मौत पर नहीं चाहिए था तमाशा, वसीयत में लिख दी थी आखिरी ख्वाहिश; खंडवा की मिट्टी में ही क्यों समाना चाहते थे किशोर दा?

नई दिल्ली। भारतीय संगीत जगत के ‘अनमोल रत्न’ और अपनी बहुमुखी गायकी से करोड़ों दिलों पर राज करने वाले किशोर कुमार केवल अपनी आवाज के जादू के लिए ही नहीं, बल्कि अपने बेहद अलग और उसूलपसंद अंदाज के लिए भी मशहूर थे। किशोर दा के गानों में जहाँ एक ओर मस्ती और रोमांस की खनक होती थी, वहीं दूसरी ओर जब वे दर्द भरे नग्में गाते थे, तो सुनने वालों की आंखें नम हो जाती थीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने वाले इस महान फनकार ने अपनी मौत के बाद के सफर को लेकर भी एक खास वसीयत तैयार की थी? किशोर कुमार नहीं चाहते थे कि उनके जाने के बाद उनकी अंतिम यात्रा किसी फिल्मी तमाशे या किसी बड़े “प्रीमियर” जैसी नजर आए। इस दिलचस्प और भावुक कर देने वाले वाकये का खुलासा मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने अपने एक शो के दौरान किया था। जावेद अख्तर ने बताया कि एक रिकॉर्डिंग के दौरान किशोर दा ने उनसे अपनी वसीयत का जिक्र करते हुए कहा था कि उन्होंने लिखित निर्देश दिए हैं कि मृत्यु के बाद उनका क्रियाकर्म उनके पैतृक शहर खंडवा में ही किया जाए। जब जावेद अख्तर ने हैरानी से इसका कारण पूछा, तो किशोर कुमार का जवाब बेहद मार्मिक था। उन्होंने कहा था कि वे मुंबई की इस ग्लैमरस दुनिया के बीच अपना अंतिम संस्कार नहीं चाहते। किशोर दा का मानना था कि मुंबई में किसी दिग्गज कलाकार की मौत पर पूरी फिल्म इंडस्ट्री उमड़ पड़ती है, बाहर हजारों की भीड़ जमा हो जाती है और लोग सेलिब्रिटीज को देखकर शोर मचाने लगते हैं। उन्हें डर था कि कहीं उनकी अंतिम विदाई किसी फिल्म के भव्य प्रीमियर जैसी न लगने लगे। वे चाहते थे कि जिस छोटे शहर की मिट्टी से वे आए हैं, उनका शरीर उसी मिट्टी में जाकर विलीन हो जाए। यही कारण है कि आज उनकी समाधि मुंबई में नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के खंडवा में स्थित है। किशोर कुमार का यह अनोखा अंदाज केवल उनकी वसीयत तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके काम करने के तरीके में भी झलकता था। ऐसा ही एक मजेदार किस्सा साल 1974 में आई फिल्म ‘आपकी कसम’ के सुपरहिट गाने “जय जय शिवशंकर” से जुड़ा है। राजेश खन्ना और मुमताज पर फिल्माए गए इस गाने को आर.डी. बर्मन ने कंपोज किया था। रिकॉर्डिंग के दौरान फिल्म के प्रोड्यूसर बार-बार पंचम दा आर.डी. बर्मन को बजट और पैसों के खर्च को लेकर ताने मार रहे थे। जब यह बात किशोर कुमार के कानों तक पहुँची, तो उन्होंने अपने ही अंदाज में प्रोड्यूसर को सबक सिखाने की ठानी। गाने के अंत में उन्होंने अचानक एक लाइन जोड़ दी- अरे बजाओ रे बजाओ, 50 हजार खर्च हो गए! यह लाइन किसी स्क्रिप्ट का हिस्सा नहीं थी, बल्कि प्रोड्यूसर के तानों का करारा जवाब था। किशोर दा का यह बेबाकपन और अपनी जड़ों के प्रति उनका गहरा लगाव ही उन्हें एक आम गायक से अलग कर लेजेंड बनाता है। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने शोहरत के शिखर पर रहते हुए भी सादगी और अपनी मिट्टी की सुगंध को कभी ओझल नहीं होने दिया।
BAFTA AWARDS 2026: आलिया भट्ट ने ‘ BAFTA अवॉर्ड्स के मंच पर हिंदी में स्पीच देकर बटोरी सुर्खियां….

