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Rishi Kapoor का मजेदार किस्सा: लड़की के कपड़ों में पहुंचे जेंट्स वॉशरूम, फिर हुआ ये दिलचस्प वाकया

नई दिल्ली । हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता Rishi Kapoor ने अपने करियर में कई यादगार किरदार निभाए, लेकिन फिल्म Rafoo Chakkar से जुड़ा एक किस्सा आज भी लोगों को हैरान कर देता है। इस फिल्म में उन्हें कहानी के अनुसार लड़की का गेटअप लेना पड़ा था, और इसी दौरान उनके साथ एक ऐसा मजेदार वाकया हुआ जिसे सुनकर कोई भी मुस्कुरा उठे। फीमेल आउटफिट में मजबूरी में जाना पड़ा जेंट्स वॉशरूमदरअसल, फिल्म Rafoo Chakkar की शूटिंग के दौरान ऋषि कपूर पूरी तरह लड़की के लुक में थे। इसी बीच उन्हें वॉशरूम जाने की जरूरत पड़ी। अब समस्या यह थी कि वे महिला शौचालय में जा नहीं सकते थे, इसलिए मजबूरी में उन्हें जेंट्स वॉशरूम जाना पड़ा। लेकिन जैसे ही वे अंदर पहुंचे, वहां मौजूद लोगों ने उन्हें असली लड़की समझ लिया। हालात ऐसे हो गए कि वॉशरूम में मौजूद लोग खुद शर्म से असहज हो गए और समझ नहीं पाए कि आखिर क्या हो रहा है। विदेशी लोग ढूंढते-ढूंढते पहुंच गए सेट तकइस मजेदार घटना का जिक्र खुद Rishi Kapoor ने अपनी किताब में किया था। उन्होंने बताया कि वॉशरूम में मौजूद कुछ विदेशी लोग तो उन्हें “लड़की” समझकर बाहर तक ढूंढने निकल पड़े। जब वे लोग सेट तक पहुंचे, तब जाकर उन्हें सच्चाई का पता चला कि जिसे वे ढूंढ रहे थे, वह कोई और नहीं बल्कि फिल्म के स्टार ऋषि कपूर ही हैं। यह सुनकर सभी हैरान रह गए। चाइल्ड आर्टिस्ट से सुपरस्टार बनने तक का सफरऋषि कपूर ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट Mera Naam Joker से की थी, जिसे उनके पिता Raj Kapoor ने निर्देशित किया था। इस फिल्म के लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड भी मिला। इसके बाद उन्होंने बतौर लीड एक्टर Bobby से डेब्यू किया, जिसमें उनके साथ Dimple Kapadia नजर आईं। यह फिल्म सुपरहिट रही और ऋषि कपूर रातों-रात स्टार बन गए। रोमांटिक हीरो से लेकर मजबूत किरदारों तकअपने करियर में उन्होंने Amar Akbar Anthony, Karz, Chandni, Damini और Kapoor & Sons जैसी कई हिट फिल्मों में काम किया। फिल्मों के दौरान ही उन्हें अपनी को-स्टार Neetu Kapoor से प्यार हुआ और दोनों ने शादी कर ली। कैंसर से जंग और आखिरी सफरसाल 2018 में ऋषि कपूर को कैंसर होने का पता चला, जिसके बाद उन्होंने New York में इलाज कराया। करीब दो साल तक बीमारी से लड़ने के बाद 2020 में उनका निधन हो गया। उनकी आखिरी फिल्म Sharmaji Namkeen थी, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

अमिताभ बच्चन की सादगी का राज़: दिव्या दत्ता ने बताया क्यों उन्हें कहते हैं ‘असली महानायक’..

