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शनि प्रदोष 2026: आज शिवजी और शनि देव की कृपा पाने का शुभ संयोग, देखें आज का पंचांग

नई दिल्ली।  Aaj Ka Panchang 27 June 2026: आज शनिवार के दिन शनि प्रदोष व्रत का पावन संयोग है। त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है, वहीं शनिवार होने के कारण इस दिन शनि देव की उपासना का भी विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक भगवान शिव और शनि देव की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और शुभ फलों की प्राप्ति होती है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिन लोगों पर शनि की साढ़ेसाती, ढैया या अन्य शनि दोष का प्रभाव है, उन्हें आज शिवलिंग पर जल और बेलपत्र अर्पित करने के साथ शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। 27 जून 2026 का पंचांग दिन: शनिवार तिथि: त्रयोदशी (शनि प्रदोष व्रत) सूर्योदय: प्रातः 5:47 बजे सूर्यास्त: शाम 7:12 बजे चंद्रोदय: शाम 5:17 बजे चंद्रास्त: 28 जून प्रातः 3:58 बजे नोट: सूर्योदय और सूर्यास्त का समय शहर के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। आज के शुभ मुहूर्त ब्रह्म मुहूर्त: प्रातः 4:11 बजे से 4:59 बजे तक अमृत काल: सुबह 10:29 बजे से दोपहर 12:17 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:03 बजे से 12:56 बजे तक आज के अशुभ मुहूर्त राहुकाल: सुबह 9:08 बजे से 10:49 बजे तक यमगंड: दोपहर 2:10 बजे से 3:51 बजे तक कुलिक काल: प्रातः 5:47 बजे से 7:28 बजे तक दुर्मुहूर्त: सुबह 7:34 बजे से 8:28 बजे तक वर्ज्य काल: प्रातः 4:28 बजे से 6:16 बजे तक शनि प्रदोष का धार्मिक महत्व शनि प्रदोष व्रत को भगवान शिव और शनि देव दोनों की कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव की आराधना करने वाले भक्तों पर शनि देव की विशेष कृपा बनी रहती है। इस दिन विधि-विधान से पूजा, रुद्राभिषेक, शिव मंत्रों का जाप तथा दीपदान करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

तमिलनाडु का श्री लक्ष्मी नारायणी स्वर्ण मंदिर, जहां 1500 किलो सोने से बनी है भव्य आस्था की पहचान

वेल्लूर। तमिलनाडु का वेल्लूर जिला केवल अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे भव्य स्वर्ण मंदिरों में शामिल श्री लक्ष्मी नारायणी स्वर्ण मंदिर के लिए भी प्रसिद्ध है। चेन्नई से लगभग 145 किलोमीटर दूर और वेल्लूर शहर से करीब 7 किलोमीटर स्थित थिरूमलाई कोडी में बना यह मंदिर अपनी अद्भुत वास्तुकला और दिव्य आभा के कारण देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करता है। करीब 1500 किलो सोने से सजा मंदिर मंदिर प्रबंधन के अनुसार इस भव्य मंदिर के निर्माण और स्वर्ण परत चढ़ाने में लगभग 1500 किलोग्राम शुद्ध सोने का उपयोग किया गया। इस स्वर्ण अलंकरण पर करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक की लागत आई थी। मंदिर का निर्माण पूरा होने में लगभग सात वर्ष का समय लगा। 100 एकड़ में फैला भव्य परिसर श्री लक्ष्मी नारायणी मंदिर का पूरा परिसर लगभग 100 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है। चारों ओर हरियाली, आकर्षक उद्यान और शांत वातावरण श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करते हैं। मंदिर को आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए 24 अगस्त 2007 को खोला गया था। अनोखी दर्शन व्यवस्था इस मंदिर की दर्शन व्यवस्था भी काफी विशेष मानी जाती है। श्रद्धालु दक्षिण दिशा से प्रवेश करते हैं और घड़ी की दिशा में बने पथ पर चलते हुए पूरे परिसर की परिक्रमा करते हैं। इसके बाद वे मुख्य गर्भगृह में भगवान श्री लक्ष्मी नारायण के दर्शन करते हैं और फिर निर्धारित मार्ग से बाहर निकलते हैं। परिसर के उत्तर भाग में एक सुंदर जलाशय भी बनाया गया है, जो इसकी सुंदरता को और बढ़ाता है। रात में दिखता है दिव्य नजारा सूर्यास्त के बाद जब मंदिर में विशेष प्रकाश व्यवस्था की जाती है, तब सोने से सजा पूरा परिसर अद्भुत चमक से जगमगा उठता है। रात के समय मंदिर का दृश्य श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए किसी अलौकिक अनुभव से कम नहीं होता। 27 फीट ऊंची दीपमाला है प्रमुख आकर्षण मंदिर परिसर में लगभग 27 फीट ऊंची विशाल दीपमाला भी स्थापित की गई है। शाम के समय जब इसमें एक साथ दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, तो पूरा परिसर सुनहरी रोशनी से दमक उठता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी के दर्शन के बाद इस दीपमाला के दर्शन करना अत्यंत शुभ माना जाता है। आज श्री लक्ष्मी नारायणी स्वर्ण मंदिर न केवल दक्षिण भारत का प्रमुख धार्मिक स्थल है, बल्कि अपनी अनूठी वास्तुकला, स्वर्णिम भव्यता और आध्यात्मिक वातावरण के कारण भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में भी अपनी अलग पहचान बना चुका है।

