NAKKI MATA TEMPLE: मंडला की पहाड़ियों में विराजमान नक्खी माता हर मुराद होती है पूरी सदियों पुरानी आस्था

NAKKI MATA TEMPLE: मंडला । चैत्र नवरात्र 2026 के पावन अवसर पर मध्यप्रदेश के मंडला जिले में स्थित नक्खी माता मंदिर एक बार फिर श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। मंडला निवास मार्ग पर बसे ग्राम बकौरी की पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यहां से जुड़ी जनश्रुतियां और चमत्कारिक मान्यताएं इसे विशेष बनाती हैं। प्राकृतिक सुंदरता से घिरे इस मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को अद्भुत शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है। मान्यता है कि यहां विराजमान मां नक्खी माता स्वयं प्रकट हुई हैं और यह प्रतिमा मानव निर्मित नहीं है। यही कारण है कि इस मंदिर की महिमा दूर दूर तक फैली हुई है और सालभर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। कोई संतान सुख की कामना लेकर आता है तो कोई अपने जीवन में सुख समृद्धि और शांति की प्रार्थना करता है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान इस मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो उठता है। गांव के लोग मिलकर जवारे बोते हैं और कलश स्थापना के साथ माता का विशेष श्रृंगार किया जाता है। ढोल नगाड़ों और जयकारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है और हर ओर भक्ति का उत्साह दिखाई देता है। खास बात यह है कि पहाड़ी पर स्थित होने के बावजूद श्रद्धालु सीधे अपने वाहनों से मंदिर तक पहुंच सकते हैं जिससे बुजुर्ग और दूरदराज से आने वाले भक्तों को सुविधा मिलती है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार जब से मां नक्खी माता इस गांव में विराजमान हुई हैं तब से गांव पर कभी कोई बड़ा संकट नहीं आया। ग्रामीण इसे देवी की कृपा मानते हैं और हर सुख दुख में सबसे पहले मां के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर में स्थापित पाषाण प्रतिमा के दर्शन मात्र से ही श्रद्धालु भावविभोर हो जाते हैं और उन्हें मानसिक शांति का अनुभव होता है। इस मंदिर का इतिहास भी बेहद रोचक है। सैकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1997 में किया गया जिसके बाद इसे भव्य स्वरूप प्रदान किया गया। मंदिर के गुंबद को विशेष चौपहला आकार दिया गया और परिसर का विस्तार कर श्रद्धालुओं के लिए अधिक सुविधाएं विकसित की गईं। मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध जनश्रुति लोगों की आस्था को और गहरा करती है। कहा जाता है कि सैकड़ों वर्ष पहले जब लुटेरे इस गांव पर हमला करने पहुंचे तब देवी ने एक छोटी कन्या का रूप धारण कर गांव वालों को खतरे की सूचना दी। जब लुटेरे उस कन्या पर हमला करने दौड़े तो उसका शरीर पत्थर का हो गया। क्रोधित लुटेरों ने उस पत्थर की मूर्ति की नाक काट दी। तभी से देवी को नक्खी माई के नाम से जाना जाने लगा और यह प्रतिमा स्वयं प्रकट मानी जाती है। आज नक्खी माता मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था विश्वास और भक्ति का जीवंत प्रतीक बन चुका है। यहां आने वाला हर श्रद्धालु अपने साथ एक उम्मीद लेकर आता है और मां के आशीर्वाद के साथ लौटता है। अगर आप भी इस नवरात्र में आध्यात्मिक शांति और दिव्यता का अनुभव करना चाहते हैं तो इस पावन धाम के दर्शन आपके लिए एक विशेष अनुभव साबित हो सकते हैं।
Vastu Tips: तरक्की पाने के लिए रखें इन वास्तु उपायों का ध्यान, तरक्की हो जाएगी डबल