BAFTA AWARDS 2026: नई दिल्ली। लंदन (London) में कुछ घंटों पहले ब्रिटिश एकेडमी फिल्म अवॉर्ड्स (British Academy Film Awards- BAFTA) का आयोजन हुआ, जहां फिल्मी जगत के कई कलाकार शामिल हुए. इंडिया की तरफ से भी फरहान अख्तर (Farhan Akhtar) और आलिया भट्ट (Alia Bhatt) वहां पहुंचे. फरहान के प्रोडक्शन में बनीं मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ को वहां बेस्ट चिल्ड्रन और फैमिली फिल्म की कैटेगरी में अवॉर्ड भी मिला. वहीं, आलिया ने पहली बार BAFTA में किसी अवॉर्ड को प्रेजेंट किया। आलिया ने BAFTA में बोली हिंदी आलिया भट्ट को BAFTA में बेस्ट नॉन-इंग्लिश फिल्म प्रेजेंट करने के लिए स्टेज पर बुलाया गया. एक्ट्रेस ने आते ही अपनी स्पीच हिंदी में कही, जिसका बाद में उन्होंने मतलब भी समझाया. उनका ये वीडियो हर तरफ वायरल भी हो रहा है. लोग आलिया की हिंदुस्तानी कल्चर दुनियाभर में फैलाने को लेकर सराहना कर रहे हैं। आलिया ने कहा, ‘नमस्कार, अगला अवॉर्ड एक ऐसी फिल्म के लिए है, जो अंग्रेजी में नहीं है. अभी से आप सबटाइटल की तरफ ना जाएं. मैं हिंदी में ये कह रही थी कि जो हमारा अगला अवॉर्ड है, वो एक ऐसी फिल्म के लिए है जिसकी भाषा अंग्रेजी नहीं है. क्योंकि फिल्में तो ढेर सारी अलग-अलग भाषाओं में बोलती हैं, लेकिन हम हमेशा जिस चीज की तारीफ करते हैं, वो है सिनेमा की भाषा. और वो भाषा तो हम सब बहुत अच्छे से समझते और बोलते हैं।’ BAFTA में बेस्ट नॉन-इंग्लिश फिल्म का अवॉर्ड फिल्म ‘सेंटिमेंटल वैल्यू’ को मिला है, जो इसी साल ऑस्कर के लिए भी नॉमिनेटेड है. फैंस को आलिया का BAFTA लुक भी बेहद पसंद आया है. एक्ट्रेस ने गुच्ची का सिल्वर गाउन पहना था, जिसके साथ उन्होंने एक सफेद स्टॉल भी कैरी किया. रेड कार्पेट पर आलिया का जलवा खूब जोर-शोर से बिखरा तीसरी इंडियन एक्ट्रेस बनीं आलिया आलिया से पहले इंडिया की दो और हीरोइन प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण को भी BAFTA में अवॉर्ड प्रेजेंट करने का मौका मिल चुका है. अब ऐसा करके आलिया तीसरी इंडियन एक्ट्रेस बन चुकी हैं. फैंस उनकी तरक्की देखकर बेहद खुश हैं. बात करें आलिया के वर्क फ्रंट की, तो उनकी दो फिल्में ‘अल्फा’ और ‘लव एंड वॉर’ आनी हैं, जिसकी रिलीज का फैंस को बेसब्री से इंतजार है।
BAFTA 2026: फरहान अख्तर की मणिपुरी फिल्म ‘बूंग’ ने BAFTA 2026 अवॉर्ड जीता, भारत के लिए पहला सम्मान

BAFTA 2026: नई दिल्ली। भारत ने BAFTA 2026 में गर्व का पल मनाया, जब मणिपुरी भाषा की फिल्म ‘बूंग’ ने बेस्ट चिल्ड्रन एंड फैमिली फिल्म का अवॉर्ड अपने नाम किया। यह इस साल भारत के लिए पहला BAFTA अवॉर्ड है। फरहान अख्तर के प्रोडक्शन सपोर्ट में बनी यह इमोशनल ड्रामा फिल्म ने इंटरनेशनल कैटेगरी में आर्को, लिलो एंड स्टिच और ज़ूट्रोपोलिस 2 जैसी मजबूत फिल्मों को पीछे छोड़ते हुए यह उपलब्धि हासिल की। फरहान अख्तर अपनी पत्नी शिबानी दांडेकर के साथ इस सेरेमनी में मौजूद थे, जिससे यह पल और भी खास बन गया। लक्ष्मीप्रिया देवी के निर्देशन में बनी ‘बूंग’ मणिपुर के सामाजिक और राजनीतिक तनाव के बीच अपने परिवार को फिर से जोड़ने की कहानी है। फिल्म का नाम मणिपुरी में “छोटा लड़का” के अर्थ में है। मुख्य किरदार बूंग (गुगुन किपगेन) अपने खोए पिता को घर लाकर अपनी मां मंदाकिनी (बाला हिजाम) को खुश करना चाहता है। अपने सबसे अच्छे दोस्त राजू (अंगोम सनामातुम) की मदद से वह बॉर्डर शहर मोरेह जाता है और पिता की तलाश में म्यांमार भी जाता है। फिल्म