाओं को मानसिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं। निजी तस्वीरों और जानकारी का दुरुपयोग गोपनीयता के हनन को बढ़ावा दे रहा है। अनुभवहीनता के कारण युवा अक्सर इन जालों में फँस जाते हैं। इस परिस्थितियों में ध्यान यही आता है कि डिजिटल डिटॉक्स आज समय की आवश्यकता बन चुका है। सप्ताह में कुछ घंटे या एक दिन मोबाइल से दूरी मानसिक शांति और संतुलन प्रदान कर सकती है। स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा
अरावली पहाड़ियों में खनन पर अदालत और सरकार

कैलाश चन्द्र । भारत की अरावली पर्वतमाला उत्तर और पश्चिम भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा प्रणाली की रीढ़ है। दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली यह प्राचीन पर्वत शृंखला भारत की सबसे पुरानी भूवैज्ञानि संरचनाओं में से एक होने के साथ ही यह मरुस्थलीकरण को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भूजल पुनर्भरण का अहम क्षेत्र और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आश्रय भी है। ऐसे में हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूब चैनलों पर यह दावा किया जाना कि सरकार ने अरावली में खनन और निर्माण के लिए ढील दे दी है स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है और इससे जुड़ा सच जानने के लिए प्रेरित करता है। इसी संदर्भ में केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना पड़ा है। उन्होंने इन आरोपों को भ्रामक और तथ्यों से परे बताया। वास्तव में इस पूरे विवाद को समझने के लिए तीन बुनियादी पहलुओं को स्पष्ट रूप से देखना आवश्यक है; अरावली का भौगोलिक और पारिस्थितिक महत्व सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए आदेश तथा सरकार की वर्तमान संरक्षण नीति। हम यदि गहराई से देखें तब अरावली पर्वतमाला दिल्ली हरियाणा राजस्थान और गुजरात के 39 जिलों में फैली हुई दिखाई देती है। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए यह ‘ग्रीन लंग्स’ की तरह काम करती है। यही पहाड़ियाँ थार मरुस्थल को उत्तर और पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती हैं। वर्षा जल को रोककर यह भूजल को रिचार्ज करती हैं। हवा के बहाव को नियंत्रित करती हैं और प्रदूषण के स्तर को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। एनसीआर की जलवायु वायु गुणवत्ता और जल सुरक्षा सीधे-सीधे अरावली की स्थिति से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि दशकों से अरावली क्षेत्र में खनन और निर्माण गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण और कई जगहों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए गए हैं। अरावली में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति को लेकर 1980 के दशक से ही जनहित याचिकाएँ दाखिल होती रही हैं। इन याचिकाओं के परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय ने कई ऐतिहासिक आदेश दिए। वर्ष 2009 में उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के फरीदाबाद गुरुग्राम और नूंह जिलों की अरावली पहाड़ियों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध आज भी प्रभावी है। इसके बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक मैपिंग और पर्यावरण प्रभाव अध्ययन ईआईए के बिना अरावली क्षेत्र में किसी भी नई खनन गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती। पहले वैज्ञानिक