नई दिल्ली वास्तु शास्त्र (Vastu Shastra) घर परिवार के लिए काफी जरूरी होता है। इसमें बताए गए नियम का पालन करने से आपके भाग्य में परिवर्तन भी होते हैं। घर परिवार में सुख समृद्धि पाने के लिए छोटे-मोटे उपायों को जरूर करना चाहिए। हर कोई चाहता है कि उसके घर में सुख समृद्धि बनी रहे और चारों तरफ से उसे तरक्की हो इसके लिए आपको सबसे पहले अपने घर में लगे हुए वास्तु दोष को दूर करना चाहिए। अगर आपके घर में नकारात्मकता और वास्तु दोष का संचार है तब तरक्की दूर-दूर तक आपके घर में नहीं आएगी। इस दूर करने के लिए नीचे वास्तु शास्त्र के कुछ उपाय दिए गए हैं जिन्हें आपको अपनाना चाहिए। जरूर करें वास्तु उपायघर से वास्तु दोष दूर करने के लिए आपको घर की साफ सफाई का बिल्कुल भी ध्यान रखना चाहिए। कभी भी मुख्य द्वार पर अंधेरा नहीं रहना चाहिए अगर ऐसा होता है तो देवी देवता आपके घर में प्रवेश नहीं करते हैं जिसके कारण आपका कोई भी कार्य सफल नहीं होता है और घर में बरकत रुक जाती है। इसके साथ ही मुख्य द्वार की अगल-बगल आपको कूड़ा या फिर टूट- फूटा सामान नहीं रखना चाहिए। घर में सुख समृद्धि बनी रहे और नकारात्मकता दूर हो इसके कारण आपके घर में गंगाजल का छिड़काव करना चाहिए। कपूर जलाकर पूरे घर में दिखना चाहिए ताकि आपके घर में शुद्धता बनी रहे इसके साथ ही अगर आपके घर में मंदिर है तो रोजाना पूजा पाठ करें। जिस घर में मंदिर रहने के बाद भी लोग पूजा अर्चना नहीं करते हैं वहां पर देवी देवता का भी आगमन नहीं होता है और कई समस्या खड़ी हो जाती है। वास्तु शास्त्र में बताया गया है कि अगर आपके घर के साथ-साथ किचन और बाथरूम में भी साफ सफाई नहीं होती है तब भी वास्तु दोष आपको घेरे रहता है। इसके साथ ही कई लोग अपने बालकनी में भी फूल पौधे लगा देते हैं लेकिन उन पर ध्यान नहीं रखते हैं उनकी पट्टियां टूट कर ऐसे ही टूटी हुई रहती हैं फूल पौधे सूखे पड़े रहते हैं सबसे घर की आर्थिक स्थिति में प्रभाव पड़ता है।
कन्या पूजन में लांगूर क्यों बुलाया जाता है? जानिए इसका पौराणिक महत्व

नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में नवरात्रि का पर्व बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। 19 मार्च 2026 से चैत्र नवरात्रि शुरू हुई और 27 मार्च 2026 को इसका समापन होगा। 26 मार्च को अष्टमी और 27 मार्च को नवमी मनाई जाएगी। नवमी के दिन हवन और कन्या पूजन का आयोजन होता है। यह व्रत और पूजा कन्या पूजन के बिना अधूरी मानी जाती है।कन्या पूजन का तरीका कन्या पूजन में 2 से 9 साल तक की छोटी लड़कियों को बुलाया जाता है। उन्हें देवी दुर्गा का रूप मानकर पूजा जाता है। पूजा के दौरान इन कन्याओं को सम्मानपूर्वक खीर-पूड़ी और हलवे का भोजन कराया जाता है इसके बाद उन्हें भेंट दी जाती है। लांगूर कौन होता है? कन्या पूजन में कन्याओं के साथ एक छोटे लड़के को भी बुलाना जरूरी होता है जिसे लांगूर कहा जाता है। जिस तरह कन्याएं देवी दुर्गा का रूप मानी जाती हैं वैसे ही यह लड़का भैरवनाथ का रूप माना जाता है। उसे लंगूर लंगूरिया या बटुक भी कहा जाता है। बिना लांगूर के बुलाए कन्या पूजन पूरी नहीं माना जाता।