नई दिल्ली ।बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन अपने अभिनय के साथ-साथ अपने अनुशासित जीवन, विनम्र स्वभाव और रिश्तों को निभाने के अनोखे तरीके के लिए भी जाने जाते हैं। लंबे समय से फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय अमिताभ बच्चन को लेकर सह-कलाकार अक्सर ऐसे अनुभव साझा करते रहते हैं, जो उनके व्यक्तित्व को और भी प्रेरणादायक बना देते हैं। इसी क्रम में एक्ट्रेस दिव्या दत्ता ने हाल ही में एक इंटरव्यू में उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें साझा की हैं, जिनसे उनके व्यवहार की एक खास झलक सामने आती है। दिव्या दत्ता ने बताया कि अमिताभ बच्चन की एक खास आदत उन्हें सबसे अधिक प्रभावित करती है। उन्होंने कहा कि बिग बी अपने करीबी लोगों को उनके जन्मदिन पर ठीक रात 12 बजे फोन कर बधाई देना नहीं भूलते। यह केवल औपचारिकता नहीं बल्कि एक भावनात्मक जुड़ाव होता है, जो सामने वाले व्यक्ति को बेहद खास महसूस कराता है। दिव्या दत्ता ने यह भी साझा किया कि उन्हें भी कई बार उनके जन्मदिन पर आधी रात फोन कर शुभकामनाएं मिल चुकी हैं, जो उनके लिए एक यादगार अनुभव रहा है। उन्होंने आगे कहा कि आज के समय में जब व्यस्तता और भागदौड़ के बीच लोग व्यक्तिगत रिश्तों को समय नहीं दे पाते, ऐसे में अमिताभ बच्चन का यह व्यवहार उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। उनके अनुसार, यह आदत उनकी सादगी और रिश्तों के प्रति गहरे सम्मान को दर्शाती है, जो उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। यही वजह है कि उनके प्रति लोगों का जुड़ाव केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि एक इंसान के रूप में भी गहरा है। दिव्या दत्ता ने एक और दिलचस्प किस्सा साझा करते हुए बताया कि अमिताभ बच्चन समय के कितने पाबंद हैं। उन्होंने बताया कि जब उनकी किताब के लॉन्च का आयोजन था, तो अमिताभ बच्चन को विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम शाम 7:30 बजे तय था, लेकिन वे उससे पहले ही लगभग 7:20 बजे पहुंच गए थे। उन्होंने सहजता से कहा कि वह पहले आ गए हैं, इसलिए बाकी लोग आराम से अपना समय लें। यह घटना उनके अनुशासन और दूसरों के समय के प्रति सम्मान को स्पष्ट रूप से दिखाती है। इसके अलावा दिव्या दत्ता ने फिल्मी सेट से जुड़ा एक अनुभव भी साझा किया। उन्होंने बताया कि एक फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके किरदार में आए बदलाव के कारण उनका व्यवहार भी थोड़ा गंभीर हो गया था, जिसे अमिताभ बच्चन ने तुरंत महसूस कर लिया था। इसके बाद उन्होंने उन्हें फोन कर समझाया कि अभिनय केवल एक भूमिका है और इसे व्यक्तिगत रूप से नहीं लेना चाहिए। इस बातचीत के बाद उन्होंने दिव्या दत्ता को सहज महसूस कराने के लिए पूरा सहयोग दिया और उन्हें आत्मविश्वास से भर दिया। इन अनुभवों से यह साफ झलकता है कि अमिताभ बच्चन केवल एक महान अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और समझदार इंसान भी हैं। उनका व्यवहार, अनुशासन और रिश्तों के प्रति सम्मान उन्हें एक अलग पहचान देता है। यही कारण है कि दशकों बाद भी वह न केवल फिल्मों में बल्कि लोगों के दिलों में भी एक खास स्थान बनाए हुए हैं।

भूतों की दुनिया की सबसे मशहूर ‘दादी अम्मा’, आज भी पर्दे पर कायम है खौफ..

नई दिल्ली । हॉरर सिनेमा की दुनिया में कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो अपनी एक अलग पहचान बनाकर इतिहास में अमर हो जाते हैं। ऐसी ही एक दिग्गज अभिनेत्री हैं लिन शाय, जिन्हें हॉरर फिल्मों की ‘गॉडमदर’ और ‘डरावनी फिल्मों की दादी अम्मा’ कहा जाता है। 82 वर्ष की उम्र में भी उनकी मौजूदगी पर्दे पर दर्शकों के लिए रोमांच और डर दोनों का अनुभव कराती है। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि उन्होंने अपने लंबे करियर में लगातार हॉरर शैली की फिल्मों में काम किया और इस जॉनर की सबसे भरोसेमंद और प्रतिष्ठित चेहरों में अपनी जगह बनाई। लिन शाय का जन्म 12 अक्टूबर 1943 को अमेरिका के डेट्रॉइट शहर में हुआ था। बचपन से ही उनकी रुचि कला और अभिनय में थी, जिसके चलते उन्होंने उच्च शिक्षा में आर्ट हिस्ट्री का अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने थिएटर की दुनिया में कदम रखा, जहां से उनके अभिनय करियर की शुरुआत हुई। थिएटर में अनुभव हासिल करने के बाद उन्होंने फिल्मों की ओर रुख किया और धीरे-धीरे हॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने लगीं। उनका शुरुआती फिल्मी करियर छोटे रोल्स से शुरू हुआ, लेकिन जल्द ही उन्हें हॉरर फिल्मों में काम करने का मौका मिला। इसी शैली ने उन्हें असली पहचान दी। 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने कई हॉरर फिल्मों में काम किया और अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस, भावनात्मक अभिव्यक्ति और डरावने दृश्यों में स्वाभाविक अभिनय ने उन्हें दर्शकों के बीच खास बना दिया। धीरे-धीरे उन्हें ‘स्क्रीम क्वीन’ कहा जाने लगा, जो हॉरर फिल्मों में महिला कलाकारों के लिए एक सम्मानजनक उपाधि मानी जाती है। उनके करियर का सबसे बड़ा मोड़ उस समय आया जब उन्होंने एक प्रसिद्ध हॉरर फिल्म सीरीज में एलिस रेनियर नाम की पात्र का किरदार निभाया। यह किरदार एक ऐसी महिला का था जो आत्माओं और परालौकिक शक्तियों से जुड़ी घटनाओं को समझती और उनसे लोगों को बचाने की कोशिश करती है। इस भूमिका ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई और यह किरदार उनकी पहचान बन गया। आगे चलकर इस सीरीज की कई फिल्मों में उनके किरदार को और विस्तार दिया गया और दर्शकों ने उन्हें बेहद पसंद किया। लिन शाय की खासियत यह रही कि उन्होंने उम्र को कभी अपनी कला के आड़े नहीं आने दिया। 80 से अधिक फिल्मों में काम कर चुकी यह अभिनेत्री आज भी सक्रिय हैं और हॉरर फिल्मों में उनकी मौजूदगी को दर्शक उत्साह के साथ देखते हैं। उनके अभिनय की गहराई और भावनात्मक पकड़ ने उन्हें इस शैली की सबसे मजबूत अभिनेत्रियों में शामिल कर दिया है। उनकी फिल्मों ने दुनिया भर में करोड़ों दर्शकों को आकर्षित किया और बॉक्स ऑफिस पर भी बड़ी सफलता हासिल की। निजी जीवन में लिन शाय ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उन्होंने दो शादियां कीं और एक बेटे की मां हैं। जीवन में कई व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कभी अपने करियर से समझौता नहीं किया। उन्होंने हमेशा अपने काम को प्राथमिकता दी और अभिनय को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत माना। समय के साथ उन्होंने अपने निजी जीवन को काफी निजी रखा और सार्वजनिक रूप से कम ही चर्चा में रहीं। आज 82 साल की उम्र में भी लिन शाय हॉरर सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और सक्रिय अभिनेत्रियों में से एक हैं। उनकी कहानी इस बात का प्रमाण है कि अगर जुनून और समर्पण हो तो उम्र केवल एक संख्या रह जाती है। उन्होंने हॉरर फिल्मों की दुनिया में जो पहचान बनाई है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