में परिवार, दोस्ती और सामाजिक संघर्ष की भावनाओं को बेहद संवेदनशील और रीयलिस्टिक अंदाज में दिखाया गया है। यह जीत सिर्फ फिल्म के लिए नहीं, बल्कि पूरे नॉर्थईस्ट सिनेमा और भारतीय क्षेत्रीय फिल्मों के लिए बड़ी उपलब्धि है। यह दर्शाता है कि भारत के छोटे इलाकों की सीधी-सादी, सच्ची कहानियां भी दुनिया भर के दर्शकों से जुड़ सकती हैं। फरहान अख्तर के प्रोडक्शन सपोर्ट और लक्ष्मीप्रिया देवी के निर्देशन ने फिल्म को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मान्यता दिलाई। बॉक्स ऑफिस और अवॉर्ड हाइलाइट्स: फिल्म: बूंग निर्देशक: लक्ष्मीप्रिया देवी प्रोड्यूसर: फरहान अख्तर अवॉर्ड: BAFTA 2026 – Best Children & Family Film मुख्य कलाकार: गुगुन किपगेन, बाला हिजाम, अंगोम सनामातुम खासियत: भारत के लिए इस साल का पहला BAFTA, नॉर्थईस्ट फिल्म को अंतरराष्ट्रीय पहचान इस जीत से यह साबित होता है कि छोटे बजट और क्षेत्रीय भाषा की फिल्में भी वैश्विक स्तर पर सफलता हासिल कर सकती हैं, बशर्ते कहानी दमदार और प्रस्तुति सशक्त हो। ‘बूंग’ ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी और नॉर्थईस्ट के सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाई। फरहान अख्तर और लक्ष्मीप्रिया देवी की मेहनत, गुगुन किपगेन, बाला हिजाम और अंगोम सनामातुम की शानदार परफॉर्मेंस ने इस फिल्म को दर्शकों और जजेस दोनों के लिए यादगार बना दिया। इस जीत से साफ है कि भारत के छोटे क्षेत्रों की कहानियां भी विश्व स्तर पर सराहना और सम्मान पा सकती हैं। अगर चाहें तो मैं इसे और भी न्यूज़पेपर स्टाइल, हेडिंग्स
Assi Vs Do Deewane Seher Mein BO Day 3: बॉक्स ऑफिस पर रोमांस vs कोर्टरूम क्लैश! तीसरे दिन कौन बना असली विजेता?

Assi Vs Do Deewane Seher Mein BO Day 3: नई दिल्ली। 20 फरवरी 2026 को बॉक्स ऑफिस पर दो अलग-अलग जॉनर की फिल्मों ने दस्तक दीएक तरफ कोर्टरूम ड्रामा तो दूसरी ओर रोमांटिक लव स्टोरी। Assi और Do Deewane Seher Mein के बीच तीसरे दिन भी कांटे की टक्कर देखने को मिली। AI Impact Summit प्रोटेस्ट: ग्वालियर से यूथ कांग्रेस नेताओं पर हुई FIR निर्देशक Anubhav Sinha की फिल्म अस्सी में Taapsee Pannu लीड रोल में हैं। यह फिल्म एक रेप केस पर आधारित कोर्टरूम ड्रामा है, जिसमें तापसी के साथ कनी कुसरुति अहम भूमिका में हैं। मजबूत कंटेंट और पॉजिटिव रिव्यू के बावजूद फिल्म की ओपनिंग धीमी रही। पहले दिन 1 करोड़, दूसरे दिन 1.6 करोड़ और तीसरे दिन 1.37 करोड़ की कमाई के साथ फिल्म का कुल कलेक्शन 3.97 करोड़ रुपये पहुंच गया है। GWALIOR WEATHER REPORT: ग्वालियर में गर्मी की एंट्री: दिन के साथ तपी राते, पारा 31 डिग्री के करीब वहीं Mrunal Thakur और Siddhant Chaturvedi स्टारर दो दीवाने सहर में एक रोमांटिक ड्रामा है, जिसके गाने और लीड जोड़ी की केमिस्ट्री को दर्शकों से अच्छा रिस्पॉन्स मिल रहा है। फिल्म ने 1.25 करोड़ से ओपनिंग की, दूसरे दिन 1.5 करोड़ और तीसरे दिन 1.31 करोड़ की कमाई की। तीन दिनों में इसका कुल कलेक्शन 4.06 करोड़ रुपये हो गया है। Holashtak 2026: 24 फरवरी से शुरू होलाष्टक, 8 दिनों तक वर्जित होंगे विवाह और मांगलिक कार्य अगर तीसरे दिन की कमाई देखें तो अस्सी ने 1.37 करोड़ के साथ हल्की बढ़त बनाई, लेकिन कुल कलेक्शन के मामले में दो दीवाने सहर में 4.06 करोड़ के साथ मामूली अंतर से आगे है। यानी रेस अभी भी बेहद करीब है और असली तस्वीर वीकडे कलेक्शन के बाद साफ होगी।