लांगूर के पूजन का पौराणिक कारण कथा के अनुसार जब भगवान शिव ने माता दुर्गा की रक्षा के लिए भैरव का रूप धारण किया था तब माता दुर्गा ने वरदान दिया कि जो भी भक्त मेरी पूजा करेगा उसे भैरव की भी पूजा करनी होगी। इसलिए कन्या पूजन में लड़के को भैरव का रूप मानकर पूजा किया जाता है ताकि पूजा पूर्ण हो सके। भैरव देवता का महत्व कई प्रसिद्ध देवीधामों में भैरव का मंदिर होता है जैसे वैष्णो देवी मंदिर में। यहाँ तक कि मंदिर दर्शन तब तक अधूरे माने जाते हैं जब तक भैरव बाबा के दर्शन नहीं किए जाते। सुख-समृद्धि और सुरक्षा का संदेश बाबा काल भैरव को शत्रुओं और नकारात्मक ऊर्जा का नाश करने वाला देवता माना जाता है। मान्यता है कि कन्या पूजन में बटुक या लांगूर को बुलाकर पूजन और भोजन कराने से घर में सुख समृद्धि आती है और सुरक्षा बनी रहती है। Disclaimer: यह खबर केवल जागरूकता के लिए लिखी गई है। इसको लिखने में सामान्य जानकारियों की मदद ली गई है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।
महाअष्टमी पर नवार्ण मंत्र जाप से मिलेगा विशेष फल, पूरी होंगी मनोकामनाएं

नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है और इस दौरान प्रत्येक दिन देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें महाअष्टमी का विशेष महत्व होता है, जो इस बार 26 मार्च को पड़ रही है। इस दिन मां दुर्गा के अष्टम स्वरूप मां महागौरी की विधि-विधान से पूजा की जाती है और कन्या पूजन का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस दिन की गई पूजा, साधना या मंत्र जाप का फल कई गुना अधिक प्राप्त होता है। नवरात्रि को देवी भक्ति और साधना का सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है। इस दौरान श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा से देवी की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन की अनेक बाधाएं दूर होती हैं। विशेष रूप से महाअष्टमी का दिन साधना और मंत्र जाप के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। इसी संदर्भ में नवार्ण मंत्र का विशेष महत्व बताया गया है। यह मंत्र नवार्ण मंत्र यानी ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे के रूप में जाना जाता है। इस मंत्र को दुर्गा साधना का अत्यंत प्रभावशाली और सिद्ध मंत्र माना गया है। नवार्ण शब्द में नव का अर्थ नौ और अर्ण का अर्थ अक्षर होता है, जो इस मंत्र के नौ अक्षरों को दर्शाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र के प्रत्येक अक्षर में देवी शक्ति का विशेष स्वरूप समाहित होता है। इसे ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ-साथ महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती की शक्तियों से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि इस मंत्र का जाप करने से साधक को मानसिक, आध्यात्मिक और भौतिक स्तर पर लाभ प्राप्त होता है। माना जाता है कि नवार्ण मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार होता है, भय और नकारात्मकता दूर होती है तथा जीवन में शांति और संतुलन बना रहता है। इसके साथ ही यह मंत्र तरक्की, सुख-समृद्धि और पारिवारिक सुख के लिए भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। विद्यार्थियों के लिए यह मंत्र एकाग्रता और सफलता में सहायक होता है, वहीं करियर और व्यवसाय में भी सकारात्मक परिणाम देता है। महाअष्टमी के दिन इस मंत्र का जाप विशेष रूप से फलदायी माना गया है। विधि के अनुसार प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण कर माता की पूजा करें और उसके बाद 108 दानों की माला से कम से कम तीन माला जाप करें। जाप करते समय मन को शांत, एकाग्र और श्रद्धा से पूर्ण रखना आवश्यक है। धार्मिक दृष्टि से यह भी माना जाता है कि यदि इस दिन नियमपूर्वक और सच्चे मन से मंत्र जाप किया जाए तो मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। इस प्रकार महाअष्टमी का दिन केवल पूजा-अर्चना का ही नहीं बल्कि आत्मिक शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने का भी विशेष अवसर है। नवार्ण मंत्र की साधना के माध्यम से श्रद्धालु मां दुर्गा की कृपा प्राप्त कर अपने जीवन को सुख, शांति और समृद्धि की दिशा में अग्रसर कर सकते हैं।
