विकास का सशक्त विजन : एक ट्रिलियन डॉलर की ओर बढ़ता मध्यप्रदेश

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्यप्रदेश आज एक ऐसे परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है, जहाँ विकास नारा न होकर धरातल पर उतरती हुई वास्तविकता बन चुका है। राज्य की आर्थिक गति, औद्योगिक विस्तार, कृषि समृद्धि और रोजगार सृजन की दिशा में हो रहे सतत प्रयासों ने इसे देश के तेजी से उभरते राज्यों की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। इस परिवर्तन के केंद्र में हैं डॉ. मोहन यादव, जिनके नेतृत्व में मध्यप्रदेश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सशक्त बनने की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव का स्पष्ट मानना है कि राज्य का विकास देश के समग्र विकास से जुड़ा हुआ है। वे अक्सर कहते हैं कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत नई ऊँचाइयों को छू रहा है और इसी दिशा में मध्यप्रदेश भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए राज्य ने एक व्यापक दृष्टिपत्र तैयार किया है, जिसमें आने वाले 25 वर्षों में प्रदेश को एक ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का संकल्प लिया गया है। आर्थिक विकास की नई कहानीपिछले कुछ वर्षों में एक तरह से देखें तो जिस गति से आर्थिक प्रगति की है, वह प्रेरणादायक है। प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय वर्तमान में लगभग 1 लाख 55 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है, जिसे अगले 25 वर्षों में 22 लाख 50 हजार रुपये तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है, जिसे व्यापक औद्योगिक निवेश, कृषि उत्पादन और सेवा क्षेत्र के विस्तार से हासिल किया जाएगा। राज्य सरकार ने औद्योगिक निवेश को आकर्षित करने के लिए 18 नई औद्योगिक नीतियां लागू की हैं। इन नीतियों का उद्देश्य बड़े शहरों के साथ ही छोटे और दूरस्थ क्षेत्रों तक उद्योगों को पहुँचाना है। इसके लिए संभागीय स्तर पर अलग-अलग सेक्टरों पर केंद्रित रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव आयोजित किए जा रहे हैं, जिनका सकारात्मक परिणाम अब दिखाई देने लगा है। रोजगार सृजन और युवाओं में नया उत्साहमप्र में तेजी से बढ़ते उद्योगों और निवेश के कारण रोजगार के नए अवसर लगातार पैदा हो रहे हैं। राज्य सरकार का लक्ष्य है कि प्रदेश का युवा रोजगार देने वाला बने। इसी उद्देश्य से स्वरोजगार और युवा उद्यमिता को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक योजनाएं चलाई जा रही हैं। यही कारण है कि वर्तमान में प्रदेश की बेरोजगारी दर मात्र 1 से 1.5 प्रतिशत के बीच रह गई है, जोकि देश के कई राज्यों की तुलना में काफी कम है। इसका सीधा संबंध उद्योगों के विस्तार, एमएसएमई सेक्टर की मजबूती और कृषि आधारित रोजगार से है। वस्तुत: यहां देखने में यह भी आ रहा है, जैसा कि मुख्यमंत्री डॉ. यादव का स्पष्ट मानना भी है कि एमएसएमई क्षेत्र राज्य के औद्योगिक विकास की बैकबोन है। छोटे और कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर ही व्यापक स्तर पर रोजगार सृजित किया जा सकता है। यही कारण है कि राज्य सरकार एमएसएमई और लघु उद्योगों को विशेष अनुदान, कर में रियायत और आसान ऋण सुविधा उपलब्ध करा रही है। औद्योगिकरण को विशेष रूप से जनजाति और पिछड़े क्षेत्रों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है। कटनी और शहडोल जैसे क्षेत्रों में माइनिंग सेक्टर में निवेश बढ़ा है, वहीं नर्मदापुरम के बाबई-मोहासा क्षेत्र में इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट्स के निर्माण के लिए औद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जा रहा है। यही कारण है कि ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट में मिले लगभग 30 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्तावों में से करीब 8 लाख करोड़ रुपये के प्रस्ताव धरातल पर उतर चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि निवेशकों का भरोसा मध्यप्रदेश की नीतियों और वातावरण पर लगातार बढ़ रहा है। कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूतीमध्यप्रदेश लंबे समय से कृषि क्षेत्र में अग्रणी रहा है और सरकार इसे और सशक्त बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। कृषक कल्याण वर्ष के तहत किसानों को आत्मनिर्भर और समृद्ध बनाने का संकल्प लिया गया है। कृषि उत्पादन के साथ-साथ फूड प्रोसेसिंग और पशुपालन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। दूध उत्पादन को 9 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है। सिंचाई के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। पिछले डेढ़ साल में ही 7.5 लाख हेक्टेयर सिंचाई रकबा बढ़ाया गया है और इसे 100 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। नर्मदा का जल क्षिप्रा नदी में पहुंचने से मालवा क्षेत्र के किसानों को विशेष लाभ मिला है। इसके साथ ही नवकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भी मध्यप्रदेश तेजी से आगे बढ़ रहा है। राज्य देश में तीसरे स्थान पर पहुंच चुका है। मुरैना में उत्तर प्रदेश के साथ मिलकर एक बड़ा सोलर प्रोजेक्ट स्थापित किया जा रहा है, जिससे दोनों राज्यों को बिजली का लाभ मिलेगा। किसानों को सोलर पंप देकर ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास किया जा रहा है। मंदसौर के गांधी सागर बांध में पंप स्टोरेज प्रोजेक्ट की स्थापना भी राज्य की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह सब प्रयास पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक विकास को भी गति दे रहे हैं। कौशल विकास और तकनीकी सशक्तिकरणऔद्योगिक गतिविधियों के बढ़ने के साथ भविष्य में कुशल श्रमिकों की मांग भी बढ़ेगी। इसे ध्यान में रखते हुए शिक्षा नीति 2020 के तहत युवाओं के कौशल उन्नयन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इंजीनियरिंग कॉलेजों में आईटी सेंटर खोले जा रहे हैं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षण की व्यवस्था की जा रही है। सरकार तकनीक को चुनौती नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देख रही है और युवाओं को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। महिला सशक्तिकरण और सामाजिक विकासप्रधानमंत्री मोदी की मंशा के अनुरूप महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी ठोस काम मध्यप्रदेश में मोहन सरकार के नेतृत्व में होता हुआ इन दिनों बड़े स्तर पर देखा जा सकता है। प्रदेश के एक लाख से अधिक स्वसहायता समूहों को बाजार और तकनीकी सहायता दी जा रही है। उद्योगों में महिलाओं को 48 प्रतिशत तक अनुदान दिया जा रहा है और उनके लिए विशेष औद्योगिक क्षेत्र बनाए जा रहे हैं। वहीं धार्मिक पर्यटन को नई गति देने के लिए होम-स्टे जैसी योजनाओं को बढ़ावा दिया गया है। इससे एक ओर पर्यटकों को बेहतर सुविधा मिल रही
वैदिक चेतना से सामाजिक क्रांति तक भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती – आचार्य ललित मुनि

आचार्य ललित मुनिउन्नीसवीं सदी का भारत गहरे संक्रमण का समय था। एक ओर अंग्रेजी शासन का राजनीतिक वर्चस्व था, दूसरी ओर समाज भीतर से जर्जर हो चुका था। धार्मिक जीवन कर्मकांडों में उलझा हुआ था, जातिगत ऊंच नीच ने सामाजिक एकता को तोड़ दिया था, स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और शिक्षा का दायरा सीमित था। मिशनरियों का प्रभाव बढ़ रहा था और पश्चिमी चिंतन भारतीय परंपराओं को चुनौती दे रहा था। ऐसे दौर में कुछ व्यक्तित्व प्रकाशस्तंभ बनकर उभरे, जिन्होंने भारतीय समाज को आत्मचिंतन की दिशा दी। इन अग्रदूतों में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने न कोई राजनीतिक दल बनाया और न किसी सत्ता का सहारा लिया। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक उत्थान भीतर से होता है। वेदों की ओर लौटने का उनका आह्वान केवल धार्मिक सुधार का संदेश नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष था। स्वामी दयानंद का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मूलशंकर था। परिवार धार्मिक था और वैदिक संस्कारों का पालन करता था। किंतु बालक मूलशंकर का मन प्रश्नों से भरा था। किशोरावस्था में एक शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में जागरण के दौरान उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग को देवता मानकर पूजा जा रही है, उस पर चूहे निर्भय होकर घूम रहे हैं। यह दृश्य उनके मन में गहरी हलचल का कारण बना। उन्होंने स्वयं से पूछा कि यदि यह ईश्वर है तो स्वयं को चूहों से क्यों नहीं बचाता। यह प्रश्न साधारण नहीं था। यही प्रश्न आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बना। उन्होंने घर छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। वर्षों तक वे विभिन्न साधु संतों के संपर्क में रहे, हिमालय की कंदराओं में तप किया और शास्त्रों का अध्ययन किया। अंततः मथुरा में उन्हें स्वामी विरजानंद का सान्निध्य मिला। विरजानंद ने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया और कहा कि सत्य का मूल स्रोत वेद हैं। शिष्य दयानंद ने गुरु को वचन दिया कि वे वेदज्ञान का प्रचार करेंगे और समाज को अज्ञान से मुक्त करने का प्रयास करेंगे। स्वामी दयानंद का सबसे प्रसिद्ध वाक्य था कि वेदों की ओर लौटो। इसका अर्थ अतीत में पलायन नहीं था, बल्कि मूल स्रोतों की ओर लौटकर शुद्धता और विवेक को अपनाना था। उनका मानना था कि वेद ज्ञान, विज्ञान और नैतिकता का मूल आधार हैं। उन्होंने मूर्तिपूजा, अवतारवाद और कर्मकांडों की कठोर आलोचना की। उनके अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। उसे पत्थर या धातु की मूर्तियों में सीमित करना उचित नहीं। वे जाति व्यवस्था को जन्म पर आधारित मानने के विरोधी थे। उनके विचार में वर्ण व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित होनी चाहिए। उनकी वाणी में स्पष्टता और तर्क था। वे संस्कृत के विद्वान थे, किंतु उन्होंने हिंदी में प्रवचन देकर आम जनता तक अपने विचार पहुंचाए। काशी, हरिद्वार, अजमेर और अन्य नगरों में उन्होंने शास्त्रार्थ किए। इन बहसों में वे वेदों की प्रामाणिकता और तार्किकता पर बल देते थे। 1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। आर्य समाज का उद्देश्य समाज को वैदिक सिद्धांतों पर संगठित करना और सामाजिक सुधार को गति देना था। इसके दस नियम सरल किंतु गहरे थे। इनमें ईश्वर की एकता, सत्य का अनुसरण, विद्या का प्रचार, अज्ञान का नाश और सर्वहित की भावना प्रमुख थे। आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन लोगों को पुनः हिंदू समाज में स्थान दिया गया, जो विभिन्न कारणों से अन्य धर्मों में चले गए थे। इस अभियान ने समाज में आत्मविश्वास का संचार किया। स्वामी दयानंद स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब स्त्रियां शिक्षित हों। उन्होंने वेदाध्ययन का अधिकार स्त्रियों को दिया और उनके लिए विद्यालय स्थापित करने का आह्वान किया। बाल विवाह, सती प्रथा और बहुविवाह जैसी कुरीतियों के वे विरोधी थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और स्त्रियों की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। उनके विचारों ने समाज में नई बहस छेड़ी और सुधार आंदोलनों को प्रेरणा दी। उनकी प्रमुख कृति सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने वेदों की व्याख्या के साथ साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं का विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य विवाद खड़ा करना नहीं था, बल्कि सत्य की खोज करना था। उन्होंने तर्क, प्रमाण और विवेक पर बल दिया। सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय समाज में आत्ममंथन की प्रक्रिया को तेज किया। यह ग्रंथ आज भी आर्य समाज के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक है। स्वामी दयानंद के विचारों से प्रेरित होकर दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों ने आधुनिक शिक्षा और वैदिक मूल्यों का समन्वय प्रस्तुत किया। आज भी डीएवी संस्थाएं देश भर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं। गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थानों ने वैदिक पद्धति और आधुनिक विषयों का संगम प्रस्तुत किया। इस शिक्षा मॉडल ने भारतीय युवाओं में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया। स्वामी दयानंद का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक आधार पर टिका था। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हो। उन्होंने स्वराज की अवधारणा को स्पष्ट किया। आर्य समाज से जुड़े अनेक नेता आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे व्यक्तित्वों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इस प्रकार स्वामी दयानंद का प्रभाव सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण तक पहुंचा। स्वामी दयानंद निर्भीक थे। वे राजाओं और शासकों से भी प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों की भी आलोचना की। 1883 में जोधपुर में उन्हें विष दिया गया। यह घटना दुखद थी, किंतु उनके विचारों को रोक न सकी। उनका जीवन अल्पकालिक था, पर प्रभाव दीर्घकालिक। आज का भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जातीय विभाजन, अंधविश्वास और सांस्कृतिक असंतुलन अब भी विद्यमान हैं। ऐसे समय में स्वामी दयानंद के विचार नई प्रेरणा देते हैं। उनका आग्रह था कि सत्य को तर्क की कसौटी पर परखा जाए और समाज को ज्ञान आधारित बनाया जाए। उनका संदेश था कि शिक्षा, नैतिकता और आत्मगौरव से ही राष्ट्र सशक्त बनता है। वे आधुनिकता
वन्दे मातरम्: राष्ट्र चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण

– कैलाश चंद “वन्दे मातरम्” ये दो शब्द सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की आत्मा का गूढ़ और दिव्य उद्गार हैं। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक जड़ है, जो भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान इन चारों को मातृभाव में एक सूत्र में पिरोता है। जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है तो वह केवल मातृभूमि को प्रणाम नहीं करता बल्कि उस चेतना, परंपरा और जीवन दर्शन को नमन करता है जिसने इस देश को हजारों वर्षों से जीवित और गतिशील बनाए रखा है। आज, जब इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के 2026 के नए दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय अपील सामने आई है, तब यह गीत एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित होता दिखाई दे रहा है। भारतीय सभ्यता में भूमि को केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संसाधनों का समूह नहीं माना गया है। यहां धरती को “माता” कहा गया है, एक ऐसी माता जो जीवन देती है, पोषण करती है और संस्कार प्रदान करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” भारतीय चिंतन की इसी भावना को प्रकट करता है। यह वाक्य बताता है कि मनुष्य और भूमि का संबंध केवल उपयोग का नहीं बल्कि आत्मीयता और मातृत्व का है। यही वैदिक आधार “वन्दे मातरम्” की आत्मा में समाहित है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं था बल्कि एक जीवित मातृशक्ति थी, जो लक्ष्मी के रूप में समृद्धि देती है, सरस्वती के रूप में ज्ञान प्रदान करती है और दुर्गा के रूप में शक्ति का संचार करती है। इसीलिए इस गीत की हर पंक्ति में प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। सन् 1875 का वह काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश शासन का दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव का संकट समाज में गहराई तक समा चुका था। भारतीयों के भीतर अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बचाने की तीव्र आकांक्षा जन्म ले रही थी। इसी समय बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था बल्कि एक जागरण का मंत्र बनकर उभरा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, तब यह गीत पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण मंत्र बन गया। साल 1905 के बंग भंग आंदोलन के समय “वन्दे मातरम्” हर गली, हर सभा और हर आंदोलन की धड़कन बन गया। विद्यार्थी जुलूसों में यह गूंजता था, महिलाओं की सभाओं में यह प्रेरणा देता था, क्रांतिकारियों के शपथ पत्रों में यह आत्मबल जगाता था और राष्ट्रीय आंदोलनों में यह एकजुटता का स्वर बन जाता था। यह केवल गीत नहीं रहा, यह आत्मगौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा का घोष बन गया। श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्य भारती, लाला हरदयाल और भीकाजी कामा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी पत्रिकाओं और पत्रों के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” को स्थान दिया। महात्मा गांधी भी अपने कई पत्रों का समापन इसी मंत्र के साथ करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस गीत के प्रभाव को समझा और इसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन जितना दमन हुआ, उतनी ही इसकी शक्ति और बढ़ती गई। यह जनता के हृदय में बस चुका था और वहां से इसे कोई नहीं हटा सकता था। समय के साथ यह गीत केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति बनकर नहीं रह गया बल्कि भारतीय पहचान का स्थायी प्रतीक बन गया। 