सुकेश चंद्रशेख का जैकलीन को भावुक पत्र,कहा-प्यार और जंग में सब जायज है.कानूनी प्रक्रिया के बीच बढ़ी हलचल

नई दिल्ली । 200 करोड़ रुपये से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक बार फिर नया घटनाक्रम सामने आया है, जहां जेल में बंद सुकेश चंद्रशेखर ने अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडिस को एक और पत्र लिखा है। यह पत्र ऐसे समय में सामने आया है जब मामला अदालत में विचाराधीन है और विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। इस नए पत्र ने एक बार फिर इस हाई-प्रोफाइल केस को चर्चा में ला दिया है और कानूनी प्रक्रिया के साथ-साथ सार्वजनिक स्तर पर भी इस पर ध्यान बढ़ गया है। अपने पत्र में सुकेश चंद्रशेखर ने भावनात्मक और व्यक्तिगत अंदाज में जैकलीन फर्नांडिस को संबोधित किया है। उसने पत्र की शुरुआत एक खास संबोधन से की और जैकलीन को मेरीबताते हुए अपने भावनात्मक जुड़ाव का उल्लेख किया। पत्र में उसने लिखा कि वह उनसे बेहद प्यार करता है और हमेशा उनके साथ खड़ा रहेगा। उसने एक बार फिर अपने शब्दों में यह दोहराया कि उसके अनुसार प्यार और जंग में सब जायज हैऔर अपने रिश्ते को लेकर कई भावनात्मक दावे किए। पत्र में उसने यह भी कहा कि वह लगातार जैकलीन को याद कर रहा है और उनके बीच का संबंध उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। सुकेश ने अपने पत्र में खुद को भावनात्मक रूप से व्यक्त करते हुए कई निजी दावे किए और यह दिखाने की कोशिश की कि वह अब भी इस रिश्ते को लेकर गंभीर भावनाएं रखता है। उसने पत्र के अंत में खुद को एक विशेष नाम से संबोधित किया और यह भी लिखा कि वह हमेशा उनके साथ रहेगा। यह पहली बार नहीं है जब उसने इस तरह का पत्र लिखा हो, इससे पहले भी वह कई बार इसी तरह के भावनात्मक पत्र भेज चुका है, जिनमें उसने अपने दावों और भावनाओं को दोहराया है। इस पूरे मामले के बीच अभिनेत्री जैकलीन फर्नांडिस की ओर से अदालत में एक महत्वपूर्ण याचिका दायर की गई है, जिसमें उन्होंने सरकारी गवाह बनने की अनुमति मांगी है। इस याचिका के दाखिल होने के बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है और अदालत में इस पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। सुनवाई के दौरान संबंधित पक्षों ने अपना पक्ष रखने के लिए समय की मांग की है, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया है। सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि मामले के सभी पहलुओं की जांच की जा रही है और प्रत्येक पक्ष को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा। इस याचिका पर अगली सुनवाई की तारीख भी तय की गई है, जिसके बाद आगे की दिशा स्पष्ट होने की संभावना है। यह मामला लंबे समय से चर्चा में बना हुआ है और समय-समय पर इससे जुड़े नए घटनाक्रम सामने आते रहे हैं। सुकेश चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए पत्र पहले भी सुर्खियों में रहे हैं, जिनमें उसने बार-बार व्यक्तिगत भावनाओं और दावों को दोहराया है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले का निर्णय केवल अदालत में प्रस्तुत साक्ष्यों और जांच के आधार पर ही तय किया जाएगा। इस नए पत्र ने एक बार फिर पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है, जहां एक ओर अदालत में कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर ऐसे पत्रों के कारण मामला लगातार सार्वजनिक बहस का विषय बना हुआ है।