सर्वे फिर पर्यावरणीय योजना और उसके बाद ही किसी प्रकार की अनुमति यह सिद्धांत स्थापित किया गया। इसमें भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये रोकें अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक और कई मामलों में स्थायी हैं। आम धारणा के विपरीत हर साल नई-नई रोकें नहीं लगतीं किंतु एक बार सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद वह वर्षों तक लागू रहता है। वर्ष 2025 में उच्चतम न्यायालय ने अरावली को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। अदालत ने सभी राज्यों से अरावली की एक समान वैज्ञानिक और लागू करने योग्य परिभाषा तैयार करने को कहा और केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया। यहीं से भ्रम की शुरुआत हुई। कुछ लोगों ने यह प्रचारित किया कि अब केवल पहाड़ी की चोटी से 100 मीटर ऊपर तक ही संरक्षण रहेगा और उसके नीचे खनन की छूट मिल जाएगी। निश्चित ही ये दावा अधूरा और पूरी तरह भ्रामक है। विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाया गया 100 मीटर मानदंड पहाड़ी की ऊँचाई को स्थानीय राहत के संदर्भ में परिभाषित करता है। इसका अर्थ यह है कि पहाड़ी का आधार यदि जमीन के भीतर 20 मीटर नीचे तक फैला है तो संरक्षण की गणना वहीं से होगी। यानी चट्टान की पूरी मोटाई उसकी ढलानें और उससे जुड़ी घाटियां भी संरक्षण के दायरे में आती हैं। दूसरे शब्दों में यह नियम खनन को छूट देने के लिए नहीं है उक्त संदर्भ में यह स्पष्ट करने के लिए है कि अरावली वास्तव में कहाँ तक फैली है। जबकि इससे पहले विभिन्न राज्यों में अलग-अलग परिभाषाओं के कारण भ्रम और दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार नई वैज्ञानिक परिभाषा के बाद अरावली क्षेत्र लगभग 1.44 से 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ माना गया है। इसमें से करीब 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे-सीधे संरक्षित श्रेणी में आता है। केवल 0.2 से 2 प्रतिशत तक का हिस्सा ही सैद्धांतिक रूप से खनन के लिए संभावित माना जा सकता है। किंतु यह संभावित शब्द भी महत्वपूर्ण है। इस छोटे से हिस्से में भी खनन तभी संभव है जब विस्तृत माइनिंग प्लान बने। वैज्ञानिक अध्ययन हो। पर्यावरणीय मंजूरी मिले और इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन आईसीएफआरई से अनुमोदन प्राप्त हो। व्यावहारिक रूप से यह छूट लगभग नगण्य है। दिल्ली की पूरी अरावली में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है और भविष्य में भी यहां किसी प्रकार की माइनिंग की अनुमति नहीं दी जाएगी। एनसीआर के संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण परियोजनाओं पर भी सख्त नियंत्रण रहेगा। जहां किसी क्षेत्र को लेकर संदेह होगा उसे तब तक अरावली माना जाएगा जब तक वैज्ञानिक सर्वे कुछ और सिद्ध न कर दे। यह प्रावधान संरक्षण नीति को और अधिक कठोर बनाता है। ध्यातव्य हो कि मई 2024 में न्यायालय ने विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाए जा रहे असंगत मानदंडों को देखते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति में पर्यावरण मंत्रालय चारों राज्यों के वन विभाग भारतीय वन सर्वेक्षण भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के प्रतिनिधि शामिल रहे। समिति का उद्देश्य था अरावली की एक समान वैज्ञानिक और कानूनी रूप से मजबूत परिभाषा तैयार करना। इसकी सिफारिशों को 20 नवंबर 2025 के अंतिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार करते हुए पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान बनने तक सभी नई खनन लीज पर रोक लगा दी है। दूसरी ओर सरकार ग्रीन अरावली अभियान के तहत 39 जिलों में वनीकरण जल संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों की नर्सरी विकसित कर रही है। ड्रोन सर्विलांस सीसीटीवी ई-चालान हाईटेक वेइंग ब्रिज और जिला स्तरीय टास्क फोर्स के जरिए अवैध खनन पर निगरानी रखी जा रही है। कुल मिलाकर यदि हम सार रूप में कहें तो अरावली को लेकर ढील या छूट की खबरें तथ्यात्मक नहीं हैं यह बहुत भ्रामक हैं। न्यायालय के आदेशों
भारत-रूस: बदलती वैश्विक राजनीति में 2030 की रणनीतिक साझेदारी

विश्व राजनीति की जटिलताओं और शक्ति-संतुलन के नए उभार के बीच कुछ संबंध ऐसे होते हैं, जो समय के साथ अपनी प्रासंगिकता को विस्तार देते हुए नई दिशाएं निर्धारित करते हैं। भारत और रूस का रिश्ता ऐसे ही संबंध का उदाहरण है, जो युद्धों, तकनीकी क्रांतियों, आर्थिक परिवर्तन और वैश्विक संरेखणों के अनेक चक्रों से गुजरते हुए भी ध्रुव तारे की तरह स्थिर बना रहा है। यह स्थिरता वैश्विक परिदृश्य में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, रूसी विश्वास और दोनों देशों के साझा हितों का परिणाम है। नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में 5 दिसंबर को आयोजित 23वें वार्षिक भारत-रूस शिखर सम्मेलन ने इस ऐतिहासिक स्थिरता को पुनर्पुष्ट करते हुए भविष्य की दिशा स्पष्ट कर दी। यह रिश्ता अब अतीत का बोझ नहीं, भविष्य की वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में एक सक्रिय और आवश्यक घटक है। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-रूस संबंधों को ‘ध्रुव तारे की तरह स्थिर’ कहा तो वह केवल एक कूटनीतिक प्रशंसा वाक्य नहीं था। ध्रुव तारा दिशा दिखाने वाला स्थायी प्रकाश-स्रोत है और भारत-रूस संबंध भी आज वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं, ऊर्जा-भू-राजनीति, उभरती तकनीकों, व्यापारिक विविधीकरण और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की दिशा तय करते प्रतीत होते हैं। इस शिखर वार्ता ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत और रूस के बीच संबंध राष्ट्रीय हित, परस्पर सम्मान और साझा दृष्टिकोण की दृढ़ बुनियाद पर टिके हैं। ऐसे समय में, जब वैश्विक राजनीति अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, यूरोपीय सुरक्षा संकट, पश्चिमी प्रतिबंधों, नाटो विस्तार और यूक्रेन युद्ध के दबावों से आकंठ भरी हुई है, भारत और रूस का संबंध संतुलन, स्वायत्तता और दीर्घकालिक नीति-दृष्टि का मॉडल बनकर उभर रहा है। दोनों देशों ने ‘भारत-रूस आर्थिक सहयोग कार्यक्रम 2030’ नामक नए रोडमैप को मूर्त रूप दिया, जो व्यापार, ऊर्जा, उर्वरक, तकनीकी नवाचार, समुद्री अवसंरचना, श्रम गतिशीलता और रणनीतिक उद्योगों में साझेदारी को एक व्यापक और भविष्यनिष्ठ आधार प्रदान करता है। यह समझौता दो देशों के व्यापारिक हितों का विस्तार नहीं बल्कि मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में डॉलर वर्चस्व को चुनौती देने वाली और बहुध्रुवीय आर्थिक संरचना को स्थापित करने वाली एक साहसिक पहल भी है। भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंधों की प्रकृति अब मूल्य, तकनीक और रणनीतिक नियंत्रण पर आधारित होती जा रही है। 