30 से 31 अक्टूबर तथा 1 नवम्बर 2025 को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसे राष्ट्र चेतना का मूल स्वरबद्ध गीत बताया। उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्र चेतना को जागृत करता है और समाज को जोड़ने वाली अद्भुत डोर है।” उनके अनुसार यह गीत सभी प्रांतों, भाषाओं और समुदायों के बीच समान रूप से स्वीकार्य है और यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और आत्मस्वत्व का आधार है। संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस 150 वर्ष के पावन काल में “वन्दे मातरम्” की ज्योति हर हृदय में प्रज्ज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया जाए। इसी संदर्भ में 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार द्वारा घोषित नए दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। इन निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले “वन्दे मातरम्” के सभी छह अंतरों का गायन किया जाएगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड होगी। राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज समारोह, पद्म पुरस्कार और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में इसे गाना अनिवार्य किया गया है। विद्यालयों में भी प्रार्थना की शुरुआत “वन्दे मातरम्” से करने का सुझाव दिया गया है। हालांकि इस संबंध में किसी प्रकार की कानूनी सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है। यह एक दंडात्मक आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में है। आज के समय में “वन्दे मातरम्” अक्सर केवल दो शब्दों तक सीमित होकर रह जाता है। लोग इसे एक नारे के रूप में बोलते हैं किंतु इसकी वास्तविक महत्ता पूरे गीत में निहित है। ये दो शब्द भावना जगाते हैं, लेकिन पूरा गीत चेतना जगाता है। इसकी संपूर्ण रचना में राष्ट्र चेतना को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करने की क्षमता है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य है, संस्कृति का गौरव है, ज्ञान का प्रकाश है और शक्ति का तेज है। ये चारों तत्व मिलकर इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन दर्शन बना देते हैं। “वन्दे मातरम्” हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं होता, यह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता होता है। इसकी सेवा कर्तव्य से बढ़कर है, यह तप और साधना है। मातृभूमि सिर्फ भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी चेतना, पहचान और अस्तित्व का आधार है। जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं तो हम उस परंपरा को
कुलधर्म, दांपत्य और आधुनिकता का द्वंद्व
दीपक कुमार द्विवेदी फरवरी का महीना आते ही वातावरण में एक अलग प्रकार की हलचल दिखाई देने लगती है। बाजारों में लाल रंग की सजावट, उपहारों की भरमार, सामाजिक माध्यमों पर प्रदर्शित संबंध, और वेलेंटाइन डे तथा प्रॉमिस डे के नाम पर बढ़ती व्यावसायिक सक्रियता ये सब केवल एक उत्सव का विस्तार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के संकेत हैं। इस दृश्य को देखकर मन बार-बार उस भारत की ओर लौटता है जहाँ विवाह केवल आकर्षण या व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं था, बल्कि कुल, वंश और धर्म की निरंतरता का आधार था। सनातन व्यवस्था में विवाह को ‘संस्कार’ कहा गया। संस्कार का अर्थ है जीवन को परिष्कृत करने वाली प्रक्रिया। गृह्यसूत्रों में विवाह को षोडश संस्कारों में स्थान दिया गया है। मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि विवाह के माध्यम से ही धर्म, अर्थ और संतति की शुद्ध परंपरा चलती है। महाभारत में कुलधर्म की रक्षा को अत्यंत महत्त्वपूर्ण बताया गया है-कुल के नष्ट होने पर समाज में अराजकता फैलती है। विवाह में अग्नि के समक्ष लिए गए सप्तपदी वचन केवल प्रतीकात्मक नहीं थे; वे जीवनपर्यंत निष्ठा, संयम और उत्तरदायित्व की प्रतिज्ञा थे। मैंने अपने घर में भी यही परंपरा देखी। मेरी माता और पिता ने विवाह से पहले एक-दूसरे को देखा तक नहीं था। हमारा विवाह भी परिवार की सहमति से हुआ। सीमित समय में, कुटुंब की उपस्थिति में एक बार मिलना ही पर्याप्त माना गया। आज की दृष्टि से यह असाधारण लग सकता है, पर उस समय विश्वास की जड़ें गहरी थीं। दाम्पत्य स्नेह विवाह के बाद विकसित होता था और वही स्थायी होता था, क्योंकि उसका आधार कर्तव्य था, क्षणिक आकर्षण नहीं। इतिहास के पन्नों में भी यह व्यवस्था दिखाई देती है। यूनानी दूत मेगस्थनीज जब चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया, तब उसने भारतीय समाज की संरचना का उल्लेख किया। उसने लिखा कि यहाँ लोग अपनी जाति के बाहर विवाह नहीं करते और अपनी परंपरागत वृत्ति नहीं बदलते। उसने ब्राह्मणों के तप, संयम और दीर्घ ब्रह्मचर्य का वर्णन किया। वह लिखता है कि भारतीय समाज में आहार-विहार के नियम कठोर हैं, लोग पवित्रता का ध्यान रखते हैं, और सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन सहज नहीं होता। उसने यह भी लिखा कि विवाह और सामाजिक संरचना में अनुशासन है। यह उल्लेख किसी भारतीय आचार्य का नहीं, बल्कि बाहरी पर्यवेक्षक का है, इसलिए उसका ऐतिहासिक महत्व विशेष है। इससे स्पष्ट है कि विवाह और कुल-मर्यादा भारतीय समाज की स्थिरता के मूल स्तंभ थे। अब वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालें। स्वतंत्रता के बाद विधि-व्यवस्था में अनेक परिवर्तन हुए। 1955 में हिंदू विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह-विच्छेद की कानूनी व्यवस्था स्थापित हुई। यह व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में आवश्यक रही होगी, विशेषकर जहाँ अत्याचार या असहनीय जीवन स्थितियाँ हों। परंतु इसके साथ विवाह की धारणा में परिवर्तन आया-विवाह अब केवल संस्कार नहीं, विधिक अनुबंध भी बन गया। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में तलाकशुदा व्यक्तियों का प्रतिशत लगभग 0.24% था, जो पश्चिमी देशों की तुलना में कम है। किंतु महानगरों के पारिवारिक न्यायालयों के आँकड़े बताते हैं कि पिछले बीस वर्षों में तलाक याचिकाओं की संख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे नगरों में प्रतिवर्ष हजारों नए मामले दर्ज हो रहे हैं। शहरी मध्यवर्ग में विवाह-विच्छेद अब दुर्लभ घटना नहीं रहा। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2019-21) के आँकड़े दर्शाते हैं कि शहरी क्षेत्रों में संयुक्त परिवारों की संख्या घट रही है और एकल परिवार बढ़ रहे हैं। संयुक्त परिवार में मतभेद प्रायः भीतर ही सुलझ जाते थे; बुजुर्ग मध्यस्थ की भूमिका निभाते थे। आज पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी सीधे न्यायालय तक पहुँच जाती है। 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यभिचार को आपराधिक अपराध की श्रेणी से हटाया। उसी वर्ष सहमति आधारित समलैंगिक संबंधों को अपराधमुक्त किया गया। विभिन्न निर्णयों में लिव-इन संबंधों को भी कुछ परिस्थितियों में संरक्षण दिया गया। इन निर्णयों का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा था, परंतु सामाजिक प्रभावों को भी समझना आवश्यक है। विवाह की विशिष्टता तब प्रभावित होती है जब उसके बाहर के संबंधों को समान सामाजिक स्वीकृति मिलने लगे। सांस्कृतिक वातावरण भी बदला है। चलचित्र, धारावाहिक और डिजिटल मंच विवाह-पूर्व और विवाहेतर संबंधों को सामान्य जीवनशैली की तरह प्रस्तुत करते हैं। फरवरी के सप्ताह में उपहार उद्योग और आतिथ्य क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज होती है। संबंध अब निजी नहीं, सार्वजनिक प्रदर्शन का विषय बनते जा रहे हैं। आकर्षण और तात्कालिक निकटता को स्थायी दांपत्य से अधिक महत्त्व मिलता दिखाई देता है । संयुक्त परिवार व्यवस्था क्यों आवश्यक है यह प्रश्न आज अत्यंत प्रासंगिक है। संयुक्त परिवार केवल आर्थिक संरचना नहीं, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का तंत्र है। बच्चों को मूल्य, अनुशासन और परंपरा का संस्कार वहीं मिलता है। बुजुर्गों का अनुभव संकट की घड़ी में मार्गदर्शन देता है। जब परिवार विखंडित होता है, तो व्यक्ति अकेला पड़ जाता है; मतभेद संवाद से अधिक संघर्ष में बदलते हैं। सनातन परंपरा में कुल और वंश की रक्षा को धर्म का अंग माना गया है। चारित्रिक मूल्य निष्ठा, संयम, मर्यादा इनके बिना कोई भी सभ्यता स्थायी नहीं रह सकती। 