मायानगरी में जुटेगा विश्व सिनेमा का हुजूम, डॉक्युमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों के महाकुंभ के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू

नई दिल्ली । दक्षिण एशिया में गैर-फीचर फिल्मों के सबसे पुराने और सम्मानित मंच के रूप में अपनी पहचान बना चुका मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल एक बार फिर अपने 19वें संस्करण के साथ वापसी कर रहा है। जून महीने की 15 तारीख से शुरू होने वाले इस सात दिवसीय महोत्सव के लिए प्रतिनिधियों के पंजीकरण की औपचारिक शुरुआत कर दी गई है। मुंबई के पेडर रोड स्थित ऐतिहासिक एनएफडीसी कॉम्प्लेक्स में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम दुनिया भर के फिल्मकारों, निर्देशकों और सिनेमा प्रेमियों को एक साझा मंच प्रदान करता है। यह फेस्टिवल केवल फिल्मों के प्रदर्शन का जरिया नहीं है, बल्कि यह उन कहानियों को आवाज देने का माध्यम है जो अक्सर व्यावसायिक सिनेमा की चकाचौंध में पीछे छूट जाती हैं। महोत्सव में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए प्रतिनिधियों को आधिकारिक पोर्टल के माध्यम से अपना पंजीकरण पूरा करना होगा। प्रक्रिया को पारदर्शी और सुलभ बनाने के लिए इसे ऑनलाइन रखा गया है, जहां नए आवेदकों को अपना विवरण साझा कर प्रोफाइल तैयार करनी होगी। सामान्य प्रतिभागियों के लिए पंजीकरण शुल्क 500 रुपये तय किया गया है, लेकिन सिनेमा की बारीकियों को समझने के लिए उत्सुक छात्रों को बड़ी राहत देते हुए उनके लिए पंजीकरण पूरी तरह निशुल्क रखा गया है। आयोजकों का उद्देश्य अधिक से अधिक युवाओं को वैश्विक सिनेमाई दृष्टिकोण और आधुनिक फिल्म निर्माण की तकनीकियों से जोड़ना है। पुरस्कारों की दृष्टि से इस वर्ष का महोत्सव अत्यंत भव्य होने वाला है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय श्रेणियों में प्रतिस्पर्धा करने वाली फिल्मों के लिए कुल 55 लाख रुपये की पुरस्कार राशि निर्धारित की गई है। महोत्सव के दौरान प्रदान किए जाने वाले गोल्डन और सिल्वर कोंच अवॉर्ड्स फिल्म जगत में काफी प्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके साथ ही भारतीय सिनेमा के महान फिल्मकार के नाम पर दिया जाने वाला वी. शांताराम लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड इस साल भी चर्चा का केंद्र रहेगा। इसके अलावा नवाचार और तकनीकी कौशल को प्रोत्साहित करने के लिए प्रमोद पति अवॉर्ड, तकनीकी उत्कृष्टता पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक जैसे सम्मान भी प्रदान किए जाएंगे। फिल्मों के प्रदर्शन के साथ-साथ यह महोत्सव बौद्धिक चर्चाओं और कौशल विकास का भी केंद्र बनेगा। सात दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में रेड कार्पेट इवेंट्स, दिग्गज फिल्मकारों की मास्टरक्लास और पैनल डिस्कशन जैसी गतिविधियां शामिल होंगी। इस वर्ष का एक मुख्य आकर्षण ‘वेव्स डॉक बाजार’ होगा, जिसमें पहली बार इमर्सिव मार्केट को पेश किया जा रहा है, जो फिल्म निर्माताओं को अपनी कृतियों के विपणन और नए निवेशकों से जुड़ने के आधुनिक अवसर प्रदान करेगा। यह आयोजन न केवल कला की सराहना करने का स्थान है, बल्कि यह भारतीय और वैश्विक फिल्म उद्योग के भविष्य की नई इबारत लिखने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरेगा।
दोस्ती के खातिर संसद पहुंचे थे बिग बी, लेकिन सियासी साजिशों और आरोपों ने तीन साल में ही करा दी ग्लैमर की दुनिया में वापसी।

नई दिल्ली । भारतीय सिनेमा के इतिहास में अमिताभ बच्चन का नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है, लेकिन उनके जीवन का एक अध्याय ऐसा भी है जिसे वह अक्सर एक कड़वी याद की तरह देखते हैं। साल 1984 में जब देश एक बड़े राजनीतिक बदलाव से गुजर रहा था, तब अपनी गहरी दोस्ती और भावनात्मक जुड़ाव के कारण अमिताभ बच्चन ने फिल्मी पर्दे की चकाचौंध छोड़ राजनीति की ऊबड़-खाबड़ गलियों में कदम रखा था। उन्होंने अपने जन्मस्थान इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया और एक अनुभवी राजनेता को रिकॉर्ड मतों से शिकस्त देकर संसद में अपनी जगह बनाई। उस वक्त