2024 में दोनों देशों का व्यापार 64 अरब डॉलर तक पहुंच चुका था और अब 2030 तक इसे 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। यह लक्ष्य उस नई आर्थिक संरचना की घोषणा है, जिसके तहत दोनों देशों के बीच 96 प्रतिशत भुगतान रुपये और रूबल में होने लगा है। इस तथ्य का अर्थ वैश्विक आर्थिक विमर्श में अत्यधिक दूरगामी है, जो न केवल डॉलर की निर्भरता को चुनौती देता है बल्कि वैश्विक व्यापार को एक ऐसी राह पर ले जाता है, जहां मुद्रा-स्वायत्तता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और बहु-मुद्रा व्यापार व्यवस्था भविष्य का आधार बन सकती है। शिखर सम्मेलन में कृषि-उद्योग क्षेत्र में उर्वरक उत्पादन पर सहमति आने से भारत की खाद्य और कृषि सुरक्षा रणनीति को ऐतिहासिक मजबूती मिली है। आज जहां दुनिया संसाधन-संकट, कृषि लागत, उत्पादन सीमाएं और उर्वरक आपूर्ति से संबंधित अनिश्चितताओं का सामना कर रही है, वहीं भारत और रूस का संयुक्त यूरिया उत्पादन कार्यक्रम भारत को केवल खरीदार देश नहीं, वैश्विक कृषि-आपूर्ति श्रृंखला में सक्रिय उत्पादक राष्ट्र के रूप में स्थापित करेगा। यह भारत की आत्मनिर्भर कृषि नीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के दीर्घकालिक ढ़ांचे को सुदृढ़ करेगा। फार्मास्यूटिकल क्षेत्र में रूस में भारतीय तकनीक से फार्मा फैक्टरी की स्थापना स्वास्थ्य-क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा का संकेत है। भारत आज दुनिया के लिए ‘फार्मेसी ऑफ द ग्लोब’ बन चुका है। कोविड काल में दुनिया ने यह देखा कि दवा निर्माण केवल उद्योग नहीं बल्कि सामरिक शक्ति भी है। रूस में दवा निर्माण भारत को न केवल बाजार देगा बल्कि ऐसे समय में तकनीकी और कच्चे माल की आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनाएगा, जब पश्चिमी दवाईयों की आपूर्ति-राजनीति वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली पर नियंत्रण का उपकरण बन चुकी है। भारत-रूस संबंधों का सबसे ठोस और दीर्घकालिक आयाम ऊर्जा क्षेत्र है। रूस भारत का सबसे बड़ा ऊर्जा-आपूर्तिकर्ता बन चुका है और उसने विश्व के ऊर्जा-संकट के मध्य भारत को अबाध आपूर्ति देकर यह साबित किया कि यह संबंध परिस्थितियों से संचालित नहीं बल्कि विश्वास पर आधारित है। सम्मेलन में परमाणु ऊर्जा पर हुई चर्चा और कुडनकुलम प्लांट के विस्तार की पुनर्पुष्टि भारत की स्वच्छ और विश्वसनीय ऊर्जा रणनीति को एक नई दिशा देती है। रूस द्वारा छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर उपलब्ध कराने का प्रस्ताव उस परिवर्तन की पूर्वपीठिका है, जहां भारत विकेन्द्रीकृत ऊर्जा प्रणालियों के माध्यम से हर क्षेत्र को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ सकेगा। यह भारत के नेट-जीरो संकल्प की व्यवहारिक यात्रा का महत्वपूर्ण चरण है। क्रिटिकल मिनरल्स का मुद्दा आने वाली औद्योगिक क्रांति की रीढ़ है। एआई, इलैक्ट्रिक वाहन, एयरोस्पेस, बैटरी निर्माण और रोबोटिक्स, इन सभी उद्योगों का अस्तित्व लिथियम, निकेल, कोबाल्ट और रेयर-अर्थ मेटल्स पर निर्भर है। पश्चिमी देशों ने इन खनिजों पर एकाधिकारवादी नियंत्रण बनाने का प्रयास किया है जबकि भारत-रूस इस समीकरण को बदल रहे हैं। रूस के पास विशाल खनिज संसाधन हैं और भारत के पास विकासशील तकनीक, अनुसंधान क्षमता और उत्पादन की औद्योगिक शक्ति। दोनों का मिलन वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा को नया आयाम प्रदान करेगा। भारत द्वारा रूसी नागरिकों के लिए 30 