रक्षाबंधन और हरियाली अमावस्या पर ग्रहण का साया? जानिए भारत में सूतक काल रहेगा या नहीं

नई दिल्ली। वर्ष 2026 में कुल चार ग्रहण लगने हैं, जिनमें से दो पहले ही हो चुके हैं। अब साल के बाकी दो ग्रहण अगस्त महीने में पड़ेंगे। खास बात यह है कि दोनों ग्रहण सावन मास की दो अत्यंत महत्वपूर्ण तिथियों हरियाली अमावस्या और रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा) पर लग रहे हैं। ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या इन ग्रहणों का असर पूजा-पाठ और त्योहारों पर पड़ेगा? ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार ग्रहण का प्रभाव तभी माना जाता है, जब वह संबंधित स्थान पर दिखाई देता हो। इस बार दोनों ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देंगे, इसलिए यहां सूतक काल मान्य नहीं होगा और धार्मिक कार्य सामान्य रूप से किए जा सकेंगे। 12 अगस्त 2026 को लगेगा वलयाकार सूर्य ग्रहण साल का दूसरा सूर्य ग्रहण 12 अगस्त 2026 को लगेगा। हिंदू पंचांग के अनुसार इस दिन श्रावण अमावस्या (हरियाली अमावस्या) होगी, जिसे भगवान शिव की पूजा और पितरों के तर्पण के लिए विशेष माना जाता है। भारतीय समयानुसार यह सूर्य ग्रहण रात 9:04 बजे शुरू होकर 13 अगस्त की सुबह 4:25 बजे समाप्त होगा। चूंकि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए इसका सूतक काल लागू नहीं होगा। श्रद्धालु हरियाली अमावस्या के सभी धार्मिक कार्य और शिव पूजा सामान्य रूप से कर सकेंगे। 28 अगस्त को रक्षाबंधन पर लगेगा चंद्र ग्रहण साल का दूसरा और अंतिम चंद्र ग्रहण 28 अगस्त 2026 को लगेगा। यह एक आंशिक चंद्र ग्रहण होगा, जिसमें चंद्रमा का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा पृथ्वी की छाया से ढक जाएगा। भारतीय समयानुसार ग्रहण सुबह 6:53 बजे शुरू होकर दोपहर 12:31 बजे समाप्त होगा। लेकिन दिन के समय होने और भारत में दिखाई न देने के कारण इसका भी सूतक काल मान्य नहीं होगा।रक्षाबंधन पर नहीं पड़ेगा कोई असर 28 अगस्त को श्रावण पूर्णिमा होने के कारण इसी दिन देशभर में रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाएगा। चूंकि चंद्र ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा, इसलिए राखी बांधने, पूजा करने और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई प्रतिबंध नहीं रहेगा। श्रद्धालु शुभ मुहूर्त में सामान्य रूप से रक्षाबंधन का पर्व मना सकेंगे। ग्रहण के दौरान क्या रहेगा नियम? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यदि ग्रहण किसी स्थान पर दिखाई नहीं देता, तो वहां उसका सूतक काल प्रभावी नहीं माना जाता। ऐसे में भारत में रहने वाले लोगों को इन दोनों ग्रहणों के कारण पूजा-पाठ, व्रत, दान या त्योहारों को लेकर चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। हरियाली अमावस्या और रक्षाबंधन दोनों पर्व पूरे विधि-विधान के साथ मनाए जा सकेंगे।