हिंदी सिनेमा की पहली प्लेबैक आवाज शमशाद बेगम: एक अनोखा और प्रेरणादायक सफर…

नई दिल्ली ।हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में जब पार्श्व गायन यानी प्लेबैक सिंगिंग अपने विकास के चरण में थी, उस समय एक ऐसी आवाज उभरी जिसने भारतीय फिल्म संगीत को नई पहचान और दिशा दी। यह आवाज थी शमशाद बेगम की, जिन्हें भारत की पहली प्रमुख प्लेबैक सिंगर के रूप में जाना जाता है। उनका जीवन संघर्ष, परंपरा और प्रतिभा का ऐसा संगम था, जिसने उन्हें भारतीय संगीत इतिहास में एक अमिट स्थान दिलाया। उनकी गायकी ने न केवल उस दौर के श्रोताओं को प्रभावित किया बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनी। 14 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में जन्मी शमशाद बेगम एक पारंपरिक परिवार से थीं, जहां सार्वजनिक रूप से गायन को लेकर सख्त नियम थे। उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह मंच पर या सार्वजनिक रूप से गाएं, लेकिन उनकी असाधारण प्रतिभा को देखते हुए परिवार के अन्य सदस्यों और परिचितों ने उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। अंततः एक विशेष शर्त के साथ उन्हें गायन की अनुमति मिली, जिसमें यह तय किया गया कि वह कभी अपनी तस्वीर सार्वजनिक नहीं कराएंगी। शमशाद बेगम ने इस शर्त को स्वीकार किया और यहीं से उनके संगीत सफर की शुरुआत हुई। बचपन से ही उनकी आवाज में एक अलग तरह की मिठास और आकर्षण था, जिसने उन्हें बहुत कम उम्र में ही पहचान दिला दी। स्कूल के दिनों में उन्हें हेड सिंगर बनाया गया और यहीं से उनके गायन कौशल को और निखरने का अवसर मिला। धीरे-धीरे वह पारिवारिक आयोजनों और छोटे कार्यक्रमों में गाने लगीं, जहां उनकी आवाज की चर्चा दूर-दूर तक फैलने लगी। उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उन्हें रेडियो पर गाने का अवसर मिला, जिसने उनके करियर को एक नई दिशा दी। उनकी किस्मत तब बदली जब एक प्रसिद्ध संगीतकार ने उनकी आवाज को पहचाना और उन्हें फिल्मी दुनिया में पहला बड़ा अवसर दिया। वर्ष 1941 में फिल्म ‘खजांची’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की और यहीं से उनका सफर इतिहास बन गया। उनकी आवाज ने तुरंत ही दर्शकों और श्रोताओं को प्रभावित किया और वह उस समय की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में शामिल हो गईं। उनकी गायकी में एक खास चंचलता, सादगी और ऊर्जा थी, जो हर उम्र के लोगों को आकर्षित करती थी। इसके बाद उन्होंने कई प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ काम किया और हिंदी फिल्म संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी आवाज को उस दौर के महान संगीतकारों ने बेहद खास माना और इसका उपयोग कई यादगार गीतों में किया गया। उनकी गायकी में एक ऐसा जादू था, जो हर गीत को जीवंत बना देता था। “कभी आर कभी पार”, “लेके पहला पहला प्यार” और “सैयां दिल में आना रे” जैसे गीत आज भी लोगों के बीच उतने ही लोकप्रिय हैं जितने उस समय थे। उस दौर में जब लता मंगेशकर, आशा भोसले और गीता दत्त जैसी महान गायिकाएं भी सक्रिय थीं, तब शमशाद बेगम ने अपनी अलग शैली और अनोखी आवाज के दम पर अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। उनकी गायकी किसी भी प्रतिस्पर्धा से परे थी और उन्होंने अपने अंदाज से संगीत जगत में एक अलग स्थान स्थापित किया। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मानों में से एक से सम्मानित किया गया, जो उनके लंबे और सफल करियर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि रही।

बुलंदशहर से शुरू हुआ सफर और करोड़ों दिलों पर किया राज; महज 30 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह गईं मशहूर अदाकारा।