2026 की वास्तविकता यह है कि तलाक की दर अभी भी पश्चिम जितनी नहीं, पर शहरी क्षेत्रों में वृद्धि स्पष्ट है। विवाह-पूर्व और विवाहेतर संबंधों की सामाजिक स्वीकृति बढ़ी है। लिव-इन संबंध सामान्य चर्चा का विषय बन चुके हैं। आवश्यक यह है कि अधिकार और दायित्व का संतुलन पुनः स्थापित हो। विवाह को केवल व्यक्तिगत विकल्प न मानकर सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में देखा जाए। शिक्षा में चरित्र-निर्माण पर बल दिया जाए। परिवारों में संवाद और परामर्श की परंपरा विकसित हो। सनातन हिंदू धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, जीवन की समग्र व्यवस्था है। कुल-परंपरा, वंश की निरंतरता और चारित्रिक दृढ़ता उसकी आधारशिला हैं। जब परिवार सुदृढ़ रहता है, तब समाज स्थिर रहता है; और जब समाज स्थिर रहता है, तब संस्कृति सुरक्षित रहती है। परिवार की रक्षा ही सनातन जीवन-दृष्टि की रक्षा है, और यही हमारे समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी केन्द्रीय बजट

-डॉ. महेन्द्र सिंह केन्द्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा वर्ष 2026-27 के लिए संसद में पेश किया गया गया बजट देश के त्वरित विकास को समर्पित कल्याणकारी बजट है। इस बजट में समाहित प्रस्तावों में आर्थिक विकास की गति को बढ़ाने और उसे निरन्तर बनाये रखने पर जोर दिया गया है। साथ ही, लोककल्याण के लिए बजट प्रस्तावों पर भी पर्याप्त बल दिया गया है। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में तीन कर्तव्यों को उजागर किया। ये हैं : (ⅰ) अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के प्रति लचीलेपन में वृद्धि करते हुए आर्थिक विकास को गति प्रदान करना और उसे बनाये रखना; (ii) जन आकाँक्षाओं की पूर्ति और उनकी क्षमताओं का वर्द्धन करना एवं (iii) देश के प्रत्येक परिवार, समुदाय, क्षेत्र और वर्ग तक संसाधनों, सुविधाओं तथा अवसरों की पहुंच को सुनिश्चित करना। इस तरह ये कर्तव्य मोदी सरकार की सर्वसमावेशी एवं पोषणीय विकास की रणनीति को सुस्पष्ट रूप में परिभाषित करते हैं। ध्यातव्य है कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के केन्द्र में एक ओर आर्थिक संवृद्धि की गति को तेज करना रहा है वहीं दूसरी तरफ सापेक्षतया वंचित लोगों एवं क्षेत्रों को उनकी क्षमता व सामर्थ्य को बढ़ाते हुए उन्हें विकास की मुख्यधारा में शामिल करना रहा है। इस दृष्टि से यह कहना समीचीन है कि ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास एवं सबका प्रयास’ का ध्येय वाक्य लोकनीतियों के प्रतिपादन एवं कार्यान्वयन का नाभिकेन्द्र रहा है। इसमें आर्थिक समृद्धि एवं लोककल्याण में वृद्धि स्वतः विहित रहे हैं। मोदी सरकार द्वारा संरचनात्मक आर्थिक सुधारों का मूल विचार ‘रिफार्म, परफार्म व ट्रॉन्सफार्म’ रहा है। इस बजट में भी, बजट प्रावधानों को अधिक परिणामोन्मुखी बनाने के लिए सुधारों के क्रम को जारी रखा गया है। ‘विकसित भारत’ के महालक्ष्य को प्राप्त करने के लिए इस बजट में कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था, मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र, एमएसएमई, ओडीओपी, रिन्यूबल व न्यूक्लियर एनर्जी, सेमिकंडक्टर, आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स, जलमार्ग व रेल विकास, डिकार्बनाइजेशन, निर्यात संवर्द्धन, रक्षा क्षेत्र इत्यादि संभावनापूर्ण क्षेत्रों एवं तत्सम्बन्धी क्रियाओं के संवर्द्धन व विकास के लिए वित्तमंत्री द्वारा प्राथमिकता के आधार पर अपेक्षित आवंटन किए गये हैं। साथ ही, मानव पूँजी के निर्माण से सम्बन्धित क्षेत्रों यथा शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला, युवा और दिव्यांग सशक्तिकरण पर पर्याप्त बल दिया गया है। वस्तुतः, मानव पूँजी के बेहतर विकास से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी तथा जनकल्याण में वृद्धि होगी। वित्तमंत्री ने इस बजट में राजकोषीय सुदृढ़ीकरण को जारी रखते हुए इस पर विशेष बल दिया है। हाल के वर्षों में जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा में निरन्तर गिरावट से इस बात की पुष्टि होती है कि मोदी सरकार का राजकोषीय प्रबन्धन सम्बन्धी निष्पादन श्लाधनीय रहा है। वर्ष 2021-22 में राजकोषीय घाटा जीडीपी का 6.7 प्रतिशत; 2022-24 में 6.5 प्रतिशत 2023-24 में 5.5 प्रतिशत; 2024-25 में 4.8 प्रतिशत एवं 2025-26 में 4.4 प्रतिशत था। इसे 2026-27 के बजट में कम करके 4.3 प्रतिशत पर रख गया है। ये प्रवृत्तियाँ राजकोषीय व्यवस्था की मजबूती की परिचायक हैं। मोदी सरकार की राजकोषीय प्रवीणता एवं बेहतर वित्तीय प्रबंधन का ही परिणाम है कि जीडीपी के सापेक्ष राजकोषीय घाटा निरन्तर घटा है। साथ ही, वित्तमंत्री इस बात में भी सफल रही हैं कि उन्होंने इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष केन्द्र सरकार के ऋण को 55.6 प्रतिशत पर रखा है। यह वर्ष 2025-26 के लिए 56.1 प्रतिशत रखा गया था। साथ ही, इस बजट में जीडीपी के सापेक्ष राजस्व घाटा एवं प्राथमिक घाटा में भी कमी आई है। घटते घाटे एवं ऋण से निजी पूँजी निवेश में वृद्धि होगी। इस बजट में, राजस्व में सतत वृद्धि; पूँजीगत व्यय में वृद्धि और राजकोषीय पारदर्शिता में सुधार के संकेतकों से भी देश की राजकोषीय सुदृढ़ता की पुष्टि होती है। पूँजीगत खर्च के जरिये अवस्थापना क्षेत्र के विकास ने विकास को तेज करने और रोजगार को बढ़ाने में उल्लेखनीय तौर पर योगदान दिया है। इंफ्रास्ट्रक्चर आर्थिक विकास में धमनियों का कार्य करता है। इसलिए यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि इन्फ्रास्ट्रक्चर पर मोदी सरकार द्वारा किया गया निवेश लगातार विकास का इंजन बना हुआ है। एक ओर जहाँ केन्द्र सरकार स्वयं पूंजीगत व्यय को बढ़ा रही है; वहीं दूसरी ओर राज्य सरकारों को भी अनुदान व ऋण देकर उनके पूँजीगत खर्च को बढ़ाने में मदद कर रही है। वर्ष 2025-26 की तुलना में 2026-27 के बजट में पूँजीगत आवंटन में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यदि राज्यों को दी जाने वाली अनुदान राशि को भी जोड़ लिया जाय तब प्रभावी पूँजीगत व्यय की वृद्धि 22 प्रतिशत बैठती है। इस तरह मोदी सरकार की यह विचारणा सुस्पष्ट होती है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर की मजबूती आर्थिक उन्नति का मूलाधार है। इस बजट में कुछ विशिष्ट क्षेत्रों क्षेत्रों में पूँजीगत व्यय की वृद्धि दरें इस तरह हैं: टेलीकॉम 97 प्रतिशत; रक्षा 18 प्रतिशत; रेलवे 10 प्रतिशत; सड़क व हाईवे 8 प्रतिशत एवं आवास व नगरीय विकास 6 प्रतिशत। यह तथ्य यह भी दर्शाते हैं कि बेहतर राजकोषीय प्रबन्धन से अब विकासगामी क्रियाओं के लिए अधिक वित्तीय संसाधन उपलब्ध हो रहे हैं। जीडीपी के सापेक्ष सरकारी ऋण भार को घटाकर 2030-31 तक 50 प्रतिशत पर लाने का लक्ष्य रखा गया है। स्पष्ट है कि इससे आगामी वर्षों में अवस्थापना के विकास के लिए और अधिक ‘फिस्कल स्पेस’ मिल सकेगा। उल्लेखनीय है कि पूँजीगत व्यय में मोदी सरकार द्वारा की गई वृद्धि से आय में तो कई गुना वृद्धि होती ही है, इससे रोजगार में भी उल्लेखनीय तौर पर वृद्धि होती है। इस बजट में छोटे, मझोले एवं धार्मिक नगरों के विकास के लिए भी प्रावधान किए गये हैं। नगरीय क्षेत्रों में जन सुविधाओं के बेहतर विकास से जनजीवन सुगम व स्वस्थ होगा। साथ ही, इसके विकास से कारोबार सुगम होगा, इसमें वृद्धि होगी। धार्मिक व साँस्कृतिक स्थलों के उन्नयन से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तथा देश-विदेश से पर्यटकों की आवाजाही से आर्थिकी सशक्त होगी। इस बजट में हास्पिटेलिटी तथा हेल्थ टूरिज्म से भी लोगों की आजीविका के स्रोतों में वृद्धि, रेल एवं जलमार्गों के विकास एवं अपग्रेडेशन से लाजिस्टिक्स की लागतें घटेंगी। इससे व्यापार में वृद्धि तो होगी ही, साथ ही आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी और अर्थव्यवस्था की स्पर्धात्मकता में वृद्धि से निर्यात-प्रेरित निवेश होगा। इस बात का उल्लेख करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इस बजट में अवस्थापना क्षेत्र के विकास के लिए 12.20 लाख
रक्षा बजट 2026-27 से बढ़ेगी सैन्य क्षमता और आत्मनिर्भरता.