नवरात्रि 2026: मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार और आवश्यक पूजा सामग्री

नई दिल्ली । नवरात्रि के पावन अवसर पर माता दुर्गा की आराधना केवल श्रद्धा ही नहीं, बल्कि समर्पण और भाव का उत्सव भी है। शास्त्रों के अनुसार जब भक्त मां के दरबार में जाता है, तो वह केवल वस्तुएं नहीं, बल्कि अपनी आस्था और कृतज्ञता भी अर्पित करता है। इसलिए मंदिर में खाली हाथ जाना उचित नहीं माना जाता। पूजा के दौरान स्वच्छ वस्त्र पहनना, पुरुषों का तिलक और महिलाओं का सिर ढकना भी अनिवार्य माना जाता है। माता के सोलह श्रृंगार का महत्व देवी पुराण के अनुसार नवरात्रि में मां दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सोलह श्रृंगार अर्पित किए जाते हैं। इन श्रृंगारों में शामिल हैं: लाल चुनरी चूड़ी इत्र सिंदूर बिछिया महावर मेहंदी काजल गजरा कुमकुम बिंदी माला या मंगलसूत्र पायल नथ कान की बाली फूलों की वेणी यह श्रृंगार सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक माना जाता है। अर्पित वस्तुओं का महत्वअक्षत (चावल): अखंडता और समृद्धि का प्रतीक लाल पुष्प: शक्ति, साहस और सकारात्मक ऊर्जा का संचार चुनरी: श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक, जीवन में सुरक्षा और सौभाग्य लाती है सिक्का: दान और त्याग का संकेत, आर्थिक स्थिरता की कामना ऋतु फल: प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, स्वास्थ्य और संतुलन का संदेश इन अर्पणों का वास्तविक महत्व उनके पीछे छिपे भाव में होता है। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है। नवरात्रि में माता को समर्पण और भक्ति भाव के साथ श्रृंगार और अर्पण करने से मनोबल बढ़ता है, घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भक्त का जीवन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध बनता है।
चैत्र शुक्ल नवमी 2026: राम जन्मोत्सव की पूजा का सही समय और विधि

नई दिल्ली । भारत के हर कोने में मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम के जन्मोत्सव यानी राम नवमी का पर्व बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। साल 2026 में यह तिथि दो दिनों तक रहने के कारण लोगों में व्रत और पूजन की सही तारीख को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया है। हिंदू पंचांग के अनुसार नवमी तिथि इस बार 26 मार्च को सुबह 11:48 बजे से शुरू होकर 27 मार्च को सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। लेकिन सूर्योदय के समय नवमी तिथि विद्यमान रहने के कारण 27 मार्च को राम नवमी मनाना अधिक शुभ माना जा रहा है। पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 11:13 बजे से दोपहर 1:41 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस समय में भगवान राम का पूजन और व्रत विधिपूर्वक संपन्न किया जा सकता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार त्रेतायुग में पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ने