29 जून से बुध का बड़ा गोचर, मिथुन, धनु और वृषभ राशि के लिए चुनौती भरा समय शुरू

नई दिल्ली । वैदिक ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि, तर्क, वाणी, व्यापार, शिक्षा, संचार और निर्णय क्षमता का कारक माना जाता है। जब बुध अपनी सामान्य चाल छोड़कर वक्री यानी उल्टी गति से चलते हैं, तब इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन के कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर देखने को मिलता है। 29 जून 2026 से 23 जुलाई 2026 तक बुध ग्रह वक्री रहेंगे। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह अवधि कई लोगों के लिए आत्ममंथन और पुराने कार्यों की समीक्षा का समय होगी, लेकिन विशेष रूप से मिथुन, धनु और वृषभ राशि के जातकों को इस दौरान अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। मिथुन राशि वालों के लिए बढ़ सकता है आर्थिक दबाव मिथुन राशि के स्वामी स्वयं बुध ग्रह हैं। ऐसे में इस राशि पर बुध की वक्री चाल का प्रभाव सबसे अधिक पड़ सकता है। इस दौरान अचानक खर्च बढ़ने से आर्थिक संतुलन बिगड़ सकता है। नौकरीपेशा लोगों को कार्यस्थल पर संवाद में सावधानी रखनी होगी, क्योंकि छोटी-सी गलतफहमी भी विवाद का कारण बन सकती है। परिवार और मित्रों के साथ बातचीत में संयम बनाए रखना जरूरी होगा। जल्दबाजी में लिया गया कोई फैसला भविष्य में परेशानी खड़ी कर सकता है। धनु राशि वालों को व्यापार और स्वास्थ्य में बरतनी होगी सावधानीधनु राशि के जातकों के लिए यह समय मानसिक तनाव और असमंजस लेकर आ सकता है। व्यापार करने वालों को उम्मीद के मुताबिक लाभ मिलने में देरी हो सकती है, जबकि निवेश से जुड़े फैसलों में नुकसान की आशंका बनी रहेगी। नौकरी करने वाले लोगों को भी कार्यस्थल पर धैर्य बनाए रखने की सलाह दी जाती है। स्वास्थ्य के लिहाज से भी यह समय थोड़ा चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। पुरानी बीमारियां दोबारा परेशान कर सकती हैं, इसलिए नियमित जांच और संतुलित दिनचर्या अपनाना लाभदायक रहेगा। वृषभ राशि वालों के काम में आ सकती हैं रुकावटें वृषभ राशि के लिए बुध का वक्री होना संचार, पराक्रम और योजनाओं से जुड़े मामलों को प्रभावित कर सकता है। मीडिया, लेखन, डिजिटल मार्केटिंग, विज्ञापन या सोशल मीडिया से जुड़े लोगों को बार-बार काम में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। किसी भी नए निवेश या बड़े आर्थिक फैसले को कुछ समय के लिए टालना बेहतर रहेगा। साथ ही अपनी भविष्य की योजनाओं को दूसरों के साथ साझा करने से बचें, क्योंकि गोपनीयता बनाए रखना इस समय अधिक लाभदायक साबित हो सकता है। बुध वक्री के दौरान किन बातों का रखें विशेष ध्यान ज्योतिष शास्त्र के अनुसार बुध की वक्री अवधि में नए कारोबार की शुरुआत करने से बचना चाहिए। किसी भी कानूनी, बैंकिंग या वित्तीय दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे अच्छी तरह पढ़ लें। वाहन, प्रॉपर्टी, महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान या अन्य बड़ी खरीदारी भी इस अवधि में टालना बेहतर माना जाता है। महत्वपूर्ण निर्णय सोच-समझकर लें और भावनाओं में बहकर कोई कदम न उठाएं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान बुधवार के दिन भगवान गणेश और भगवान विष्णु की पूजा करना, हरे रंग की वस्तुओं का दान करना तथा बुध मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। हालांकि ज्योतिषीय भविष्यवाणियां पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित होती हैं और इन्हें व्यक्तिगत निर्णय का एकमात्र आधार नहीं बनाना चाहिए। विवेकपूर्ण सोच, धैर्य और सही योजना के साथ इस अवधि को सकारात्मक तरीके से पार किया जा सकता है।