नई दिल्ली। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 1 फरवरी 2026 को प्रस्तुत केंद्रीय बजट में वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा क्षेत्र को विशेष प्राथमिकता दी गई है। वर्तमान वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों, क्षेत्रीय चुनौतियों और चल रहे अभियानों को ध्यान में रखते हुए रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि भारत की दीर्घकालिक सैन्य रणनीति, आत्मनिर्भरता और तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में एक मजबूत कदम है। इसके बारे में यही कहना होगा कि यह बजट देश की सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ भारत को वैश्विक सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने की आधारशिला भी रखता है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष के 6.81 लाख करोड़ रुपये की तुलना में 15.19 प्रतिशत अधिक है। यह वृद्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बजट को आधुनिकरण, स्वदेशीकरण और मानव संसाधन विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि यह सुरक्षा, विकास और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन स्थापित करता है। यदि सकल घरेलू उत्पाद के संदर्भ में देखा जाए, तो यह रक्षा आवंटन अनुमानित जीडीपी का लगभग 2.0 प्रतिशत है, जो पिछले वर्ष के 1.9 प्रतिशत से अधिक है। भारत पहले ही दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और तेजी से तीसरे स्थान की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में रक्षा क्षेत्र में यह निवेश देश की वैश्विक स्थिति को और मजबूत करता है। अमेरिका, चीन और रूस जैसे देशों के बाद भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा खर्च करने वाले देशों में शामिल है। यह तथ्य भारत की सुरक्षा आवश्यकताओं और उसकी रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं को दर्शाता है। रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण पर केंद्रित है। इसके लिए 2.1 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 21.84 प्रतिशत अधिक है। यह राशि नई पीढ़ी के लड़ाकू विमानों, अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों, आधुनिक युद्धपोतों, पनडुब्बियों, ड्रोन और डिजिटल युद्ध प्रणाली के विकास एवं खरीद पर खर्च की जाएगी। भारतीय वायुसेना और नौसेना के लिए अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया गया है, क्योंकि ये तकनीकी रूप से अधिक महंगे और जटिल होते हैं। इसके साथ ही, वेतन, भत्ते, ईंधन, गोला-बारूद और रखरखाव के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपये का राजस्व बजट निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 17 प्रतिशत अधिक है। इससे सैनिकों के मनोबल को मजबूत करने और उनकी कार्यक्षमता बढ़ाने में सहायता मिलेगी। रक्षा पेंशन के लिए 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिससे लगभग 34 लाख रक्षा एवं नागरिक कर्मचारियों को लाभ मिलेगा। वन रैंक वन पेंशन योजना में सुधार के माध्यम से सरकार ने पूर्व सैनिकों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के लिए 29,100 करोड़ रुपये, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के लिए 7,394 करोड़ रुपये और पूर्व सैनिक कल्याण योजनाओं के लिए 12,100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। ये सभी आवंटन यह दर्शाते हैं कि सरकार केवल हथियारों पर ही नहीं, बल्कि सैनिकों के जीवन, बुनियादी ढांचे और भविष्य की आवश्यकताओं पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। स्वदेशीकरण इस बजट का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। पूंजीगत अधिग्रहण के लिए 1,85,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं, जिसमें से 75 प्रतिशत राशि घरेलू उद्योग से रक्षा उपकरण खरीदने पर खर्च की जाएगी। इससे भारत की आत्मनिर्भर भारत नीति को मजबूती मिलेगी और देश के रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को नई ऊर्जा प्राप्त होगी। निजी क्षेत्र की भागीदारी और अनुसंधान एवं विकास में निवेश के कारण इस वर्ष रक्षा निर्यात से लगभग 30,000 करोड़ रुपये की आय होने की संभावना है। यह न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी है, बल्कि भारत को वैश्विक रक्षा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी के रूप में स्थापित भी करता है। भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना की क्षमताओं में पिछले कुछ वर्षों में लगातार वृद्धि हुई है। भारतीय सेना दुनिया की सबसे अनुशासित और प्रशिक्षित सेनाओं में से एक मानी जाती है। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्यों से लेकर अंतरराष्ट्रीय शांति अभियानों तक, भारतीय सशस्त्र बलों ने हर क्षेत्र में अपनी दक्षता और समर्पण साबित किया है। सेना का तकनीकी रूपांतरण, महिला सैनिकों की बढ़ती भागीदारी और अत्याधुनिक प्रशिक्षण प्रणाली भारतीय सैन्य शक्ति को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही है। इसके अलावा, बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन द्वारा सीमावर्ती क्षेत्रों में सड़कों और पुलों का निर्माण रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इससे न केवल सेना की तैनाती और रसद व्यवस्था मजबूत होती है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों का सामाजिक और आर्थिक विकास भी तेज होता है। रक्षा बजट का प्रभाव सुरक्षा तक सीमित न रहते हुए यह राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। रक्षा उद्योग से लाखों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। स्वदेशी हथियारों और उपकरणों का निर्माण देश के औद्योगिक विकास को गति देता है। यह बजट तकनीकी नवाचार, स्टार्टअप और अनुसंधान संस्थानों के लिए भी नए अवसर पैदा करता है। आज के समय में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि साइबर युद्ध, सूचना युद्ध और अंतरिक्ष आधारित सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। इस बजट में इन उभरते क्षेत्रों में निवेश का संकेत मिलता है, जिससे भारत भविष्य के युद्धों के लिए तैयार हो सकेगा। तीनों सेनाओं के बीच समन्वय और एकीकृत युद्ध क्षमता विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है। भारत के यूरोप और अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग से उसकी सामरिक स्थिति और मजबूत हुई है। बहु-क्षेत्रीय अभियानों, दीर्घकालिक युद्ध क्षमता और सीमाओं की सुरक्षा के लिए यह बजट एक महत्वपूर्ण आधार तैयार करता है। सरकार का स्पष्ट उद्देश्य है कि भारतीय सशस्त्र बल आतंकवाद से लेकर पारंपरिक युद्ध तक हर प्रकार की चुनौती का सामना करने में सक्षम हों। यदि इस रक्षा बजट को आम नागरिक के दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह राष्ट्र की सुरक्षा के लिए एक प्रकार का बीमा है। यह देश के भविष्य को सुरक्षित करने, सैनिकों के मनोबल को मजबूत करने और भारत को एक जिम्मेदार वैश्विक सुरक्षा प्रदाता के रूप में स्थापित करने की
पत्थर के देवता- डॉ. नारायण व्यास: ये हैं समय, शिला और सभ्यता के मौन साधक