पर देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के घर जन्म लेने का निर्णय लिया। राजा दशरथ ने संतान प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ से प्राप्त खीर को कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा ने ग्रहण किया, और इस प्रकार चैत्र शुक्ल नवमी को भगवान श्रीराम का जन्म हुआ। वाल्मीकि रामायण के अनुसार जन्म के समय पांच ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित थे, जो उनके दिव्य स्वरूप और प्रभाव को दर्शाता है। साथ ही, चैत्र नवरात्रि के अवसर पर मां दुर्गा की आराधना का विशेष महत्व है। नवरात्रि में श्रद्धालु मां को सोलह श्रृंगार अर्पित करते हैं। इसमें लाल चुनरी, चूड़ी, इत्र, सिंदूर, बिछिया, महावर, मेहंदी, काजल, गजरा, कुमकुम, बिंदी, माला या मंगलसूत्र, पायल, नथ, कान की बाली और फूलों की वेणी शामिल हैं। ये श्रृंगार माता के सौभाग्य, सुंदरता और भक्त के समर्पण का प्रतीक हैं। अर्पित की जाने वाली वस्तुओं का भी विशेष महत्व है। अक्षत चावल, अखंडता और समृद्धि का प्रतीक है, लाल पुष्प शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं, चुनरी श्रद्धा और सम्मान दर्शाती है, सिक्का दान और त्याग का संकेत देता है, जबकि ऋतु फल प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देते हैं। सच्ची श्रद्धा और विश्वास के साथ की गई पूजा ही जीवन में सुख, शांति और समृद्धि लाती है। इस साल 2026 में राम नवमी और चैत्र नवरात्रि का संगम भक्तों के लिए विशेष धार्मिक महत्त्व रखता है, इसलिए तय मुहूर्त और विधि के अनुसार पूजन और व्रत करना अत्यंत शुभ माना गया है।
कलयुग के 5 जागृत देवी देवता संकट में तुरंत सुनते हैं भक्त की पुकार

नई दिल्ली । कलयुग को अक्सर ऐसा समय माना जाता है जब भक्ति और साधना का प्रभाव कम हो गया है और लोगों को भगवान के साक्षात दर्शन मिलना दुर्लभ हो गया है लेकिन धर्म शास्त्रों और जनमान्यताओं के अनुसार आज भी कुछ ऐसे देवी देवता हैं जिन्हें जागृत माना जाता है यानी वे अपने भक्तों के बीच उपस्थित हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थना को तुरंत स्वीकार करते हैं ऐसे देवताओं की भक्ति करने से जीवन के बड़े से बड़े संकट भी दूर हो सकते हैं सबसे पहले नाम आता है संकटमोचन हनुमान जी का जिन्हें कलयुग का सबसे प्रभावशाली देवता माना गया है मान्यता है कि उन्हें अमरता का वरदान प्राप्त है और वे आज भी पृथ्वी पर विराजमान हैं हनुमान जी भगवान शिव के अवतार माने जाते हैं और अपने भक्तों के हर संकट को दूर करने वाले हैं जब भी जीवन में भय बाधा या संकट आए तो हनुमान चालीसा का पाठ और राम नाम का जप अत्यंत प्रभावी माना जाता है कहा जाता है कि सच्चे मन से स्मरण करने पर हनुमान जी तुरंत सहायता करते हैं दूसरे जागृत देवता के रूप में काल भैरव का नाम लिया जाता है जो भगवान शिव का रौद्र स्वरूप हैं उनका नाम सुनते ही मन में भय उत्पन्न होता है लेकिन वास्तव में वे अत्यंत दयालु और अपने भक्तों की रक्षा करने वाले देवता हैं काल भैरव की उपासना विशेष रूप से रात्रि में की जाती है और यह पूजा बहुत शीघ्र फल देने वाली मानी जाती है मान्यता है कि उनकी कृपा से शनि और राहु जैसे ग्रहों के दोष भी शांत हो जाते हैं और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं तीसरी जागृत देवी के रूप में मां काली या महाकाली का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है मां काली का स्वरूप भले ही उग्र