ऐसा लगा था कि जनता का यह अपार प्रेम उन्हें राजनीति के शिखर पर ले जाएगा, लेकिन जल्द ही उन्हें यह महसूस होने लगा कि फिल्म के सेट और संसद के गलियारों के बीच एक गहरी खाई है जिसे पार करना उनके बस की बात नहीं थी। राजनीति के उस छोटे से सफर में अमिताभ बच्चन ने जमीनी हकीकत को बहुत करीब से देखा। उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण भारत के लोग कितने सीधे और सरल हैं, जो अपने नेता को देवता की तरह पूजते हैं। हालांकि, व्यवस्था के भीतर की पेचीदगियों और हर तरफ से आने वाले सवालों ने उन्हें बेचैन करना शुरू कर दिया था। उनके लिए यह समझना मुश्किल हो रहा था कि किस तरफ बात करनी है और विरोधियों के तीखे हमलों का जवाब कैसे देना है। उन्होंने बाद के वर्षों में स्वीकार किया कि वह राजनीति के लिए बने ही नहीं थे और उनका वहां जाना पूरी तरह से एक भावुक निर्णय था। वह दो साल उनके जीवन के लिए बहुत कीमती रहे क्योंकि उन्होंने वहां से भारत की असली आत्मा को समझा, लेकिन इसके बदले उन्हें जो मानसिक शांति खोनी पड़ी, वह बहुत बड़ी कीमत थी। अमिताभ बच्चन के राजनीतिक करियर का दुखद अंत तब हुआ जब बोफोर्स घोटाले की आग ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। इस विवाद में उनका नाम भी घसीटा गया, जिसने महानायक की बेदाग छवि को जनता की नजरों में संदिग्ध बना दिया। उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था और विरोधियों के लगातार बढ़ते दबाव के बीच उन्होंने 1987 में अपने पद से इस्तीफा देना ही बेहतर समझा। यह मामला उनके जीवन पर एक काले साये की तरह करीब ढाई दशक तक मंडराता रहा। हालांकि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद साल 2012 में उन्हें पूरी तरह निर्दोष घोषित कर दिया गया, लेकिन यह न्याय मिलने में बहुत देर हो चुकी थी। उनके माता-पिता उनकी बेगुनाही देखे बिना ही दुनिया से चले गए, जिसका दुख आज भी उनके शब्दों में झलकता है। अपने उस दौर को याद करते हुए अमिताभ बच्चन ने इसे ‘नरक’ के समान बताया था। उन्होंने साझा किया कि किस तरह उन्हें और उनके परिवार को निशाना बनाया गया और कई बड़े नेताओं ने उन्हें अपनी जान के खतरे तक की चेतावनी दी थी। जिस इंसान ने कभी राजनीति में आने का सपना भी नहीं देखा था, उसे व्यवस्था के सबसे क्रूर रूप का सामना करना पड़ा। इस कड़वे अनुभव के बाद उन्होंने कसम खा ली कि वह फिर कभी सक्रिय राजनीति का हिस्सा नहीं बनेंगे। आज जब वह पीछे मुड़कर देखते हैं, तो वह उन दो सालों को एक ऐसी सीख मानते हैं जिसने उन्हें यह समझा दिया कि हर सफल अभिनेता एक सफल राजनेता नहीं हो सकता और हर मैदान हर किसी के लिए नहीं बना होता।
अक्षय खन्ना ने खाने पर टोकने वालों को लताड़ा, बोले-दुआओं से बनती है फिल्म..

नई दिल्ली । सिनेमा की दुनिया में अक्षय खन्ना को एक ऐसे मंझे हुए कलाकार के रूप में जाना जाता है जो अपनी निजी जिंदगी और सेट पर अपने व्यवहार को लेकर बेहद अनुशासित रहते हैं। अक्सर खामोश रहने वाले अक्षय के बारे में कहा जाता है कि वह अपने काम से काम रखते हैं और फालतू की चर्चाओं से दूर रहते हैं। लेकिन हाल ही में उनके एक पुराने साथी कलाकार ने उस घटना का विवरण दिया है, जिसने अक्षय के एक अलग ही पहलू को दुनिया के सामने रखा है। यह वाकया उस समय का है जब एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी और वहां एक ऐसा विवाद खड़ा हुआ जिसने शांत रहने वाले अक्षय को ‘ज्वालामुखी’ की तरह फटने पर मजबूर कर दिया। दरअसल, पूरा मामला एक सह-कलाकार के सम्मान और उसकी भूख से जुड़ा था, जिसे प्रोडक्शन टीम के कुछ लोगों ने बेहद तुच्छ समझा था। सेट पर मौजूद गवाहों के अनुसार, एक कैरेक्टर एक्टर जो उस फिल्म का हिस्सा थे, लंच के समय अक्षय के होटल में भोजन करने पहुंचे थे। वे किसी दूसरे होटल में ठहरे हुए थे, इसलिए तकनीकी नियमों का हवाला देकर वहां मौजूद प्रोड्यूसर के करीबियों या परिवार के सदस्यों ने उन पर आपत्ति जता दी। जैसे ही वह कलाकार भोजन का पहला निवाला लेने वाले थे, उन्हें टोक दिया गया और कहा गया कि वे वहां का खाना नहीं खा सकते। उस कलाकार को यह बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने चुपचाप अपनी प्लेट किनारे रख दी और वहां से हटकर अकेले बैठ गए। अक्षय खन्ना दूर से यह सब देख रहे थे और उनसे एक कलाकार का यह सार्वजनिक अपमान बर्दाश्त नहीं हुआ। जो अक्षय कभी किसी के विवाद में नहीं पड़ते, उस दिन उन्होंने अपनी गरिमा और शांति को किनारे रखकर मोर्चा संभाल लिया। अक्षय खन्ना का गुस्सा उस दिन सातवें आसमान पर था। उन्होंने न केवल उस कलाकार का पक्ष लिया बल्कि पूरी यूनिट और प्रोड्यूसर के सामने अपना विरोध दर्ज कराया। बताया जाता है कि अक्षय इस कदर आक्रोशित थे कि उन्होंने प्रोड्यूसर और संबंधित क्रू मेंबर्स को जमकर लताड़ा और शब्दों की मर्यादा भी टूट गई। उन्होंने बेहद कड़े लहजे में कहा कि कोई भी फिल्म इस बात से सफल नहीं होती कि आपने सेट पर कितनी प्लेटें बचाईं या कितना राशन कम खर्च किया। अक्षय ने दहाड़ते हुए कहा कि फिल्में लोगों की दुआओं और उनके आशीर्वाद से बनती हैं, किसी भूखे का अपमान करके नहीं। उन्होंने साफ कर दिया कि अगर एक कलाकार के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो काम की गुणवत्ता का कोई मोल नहीं रह जाएगा। इस घटना ने सेट पर मौजूद हर शख्स को हैरान कर दिया था क्योंकि किसी ने भी अक्षय का ऐसा ‘रौद्र रूप’ पहले कभी नहीं देखा था। अक्षय ने उस दिन यह साबित कर दिया कि वे भले ही कम बोलते हों, लेकिन जब बात किसी के स्वाभिमान और मानवता की आती है, तो वे पीछे हटने वालों में से नहीं हैं। उनके इस कड़े रुख के बाद सेट का माहौल पूरी तरह बदल गया और प्रोडक्शन को अपनी गलती का अहसास हुआ। यह किस्सा आज भी फिल्म जगत के गलियारों में चर्चा का विषय रहता है क्योंकि यह दिखाता है कि पर्दे पर विलेन की भूमिका निभाने वाला यह कलाकार असल जिंदगी में कमजोरों और अपने साथियों के लिए किसी नायक से कम नहीं है। अक्षय की इस बेबाकी ने यह संदेश दिया कि फिल्म निर्माण केवल कैमरे और लाइट्स का खेल नहीं है, बल्कि यह एक परिवार की तरह है जहां हर सदस्य का सम्मान सर्वोपरि है।
मुख्यमंत्री बनते ही विजय का भावुक और दमदार जननायक’ रूप, परिवार की आंखें नम..

नई दिल्ली । तमिलनाडु की राजनीति में एक नया अध्याय उस समय शुरू हुआ जब अभिनेता से नेता बने जोसेफ विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राजधानी में आयोजित इस भव्य समारोह ने न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि आम जनता के बीच भी गहरी चर्चा पैदा कर दी। यह अवसर उनके जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ माना जा रहा है, जहां एक फिल्मी करियर से निकलकर उन्होंने सीधे राज्य के शीर्ष नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। शपथ ग्रहण के बाद विजय का व्यक्तित्व पूरी तरह बदला हुआ और आत्मविश्वास से भरा नजर आया। मंच पर आते ही उन्होंने जनता को संबोधित किया और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से सामने रखा। उनका संदेश पूरी तरह जनसेवा और जिम्मेदारी पर केंद्रित था, जिसमें उन्होंने जनता के कल्याण को अपनी प्राथमिक प्राथमिकता बताया। इस दौरान उनके अंदाज में एक अलग ही गंभीरता और नेतृत्व क्षमता झलक रही थी, जिसे कई लोगों ने उनके ‘जननायक’ रूप से जोड़कर देखा। इस पूरे आयोजन का सबसे भावनात्मक पक्ष उनके परिवार की मौजूदगी रही। जैसे ही विजय ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उनके पिता और माता भावुक हो उठे। उनके चेहरे पर गर्व के साथ-साथ भावनाओं की गहराई भी साफ दिखाई दे रही थी। यह दृश्य केवल एक राजनीतिक क्षण नहीं बल्कि एक पारिवारिक उपलब्धि का प्रतीक बन गया, जिसने वहां मौजूद सभी लोगों को भावुक कर दिया। इसी समारोह में विजय के करीबी लोगों की मौजूदगी ने भी इस पल को और खास बना दिया। अभिनेत्री तृषा कृष्णन इस आयोजन में विशेष रूप से शामिल हुईं और पूरे कार्यक्रम के दौरान बेहद भावनात्मक नजर आईं। बताया जाता है कि इस ऐतिहासिक क्षण के दौरान उनकी आंखों में नमी थी और वे इस उपलब्धि को बेहद करीब से महसूस कर रही थीं। उनकी उपस्थिति ने भी इस पूरे माहौल को और अधिक व्यक्तिगत और भावनात्मक बना दिया। कार्यक्रम के दौरान कई अन्य प्रमुख हस्तियां भी मौजूद रहीं, जिससे यह आयोजन एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मिलन के रूप में सामने आया। मंच पर और उसके बाद विजय का कई लोगों के साथ संवाद भी देखने को मिला, जिसमें एक नई शुरुआत और सहयोग की झलक स्पष्ट दिखाई दी। शपथ ग्रहण के बाद विजय सीधे सचिवालय पहुंचे, जहां उन्होंने औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का कार्यभार संभाला। यह क्षण उनके राजनीतिक सफर में एक नई जिम्मेदारी की शुरुआत का प्रतीक बना। इस दौरान उनके समर्थकों में उत्साह और जोश का माहौल देखा गया, जो लगातार उनके नेतृत्व को लेकर आशान्वित नजर आ रहे थे। इस पूरे आयोजन ने यह स्पष्ट कर दिया कि विजय का राजनीतिक प्रवेश केवल एक व्यक्तिगत यात्रा नहीं है, बल्कि यह एक बड़े जन समर्थन और उम्मीदों से जुड़ा हुआ अध्याय है। भावनाओं, जिम्मेदारियों और नई उम्मीदों से भरा यह दिन तमिलनाडु की राजनीति में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
नामों में बसती भक्ति: फिल्मी सितारे अपने बच्चों को दे रहे हैं आध्यात्मिक और पौराणिक अर्थ वाले नाम

नई दिल्ली । मनोरंजन जगत में इन दिनों एक दिलचस्प बदलाव देखने को मिल रहा है, जहां सितारे अपने बच्चों के नाम केवल आधुनिक या ट्रेंडी शब्दों पर आधारित नहीं रख रहे, बल्कि उन्हें गहरे आध्यात्मिक और धार्मिक अर्थों से जोड़ रहे हैं। यह प्रवृत्ति इस बात का संकेत देती है कि ग्लैमर की दुनिया में भी भारतीय संस्कृति और आस्था की जड़ें और मजबूत होती जा रही हैं। हाल ही में सोनम कपूर ने अपने छोटे बेटे का नाम रुद्रलोक रखा, जो भगवान शिव के रुद्र स्वरूप से प्रेरित है। यह नाम शक्ति, ऊर्जा और निडरता का प्रतीक माना जाता है। उन्होंने इसे दिव्य आशीर्वाद के रूप में देखा है और अपने बच्चे के भविष्य के लिए शक्ति और प्रकाश का प्रतीक बताया है। उनके बड़े बेटे का नाम भी आध्यात्मिक अर्थों से जुड़ा हुआ है, जिससे यह साफ झलकता है कि परिवार नामकरण को केवल एक परंपरा नहीं बल्कि आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय मानता है। यह चलन केवल एक परिवार तक सीमित नहीं है। कई अन्य कलाकारों ने भी अपने बच्चों के नाम संस्कृत, पौराणिक और धार्मिक अर्थों से प्रेरित रखे हैं। कुछ ने ज्ञान को दर्शाने वाले नाम चुने हैं, तो कुछ ने प्रकृति और दिव्यता से जुड़े नाम अपनाए हैं। यह बदलाव दर्शाता है कि आधुनिक माता-पिता अब नामों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक पहचान और आध्यात्मिक सोच को भी व्यक्त करना चाहते हैं। कुछ कलाकारों ने अपनी बेटियों का नाम ऐसे रखा है, जो ज्ञान और बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, जबकि कुछ ने अपने बेटों के नाम पवन, शक्ति और दिव्यता से जुड़े अर्थों पर आधारित रखे हैं। यह नाम केवल पहचान नहीं बल्कि एक विचार और भावना को भी दर्शाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को उनकी जड़ों से जोड़ते हैं। एक प्रमुख जोड़े ने अपनी बेटी का नाम ऐसा रखा है, जो देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है, वहीं उनके बेटे का नाम जीवन ऊर्जा और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। इसी तरह कुछ अन्य कलाकारों ने भी अपने बच्चों के नाम ऐसे चुने हैं जो धार्मिक ग्रंथों, देवी-देवताओं और आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित हैं। दक्षिण भारतीय फिल्म उद्योग में भी यह प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, जहां कई सितारों ने अपने बच्चों के नाम भगवान शिव, कृष्ण और अन्य देवताओं के नामों से प्रेरित रखे हैं। यह न केवल आस्था को दर्शाता है बल्कि यह भी दिखाता है कि आधुनिक जीवनशैली के बावजूद परंपराएं अब भी मजबूत हैं। यह पूरा बदलाव इस बात का संकेत है कि नामकरण अब केवल एक सामाजिक प्रक्रिया नहीं रह गई है, बल्कि यह परिवार की सोच, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों का प्रतिबिंब बन गई है। माता-पिता अपने बच्चों के नामों के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी जड़ों, परंपराओं और आध्यात्मिक मूल्यों से जुड़े रहें। आज के समय में जहां आधुनिकता तेजी से बढ़ रही है, वहीं यह प्रवृत्ति यह साबित करती है कि संस्कृति और आस्था अभी भी लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। फिल्मी दुनिया के ये नाम केवल आकर्षक नहीं हैं, बल्कि उनमें गहरी भावनाएं, विश्वास और भारतीय परंपराओं की झलक भी छिपी होती है।