वक्त से आगे सोचने वाली मधुबाला: 12 साल में थामा स्टीयरिंग, 36 की उम्र में बन गई अमर सितारा

नई दिल्ली/ मुंबई। हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की चमकती हुई धरोहर मधुबाला सिर्फ अपनी अदाकारी और खूबसूरती के लिए ही नहीं बल्कि अपनी साहसिक सोच और आत्मनिर्भर व्यक्तित्व के लिए भी जानी जाती हैं। जिस दौर में लड़कियों के लिए सामाजिक सीमाएं तय थीं उस समय उन्होंने महज 12 साल की उम्र में ड्राइविंग सीखकर परंपराओं को चुनौती दे दी थी। 14 फरवरी 1933 को दिल्ली में जन्मी मधुबाला का असली नाम मुमताज जहां देहलवी था। उनके पिता अताउल्लाह खान बेहतर जीवन की तलाश में परिवार सहित मुंबई आ गए थे। आर्थिक तंगी के कारण मधुबाला को बचपन में ही काम करना पड़ा। उन्होंने नौ साल की उम्र में फिल्म बसंत में बाल कलाकार के रूप में काम शुरू किया और उस समय उन्हें बेबी मुमताज के नाम से पहचाना जाने लगा। मासूम चेहरा और स्वाभाविक अभिनय ने दर्शकों का दिल जीत लिया। 1947 में फिल्म नील कमल के साथ उनके करियर को नई दिशा मिली और यहीं से वह मधुबाला के नाम से मशहूर हुईं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1950 के दशक में उन्होंने एक से बढ़कर एक सफल फिल्में दीं। महल ने उन्हें रहस्यमयी सौंदर्य की पहचान दी तो हावड़ा ब्रिज और चलती का नाम गाड़ी जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय की बहुमुखी प्रतिभा को साबित किया। उनकी जोड़ी उस दौर के दिग्गज अभिनेताओं के साथ खूब सराही गई। दिलीप कुमार के साथ उनकी ऑनस्क्रीन केमिस्ट्री आज भी याद की जाती है। वहीं राज कपूर और देव आनंद जैसे सितारों के साथ भी उन्होंने काम किया। मधुबाला का निजी जीवन भी चर्चा में रहा। दिलीप कुमार के साथ उनका प्रेम संबंध गहरा था लेकिन पारिवारिक कारणों से दोनों अलग हो गए। बाद में उन्होंने किशोर कुमार से विवाह किया जिन्होंने उनके कठिन समय में साथ निभाया। उनकी जिंदगी में संघर्ष भी कम नहीं थे। 1960 के दशक में पता चला कि उनके दिल में छेद है। इस गंभीर बीमारी ने धीरे धीरे उनके स्वास्थ्य को कमजोर कर दिया। विदेश में इलाज की कोशिशें भी सफल नहीं हो सकीं। तमाम तकलीफों के बावजूद उन्होंने अपने आत्मसम्मान और हौसले को कभी टूटने नहीं दिया। करीब 70 फिल्मों में अभिनय करने वाली मधुबाला ने महज 36 साल की उम्र में 23 फरवरी 1969 को दुनिया को अलविदा कह दिया। कम उम्र में विदा लेने के बावजूद वह आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्रियों में गिनी जाती हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं बल्कि एक ऐसी लड़की की भी है जिसने समय से आगे सोचने का साहस दिखाया। 12 साल की उम्र में स्टीयरिंग थामना हो या पुरुष प्रधान फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाना हो मधुबाला ने हर मोर्चे पर यह साबित किया कि असली खूबसूरती आत्मविश्वास और स्वतंत्र सोच में होती है।
कैंसर की जंग के बीच दीपिका कक्कड़ की बढ़ी मुश्किलें! 13 मिमी की सिस्ट के लिए फिर होंगी अस्पताल में भर्ती, शोएब ने दी हेल्थ अपडेट