दिन तक मुफ्त ई-टूरिस्ट वीजा की घोषणा कूटनीति को लोगों की चेतना में स्थापित करती है। यह सांस्कृतिक जुड़ाव की पुनर्पुष्टि है, जिसमें बौद्ध परंपरा, योग, भारत-रूस सांस्कृतिक आकर्षण और ऐतिहासिक धारा की निरंतरता उपस्थित है। यह पहल वैश्विक सूचना-राजनीति के युग में ‘नैरेटिव स्वायत्तता’ के निर्माण की ओर भी संकेत करती है, जिसे रूस के ‘आरटी इंडिया’ ब्यूरो की स्थापना आगे बढ़ाएगी। इस शिखर वार्ता में यूक्रेन संकट पर भारत की स्थिति ने अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की नई भूमिका को स्पष्ट किया। भारत न तो किसी ध्रुव में समाहित है, न ही किसी वैश्विक सुरक्षा-प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बल्कि वह शांतिवादी और वैचारिक नेतृत्व के नए मॉडल के रूप में उभरा है। ब्रिक्स, जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन जैसे मंचों पर भारत और रूस का समन्वय बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। यह संबंध केवल सुरक्षा और सामरिक हितों से परे है, यह एक सभ्यतामूलक विमर्श है, जहां भारत और रूस अमेरिकी-यूरोपीय प्रभाव-क्षेत्र की
शांत किशोर का राजनीतिक दांव फ्लॉप, नहीं मिली अपेक्षित सफलता

राजेश कुमार पासीबिहार विधानसभा चुनाव में सबकी नजर प्रशांत किशोर की नई पार्टी जन सुराज पार्टी पर थी क्योंकि उनका दावा है कि उन्होंने अपनी रणनीतियों के कारण कई पार्टियों को चुनाव जिताया है । ऐसा लगता था कि बिहार चुनाव में वो बड़ा उलटफेर कर सकते हैं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि वो बिहार के चुनाव परिणाम बदल सकते हैं। मैंने सिर्फ इतना लिखा कि चुनाव परिणाम बताएंगे कि उनकी पार्टी को क्या मिलता है। उन्हें पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता था क्योंकि उन्होंने बड़ी मेहनत की है। मैं उन्हें ज्यादा महत्व इसलिए नहीं दे रहा था क्योंकि बिहार में अभी तीसरी शक्ति के लिए जगह नहीं है। राजद आज भी अपने वोट बैंक को मजबूती से थामे हुए है और नीतीश-मोदी की जोड़ी के रहते मतदाताओं को तीसरे विकल्प की ओर देखने की जरूरत नहीं है। प्रशान्त किशोर के गुब्बारे में मीडिया ने इतनी ज्यादा हवा भर दी थी कि उनका कद बहुत बड़ा नजर आ रहा था। वास्तव में मोदी का विरोधी सिर्फ विपक्षी दल नहीं हैं बल्कि उनका विरोधी मीडिया का एक बड़ा वर्ग भी है जो मोदी के लगातार सत्ता में बने रहने से परेशान है। इस मीडिया को जहां भी मोदी के खिलाफ कोई उम्मीद की किरण दिखाई देती है, वो उस तरफ चल पड़ता है। इस मीडिया को लगा कि प्रशान्त किशोर देश के दूसरे केजरीवाल बन सकते हैं इसलिए वो पूरी ताकत से इनके गुब्बारे को फुलाने में लगा हुआ था। भारत में एक बड़ा वर्ग है, जो कट्टर मोदी विरोधी है और वो किसी भी तरह मोदी को सत्ता से बाहर देखना चाहता है। उसे समझ नहीं आ रहा है कि क्यों जनता मोदी की इतनी दीवानी हो गई है। यही कारण है कि अपनी खीज मिटाने के लिए ये वर्ग मोदी समर्थकों को अंधभक्त बोलता है जबकि सच्चाई यह है कि ये वर्ग मोदी का अंध विरोधी है । ये नहीं जानते कि इन्हें मोदी से इतनी नफरत क्यों है। समस्या यह है कि पिछले 11 सालों की विपक्ष की हार ने इस वर्ग को हताशा से भर दिया है। प्रशांत किशोर जैसे व्यक्ति के बिहार की राजनीति में आने के कारण उन्हें लगा कि ये एनडीए को हरा सकता है। वास्तव में ये वर्ग विपक्षी दलों से भी निराश हो चुका है. इसे एक और केजरीवाल की तलाश है । सच यही है कि प्रशांत किशोर मीडिया का