नई दिल्ली ।क्षेत्रीय मनोरंजन जगत से एक बेहद दुखद और विचलित कर देने वाली खबर सामने आई है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और नृत्य कौशल से करोड़ों दर्शकों के दिलों में जगह बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री दिव्यांका सिरोही अब हमारे बीच नहीं रहीं। महज 30 वर्ष की अल्पायु में हृदय गति रुकने के कारण उनका आकस्मिक निधन हो गया है। इस खबर ने न केवल उनके परिवार को झकझोर कर रख दिया है, बल्कि उन तमाम प्रशंसकों को भी गहरे सदमे में डाल दिया है जो उन्हें भविष्य के एक बड़े सितारे के रूप में देख रहे थे। अभिनेत्री के निधन की जानकारी मिलते ही सोशल मीडिया पर शोक संवेदनाओं का सैलाब उमड़ पड़ा है। दिव्यांका की मृत्यु के बाद उनका एक पुराना संदेश तेजी से चर्चा में आ गया है, जिसे पढ़कर हर किसी का दिल भर आ रहा है। कुछ समय पहले साझा किए गए इस संदेश में दिव्यांका ने ईश्वर के प्रति अपनी अटूट आस्था प्रकट की थी। मरून रंग की पगड़ी पहने हुए अपनी एक तस्वीर के साथ उन्होंने लिखा था कि महादेव उन्हें अपने साथ ले चलें। उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि उनकी यह आध्यात्मिक पुकार इतनी जल्दी और इस रूप में सच हो जाएगी। आज उनके चाहने वाले उसी संदेश को याद करते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। प्रशंसकों का कहना है कि एक प्रतिभावान कलाकार का इस तरह जाना पूरी इंडस्ट्री के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में जन्मी दिव्यांका का जीवन सपनों को हकीकत में बदलने की एक कहानी रहा है। उन्होंने अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा में एमबीए की डिग्री भी हासिल की थी। शिक्षित और जागरूक होने के बावजूद उनका रुझान हमेशा से अभिनय की ओर रहा। बचपन से ही कला के प्रति समर्पित दिव्यांका ने अपने करियर की शुरुआत डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के जरिए की थी, जहाँ उनकी प्रतिभा को दर्शकों का भरपूर समर्थन मिला। इसी लोकप्रियता ने उनके लिए संगीत और अभिनय की दुनिया के दरवाजे खोल दिए, जिसके बाद उन्होंने दर्जनों प्रसिद्ध प्रोजेक्ट्स में अपनी छाप छोड़ी। दिव्यांका ने अपने करियर के दौरान 50 से अधिक संगीत वीडियो में काम किया और कई स्थापित कलाकारों के साथ अपनी कला का प्रदर्शन किया। उनकी कड़ी मेहनत का ही परिणाम था कि डिजिटल जगत में उनके चाहने वालों की संख्या करोड़ों में पहुँच गई थी। जानकारी के अनुसार, अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें तुरंत चिकित्सा सहायता के लिए ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इतनी कम उम्र में इस तरह के हादसे ने स्वास्थ्य के प्रति भी लोगों को चिंता में डाल दिया है। एक सक्रिय और ऊर्जावान कलाकार का इस तरह चले जाना सभी को खटक रहा है। दिव्यांका सिरोही की अंतिम विदाई की प्रक्रिया उनके निवास स्थान के पास संपन्न होगी, जहाँ कला जगत के कई लोग और उनके प्रशंसक उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने पहुँचेंगे। एक हंसमुख और सकारात्मक व्यक्तित्व के रूप में पहचानी जाने वाली दिव्यांका की कमी हमेशा महसूस की जाएगी। उन्होंने हमेशा अपनी कला के माध्यम से लोगों का मनोरंजन करने का लक्ष्य रखा था। आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी अदाकारी और उनकी यादें उनके करोड़ों चाहने वालों के दिलों में हमेशा जीवित रहेंगी। क्षेत्रीय सिनेमा ने निश्चित रूप से एक बहुत ही होनहार और समर्पित कलाकार को खो दिया है।

रचनात्मक मतभेदों और भारी नुकसान के बीच कैसे बिखर गए बॉलीवुड के कई बड़े सपने?

नई दिल्ली । किसी भी फिल्म की सफलता उसके पर्दे के पीछे की टीम और कलाकारों के बीच के मजबूत तालमेल पर निर्भर करती है। निर्देशक का दृष्टिकोण और अभिनेता का समर्पण जब एक दिशा में काम करते हैं, तभी एक कालजयी रचना का जन्म होता है। हालांकि, फिल्म जगत का इतिहास ऐसे कई उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ सेट पर दो दिग्गजों के बीच विचारों का टकराव इस कदर बढ़ा कि उसका खामियाजा पूरी फिल्म को भुगतना पड़ा। रचनात्मक मतभेद हों या व्यक्तिगत प्रतिष्ठा की लड़ाई, इन विवादों के कारण न केवल फिल्म निर्माण की लागत कई गुना बढ़ गई, बल्कि कई बार तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी फिल्में कभी दर्शकों तक पहुँच ही नहीं पाईं। इस कड़ी में एक सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब एक मशहूर फिल्म स्टार और एक दिग्गज निर्देशक के बीच एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को लेकर अनबन हो गई। वर्षों बाद साथ आने का यह मौका प्रशंसकों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था, लेकिन स्क्रिप्ट और रचनात्मक स्वतंत्रता को लेकर दोनों के बीच असहमति इतनी गहरी हो गई कि अंततः फिल्म को बंद करने का फैसला लेना पड़ा। इस फैसले ने न केवल आर्थिक रूप से फिल्म निर्माण टीम को बड़ा झटका दिया, बल्कि उस समय की सबसे बड़ी फिल्म होने का दावा करने वाला यह प्रोजेक्ट इतिहास के पन्नों में दबकर रह गया। इसी प्रकार, एक ऐतिहासिक फिल्म के निर्माण के दौरान भी निर्देशक और मुख्य अभिनेत्री के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर भारी विवाद हुआ। आरोप लगे कि कलाकार द्वारा फिल्म के संपादन और निर्देशन में जरूरत से ज्यादा दखल दिया जा रहा है, जिसके कारण निर्देशक को बीच रास्ते में ही फिल्म का साथ छोड़ना पड़ा। फिल्मों के निर्माण में केवल वैचारिक मतभेद ही नहीं, बल्कि व्यावसायिक मांगे भी बड़ी रुकावट बनती रही हैं। एक चर्चित मामले में, एक अग्रणी अभिनेत्री और एक प्रभावशाली निर्देशक के बीच पारिश्रमिक और काम करने की शर्तों को लेकर विवाद इतना बढ़ गया कि अभिनेत्री ने ऐन वक्त पर फिल्म से दूरी बना ली। किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के बीच में मुख्य कलाकार का हटना पूरी फिल्म की समय सीमा और बजट को बिगाड़ देता है। नए कलाकार की तलाश और फिर से शूटिंग करने की प्रक्रिया में निर्माताओं को भारी चपत लगती है। इसी तरह का एक और वाकया तब देखने को मिला जब एक उभरते हुए अभिनेता और एक बड़े प्रोडक्शन हाउस के बीच किसी मतभेद के चलते अभिनेता को फिल्म से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालांकि बाद में उनके बीच समझौते की बात भी सामने आई, लेकिन उस दौरान हुई देरी और विवाद ने फिल्म की प्रतिष्ठा को काफी नुकसान पहुँचाया। सिनेमाई दुनिया में कई बार एक फिल्म की सफलता का श्रेय लेने की होड़ भी आपसी रिश्तों में दरार डाल देती है। एक संवेदनशील फिल्म के निर्माण के दौरान निर्देशक और लेखक के बीच छिड़ी जंग ने काफी सुर्खियां बटोरी थीं। यहाँ फिल्म के विजन को लेकर हुई तकरार इतनी बढ़ी कि दोनों ने भविष्य में फिर कभी साथ काम न करने की कसम खा ली। इसी तरह, एक अन्य मामले में एक अभिनेता ने फिल्म की कहानी से नाखुश होकर प्रोजेक्ट बीच में ही छोड़ दिया, जिसके बाद निर्देशक और अभिनेता के बीच के रिश्ते इस कदर बिगड़े कि निर्देशक ने सार्वजनिक रूप से कभी साथ काम न करने का फैसला ले लिया। ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि जब पेशेवर दुनिया में अहंकार और मतभेद हावी होते हैं, तो कला की बलि चढ़ना तय हो जाता है।