– डॉ. मयंक चतुर्वेदी मध्य प्रदेश की धरती पर जब भी पत्थरों की भाषा पढ़ी जाती है, शिलाओं पर उकेरे गए आदिम मनुष्य के सपने समझे जाते हैं और गुफाओं की दीवारों पर जब सांस लेते इतिहास को अनुभूत किया जाता है, तब अनायास ही एक नाम सामने आता है; भारत के महान पुरातत्त्वविद्, चित्रकार, इतिहासकार और सांस्कृतिक शोधकर्ता डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर का। डॉ. नारायण व्यास उन्हीं के शिष्य हैं, इसलिए पुरातत्व के इस तपस्वी को जब 2026 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया, तो यह सम्मान उन अनगिनत पत्थरों, शैलचित्रों और अनसुनी कथाओं का सम्मान था, जिन्हें उन्होंने जीवन भर सहेजा। सच; आज के संदर्भ में देखें तो सच्चे अर्थों में ‘पत्थर के देवता’ हैं, क्योंकि उनके लिए पत्थर जड़ नहीं, जीवंत इतिहास हैं। मध्य प्रदेश की धरती पर फैली पहाड़ियां, गुफाएं और शैलाश्रय सिर्फ प्राकृतिक संरचनाएं नहीं हैं, वे मानव सभ्यता की सबसे पुरानी स्मृतियों को अपने भीतर समेटे हुए हैं। इन पत्थरों की भाषा को जिसने पढ़ा, समझा और दुनिया को सुनाया, उनमें आज डॉ. नारायण व्यास का नाम अग्रणी है। मालवांचल से जुड़े डॉ. नारायण व्यास का जीवन पुरातत्व और सांस्कृतिक संरक्षण की ऐसी प्रेरक कहानी है, जिसमें यश से अधिक कर्म और प्रचार से अधिक प्रतिबद्धता दिखाई देती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण में सीनियर और बाद में सुपरिंटेंडिंग आर्कियोलॉजिस्ट के रूप में उन्होंने 2009 तक सेवा की। यह वह समय था, जब पुरातत्व कार्य आसान नहीं था। सीमित संसाधन, कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और लंबी फील्ड यात्राएं इस पेशे का हिस्सा थीं। लेकिन डॉ. व्यास के लिए यह सब चुनौतियां एक नया अवसर दे रही थीं क्योंकि उनके लिए पुरातत्व नौकरी नहीं, जीवन-धर्म था। डॉ. व्यास की पहचान का सबसे उज्ज्वल अध्याय भीमबेटका से जुड़ा है। मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित यह क्षेत्र प्रागैतिहासिक मानव की जीवन-शैली, कला और सोच का सबसे प्रामाणिक साक्ष्य है। गुफाओं की दीवारों पर बने शैलचित्र हजारों वर्ष पुराने हैं, जिनमें शिकार, नृत्य, सामाजिक गतिविधियां और प्रकृति से मनुष्य का संबंध स्पष्ट दिखाई देता है। डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर के सान्निध्य में भीमबेटका की रॉक पेंटिंग्स का गहन अध्ययन किया और उनके संरक्षण के लिए वर्षों तक काम किया। डॉ. वाकणकर, जिन्हें भारतीय रॉक आर्ट का पितामह कहा जाता है से मिली दृष्टि और अनुशासन ने डॉ. व्यास को इस क्षेत्र का विशेषज्ञ बनाया। 2003 में जब भीमबेटका को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला, तब उसके पीछे डॉ. व्यास जैसे शोधकर्ताओं की वर्षों की मेहनत छिपी हुई दिखाई दी। भीमबेटका के अलावा सांची स्तूपों के संरक्षण और अध्ययन में भी डॉ. व्यास की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सांची केवल स्थापत्य का उदाहरण होने के साथ विश्व भर के लिए आज बौद्ध दर्शन, अहिंसा और शांति का प्रतीक है। इन स्तूपों और उनसे जुड़े बौद्ध स्थलों के वैज्ञानिक अध्ययन, दस्तावेजीकरण और संरक्षण में डॉ. व्यास ने उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सांची की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान अक्षुण्ण रहे और आने वाली पीढ़ियां इसे उसी गरिमा के साथ देख सकें। डॉ. व्यास का शोध कार्य गुजरात स्थित रानी की वाव तक भी फैला। रानी की वाव पर उन्होंने अपना पीएचडी शोध पूरा किया। यह बावड़ी भारतीय जल-संरचना, स्थापत्य कला और धार्मिक प्रतीकों का अद्भुत उदाहरण है। रानी की वाव को 2014 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया और इसके वैश्विक स्तर पर स्थापित होने में डॉ. व्यास के शोध और संरक्षण प्रयासों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इन तीनों स्थलों भीमबेटका, सांची और रानी की वाव के संरक्षण में योगदान देना अपने आप में एक असाधारण उपलब्धि है, जो बहुत कम पुरातत्वविदों के हिस्से आती है। मध्य भारत में प्रागैतिहासिक औजारों और शैलचित्रों पर डॉ. व्यास का कार्य उन्हें विशेष स्थान दिलाता है। उन्होंने प्रारंभिक मानव द्वारा उपयोग किए गए 500 से अधिक प्रागैतिहासिक औजारों का संग्रह तैयार किया, जिसे उन्होंने शोध और शिक्षा के उद्देश्य से संरक्षित किया है। यह संग्रह असम बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज है और पुरातत्व जगत में इसे एक दुर्लभ उपलब्धि माना जाता है। यह संग्रह इस बात का भी प्रमाण है कि डॉ. व्यास के लिए पुरातत्व अध्ययन के साथ विरासत को सहेजने की जिम्मेदारी है। शैक्षणिक दृष्टि से भी डॉ. व्यास का योगदान व्यापक है। उन्होंने मध्य भारत के रॉक आर्ट स्थलों पर पोस्ट-डॉक्टरेट डी.लिट. किया, जिससे उनकी विशेषज्ञता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली। स्पेन जैसे देशों के साथ उनका सहयोग इस बात का संकेत है कि भारतीय रॉक आर्ट और प्रागैतिहासिक अध्ययन वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। मध्य प्रदेश सहित देश के विभिन्न हिस्सों में दिए गए उनके व्याख्यानों से शोधार्थियों के साथ ही आम लोगों को भी इतिहास के प्रति संवेदनशील बनाया है। डॉ. व्यास ने अपने गुरु डॉ. वाकणकर की स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए दिल्ली में दीर्घा निर्माण में भी सहयोग किया है। यह कार्य उनकी उस सोच को दर्शाता है, जिसमें ज्ञान परंपरा और गुरु-शिष्य संबंध को विशेष महत्व दिया जाता है। इसी कारण उन्हें पुरातत्व जगत में “मध्य भारत का पुरातत्व पुरोधा” और “ग्रैंड ओल्ड मैन” कहा जाता है। यह उपाधियां किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि सम्मान और अनुभव से मिलती हैं। ऐसे में कहना यही होगा कि वर्ष 2026 में पद्मश्री सम्मान मिलना बताता है कि पुरातत्व अतीत की खुदाई और उसे जानने के अर्थ में तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही ये सांस्कृतिक चेतना और अपने जड़ों की पहचान की रक्षा का माध्यम भी है। आज भी एक लम्बी उम्र पार करने के बाद भी डॉ. नारायण व्यास उतने ही सक्रिय दिखाई देते हैं, जितने कि किसी शोधार्थी युवा को देखा जा सकता है। वे शोध, लेखन, संवाद और मार्गदर्शन के माध्यम से युवा पीढ़ी को विरासत से जोड़ने का सतत कार्य कर रहे हैं। उनका काम इस बात का प्रमाण है कि पत्थर जड़ नहीं होते, वे बोलते हैं, अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं, वे हंसते और रोते भी हैं। इस तरह देखें तो उनमें समय की स्मृति, मानव और प्रकृति की तमाम कहानियां और सभ्यता की चेतना बसती है। डॉ. व्यास आज भी पत्थरों की भाषा को समझा रहे हैं। इसी अर्थ में वे वास्तव में “पत्थर के देवता” हैं, जिनकी साधना ने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत
नई नौकरियां, मजबूत अर्थव्यवस्था: 2026 में भारत में पीएमआई 59.5

– रवि रंजन सिंह भारत की अर्थव्यवस्था ने हाल के वर्षों में अभूतपूर्व गति पकड़ी है। जनवरी 2026 के एचएसबीसी फ्लैश पीएमआई डेटा (परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स) ने इसकी पुष्टि की है, जहां मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज सेक्टरों में तेजी दर्ज की गई। यह न केवल आर्थिक विकास की मजबूती को दर्शाता है, बल्कि रोजगार सृजन के व्यापक अवसरों की नींव भी रखता है। विवेचनात्मक दृष्टि से देखें तो ये आंकड़े बताते हैं कि भारत वैश्विक आर्थिक मंदी के बीच भी लचीलापन दिखा रहा है। सरकारी नीतियां जैसे ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ ने उत्पादन और सेवा क्षेत्रों को गति दी है, जिसका असर रोजगार पर स्पष्ट दिख रहा है। इस लेख में हम इन आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे और भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे। पीएमआई डेटा और आर्थिक गतिविधियों में उछालएचएसबीसी फ्लैश इंडिया कंपोजिट पीएमआई इंडेक्स जनवरी में 59.5 पर पहुंच गया, जो दिसंबर के 57.8 से काफी ऊपर है। एसएंडपी ग्लोबल द्वारा संकलित यह डेटा मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज दोनों क्षेत्रों में सुधार को रेखांकित करता है। एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी के अनुसार, वृद्धि की गति दोनों क्षेत्रों में तेज हुई, हालांकि मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई 2025 के औसत से नीचे रहा। दिसंबर में थोड़ी गिरावट के बाद नए ऑर्डर्स में तेज उछाल आया, जो मांग में सुधार का संकेत है। विवेचना करें तो इनपुट लागतों में बढ़ोतरी के बावजूद महंगाई मध्यम स्तर पर रही। मैन्युफैक्चरर्स पर इसका दबाव अधिक था, लेकिन सेवा प्रदाताओं ने बेहतर तरीके से प्रबंधन किया। निजी क्षेत्र की गतिविधियों में तेजी का मुख्य कारण नए व्यवसायों की बढ़ोतरी थी। सर्वे में शामिल लोगों ने बढ़ती मांग और आक्रामक विपणन को जिम्मेदार ठहराया। मैन्युफैक्चरिंग ने सर्विसेज से अधिक तेजी दिखाई, जो निर्यात-केंद्रित नीतियों का परिणाम है। अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स में पिछले चार महीनों की सबसे मजबूत वृद्धि दर्ज हुई, जिसमें एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, लैटिन अमेरिका और मध्य पूर्व प्रमुख बाजार बने। यह भारत की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में मजबूत स्थिति को प्रमाणित करता है। दिसंबर में स्थिर रहने के बाद जनवरी में निजी क्षेत्र में भर्तियां फिर शुरू हुईं। कंपनियां व्यावसायिक गतिविधियों के 12 महीने के दृष्टिकोण पर आशावादी हैं। ये संकेत आर्थिक विकास को रोजगार से जोड़ते हैं, जहां जीडीपी वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर बनी रहने की उम्मीद है। अवसरों में 2026 में नई भूमिकाओं का विस्तारनौकरीडॉटकॉम के द्विवार्षिक सर्वेक्षण से और सकारात्मक खबरें आई हैं। 