नई दिल्ली ।टेलीविज़न की मशहूर अभिनेत्री और ‘बिग बॉस 12’ की विजेता दीपिका कक्कड़ के लिए पिछला एक साल किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं रहा है। साल 2025 में लीवर कैंसर जैसी गंभीर बीमारी का पता चलने के बाद, जिसमें उनके लीवर का 22 प्रतिशत हिस्सा हटाना पड़ा था, अब एक्ट्रेस के सामने एक नई स्वास्थ्य चुनौती खड़ी हो गई है। दीपिका के पति और अभिनेता शोएब इब्राहिम ने अपने हालिया व्लॉग में प्रशंसकों को जानकारी दी है कि दीपिका के पेट में एक 13 मिमी (1.3 सेमी) की सिस्ट का पता चला है, जिसके इलाज के लिए उन्हें फिर से अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। शोएब ने बताया कि शुक्रवार की रात अचानक दीपिका के पेट का दर्द असहनीय हो गया, जिसके बाद तुरंत उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया गया। सीटी स्कैन की रिपोर्ट में इस सिस्ट का खुलासा हुआ। हालांकि, शोएब ने राहत की खबर देते हुए यह भी साझा किया कि यह कोई बड़ी सर्जरी नहीं होगी, बल्कि डॉक्टर इस सिस्ट को जलाकर Cauterize हटाएंगे। दिसंबर के पीईटी स्कैन में यह सिस्ट नहीं दिखी थी, लेकिन समय रहते इसका पता चलना एक सकारात्मक संकेत है। दीपिका को 3-4 दिन अस्पताल में निगरानी में रखा जाएगा और मंगलवार को यह प्रक्रिया पूरी की जाएगी। प्रशंसक और साथी कलाकार अब दीपिका के जल्द स्वस्थ होने की कामना कर रहे हैं।
पद्मावत के बाद अब सोमनाथ की गाथा! पर्दे पर जीवंत होगा गजनवी का हमला और महादेव के मंदिर का पुनरुत्थान; भंसाली का नया मास्टरस्ट्रोक।

नई दिल्ली ।भारतीय सिनेमा के दिग्गज फिल्ममेकर संजय लीला भंसाली अपनी भव्यता और ऐतिहासिक कहानियों को जीवंत करने के लिए जाने जाते हैं। इस शिवरात्रि पर उन्होंने अपनी नई महात्वाकांक्षी फिल्म ‘जय सोमनाथ’ की घोषणा कर मनोरंजन जगत और इतिहास प्रेमियों में हलचल पैदा कर दी है। यह फिल्म केवल एक मंदिर की कहानी नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की उस अदम्य शक्ति और कभी न हारने वाली हिम्मत का प्रतीक है, जिसने सदियों तक विदेशी आक्रांताओं के वार सहे, लेकिन हर बार पहले से अधिक भव्यता के साथ उठ खड़ी हुई। इस बार भंसाली ने मशहूर निर्देशक केतन मेहता के साथ हाथ मिलाया है, जो इस बात का संकेत है कि सोमनाथ मंदिर के 17 बार विध्वंस और पुनर्निर्माण की गाथा को बहुत ही गहराई और भव्यता के साथ पर्दे पर उतारा जाएगा। इतिहास के पन्नों को पलटें तो सोमनाथ मंदिर पर लगभग छह सदियों तक बार-बार क्रूर हमले हुए। इस श्रृंखला में सबसे विनाशकारी हमला 1026 ईस्वी में महमूद गजनवी ने किया था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, गजनवी ने न केवल मंदिर की अकूत संपत्ति लूटी, बल्कि पवित्र ज्योतिर्लिंग को भी भारी नुकसान पहुंचाया। हमलों का यह सिलसिला यहीं नहीं थमा; 1299 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के जनरल उलग खान ने हमला कर मूर्ति को दिल्ली ले जाने का दुस्साहस किया। इसके बाद 1395 में जफर खान, 1451 में महमूद बेगड़ा और अंततः 1665 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेशों पर इस आस्था के केंद्र को बार-बार खंडित किया गया। भंसाली की यह फिल्म इन जख्मों और उनसे उबरने की भारतीय जिजीविषा को बड़े पर्दे पर पेश करेगी। संजय लीला भंसाली का इतिहास से पुराना नाता रहा है। इससे पहले उन्होंने ‘पद्मावत’ के जरिए रानी पद्मावती के त्याग और जौहर की उस शौर्य गाथा को दिखाया था, जिसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। खिलजी के उन्माद और राजपूतों की आन-बान-शान को भंसाली ने जिस बारीकी से फिल्माया, वह आज भी मिसाल है। इसके अलावा ‘हीरामंडी’, ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ और ‘बाजीराव मस्तानी’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होंने यह साबित किया है कि वे बीते हुए कल को वर्तमान में जीवंत करने की अद्भुत कला रखते हैं। ‘जय