खतरों के खिलाड़ी 15’ में स्टंट और इमोशन का तड़का, गौरव खन्ना बोले- चुनौती के लिए तैयार हूं

नई दिल्ली । टेलीविजन की दुनिया में इस बार एक ऐसा संयोजन देखने को मिल रहा है, जहां पुराने अनुभव और नए खतरों का रोमांच एक साथ सामने आएगा। स्टंट आधारित लोकप्रिय रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ के 15वें सीजन में इस बार कई जाने-पहचाने चेहरे एक बार फिर अलग अंदाज में दर्शकों के सामने होंगे। यह सीजन केवल खतरनाक चुनौतियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें पुराने रिश्तों, अनुभवों और प्रतिस्पर्धा का एक नया मिश्रण भी देखने को मिलेगा। इस बार शो में अभिनेता Gaurav Khanna की भागीदारी खास चर्चा में है। वे पहले भी एक बड़े रियलिटी शो का हिस्सा रह चुके हैं और विजेता भी बन चुके हैं। अब वे एक बिल्कुल अलग फॉर्मेट में स्टंट्स और जोखिम भरी चुनौतियों का सामना करने जा रहे हैं। उनका कहना है कि इस तरह के शो उन्हें खुद को नए तरीके से परखने का मौका देते हैं और हर अनुभव कुछ नया सिखाता है। इस सीजन की सबसे दिलचस्प बात यह है कि गौरव खन्ना के साथ कुछ ऐसे प्रतिभागी भी नजर आएंगे जिनके साथ उनका पहले का जुड़ाव रहा है। ये वे चेहरे हैं जिनसे उनकी मुलाकात पहले एक अलग रियलिटी शो के दौरान हुई थी। अब वही लोग एक बार फिर उनके साथ एक ही मंच पर होंगे, लेकिन इस बार माहौल पूरी तरह अलग होगा। दोस्ती, प्रतिस्पर्धा और चुनौती तीनों का मिश्रण इस शो को और रोमांचक बना रहा है। शो के दौरान प्रतिभागियों को कई तरह के खतरनाक और चुनौतीपूर्ण स्टंट्स से गुजरना होगा, जहां शारीरिक ताकत के साथ-साथ मानसिक मजबूती की भी परीक्षा होगी। हर टास्क में डर, दबाव और समय की सीमाएं उन्हें लगातार चुनौती देंगी। यही वजह है कि यह शो केवल मनोरंजन नहीं बल्कि साहस और आत्मविश्वास की भी परीक्षा माना जाता है। गौरव खन्ना ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि रियलिटी शो उनके लिए केवल प्रतियोगिता नहीं हैं, बल्कि यह खुद को समझने और नए लोगों को जानने का एक माध्यम भी हैं। उनके अनुसार हर व्यक्ति अलग परिस्थिति में अलग तरह से प्रतिक्रिया देता है, इसलिए किसी को एक ही नजरिए से आंकना सही नहीं होता। इस शो में भी वे अपने पुराने साथियों को एक नए रूप में देखने और उनके साथ नए अनुभव साझा करने को लेकर उत्साहित हैं। इस सीजन में एक खास आकर्षण यह भी रहेगा कि दर्शक उन चेहरों को एक साथ देखेंगे, जिन्हें पहले एक अलग माहौल में देखा जा चुका है। अब वही लोग एक कठिन और जोखिम भरे माहौल में एक-दूसरे के सामने होंगे। इससे शो में भावनात्मक जुड़ाव और प्रतिस्पर्धा दोनों का स्तर और बढ़ जाएगा। आने वाला यह सीजन दर्शकों के लिए मनोरंजन, रोमांच और भावनाओं का एक अनोखा मिश्रण लेकर आ रहा है। पुराने रिश्तों की यादें और नए खतरों की चुनौती इस शो को पहले से ज्यादा दिलचस्प और चर्चित बनाने वाली हैं।
मदर्स डे पर भावनाओं का सैलाब: अन्ना कोनिडेला ने मातृत्व के हर रूप को दी दिल छू लेने वाली सलामी

नई दिल्ली । मदर्स डे के अवसर पर इस बार भावनाओं का एक अलग ही रंग देखने को मिला, जहां मातृत्व को केवल एक परंपरा या उत्सव के रूप में नहीं बल्कि एक गहरे अनुभव के रूप में सामने रखा गया। इसी भावनात्मक माहौल में अभिनेता पवन कल्याण की पत्नी अन्ना कोनिडेला का संदेश लोगों के बीच खास चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने अपने शब्दों के जरिए मातृत्व की उन अनकही कहानियों को सामने रखा, जिन्हें अक्सर समाज नजरअंदाज कर देता है। अपने संदेश में अन्ना कोनिडेला ने मातृत्व को किसी एक परिभाषा में बांधने से इनकार करते हुए इसे एक व्यापक और विविध अनुभव बताया। उन्होंने उन महिलाओं का जिक्र किया जिन्होंने बहुत कम उम्र में मां बनने की जिम्मेदारी संभाली, और उन लोगों को भी याद किया जिन्होंने लंबे इंतजार और कठिन परिस्थितियों के बाद मातृत्व का सुख पाया। उनके