1,250 से अधिक रोजगार प्रदाताओं के इनपुट के आधार पर, 76 प्रतिशत नियोक्ता 2026 की पहली छमाही में नई नौकरियां पैदा करेंगे। स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र 88 प्रतिशत नई भूमिकाओं के साथ अग्रणी है, जो उम्रदराज आबादी और स्वास्थ्य बीमा योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत का परिणाम है। मैन्युफैक्चरिंग में 79 प्रतिशत, बीएफएसआई में 70 प्रतिशत और आईटी में 76 प्रतिशत नई नौकरियां होंगी। निश्चित ही यह आंकड़ा भारत की युवा आबादी (65 प्रतिशत से अधिक 35 वर्ष से कम आयु के) के लिए वरदान है। विवेचनात्मक रूप से देखें तो आर्थिक सुधार रोजगार-सघन विकास की ओर बढ़ रहे हैं। प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था और डिजिटल इंडिया ने सेवा क्षेत्र को मजबूत किया है, जबकि पीएलआई योजना ने मैन्युफैक्चरिंग को प्रोत्साहित किया है। इसके साथ ही एक तथ्य यह भी सामने आया है कि 87 प्रतिशत नियोक्ताओं ने माना है कि एआई से नौकरियों पर कोई खास असर नहीं पड़ेगा। इसके विपरीत, 18 प्रतिशत का कहना है कि एआई नई भूमिकाएं सृजित कर रहा है, खासकर आईटी, एनालिटिक्स और मार्केटिंग में। ये निरंतर कौशल विकास की आवश्यकता पर जोर देता है। उदाहरणस्वरूप, चैटजीपीटी जैसे टूल्स ने कोडिंग और डेटा एनालिसिस में मांग बढ़ाई है। भर्ती में मध्य स्तर (4-7 वर्ष अनुभव) के पेशेवरों की मांग बढ़ेगी, जहां आईटी के 69 प्रतिशत प्रदाता इन्हें प्राथमिकता देंगे। स्वास्थ्य सेवा में 65 प्रतिशत नियोक्ता शुरुआती स्तर (0-3 वर्ष) को लक्षित करेंगे, जो नए स्नातकों के लिए राहत है। मैन्युफैक्चरिंग और आईटी मध्य स्तर में अग्रणी होंगे। आज देश में स्वास्थ्य सेवा में 88 प्रतिशत नई नौकरियां पैदा हुई हैं। महामारी के बाद निवेश बढ़ा है। टेलीमेडिसिन और डायग्नोस्टिक्स में विस्तार लगातार इस सेक्टर में होता हुआ दिख रहा है।मैन्युफैक्चरिंग में 79 प्रतिशत का उछाल है- इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और टेक्सटाइल में निर्यात बढ़ा। पीएमआई में अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर्स की मजबूती इसका प्रमाण है। आईटी और बीएफएसआई में भी पिछली तुलना में 76-70 प्रतिशत बढ़ोत्तरी देखी जा रही है। डिजिटल बैंकिंग और क्लाउड कंप्यूटिंग ड्राइवर में भारी उत्साह नजर आ रहा है। इसके साथ ही अन्य में विशेष तौर पर रिन्यूएबल एनर्जी और ई-कॉमर्स में अप्रत्यक्ष वृद्धि दिखती है। निश्चित ही ये आंकड़े बताते हैं कि विविधीकरण हो रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में मैन्युफैक्चरिंग इकाइयां रोजगार फैला रही हैं, जो असमानता कम करेगी (लेखक आर्थक मामलों के विश्लेषक हैं)
स्क्रीन के उजाले में बुझती युवा संवेदनाएं

– डॉ. संध्या एस चौकसे आज का भारत युवाओं का भारत है। यही युवा देश की रीढ़ हैं और भविष्य की नींव भी, किंतु विडंबना यह है कि जिन हाथों में कलम किताबें औजार और रचनात्मकता होनी चाहिए, उन्हीं हाथों में आज हर पल एक चमकती हुई स्क्रीन दिखाई देती है। मोबाइल फोन! जिसने दुनिया को हमारी मुट्ठी में समेट दिया, वही अब हमारी संवेदनाओं संबंधों और संतुलन को चुपचाप निगलता जा रहा है। ऐसे में आज मोबाइल आधुनिकता का प्रतीक भर नहीं रहा है, वह घटती मानवीय संवेदनशीलता का सबसे स्पष्ट चेहरा बन चुका है। डिजिटल क्रांति ने शिक्षा संचार और सूचना के क्षेत्र में अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं। परंतु जब उपयोग की सीमा टूटती है तब वही साधन विनाश का कारण बन जाता है। भारत में आज युवा वर्ग मोबाइल लत का सबसे बड़ा शिकार है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार भारत में लगभग 50 प्रतिशत युवा किसी न किसी रूप में मोबाइल पर निर्भरता या लत के लक्षण दिखा रहे हैं। विश्व स्तर पर लगभग 6.9 प्रतिशत आबादी स्मार्टफोन लत से ग्रस्त मानी जाती है जिसमें भारतीय युवाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ये आंकड़े आज उस गहरी सामाजिक समस्या की चेतावनी हैं जो हमारे सामने खड़ी है। हाल के वर्षों में मोबाइल से जुड़ी हिंसक और आत्मघाती घटनाएँ समाज को झकझोरने वाली हैं। ओडिशा के जगतसिंहपुर में 21 वर्षीय छात्र द्वारा मोबाइल देखने से रोके जाने पर अपने माता-पिता और बहन की हत्या कर देना। मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में किशोर का अपने माता-पिता पिता द्वारा हर वक्त मोबाइल में डूबे रहने से मना किए जाने पर लोहे की छड़ से उन पर हमला कर देना, जिसमें कि पिता की जान किसी तरह बच सकी, लेकिन मां की जान चली गई। राजस्थान के जयपुर में तेरह साल की एक बच्ची को उसके माता-पिता ने मोबाइल देखने से मना किया और इससे गुस्साई उस बच्ची ने पहले अपने हाथ की नस काट ली, तो उसके अभिभावकों ने इलाज करा कर उसे बचा लिया। मगर अगले ही दिन उसने नदी में कूद कर जान दे दी। छत्तीसगढ़ और सरगुजा की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि मोबाइल अब आदत नहीं रहा बल्कि कई युवाओं के लिए भावनात्मक नियंत्रण का केंद्र बन चुका है। जब मोबाइल उनसे दूर होता है तो उन्हें लगता है जैसे उनका अस्तित्व ही छिन गया हो। युवा अवस्था लक्ष्य अनुशासन और निर्माण की होती है। परंतु मोबाइल की अंतहीन दुनिया युवाओं को लक्ष्यहीनता की ओर धकेल रही है। घंटों तक रील्स गेम्स और चैट में उलझे रहना पढ़ाई कौशल विकास और शारीरिक गतिविधियों का समय छीन रहा है। अध्ययनों के अनुसार औसतन भारतीय युवा प्रतिदिन चार से छह घंटे मोबाइल स्क्रीन पर बिताते हैं जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन किशोरों के लिए दो घंटे से अधिक स्क्रीन टाइम को हानिकारक मानता है। इस असंतुलन का परिणाम है एकाग्रता में कमी धैर्य का अभाव और त्वरित आनंद की मानसिकता। मानसिक स्वास्थ्य पर मोबाइल का प्रभाव अत्यंत घातक सिद्ध हो रहा है। सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली तथाकथित परफेक्ट लाइफ की तस्वीरें युवाओं को निरंतर तुलना के जाल में फँसा देती हैं। लाइक और फॉलोअर्स आत्म मूल्यांकन का पैमाना बन जाते हैं। शोध बताते हैं कि जो किशोर प्रतिदिन चार घंटे से अधिक मोबाइल का उपयोग करते हैं उनमें अवसाद के लक्षण 60 प्रतिशत तक अधिक पाए जाते हैं। मोबाइल लत चिंता अवसाद और नींद विकारों की संभावना को दो से तीन गुना तक बढ़ा देती है। अनिद्रा चिड़चिड़ापन और निर्णय लेने में कठिनाई आज सामान्य समस्याएँ बन चुकी हैं। सामाजिक अलगाव इस संकट का दूसरा गंभीर पहलू है। आभासी संवाद ने वास्तविक रिश्तों की जगह ले ली है। एक सर्वे के अनुसार मोबाइल के कारण माता पिता और बच्चों के बीच औसत संवाद समय घटकर मात्र दो मिनट रह गया है। जब परिवार में संवाद टूटता है तो भावनात्मक सुरक्षा भी कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि मोबाइल लत से ग्रस्त किशोरों में सामाजिक समर्थन की कमी 25 से 30 प्रतिशत अधिक पाई गई है। यह कमी उन्हें आत्मघाती विचारों और आत्म हानि की ओर धकेल सकती है। शारीरिक स्वास्थ्य भी इस डिजिटल लत से अछूता नहीं है। लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आँखों में जलन सिरदर्द गर्दन और पीठ दर्द आम समस्याएँ बन गई हैं। देर रात तक मोबाइल उपयोग से नींद का चक्र बिगड़ता है जिससे हार्मोनल असंतुलन और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है। खेलकूद और शारीरिक श्रम की जगह बैठकर मोबाइल चलाने की आदत मोटापा आलस्य और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को बढ़ावा दे रही है। नैतिक और भावनात्मक स्तर पर मोबाइल का प्रभाव और भी चिंताजनक है। इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध अश्लीलता हिंसा और नकारात्मक सामग्री युवाओं की सोच को प्रभावित कर रही