सोमनाथ’ के जरिए पहली बार भारतीय इतिहास का वह काला अध्याय और उसके बाद की विजय गाथा सामने आ रही है, जिसे अब तक मुख्यधारा के सिनेमा ने अछूता छोड़ दिया था। केतन मेहता की ऐतिहासिक समझ और भंसाली की भव्य सिनेमैटोग्राफी का मिलन इस फिल्म को दशक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक फिल्म बना सकता है। यह फिल्म न केवल महमूद गजनवी की बर्बरता को उजागर करेगी, बल्कि यह भी दिखाएगी कि कैसे हर विध्वंस के बाद करोड़ों भारतीयों की आस्था ने सोमनाथ को फिर से संवारा और आज भी वह गौरव के साथ खड़ा है।
शिव सेना नेता शैना एनसी ने दी The Kerala Story 2 को समर्थन, कहा फिल्म दिखाती है सच, कोई गुमराह नहीं

मुंबई । आगामी हिंदी फिल्म The Kerala Story 2 के खिलाफ राजनीतिक विवाद के बीच शिव सेना नेता Shaina NC ने फिल्म का खुलकर समर्थन किया है। उन्होंने शुक्रवार को ANI से बातचीत में कहा कि यह फिल्म किसी प्रकार का गलत प्रचार या गुमराह करने का अभियान नहीं है बल्कि इसमें दिखाया गया सच है। शैना एनसी ने लोगों से अपील की कि समाज में शांति बनाए रखने के लिए दोनों पक्षों की स्थिति को देखें और समझें कि केरल में वास्तव में क्या हो रहा है। शैना एनसी का दावा: फिल्म सच्चाई दिखाती है फिल्म के हाल ही में रिलीज हुए ट्रेलर में दिखाया गया है कि केरल में कई लड़कियों को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया। शैना ने कहा The Kerala Story 2 किसी गुमराह करने वाले अभियान का हिस्सा नहीं है। सच यह है कि केरल में कई लड़कियों का धर्म परिवर्तन हुआ है। 32 000 लड़कियों के केस स्टडी में यह साफ दिखाई देता है। फिल्म का उद्देश्य यही उजागर करना है। जो लोग इसका विरोध कर रहे हैं उन्हें मैं यही कहूंगी कि शांति बनाए रखने के लिए वास्तविकता देखें और समझें। ट्रेलर विवाद और राजनीतिक आलोचना फिल्म का ट्रेलर जारी होते ही विवाद शुरू हो गया। कुछ लोगों ने इसे सख्त सच्चाई बताया वहीं कुछ ने प्रचार करार दिया। फिल्म केरल राजस्थान और मध्य प्रदेश में धार्मिक परिवर्तन और दबाव के मुद्दों को दिखाती है। केरल के मुख्यमंत्री Pinarayi Vijayan और धार्मिक संगठन All India Muslim Jamaat ने फिल्म की आलोचना की है। CM विजयन ने चेताया कि यह फिल्म राज्य में साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर सकती है। निर्माता विपुल शाह का पक्ष फिल्म के निर्माता Vipul Amrutlal Shah ने कहा कि फिल्म का मकसद केरल पर हमला नहीं है। उन्होंने बताया हम केरल के खिलाफ नहीं हैं। केरल गॉड्स कंट्री है। हमारा उद्देश्य वहां की यह दुष्ट प्रथा खत्म करना है। शाह ने यह भी बताया कि फिल्म का शीर्षक क्यों वही रखा गया। उन्होंने कहा The Kerala Story 2 केवल केरल तक सीमित नहीं है। यह पूरे भारत में हो रही जबरन धर्मांतरण की साजिश को उजागर करती है। पहली फिल्म की केंद्रीय थीम वही है इसलिए इसे Kerala Story 2 नाम दिया गया। रिलीज़ और अन्य जानकारी फिल्म का निर्देशन Kamakhya Narayan Singh कर रहे हैं और यह 27 फरवरी को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। यह 2023 की The Kerala Story की सीक्वल है जिसने अपने रिलीज़ के समय विवाद उत्पन्न किया था लेकिन व्यावसायिक रूप से सफल रही और दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते। नई फिल्म में पूरी तरह नया कलाकार वर्ग और नया निर्देशक है।
बर्थडे स्पेशल: कभी पेट पालने के लिए की चौकीदारी, आज करोड़ों के मालिक हैं 'राम' फेम गुरमीत चौधरी!