अनुसार हर मां की यात्रा अलग होती है, लेकिन हर यात्रा में संघर्ष, प्रेम और त्याग समान रूप से मौजूद होते हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि मां बनने का अनुभव केवल जैविक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। कई महिलाएं चिकित्सा प्रक्रियाओं, भावनात्मक संघर्षों और अनिश्चितताओं के बीच इस सफर को तय करती हैं। वहीं कुछ महिलाएं गोद लेकर भी मातृत्व का अनुभव प्राप्त करती हैं और समाज में प्रेम और जिम्मेदारी का नया उदाहरण पेश करती हैं। अन्ना के संदेश में यह स्पष्ट झलकता है कि मातृत्व का वास्तविक अर्थ केवल जन्म देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गहरी भावनात्मक यात्रा है। अपने संदेश में उन्होंने उन महिलाओं की पीड़ा को भी जगह दी, जिन्होंने अपने बच्चों को खो दिया या गर्भपात जैसी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। ऐसे अनुभवों के बावजूद जीवन को संभालकर आगे बढ़ने वाली महिलाओं की ताकत को उन्होंने अत्यंत सम्मान के साथ प्रस्तुत किया। उनके शब्द यह बताते हैं कि दर्द और टूटन के बावजूद महिलाएं अपने भीतर एक नई ऊर्जा पैदा कर लेती हैं। इसके साथ ही उन्होंने उन माताओं का भी उल्लेख किया जो अकेले अपने बच्चों की परवरिश कर रही हैं। बिना किसी सहारे के जीवन की चुनौतियों का सामना करते हुए वे जिस तरह से अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने की कोशिश करती हैं, वह समाज के लिए एक प्रेरणा है। अन्ना का यह संदेश उन सभी महिलाओं की भूमिका को उजागर करता है, जिन्हें अक्सर उनके रोजमर्रा के संघर्षों के बावजूद पहचान नहीं मिल पाती। उनके पूरे संदेश में एक बात बार-बार सामने आती है कि मातृत्व कोई परफेक्ट स्थिति नहीं होती। यह भावनाओं, संघर्षों, थकान और असीम प्रेम का मिश्रण है, जिसमें हर दिन नई चुनौतियां और नए अनुभव शामिल होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज का दिन परफेक्ट होने के लिए नहीं है, बल्कि उन सभी महिलाओं को सम्मान देने के लिए है जो हर परिस्थिति में अपने परिवार और बच्चों के लिए मजबूत खड़ी रहती हैं। यह संदेश लोगों के बीच इसलिए भी गहराई से जुड़ा क्योंकि इसमें किसी आदर्श छवि के बजाय वास्तविक जीवन की सच्चाई दिखाई गई है। मातृत्व को एक सामान्य और मानवीय अनुभव के रूप में प्रस्तुत करते हुए अन्ना कोनिडेला ने हर महिला की कहानी को एक सम्मानजनक स्थान दिया है। उनका यह संदेश मदर्स डे को केवल एक उत्सव नहीं बल्कि एक भावनात्मक स्वीकार्यता में बदल देता है।
मां के नाम फिल्मी दुनिया के सितारों का दिल छू लेने वाला संदेश, पुरानी यादों और तस्वीरों के साथ साझा की भावनाएं

नई दिल्ली । मदर्स डे के मौके पर फिल्मी दुनिया में एक भावनात्मक माहौल देखने को मिला, जहां कई बड़े सितारे अपनी मां को याद करते हुए भावुक नजर आए। इस खास दिन पर किसी ने अपनी पुरानी तस्वीरों के जरिए बचपन की यादों को ताजा किया, तो किसी ने भावनात्मक संदेश लिखकर मां के प्रति अपने प्यार और सम्मान को शब्दों में पिरोया। सोशल मीडिया पर मां के साथ जुड़े इन खास पलों ने लोगों के दिलों को छू लिया और हर तरफ भावनाओं का माहौल बन गया। अभिनेता अनुपम खेर ने अपनी मां के साथ एक वीडियो साझा किया, जिसमें उनके जीवन के कई सरल और स्नेहभरे पल नजर आए। इस वीडियो में मां का अलग-अलग अंदाज देखने को मिला, जहां वह कभी मुस्कुराती दिखीं तो कभी बेटे के साथ भावनात्मक जुड़ाव में दिखाई दीं। अनुपम खेर ने अपने संदेश में मां के निस्वार्थ प्रेम को बेहद गहराई से व्यक्त किया और कहा कि मां अपने बच्चों के लिए अपनी इच्छाओं और खुशियों तक को त्याग देती है। उन्होंने यह भी कहा कि जब दुनिया किसी को समझने में देर करती है, तब मां बिना कुछ कहे अपने बच्चों की हर भावना को समझ लेती है और हमेशा उनके साथ खड़ी रहती है। इसी तरह सनी देओल ने भी अपनी मां के साथ पुराने पलों को याद करते हुए तस्वीरें साझा कीं। इन तस्वीरों में उनके बचपन और पारिवारिक रिश्तों की झलक देखने को मिली, जिससे उनके और उनकी मां के बीच के गहरे रिश्ते का अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने अपनी मां को अपने जीवन