है। बार-बार हिंसक दृश्य देखने से संवेदनशीलता घटती जाती है और दूसरों के दुख दर्द के प्रति सहानुभूति कम होती है। साइबर बुलिंग ट्रोलिंग और नफरत भरे संदेश युवाओं को आक्रामक और असहिष्णु बना रहे हैं। त्वरित संतुष्टि की आदत धैर्य जिम्मेदारी और त्याग जैसे मूल्यों को कमजोर कर रही है। शिक्षा के क्षेत्र में भी मोबाइल दोधारी तलवार बन गया है। एक ओर ऑनलाइन संसाधनों ने सीखने को आसान बनाया है वहीं दूसरी ओर अनियंत्रित उपयोग पढ़ाई में बाधा बन रहा है। नोटिफिकेशन और चैट के बीच गहन अध्ययन संभव नहीं रह जाता। कॉपी पेस्ट संस्कृति मौलिक सोच और विश्लेषण क्षमता को नुकसान पहुँचा रही है। इससे दीर्घकालीन बौद्धिक विकास प्रभावित हो रहा है और युवा शॉर्टकट की मानसिकता के शिकार बनते जा रहे हैं। साइबर अपराध भी युवाओं के लिए एक बड़ा खतरा बनकर उभरा है। फर्जी प्रोफाइल ऑनलाइन ठगी डेटा चोरी और ब्लैकमेलिंग जैसी घटनाएँ युवाओं को मानसिक और आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचा रही हैं। निजी तस्वीरों और जानकारी का दुरुपयोग गोपनीयता के हनन को बढ़ावा दे रहा है। अनुभवहीनता के कारण युवा अक्सर इन जालों में फँस जाते हैं। इस परिस्थितियों में ध्यान यही आता है कि डिजिटल डिटॉक्स आज समय की आवश्यकता बन चुका है। सप्ताह में कुछ घंटे या एक दिन मोबाइल से दूरी मानसिक शांति और संतुलन प्रदान कर सकती है। स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा
अरावली पहाड़ियों में खनन पर अदालत और सरकार

कैलाश चन्द्र । भारत की अरावली पर्वतमाला उत्तर और पश्चिम भारत की पारिस्थितिक सुरक्षा प्रणाली की रीढ़ है। दिल्ली से लेकर गुजरात तक फैली यह प्राचीन पर्वत शृंखला भारत की सबसे पुरानी भूवैज्ञानि संरचनाओं में से एक होने के साथ ही यह मरुस्थलीकरण को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार भूजल पुनर्भरण का अहम क्षेत्र और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आश्रय भी है। ऐसे में हाल के दिनों में सोशल मीडिया और कुछ यूट्यूब चैनलों पर यह दावा किया जाना कि सरकार ने अरावली में खनन और निर्माण के लिए ढील दे दी है स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है और इससे जुड़ा सच जानने के लिए प्रेरित करता है। इसी संदर्भ में केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण देना पड़ा है। उन्होंने इन आरोपों को भ्रामक और तथ्यों से परे बताया। वास्तव में इस पूरे विवाद को समझने के लिए तीन बुनियादी पहलुओं को स्पष्ट रूप से देखना आवश्यक है; अरावली का भौगोलिक और पारिस्थितिक महत्व सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए आदेश तथा सरकार की वर्तमान संरक्षण नीति। हम यदि गहराई से देखें तब अरावली पर्वतमाला दिल्ली हरियाणा राजस्थान और गुजरात के 39 जिलों में फैली हुई दिखाई देती है। दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए यह ‘ग्रीन लंग्स’ की तरह काम करती है। यही पहाड़ियाँ थार मरुस्थल को उत्तर और पूर्व की ओर बढ़ने से रोकती हैं। वर्षा जल को रोककर यह भूजल को रिचार्ज करती हैं। हवा के बहाव को नियंत्रित करती हैं और प्रदूषण के स्तर को संतुलित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। एनसीआर की जलवायु वायु गुणवत्ता और जल सुरक्षा सीधे-सीधे अरावली की स्थिति से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि दशकों से अरावली क्षेत्र में खनन और निर्माण गतिविधियों पर सख्त नियंत्रण और कई जगहों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए गए हैं। अरावली में अवैध खनन और पर्यावरणीय क्षति को लेकर 1980 के दशक से ही जनहित याचिकाएँ दाखिल होती रही हैं। इन याचिकाओं के परिणामस्वरूप उच्चतम न्यायालय ने कई ऐतिहासिक आदेश दिए। वर्ष 2009 में उच्चतम न्यायालय ने हरियाणा के फरीदाबाद गुरुग्राम और नूंह जिलों की अरावली पहाड़ियों में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। यह प्रतिबंध आज भी प्रभावी है। इसके बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वैज्ञानिक मैपिंग और पर्यावरण प्रभाव अध्ययन ईआईए के बिना अरावली क्षेत्र में किसी भी नई खनन गतिविधि की अनुमति नहीं दी जा सकती। पहले वैज्ञानिक सर्वे फिर पर्यावरणीय योजना और उसके बाद ही किसी प्रकार की अनुमति यह सिद्धांत स्थापित किया गया। इसमें भी महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये रोकें अस्थायी नहीं बल्कि दीर्घकालिक और कई मामलों में स्थायी हैं। आम धारणा के विपरीत हर साल नई-नई रोकें नहीं लगतीं किंतु एक बार सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने के बाद वह वर्षों तक लागू रहता है। वर्ष 2025 में उच्चतम न्यायालय ने अरावली को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्देश दिया। अदालत ने सभी राज्यों से अरावली की एक समान वैज्ञानिक और लागू करने योग्य परिभाषा तैयार करने को कहा और केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट को स्वीकार किया। यहीं से भ्रम की शुरुआत हुई। कुछ लोगों ने यह प्रचारित किया कि अब केवल पहाड़ी की चोटी से 100 मीटर ऊपर तक ही संरक्षण रहेगा और उसके नीचे खनन की छूट मिल जाएगी। निश्चित ही ये दावा अधूरा और पूरी तरह भ्रामक है। विशेषज्ञ समिति द्वारा सुझाया गया 100 मीटर मानदंड पहाड़ी की ऊँचाई को स्थानीय राहत के संदर्भ में परिभाषित करता है। इसका अर्थ यह है कि पहाड़ी का आधार यदि जमीन के भीतर 20 मीटर नीचे तक फैला है तो संरक्षण की गणना वहीं से होगी। यानी चट्टान की पूरी मोटाई उसकी ढलानें और उससे जुड़ी घाटियां भी संरक्षण के दायरे में आती हैं। दूसरे शब्दों में यह नियम खनन को छूट देने के लिए नहीं है उक्त संदर्भ में यह स्पष्ट करने के लिए है कि अरावली वास्तव में कहाँ तक फैली है। जबकि इससे पहले विभिन्न राज्यों में अलग-अलग परिभाषाओं के कारण भ्रम और दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार नई वैज्ञानिक परिभाषा के बाद अरावली क्षेत्र लगभग 1.44 से 1.47 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ माना गया है। इसमें से करीब 90 प्रतिशत हिस्सा सीधे-सीधे संरक्षित श्रेणी में आता है। केवल 0.2 से 2 प्रतिशत तक का हिस्सा ही सैद्धांतिक रूप से खनन के लिए संभावित माना जा सकता है। किंतु यह संभावित शब्द भी महत्वपूर्ण है। इस छोटे से हिस्से में भी खनन तभी संभव है जब विस्तृत माइनिंग प्लान बने। वैज्ञानिक अध्ययन हो। पर्यावरणीय मंजूरी मिले और इंडियन काउंसिल ऑफ फॉरेस्ट्री रिसर्च एंड एजुकेशन आईसीएफआरई से अनुमोदन प्राप्त हो। व्यावहारिक रूप से यह छूट लगभग नगण्य है। दिल्ली की पूरी अरावली में खनन पर पूर्ण प्रतिबंध है और भविष्य में भी यहां किसी प्रकार की माइनिंग की अनुमति नहीं दी जाएगी। एनसीआर के संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण परियोजनाओं पर भी सख्त नियंत्रण रहेगा। जहां किसी क्षेत्र को लेकर संदेह होगा उसे तब तक अरावली माना जाएगा जब तक वैज्ञानिक सर्वे कुछ और सिद्ध न कर दे। यह प्रावधान संरक्षण नीति को और अधिक कठोर बनाता है। ध्यातव्य हो कि मई 2024 में न्यायालय ने विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाए जा रहे असंगत मानदंडों को देखते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। इस समिति में पर्यावरण मंत्रालय चारों राज्यों के वन विभाग भारतीय वन सर्वेक्षण भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के प्रतिनिधि शामिल रहे। समिति का उद्देश्य था अरावली की एक समान वैज्ञानिक और कानूनी रूप से मजबूत परिभाषा तैयार करना। इसकी सिफारिशों को 20 नवंबर 2025 के अंतिम आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार करते हुए पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक सस्टेनेबल माइनिंग मैनेजमेंट प्लान बनने तक सभी नई खनन लीज पर रोक लगा दी है। दूसरी ओर सरकार ग्रीन अरावली अभियान के तहत 39 जिलों में वनीकरण जल संरक्षण और स्थानीय प्रजातियों की नर्सरी विकसित कर रही है। ड्रोन सर्विलांस सीसीटीवी ई-चालान हाईटेक वेइंग ब्रिज और जिला स्तरीय टास्क फोर्स के जरिए अवैध खनन पर निगरानी रखी जा रही है। कुल मिलाकर यदि हम सार रूप में कहें तो अरावली को लेकर ढील या छूट की खबरें तथ्यात्मक नहीं हैं यह बहुत भ्रामक हैं। न्यायालय के आदेशों