और रौद्र दिखाई देता हो लेकिन वे अपने भक्तों के लिए अत्यंत ममतामयी और करुणामयी हैं वे अन्याय और अधर्म का नाश करती हैं और अपने भक्तों को हर प्रकार के भय से मुक्त करती हैं जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी आराधना करता है उसके जीवन के कष्ट शीघ्र समाप्त होते हैं और उसे सुरक्षा तथा शक्ति प्राप्त होती है चौथे जागृत देवता के रूप में सूर्य देव का उल्लेख किया जाता है जो प्रत्यक्ष देवता माने जाते हैं क्योंकि वे प्रतिदिन दर्शन देते हैं सूर्य को जल अर्पित करना अत्यंत पुण्यदायी माना गया है इससे व्यक्ति को ऊर्जा आत्मविश्वास सफलता और उत्तम स्वास्थ्य प्राप्त होता है सूर्य उपासना से व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता आती है और उसका व्यक्तित्व निखरता है इसलिए कलयुग में सूर्य देव की पूजा को विशेष महत्व दिया गया है पांचवें जागृत देवता के रूप में भगवान शिव स्वयं भी माने जाते हैं जिन्हें भोलेनाथ कहा जाता है वे अत्यंत सरल स्वभाव के हैं और अपने भक्तों की थोड़ी सी भक्ति से भी प्रसन्न हो जाते हैं शिव की उपासना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और मन को शांति मिलती है जलाभिषेक और महामृत्युंजय मंत्र का जप विशेष फलदायी माना गया है इस प्रकार कलयुग में भी भक्ति का महत्व कम नहीं हुआ है बल्कि सच्चे मन और श्रद्धा से की गई प्रार्थना आज भी उतनी ही प्रभावी है इन जागृत देवी देवताओं की आराधना करके व्यक्ति अपने जीवन की कठिनाइयों को दूर कर सकता है और सुख शांति तथा समृद्धि प्राप्त कर सकता है
MP का चमत्कारी मंदिर, 111 साल से लगातार जल रही अखंड ज्योत, दर्शन करने से मनोकामना होती है पूरी

रायसेन। मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में 250 साल पुराने मां कंकाली मंदिर में 111 साल से अखंड ज्योत जल रही है। मंदिर से जुड़े कई चमत्कारी किस्से भक्तों द्वारा सुनाए जाते हैं। इनमें से एक है कि सामान्य समय में माता की गर्दन थोड़ी टेढ़ी रहती है लेकिन दशहरे के दिन हवन के बाद कुछ क्षणों के लिए उनकी गर्दन सीधी हो जाती है। मंदिर रायसेन जिला मुख्यालय से लगभग 28 किलोमीटर दूर भोजपुर विधानसभा के ग्राम गुदावल में स्थित है। यहां कहा जाता है कि मां कंकाली के दरबार में आने वाले भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है। सपने से मंदिर की स्थापना ग्रामीणों के अनुसार गांव के पटेल हरलाल मीणा को मां ने सपना दिखाया कि इस स्थान पर खुदाई करके उनकी मूर्ति निकाली जाए। सन 1731 में हरलाल मीणा ने खुदाई कराई जिसमें मां कंकाली के साथ ब्रह्मा विष्णु और महेश की मूर्तियाँ भी मिलीं। माता कंकाली की मूर्ति को उसी स्थान पर विराजमान किया गया और तब से यह मंदिर भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी करता आ रहा है। चोरों की आंखों की रोशनी चली गई कहा जाता है कि एक बार मंदिर में चोरी करने वाले चोरों की आंखों की रोशनी चली गई। जब उन्होंने मंदिर में आकर अपनी गलती मानी और मां कंकाली के दरबार में माफी मांगी तभी उनकी दृष्टि वापस आई। 111 साल से जलती अखंड ज्योत मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां आने वाली महिलाओं की गोद सूनी नहीं रहती। लोग अपने बिगड़े कामों की हाजिरी देने और मन्नत पूरी होने पर धन्यवाद देने भी यहां आते हैं। इस मंदिर में लगभग 111 साल से लगातार जल रही अखंड ज्योत इस स्थान की पवित्रता का प्रतीक मानी जाती है। यह मंदिर न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि चमत्कारी घटनाओं और भक्तों की आस्था के कारण भी प्रसिद्ध है।