का सबसे मजबूत सहारा बताया और उनके प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया। अभिनेता संजय दत्त ने इस अवसर पर अपनी दिवंगत मां नरगिस को याद किया। उन्होंने पुरानी तस्वीरों के जरिए अपने बचपन के पलों को साझा किया और भावनात्मक संदेश में बताया कि आज भी उनकी मां की यादें और उनका आशीर्वाद उनके साथ है। उनके शब्दों में मां के बिना जीवन की अधूरी भावना साफ झलकती है, जिसने उनके चाहने वालों को भी भावुक कर दिया। वहीं सुनील शेट्टी ने भी अपनी मां को याद करते हुए कहा कि परिवार की हर अच्छी शुरुआत मां से ही होती है। उन्होंने मां के प्रेम को परिवार की नींव बताते हुए कहा कि मां का स्नेह ही हर रिश्ते को जोड़कर रखता है। उनका संदेश सरल होने के बावजूद बेहद गहरा था, जिसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया। अभिनेत्री रकुल प्रीत सिंह ने इस दिन को और भी खास बनाते हुए अपनी मां और सास दोनों के साथ अपने रिश्तों को साझा किया। उन्होंने कहा कि एक मां जीवन देती है, जबकि दूसरी मां एक नया परिवार देती है और दोनों का प्यार उनके जीवन की सबसे बड़ी ताकत है। उनके अनुसार, दो मांओं का स्नेह मिलना उनके लिए किसी आशीर्वाद से कम नहीं है। मदर्स डे पर सामने आए ये सभी भावनात्मक संदेश इस बात को और मजबूत करते हैं कि मां का रिश्ता दुनिया का सबसे अनमोल और निस्वार्थ रिश्ता होता है, जो हर परिस्थिति में इंसान को संभालने की ताकत देता है।
शपथ ग्रहण समारोह में तृषा कृष्णन का सादगी भरा अंदाज़ बना चर्चा का केंद्र..

नई दिल्ली । तमिलनाडु में हाल ही में हुए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सार्वजनिक आयोजन ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जहां फिल्म जगत और राजनीति से जुड़े कई चेहरे एक साथ नजर आए। इस कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा का केंद्र रहीं अभिनेत्री तृषा कृष्णन, जिनकी उपस्थिति और उनका पारंपरिक अंदाज़ लगातार सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। कार्यक्रम के दौरान तृषा कृष्णन बेहद सादगीपूर्ण और पारंपरिक लुक में नजर आईं। उन्होंने हल्के नीले रंग की सिल्क साड़ी पहनी थी, जिसके साथ उन्होंने क्रीम रंग का ब्लाउज चुना। उनके पूरे लुक में भारतीय परंपरा की झलक साफ दिखाई दे रही थी। माथे पर सजी छोटी सी बिंदी, बालों में लगाया गया गजरा और बेहद हल्का मेकअप उनके व्यक्तित्व को और अधिक आकर्षक बना रहा था। उनका यह रूप न केवल वहां मौजूद लोगों को प्रभावित कर गया बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी तेजी से लोकप्रिय हो गया। इस पूरे आयोजन के दौरान एक ऐसा पल भी कैमरे में कैद हुआ जिसने चर्चा को और बढ़ा दिया। बताया जा रहा है कि जब तृषा कृष्णन कार्यक्रम स्थल पर पहुंचीं, उस समय उनका स्वागत बेहद गर्मजोशी से हुआ और वहां मौजूद लोगों के बीच वे सहजता से घुलती-मिलती नजर आईं। इसी दौरान अभिनेता से नेता बने विजय के साथ उनकी उपस्थिति ने भी ध्यान खींचा, जहां दोनों के बीच एक सहज और मुस्कुराहट भरा पल देखने को मिला। यह दृश्य सामने आते ही लोगों के बीच उत्सुकता और चर्चा दोनों बढ़ गई। कार्यक्रम के माहौल को देखते हुए यह साफ दिखाई दिया कि यह केवल एक राजनीतिक आयोजन नहीं बल्कि कई भावनात्मक और व्यक्तिगत जुड़ावों का भी हिस्सा बन गया था। तृषा कृष्णन को न केवल मंच पर बल्कि कार्यक्रम के अन्य हिस्सों में भी बेहद आत्मीयता से लोगों से मिलते-जुलते देखा गया। बताया जा रहा है कि उन्होंने विजय के परिवार के कुछ सदस्यों से भी मुलाकात की, जिससे माहौल और अधिक सौहार्दपूर्ण बन गया। इस आयोजन में दक्षिण भारतीय फिल्म जगत से जुड़े अन्य कई कलाकारों की भी मौजूदगी देखी गई, जिससे यह कार्यक्रम और अधिक भव्य और चर्चा में आ गया। हालांकि सोशल मीडिया पर सबसे अधिक ध्यान तृषा कृष्णन की मौजूदगी और उनके पारंपरिक रूप ने खींचा है। लोग उनके लुक, उनके आत्मविश्वास और उनकी सहजता की लगातार सराहना कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर विजय के साथ उनके कथित जुड़ाव और मुस्कुराहट भरे पल को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं सामने आ रही हैं। कुछ लोगों ने इसे केवल एक औपचारिक और सौहार्दपूर्ण मुलाकात बताया है, जबकि अन्य इसे एक खास जुड़ाव के रूप में देख रहे हैं। हालांकि किसी भी प्रकार की आधिकारिक या स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन वायरल होते वीडियो और तस्वीरों ने इस पूरे मामले को चर्चा का विषय बना दिया है।