डेविड धवन ने पहली बार तोड़ी चुप्पी, बताया आखिर क्यों सुपरस्टार शाहरुख खान के साथ कभी नहीं बन पाई कोई फिल्म।

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में जब भी व्यावसायिक और मनोरंजक फिल्मों का जिक्र होता है, तो निर्देशक डेविड धवन का नाम सबसे ऊपर आता है। उन्होंने अपने करियर में गोविंदा, सलमान खान, संजय दत्त और अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज कलाकारों के साथ काम करके सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। डेविड धवन की फिल्मों की अपनी एक अलग पहचान रही है, जिसमें हंसी, मस्ती और पारिवारिक मनोरंजन का अनूठा संगम होता है। हालांकि, फिल्म जगत के जानकारों और प्रशंसकों के मन में हमेशा यह एक बड़ा सवाल बना रहा कि आखिर क्यों डेविड धवन ने ‘रोमांस के बादशाह’ शाहरुख खान के साथ कभी कोई फिल्म निर्देशित नहीं की। यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि जिस दौर में डेविड धवन एक के बाद एक सुपरहिट फिल्में दे रहे थे, उसी दौर में शाहरुख खान भी बॉलीवुड के सबसे बड़े सुपरस्टार बनकर उभरे थे। हाल ही में अपनी आने वाली फिल्म के प्रचार के दौरान डेविड धवन ने इस रहस्य से पर्दा हटाया और बताया कि उनके और शाहरुख के बीच कभी किसी अनबन या मतभेद की वजह से दूरी नहीं रही। असल में एक समय ऐसा भी था जब दोनों कलाकार और निर्देशक साथ में किसी प्रोजेक्ट पर काम करने की गंभीरता से योजना बना रहे थे। डेविड धवन के अनुसार, वह शाहरुख खान की प्रतिभा के कायल रहे हैं और उनके मन में हमेशा से उनके साथ काम करने की इच्छा थी। दोनों के बीच बातचीत भी हुई और एक कहानी को लेकर शुरुआती चर्चाएं भी की गईं, लेकिन सिनेमाई दुनिया के कुछ व्यावहारिक कारणों ने इस जोड़ी को पर्दे पर आने से रोक दिया। इस दूरी का सबसे बड़ा कारण डेविड धवन का उस समय का अत्यधिक व्यस्त वर्क शेड्यूल था। निर्देशक ने साझा किया कि 90 के दशक और उसके बाद के वर्षों में उनके पास काम का इतना दबाव रहता था कि अक्सर उनकी दो से तीन फिल्में एक साथ फ्लोर पर रहती थीं। एक फिल्म की शूटिंग खत्म होने से पहले ही दूसरी फिल्म के प्री-प्रोडक्शन का काम शुरू हो जाता था। दूसरी ओर, शाहरुख खान भी अपने करियर के शिखर पर थे और उनकी डेट्स मिलना बेहद चुनौतीपूर्ण था। डेविड धवन का कहना है कि जब वे दोनों एक प्रोजेक्ट के लिए साथ बैठने की कोशिश करते थे, तो समय का तालमेल नहीं बैठ पाता था। निर्देशक का मानना है कि किसी बड़े स्टार के साथ काम करने के लिए पूरी एकाग्रता और समय की आवश्यकता होती है, जो उस समय उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। डेविड धवन ने यह भी स्पष्ट किया कि फिल्म उद्योग में कलाकारों के साथ उनकी एक खास ‘ट्यूनिंग’ रही है। जैसे गोविंदा के साथ उनकी जोड़ी ने लगातार कई ब्लॉकबस्टर फिल्में दीं, वैसे ही सलमान खान और संजय दत्त के साथ भी उनका एक सहज रिश्ता बन गया था। उन्होंने अपनी शैली की फिल्मों के लिए एक विशेष कलाकार वर्ग चुन लिया था, जिसके साथ वे काम करने में बहुत सहज महसूस करते थे। हालांकि, वे शाहरुख खान के साथ भी वैसा ही जादुई अनुभव साझा करना चाहते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। समय बीतता गया और वे अपने स्थापित कलाकारों के साथ प्रोजेक्ट्स में व्यस्त होते गए, जिसके कारण शाहरुख के साथ काम करने का विचार धीरे-धीरे पीछे छूट गया। वर्तमान परिदृश्य की बात करें तो डेविड धवन आज भी फिल्म निर्माण की दुनिया में सक्रिय हैं और अब वे अपने बेटे वरुण धवन के साथ नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए कॉमेडी फिल्में बना रहे हैं। उनकी आने वाली फिल्म ‘है जवानी तो इश्क होना है’ को लेकर दर्शकों में जबरदस्त उत्साह है। यह फिल्म न केवल डेविड के निर्देशन की वापसी को दर्शाती है, बल्कि वरुण धवन के करियर के लिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भले ही डेविड धवन और शाहरुख खान का साथ काम करने का सपना अधूरा रह गया हो, लेकिन डेविड के मन में आज भी शाहरुख के प्रति गहरा सम्मान है। वे मानते हैं कि शाहरुख एक बेहद मेहनती और समर्पित अभिनेता हैं और अगर भविष्य में कभी सही स्क्रिप्ट और सही समय का मेल हुआ, तो दर्शक शायद उस अधूरा सपने को पूरा होते देख सकें। डेविड धवन और शाहरुख खान का साथ न आना फिल्म इंडस्ट्री के उन ‘मिसिंग लिंक्स’ में से एक है जिसे लेकर प्रशंसक आज भी चर्चा करते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि मनोरंजन की चकाचौंध भरी दुनिया में कभी-कभी प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि समय और परिस्थितियों का सही तालमेल न बैठना बड़े कोलैबोरेशंस को रोक देता है। डेविड धवन की सुपरहिट फिल्मों की सूची में भले ही शाहरुख खान का नाम शामिल न हो, लेकिन दोनों ने अपने-अपने तरीके से भारतीय सिनेमा को समृद्ध किया है। आज भी जब डेविड अपनी पुरानी यादें साझा करते हैं, तो उनके शब्दों में एक कलाकार के प्रति दूसरे कलाकार का सम्मान साफ झलकता है, जो यह साबित करता है कि सिनेमाई पर्दे से परे भी रिश्तों और व्यावसायिक व्यस्तताओं की अपनी एक अलग जटिलता होती है।