नई दिल्ली । फिल्म और टीवी इंडस्ट्री में कई सितारे ऐसे हैं जिन्होंने नेम-फेम कमाने से पहले काफी संघर्ष किया. उन्होंने छोटे-मोटे काम करके अपना गुजारा किया और फिर मेहनत से नाम कमाया. आज हम आपको ऐसे ही एक स्टार की बारे में बताने जा रहे हैं जो अब इंडस्ट्री का टॉप एक्टर बन चुका है लेकिन यहां तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था. उन्होंने कई मुश्किलें झेलीं लेकिन हार नहीं मानी. आज उनकी शोहरत की कोई कमी नहीं है. आइए जानते हैं कि कौन है ये सितारा? इंडस्ट्री के टॉप एक्टर ग्लैमर और शोहरत की दुनिया में पहुंचने से पहले कई कलाकारों को संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ता है. कभी-कभी हालात इतने मुश्किल हो जाते हैं कि गुजारा करने के लिए कोई भी छोटा मोटा काम भी करना पड़ता है. वैसे तो इस लिस्ट में कई नाम शामिल हैं लेकिन आज हम आपको एक ऐसे स्टार के बारे में बताने जा रहे हैं जिसके पास आज नाम और शोहरत की कोई कमी नहीं है. हालांकि यहां तक पहुचे लिए उनको भी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. क्या आपने इन्हें पहचाना?कौन है ये टीवी इंडस्ट्री का टॉप स्टार? इस एक्टर की लाइफ में ऐसे भी दिन आए जब उनको अपना खर्च निकालने के लिए चौकीदारी कर करनी पड़ी थी. लेकिन उनकी मेहनत और लगन ने उन्हें इंडस्ट्री में खास पहचान दिलाई और आज वे टीवी के मशहूर सितारों में शामिल हैं. हम यहां बिहार के भागलपुर में 22 फरवरी 1984 को जन्मे गुरमीत चौधरी की बात कर रहे हैं जो आज टीवी इंडस्ट्री का एक जाना-माना नाम हैं. उन्होंने 2008 में टीवी पर टेलीकास्ट होने वाली ‘रामायण’ में भगवान राम का किरदार निभाकर घर-घर में पहचान बनाई. बचपन से बनना चाहते थे एक्टर गुरमीत को बचपन से ही एक्टिंग और डांस का शौक था. जब उन्होंने ऋतिक रोशन को बड़े पर्दे पर शानदार डांस करते देखा तो उन्होंने ठान लिया कि वे भी एक्टिंग में करियर बनाएंगे. इसके लिए उन्होंने मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग ली और मिस्टर जबलपुर का खिताब भी जीता. हालांकि एक्टिंग की राह आसान नहीं थी लेकिन उनके जुनून और मेहनत ने उन्हें सफलता दिलाई. जब गुरमीत चौधरी एक्टिंग में करियर बनाने के लिए मुंबई आए तब उनके पास कोई बैकअप प्लान नहीं था. संघर्ष के उनको चौकीदारी तक करनी पड़ी थी. करनी पड़ी चौकीदार की नौकरी दरअसल जब उनके पास रहने के लिए जगह नहीं थे तब उन्हें एक सस्ता कमरा मिला जो एक चौकीदार ने दिया था. सिर पर छत तो मिल गई लेकिन खर्च चलाना मुश्किल था. इसलिए उन्होंने एक स्टोर में चौकीदारी की नौकरी कर ली जिससे वो अपने खर्च निकाल पाते थे. इसी दौरान वो लगातार ऑडिशन देते रहे और आखिरकार 2008 में ‘रामायण’ में भगवान राम का किरदार निभाने का मौका मिला. इस शो ने उन्हें इतनी लोकप्रियता दिलाई कि वह देखते ही देखते स्टार बन गए. गुरमीत चौधरी का करियर इसके बाद जब ये शो ऑफ एयर हुआ तो तीन साल तक उनके पास कोई काम नहीं था जिससे वो फिर से संघर्ष के दौर में चले गए. गुरमीत ने अपने करियर की शुरुआत 2004 में टीवी शो ‘ये मेरी लाइफ है’ से की थी लेकिन असली पहचान ‘रामायण’ से मिली. इसके बाद उन्होंने ‘गीत- हुई सबसे पराई’ ‘पुनर्विवाह’ और ‘झलक दिखला जा’ जैसे पॉपुलर शोज में काम किया. इसके अलावा उन्होंने 2015 में ‘खामोशियां’ से बॉलीवुड डेब्यू किया और फिर ‘वजह तुम हो’ (2016) और ‘पलटन’ (2018) जैसी फिल्मों में काम किया. गुरमीत चौधरी की नेटवर्थ पर्सनल लाइफ गुरमीत चौधरी ने 2011 में टीवी एक्ट्रेस देबिना बनर्जी से शादी की और अब वे दो बेटियों के माता-पिता हैं. संघर्ष से लेकर स्टारडम तक का उनका सफर कई लोगों के लिए इंस्पिरेशनल रहा है. आज गुरमीत एक शानदार लाइफस्टाइल जीते हैं उनके पास कई लग्जरी गाड़ियां और आलीशान घर हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक उनकी कुल संपत्ति 30-40 करोड़ रुपये के बीच बताई जाती है. उनकी सफलता इस बात का सबूत है कि अगर मेहनत और लगन हो तो कोई भी अपने सपनों को हकीकत में बदल सकता है.