चैत्र नवरात्रि 2026 दुर्गाष्टमी पर ऐसे करें मां महागौरी की पूजा हर मनोकामना होगी पूर्ण

नई दिल्ली । चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व हिंदू धर्म में अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है और इसके आठवें दिन आने वाली दुर्गाष्टमी या महाष्टमी का विशेष महत्व होता है यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी को समर्पित माना जाता है जो शुद्धता शांति और सौभाग्य की प्रतीक हैं इस दिन विधि विधान से पूजा करने पर भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होने की मान्यता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है दृक पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि 25 मार्च 2026 को दोपहर 1 बजकर 50 मिनट से प्रारंभ होगी और 26 मार्च 2026 को सुबह 11 बजकर 48 मिनट तक रहेगी उदय तिथि के अनुसार दुर्गाष्टमी 26 मार्च को मनाई जाएगी इसलिए इस दिन पूजा और कन्या पूजन का विशेष महत्व रहेगा दुर्गाष्टमी के दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए इसके बाद पूजा स्थल को साफ कर लाल या पीला वस्त्र बिछाकर मां महागौरी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें पूजा के दौरान कुमकुम रोली अक्षत चंदन और पुष्प अर्पित करें तथा घी या कपूर का दीपक जलाएं इसके बाद पूरे श्रद्धा भाव से मां का ध्यान करते हुए उनके मूल मंत्र ॐ देवी महागौर्यै नमः का कम से कम 108 बार जाप करें साथ ही दुर्गा सप्तशती या महागौरी स्तोत्र का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है मां महागौरी का स्वरूप अत्यंत शांत और दिव्य माना जाता है वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं और वृषभ पर विराजमान रहती हैं उनके चार हाथों में त्रिशूल और डमरू शोभा देते हैं उनकी पूजा करने से जीवन के पापों का नाश होता है मन की शुद्धि होती है और भय तथा नकारात्मकता दूर होती है इस दिन मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है जैसे खीर नारियल केले पंचामृत और अन्य सात्विक मिठाइयां भोग लगाते समय मंत्र जाप करना चाहिए और बाद में प्रसाद सभी में बांटना चाहिए इससे मां की कृपा प्राप्त होती है और घर में सुख समृद्धि बनी रहती है दुर्गाष्टमी के दिन कन्या पूजन का भी अत्यधिक महत्व है इस दिन छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है उनके पैर धोकर तिलक लगाया जाता है और उन्हें चुनरी फूल मिठाई और दक्षिणा भेंट की जाती है ऐसा करने से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न होती हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं इसके अलावा इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से भी जीवन की बाधाएं दूर होती हैं पितृ दोष या कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए चांदी के नाग नागिन की पूजा कर उन्हें नदी में प्रवाहित करना शुभ माना जाता है साथ ही पीपल के वृक्ष पर जल चढ़ाकर सरसों के तेल का दीपक जलाने से घर में सुख शांति और समृद्धि का वास होता है दुर्गाष्टमी का यह पावन दिन भक्तों के लिए आध्यात्मिक उन्नति और आस्था का प्रतीक है यदि इस दिन पूरी श्रद्धा और नियम के साथ मां महागौरी की पूजा की जाए तो जीवन में शांति सफलता और खुशहाली का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है