बॉलीवुड किस्सा: माधुरी दीक्षित के लिए मुश्किल रही ये फिल्म, शूटिंग के दौरान जोशीली हो गई थीं एक्ट्रेस

नई दिल्ली। बॉलीवुड में सितारों की चमक-दमक और शानदार कॉस्ट्यूम्स अक्सर फिल्मों की पहचान बन जाते हैं, लेकिन एक फिल्म ऐसी भी रही, जहां लीड एक्ट्रेस को पूरी कहानी सिर्फ दो जोड़ी कपड़ों में निभानी पड़ी। यह किस्सा जुड़ा है सुपरहिट फिल्म Khalnayak और इसके निर्देशक Subhash Ghai से, जिन्होंने अपनी परफेक्शन के लिए Madhuri Dixit को एक कठिन स्थिति में डाल दिया था। जब डायरेक्टर की सोच बन गई चुनौतीफिल्म ‘खलनायक’ की कहानी में माधुरी दीक्षित का किरदार एक किडनैप्ड लड़की का था। इस किरदार को वास्तविक बनाने के लिए सुभाष घई ने एक सख्त फैसला लिया पूरी फिल्म में माधुरी सिर्फ दो ही आउटफिट्स पहनेंगी। उनका तर्क साफ था कि एक अपहृत लड़की के पास कपड़े बदलने का विकल्प नहीं होता, इसलिए किरदार की सच्चाई बनाए रखने के लिए यह जरूरी है। यह फैसला भले ही कहानी के लिहाज से मजबूत था, लेकिन माधुरी के लिए काफी मुश्किल भरा साबित हुआ। बार-बार बदली ड्रेस की इच्छा, लेकिन नहीं मिली इजाजतशूटिंग के दौरान माधुरी कई बार नई ड्रेस पहनने की इच्छा जाहिर करती थीं, लेकिन सुभाष घई अपने फैसले पर अड़े रहे। उन्होंने साफ कहा कि फिल्म की डिमांड यही है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। हालांकि उन्होंने एक वादा जरूर किया कि गानों में उन्हें शानदार और आकर्षक लुक दिया जाएगा। इस सख्ती के कारण कई बार माधुरी भावुक भी हो गईं, लेकिन उन्होंने अपने प्रोफेशनलिज्म के चलते काम जारी रखा। संजय दत्त का दमदार किरदार और फिल्म की सफलताफिल्म में Sanjay Dutt ने खलनायक का किरदार निभाया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। सुभाष घई ने उनके लुक और डायलॉग डिलीवरी पर खास मेहनत की थी, जो फिल्म की सफलता का बड़ा कारण बना। यह फिल्म अपने समय की सबसे चर्चित फिल्मों में से एक रही और बॉक्स ऑफिस पर भी जबरदस्त हिट साबित हुई। ‘चोली के पीछे’ गाने ने मचाया था बवालफिल्म का मशहूर गाना Choli Ke Peeche Kya Hai रिलीज के साथ ही विवादों में आ गया था। इसके बोलों को लेकर काफी विरोध हुआ और शुरुआती दौर में इसे बैन भी कर दिया गया था। हालांकि बाद में इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ी कि इसे वापस शामिल करना पड़ा। इस गाने के लिए Alka Yagnik और Ila Arun को फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला। शूटिंग के दौरान मुश्किलें और अनोखे किस्सेफिल्म की शूटिंग के दौरान कई उतार-चढ़ाव भी आए। Sanjay Dutt को उस समय जेल जाना पड़ा था, जिसके बाद उन्होंने बाहर आकर फिल्म की डबिंग पूरी की। इसके अलावा, उसी समय एक और फिल्म ‘खलनायिका’ को लेकर भी विवाद सामने आया, जिससे इस प्रोजेक्ट की चर्चा और बढ़ गई। आज भी यादगार है यह किस्सा‘खलनायक’ सिर्फ अपनी कहानी और गानों के लिए ही नहीं, बल्कि ऐसे दिलचस्प किस्सों के लिए भी याद की जाती है। माधुरी दीक्षित का यह अनुभव बताता है कि एक कलाकार अपने किरदार को जीवंत बनाने के लिए किस हद तक समर्पण दिखाता है।