विवियन डीसेना: धर्म बदलकर इस्लाम अपनाया, रमजान में रोजा और पांच वक्त की नमाज, गुपचुप रचाई दूसरी शादी

नई दिल्ली। टीवी के मोस्ट पॉपुलर स्टार विवियन डीसेना ने साल 2019 में अपने जीवन का बड़ा फैसला लिया और धर्म बदलकर इस्लाम अपनाया। इस बदलाव के बाद उन्होंने मिस्र की नागरिक नौरान से गुपचुप शादी रचाई। विवियन की पहली शादी टीवी अभिनेत्री वाहबिज दोराबजी से 2013 में हुई थी, लेकिन कुछ सालों बाद तलाक हो गया। इसके बाद उन्होंने अपने निजी जीवन और आस्था के अनुसार नई राह चुनी। विवियन ने खुलासा किया कि इस्लाम धर्म अपनाने के बाद उन्होंने अपनी आस्था और जीवनशैली में कई बदलाव किए। वे अब पांच वक्त की नमाज नियमित रूप से पढ़ते हैं और रमजान के महीने में रोजा रखते हैं। उन्होंने बताया कि उनका रोजा बहुत सादगी से खुलता है—तीन खजूर, एक गिलास दूध और थोड़ा पानी। इसके अलावा, वे घर पर विशेष ‘डेट मिल्क’ तैयार करते हैं जिसमें खजूर, शहद, सूखे मेवे और ताजे फल मिलाते हैं। इस परंपरा के माध्यम से वे अपनी इफ्तार करते हैं। HT को दिए इंटरव्यू में विवियन ने कहा कि रमजान उनका जीवन बदलने वाला महीना रहा। उन्होंने बताया, “रमजान आस्था का महीना है। यह हमें संस्कार और मूल्य सिखाता है। इस दौरान हमें यह भी समझ आता है कि जिन लोगों के पास भोजन नहीं है, वे किस तरह की कठिनाइयों से गुजरते हैं।” विवियन ने यह भी कहा कि रमजान का महीना हमारी आदतों को ‘रीसेट’ करने और आत्म-अनुशासन बढ़ाने का अवसर है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि उन्हें अपनी सुबह की कॉफी छोड़नी पड़ती है, और पानी भी नहीं पीते। इससे शरीर वैज्ञानिक रूप से 30 दिनों के लिए ‘डिटॉक्स मोड’ में चला जाता है। विवियन ने जकात (चैरिटी) देने की भी अहमियत पर जोर दिया और कहा कि वह अपनी क्षमता के अनुसार दान करते हैं। उनका मानना है कि चैरिटी का उद्देश्य केवल प्रचारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे एक जिम्मेदारी के रूप में निभाना चाहिए। विवियन की निजी जिंदगी भी चर्चा में रही है। धर्म परिवर्तन और दूसरी शादी के बाद उन्हें ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा, लेकिन इसका असर उनके खुशहाल जीवन पर नहीं पड़ा। विवियन और नौरान अब साथ में संतुलित और खुशहाल जीवन जी रहे हैं। वे अपने करियर और परिवार दोनों में संतुलन बनाए हुए हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनकी पांच वक्त की नमाज और रोजा उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं, चाहे रमजान का महीना हो या न हो। विवियन का यह अनुभव यह दिखाता है कि चाहे जीवन में कितनी भी चुनौतियाँ आएं, आस्था और अपने सिद्धांतों का पालन हमेशा मार्गदर्शक होता है। विवियन डीसेना की कहानी बताती है कि धर्म और आस्था के बदलाव से जीवन में स्थिरता और संतुलन पाया जा सकता है, और निजी निर्णयों को अपनाकर भी कोई व्यक्ति खुशहाल और संतुलित जीवन जी सकता है।