नवरात्रि का 6वां दिन: मां कात्यायनी की पूजा से मिलेंगे विशेष लाभ, जानिए पूजा विधि और मंत्र

नई दिल्ली। चैत्र नवरात्रि का आज मंगलवार को छठवां दिन है। मां कात्यायनी नवरात्रि के छठे दिन पूजी जाने वाली देवी दुर्गा का छठा स्वरूप हैं। मां कात्यायनी की पूजा करने से जीवन में साहस, धर्म और विजय की प्राप्ति होती है। देवी पुराणों और विशेष रूप से देवी भागवत पुराण में मां कात्यायनी को आदिशक्ति का अत्यंत शक्तिशाली स्वरूप बताया गया है। मां कात्यायनी का स्वरूप मां कात्यायनी का वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला और उनका रूप अत्यंत तेज से परिपूर्ण है। उनका वाहन सिंह है और वे चार भुजाओं में तलवार और कमल धारण किए हुए हैं। एक हाथ अभय मुद्रा और दूसरा वर मुद्रा में है। देवी पुराणों में उनका स्वरूप दिव्य, तेजपूर्ण और युद्धशील बताया गया है। पूजा करने के लाभपौराणिक मान्यता के अनुसार, महर्षि कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उनके घर पुत्री रूप में जन्म लिया, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। मां कात्यायनी की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, विवाह में बाधाएं समाप्त होती हैं और नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। विशेष रूप से कुंवारी कन्याओं के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। यह देवी शत्रुओं पर विजय, आत्मबल और साहस में वृद्धि का प्रतीक भी हैं। मां कात्यायनी की पूजा विधिसुबह स्नान कर नारंगी रंग के कपड़े पहनें, क्योंकि मंगलवार को यह रंग शुभ माना जाता है। मां को नारंगी फूल जैसे गेंदा अर्पित करें, कुमकुम और अक्षत चढ़ाएं। माता के समक्ष एक पान चढ़ाएं और अपनी मनोकामना कहकर देवी से प्रार्थना करें। माता की कथा पढ़ें और सुबह-शाम आरती करें। इस दिन दान में लोगों को संतरा, शहद, कपड़े और जूते-चप्पल आदि दान करें। विवाहितों को पूजा के बाद सुहाग की सामग्री भी दान करनी चाहिए। मां कात्यायनी का भोगमां कात्यायनी को शहद का भोग अर्पित करना चाहिए। इसके अलावा हलवा या मीठा पान भी भोग में लगाया जा सकता है। मां कात्यायनी का मंत्रमूल बीज मंत्र है: “ॐ देवी कात्यायन्यै नमः”। विवाह प्राप्ति के लिए विशेष मंत्र: “कात्यायनि महामाये महायोगिन्यधीश्वरि। नन्दगोपसुतं देवि पतिं मे कुरु ते नमः॥”। तांत्रिक मंत्र है: “ॐ ह्रीं क्लीं कात्यायन्यै नमः”। मंत्र जाप का सबसे प्रभावी समय ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) माना गया है। नवरात्रि में किए गए जाप का प्रभाव कई गुना अधिक होता है। मंत्र का कम से कम 108 बार (एक माला) जाप करना चाहिए। मां कात्यायनी की आरती जय जय अम्बे, जय कात्यायनी,जय जगमाता, जग की महारानी।बैजनाथ स्थान तुम्हारा,वहां वरदाती नाम पुकारा।कई नाम हैं, कई धाम हैं,यह स्थान भी तो सुखधाम है।हर मंदिर में जोत तुम्हारी,कहीं योगेश्वरी महिमा न्यारी।हर जगह उत्सव होते रहते,हर मंदिर में भक्त हैं कहते।कात्यायनी रक्षक काया की,ग्रंथि काटे मोह माया की।झूठे मोह से छुड़ाने वाली,जय जय अम्बे, जय कात्यायनी।जय जगमाता, जग की महारानी,अपना नाम जपाने वाली।बृहस्पतिवार को पूजा करियो,ध्यान कात्यायनी का धरियो।हर संकट को दूर करेगी,भंडारे भरपूर करेगी।जो भी मां को भक्त पुकारे,कात्यायनी सब कष्ट निवारे।जय जय अम्बे, जय कात्यायनी,जय जगमाता, जग की महारानी। (नोट- यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हम किसी भी तरह की मान्यता व परिणाम की पुष्टि नहीं करते हैं।)