JioHotstar की ये क्राइम सीरीज देख उड़ जाएंगे होश, पहले एपिसोड से ही शुरू होता है सस्पेंस

नई दिल्ली । क्राइम थ्रिलर के शौकीनों के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म The Raikar Case एक ऐसी सीरीज है, जो शुरुआत से लेकर अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। अगर आप सस्पेंस, मिस्ट्री और फैमिली ड्रामा का बेहतरीन मिश्रण देखना चाहते हैं, तो यह सीरीज आपके लिए परफेक्ट चॉइस हो सकती है। 7 एपिसोड्स में सिमटी इस कहानी का हर हिस्सा एक नया ट्विस्ट लेकर आता है और क्लाइमेक्स ऐसा है, जो देखने वालों को हैरान कर देता है। सुसाइड या मर्डर? यहीं से शुरू होता है खेलसीरीज की कहानी गोवा के एक प्रतिष्ठित रायकर परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां एक 16 साल के लड़के की रहस्यमयी मौत हो जाती है। शुरुआत में यह मामला आत्महत्या जैसा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे पुलिस जांच आगे बढ़ती है, यह साफ हो जाता है कि मामला कुछ और ही है। यहीं से कहानी में सस्पेंस का असली खेल शुरू होता है। परिवार के लोग, जो बाहर से एकजुट दिखते हैं, धीरे-धीरे अपने-अपने राज खोलने लगते हैं। हर एपिसोड में नया खुलासा, हर चेहरा संदिग्धसीरीज का सबसे मजबूत पहलू यह है कि हर एपिसोड में एक नया सस्पेक्ट सामने आता है। दूसरे एपिसोड में परिवार के ही एक अहम सदस्य पर शक गहराता है, जबकि तीसरे एपिसोड में एक ऐसा सबूत मिलता है जो पूरी कहानी को पलट देता है। चौथे और पांचवें एपिसोड तक आते-आते यह साफ हो जाता है कि इस परिवार में हर कोई कुछ न कुछ छिपा रहा है। बेटी इताशा का किरदार खास तौर पर कहानी को आगे बढ़ाता है, जो सच तक पहुंचने के लिए हर जोखिम उठाती है। सच सामने आने पर उड़ जाएंगे होशछठे एपिसोड में आखिरकार किलर का चेहरा सामने आता है और यही वह मोड़ है, जहां दर्शक सबसे ज्यादा चौंकते हैं। जिस शख्स पर किसी को शक नहीं होता, वही असली गुनहगार निकलता है। सातवें एपिसोड में कहानी और भी उलझती है और इताशा खुद एक बड़े संकट में फंस जाती है। अंत ऐसा रखा गया है कि दर्शक अगले सीजन का इंतजार करने को मजबूर हो जाते हैं। दमदार कास्ट ने बढ़ाई कहानी की ताकतइस सीरीज की सफलता में इसकी कास्ट का भी बड़ा योगदान है। Atul Kulkarni, Ashwini Bhave, Parul Gulati, Rina Wadhwa, Lalit Prabhakar, Rushad Rana और Kunal Karan Kapoor जैसे कलाकारों ने अपने अभिनय से हर किरदार को जीवंत बना दिया है। सभी कलाकारों की परफॉर्मेंस कहानी को और प्रभावी बनाती है। क्यों देखें ये सीरीज?अगर आप ऐसी कहानी देखना चाहते हैं, जिसमें हर मोड़ पर सस्पेंस हो, हर किरदार में रहस्य छिपा हो और अंत तक सच्चाई का अंदाजा न लगे, तो ‘द रायकर केस’ जरूर देखनी चाहिए। यह सिर्फ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं, बल्कि रिश्तों, भरोसे और छिपे हुए सच की कहानी है।