फिल्मों से लेकर जननायक बनने तक: कैसे बने तमिलनाडु के नए ‘थलापति’ विजय, जानिए पूरी कहानी

नई दिल्ली । फिल्मों की दुनिया से निकलकर राजनीति के शिखर तक पहुंचने की कहानी अक्सर कल्पना जैसी लगती है, लेकिन तमिल सुपरस्टार विजय थलापति के जीवन में यह सच बनती दिख रही है। आमिर खान की फिल्म ‘3 इडियट्स’ का गाना “जैसा फिल्मों में होता है, हो रहा है हूबहू…” जैसे उनके सफर पर बिल्कुल फिट बैठता है। पर्दे पर कई बार नेता बनकर जनता का दिल जीतने वाले विजय अब असल जीवन में तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा नाम बन चुके हैं। विजय को फिल्मी दुनिया की प्रेरणा उनके परिवार से मिली। उनके पिता एस.ए. चंद्रशेखर निर्देशक हैं, जबकि मां शोभा चंद्रशेखर प्लेबैक सिंगर रही हैं। घर में कला और संगीत के माहौल ने उन्हें बचपन से ही अभिनय की ओर खींचा। अभिनय के साथ-साथ उन्हें गायन का भी शौक है। बाल कलाकार से शुरुआत22 जून 1974 को जन्मे जोसेफ विजय चंद्रशेखर ने 1984 में फिल्म ‘वेट्री’ से बाल कलाकार के रूप में शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने ‘कुडुम्बम’, ‘नान सिगप्पू मणिथन’, ‘वसंत रागम्’, ‘सत्तम ओरु विलायाट्टू’ और ‘इधु एंगळ नीति’ जैसी फिल्मों में काम किया। इन फिल्मों का निर्देशन उनके पिता ने ही किया था। हीरो बनने की राह में संघर्ष18 साल की उम्र में उन्होंने फिल्म ‘नालया थीरपू’ से बतौर लीड हीरो शुरुआत की, लेकिन फिल्म असफल रही और उनके लुक की आलोचना भी हुई। इसके बाद उनके पिता ने अभिनेता विजयकांत के साथ ‘सेंथूरपांडी’ (1993) बनाई, जो हिट रही और यहीं से विजय के करियर ने रफ्तार पकड़ी। हिट फिल्मों से सुपरस्टार तकअपने करियर में उन्होंने अब तक 69 फिल्में की हैं। ‘थेरी’, ‘राजविन परवैयिले’, ‘मिन्सरा कन्ना’, ‘बीस्ट’, ‘शाहजहां’, ‘लियो’ और ‘द ग्रेटेस्ट ऑफ ऑल टाइम’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़ी सफलता दिलाई। 2023 की ‘लियो’ ने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकॉर्ड तोड़े। बताया जाता है कि वह एक फिल्म के लिए करीब 250 करोड़ रुपये तक फीस लेते हैं। ‘थलापति’ नाम कैसे मिलाफैंस ने उन्हें प्यार से ‘थलापति’ यानी कमांडर का नाम दिया। 1994 की फिल्म ‘रसिगन’ की सफलता के बाद उन्हें ‘इलाया थलापति’ (छोटा कमांडर) कहा गया। 2017 में फिल्म ‘मार्सल’ की बड़ी सफलता के बाद वे पूरी तरह ‘थलापति’ बन गए। फिल्मों में विवाद भी साथ-साथउनकी फिल्मों ने कई बार विवाद भी झेले। 2013 की ‘थलाइवा’ और 2018 की ‘सरकार’ पर राजनीतिक विवाद हुए। हाल ही में उनकी फिल्म ‘जन नायकन’ भी सेंसर और कानूनी अड़चनों में फंसी रही और रिलीज नहीं हो सकी। राजनीति में एंट्री और बड़ा बदलावफरवरी 2024 में विजय ने राजनीति में कदम रखते हुए अपनी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम (TVK) बनाई। इसके बाद उनकी पार्टी ने तमिलनाडु की राजनीति में तेजी से मजबूत पकड़ बनाई और सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई। करूर रैली हादसा27 सितंबर 2025 को करूर में हुई रैली के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई। इस घटना के बाद विजय ने पीड़ितों के लिए मुआवजे की घोषणा की और गहरा दुख जताया। इस मामले में जांच भी आगे बढ़ी और पुलिस केस दर्ज हुआ। निजी जीवन भी चर्चा मेंविजय ने 1999 में अपनी एक फैन से शादी की थी। हाल ही में उनके निजी जीवन को लेकर तलाक की खबरें सामने आई हैं। उनका नाम अभिनेत्री तृषा कृष्णन के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआतआज 10 मई 2026 को विजय का राजनीतिक सफर एक नए मोड़ पर पहुंचने वाला है। बड़े पर्दे पर निभाए गए उनके नेता के किरदार अब असल जिंदगी में भी आकार लेते दिख रहे हैं। उनके समर्थक इस बदलाव को एक ऐतिहासिक शुरुआत के रूप में देख रहे हैं।