इस्तेमाल कैसे करना है, ये अच्छी तरह जानते हैं। इसकी वजह यह है कि उन्होंने जिन दलों के लिए चुनाव अभियान की रणनीति बनाई है, उनके लिए उन्होंने मीडिया प्रबंधन भी किया है। विपक्षी दलों और मीडिया को लग रहा था कि प्रशांत किशोर सिर्फ भाजपा का वोट काटेंगे जिससे महागठबंधन को बड़ा फायदा हो सकता है। इसके पीछे उनकी सोच यह थी कि जन सुराज पार्टी को सवर्णो का ही वोट मिलेगा । मुस्लिम और यादव महागठबंधन के पीछे एकजुट होकर खड़े रहेंगे । इसलिए विपक्षी दलों ने प्रशांत किशोर को अपना निशाना नहीं बनाया । प्रशांत ने भी महागठबंधन पर हल्की चोट की लेकिन उनका मुख्य निशाना एनडीए पर ही था । उनमें केजरीवाल ढूंढने वाले मीडिया को यह बात समझ नहीं आ रही है कि केजरीवाल अन्ना आंदोलन की ऊर्जा पाकर खड़े हुए थे। इंडिया अगेंस्ट करप्शन के आंदोलन और अन्ना हजारे के समर्थकों की मदद से उन्हें कार्यकर्ताओं की बड़ी फौज मिल गयी थी और आम आदमी पार्टी एक बड़ा संगठन बन गयी । ऐसे ही अगर हम भारतीय लोकतंत्र के इतिहास को देखे तो पता चलता है कि आंदोलन से ही निकलकर जनता पार्टी और असम गण परिषद ने सत्ता संभाली थी । प्रशांत किशोर के पास न तो संगठन है और न ही उन्हें किसी आंदोलन से शक्ति मिली हुई है । उनके लिए काम करने वाले ज्यादातर लोग उनके पेड वर्कर हैं जो पैसे लेकर उनका काम कर रहे हैं। उन्होंने बिहार में लंबी यात्रा निकाल कर माहौल बनाने की कोशिश की, लेकिन चुनाव परिणामों ने साबित कर दिया है कि उसका कोई फायदा नहीं हुआ है । वास्तव में प्रशांत को अपने बारे में यह गलतफहमी हो गई थी कि वो अपनी रणनीतियों से चुनाव जीत सकते हैं । इसकी वजह यह है कि उन्होंने जिन पार्टियों के लिए काम किया, उन्हें चुनावी सफलता हासिल हुई । 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रशांत भाजपा के लिए काम कर रहे थे और भाजपा को उन चुनावों में बड़ी सफलता हासिल हुई । मीडिया के एक वर्ग ने यह विमर्श चलाया कि प्रशांत किशोर का मोदी की सफलता में बड़ा हाथ है, जबकि सच्चाई यह है कि भाजपा के लिए प्रशांत किशोर की तरह कई व्यक्ति काम कर रहे थे । सच यह है कि प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा उस समय ही उबाल मारने लगी थी । उन्होंने कोशिश की थी कि उन्हें भाजपा से कोई राजनीतिक फायदा मिल जाए लेकिन भाजपा ने उनसे दूरी बना ली । बिहार में जेडीयू के लिए भी उन्होंने काम किया और जब जेडीयू को चुनाव में सफलता मिल गई तो उन्होंने नीतीश कुमार से पार्टी में पद हासिल कर लिया । वो ज्यादा समय तक जेडीयू में काम नहीं कर पाए और उन्हें पार्टी छोड़नी पड़ी । पहले बाहुबली राजनीतिक दलों के लिए काम करते थे और उनके लिए वोट डलवाते थे । धीरे-धीरे बाहुबलियों को लगा कि वो जब दूसरों को जीता सकते हैं तो खुद क्यों नहीं जीत सकते । इसके बाद कई बाहुबलियों ने राजनीति में कदम बढ़ा दिए । ऐसे ही प्रशान्त को महसूस हुआ कि जब वो दूसरों को चुनाव जीता सकते हैं तो खुद की पार्टी बनाकर क्यों नहीं सत्ता हासिल कर लेते । यही सोचकर उन्होंने अपनी पार्टी बना ली और तीन साल से बिहार में माहौल बनाने के लिए घूम रहे थे । उन्होंने बिहार के जमीनी मुद्दे उठाए और जनता के बीच जाकर अपनी पार्टी का प्रचार किया । उन्हें मीडिया ने इतना ज्यादा महत्व दिया कि सबको लगने लगा कि प्रशांत किशोर की पार्टी बिहार की राजनीति में नई खिलाड़ी बन सकती है । उन्होंने भी बड़े-बड़े दावे करने शुरू कर दिये । उनका कहना था कि उनकी पार्टी अगर 150 सीटों से