आज शनि प्रदोष व्रत, बन रहा दुर्लभ संयोग, जानिए पूजा का शुभ समय और मुहूर्त

नई दिल्ली। आज, 27 जून 2026 को शनि प्रदोष व्रत का विशेष और दुर्लभ संयोग बना है। शनिवार को पड़ने वाली त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला यह व्रत धार्मिक दृष्टि से अत्यंत शुभ माना जाता है। इस दिन भगवान शिव की आराधना के साथ शनिदेव की पूजा का भी विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से शिव एवं शनिदेव दोनों की कृपा प्राप्त होती है। शनि प्रदोष व्रत का महत्वहिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। जब यह तिथि शनिवार को आती है, तब इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है और इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव और उनके परिवार की पूजा करने से जीवन में सुख-समृद्धि, दीर्घायु और मानसिक शांति का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या अन्य अशुभ प्रभावों से राहत मिलने की भी मान्यता है। पूजा का शुभ मुहूर्तप्रदोष व्रत में प्रदोष काल को सबसे शुभ समय माना गया है। आज 27 जून 2026 को प्रदोष काल शाम 7:04 बजे से रात 9:06 बजे तक रहेगा। इसी अवधि में भगवान शिव की पूजा करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है। इसके अलावा दिन का अभिजित मुहूर्त दोपहर 1:21 बजे से 2:26 बजे तक रहेगा, जो शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। पूजा की विधिव्रत के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूरे दिन उपवास का संकल्प लें। प्रदोष काल में सबसे पहले शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से पंचामृत अभिषेक करें। पूजा के दौरान भगवान शिव को सफेद चंदन, सफेद पुष्प, भांग, धतूरा, अक्षत और शमी पत्र अर्पित करें। चूंकि यह शनि प्रदोष है, इसलिए शमी पत्र का विशेष महत्व माना गया है। इसके बाद भगवान गणेश, माता पार्वती, कार्तिकेय और नंदी महाराज का स्मरण करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ या ‘श्री शिवाय नमस्तुभ्यं’ मंत्र का जप करें। अंत में भगवान शिव की आरती कर घर में बनी शुद्ध खीर का भोग अर्पित करें। व्रत पारण का समयशनि प्रदोष व्रत का पारण अगले दिन 28 जून 2026 को सूर्योदय के बाद किया जाएगा। श्रद्धालु सुबह 5:49 बजे के बाद व्रत का पारण कर सकते हैं। विशेष उपायधन-समृद्धि की कामना रखने वाले श्रद्धालु प्रदोष काल में दूध में केसर मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करें। वहीं परिवार की सुख-शांति और कष्टों से मुक्ति के लिए जौ के आटे की रोटियां बनाकर गाय के बछड़े को खिलाना शुभ और फलदायी माना गया है।

30 जून से राहु बदलेंगे नक्षत्र, अंगारक योग का असर मेष, कन्या और धनु राशि पर कैसा रहेगा?

नई दिल्ली । वैदिक ज्योतिष में राहु को रहस्यमयी और मायावी ग्रह माना जाता है, जबकि मंगल ऊर्जा, साहस और पराक्रम के प्रतीक हैं। 30 जून 2026 को राहु धनिष्ठा नक्षत्र में प्रवेश करेंगे, जिसका स्वामी मंगल है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यह परिवर्तन अंगारक योग के प्रभाव को बढ़ा सकता है। इस दौरान कुछ राशियों के लिए करियर, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा में सकारात्मक बदलाव के संकेत माने जाते हैं। हालांकि, किसी भी व्यक्ति पर इसका वास्तविक प्रभाव उसकी जन्म कुंडली, ग्रहों की दशा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर निर्भर करता है। क्या है अंगारक योग? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राहु और मंगल का विशेष संबंध बनने पर अंगारक योग का प्रभाव माना जाता है। यह योग व्यक्ति में साहस, महत्वाकांक्षा और जोखिम उठाने की क्षमता बढ़ा सकता है, लेकिन साथ ही क्रोध, आवेग और जल्दबाजी में फैसले लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ा सकता है। कुछ ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इस दौरान तकनीक, शेयर बाजार, राजनीति और कारोबारी गतिविधियों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं। इन 3 राशियों के लिए शुभ माने जा रहे हैं योग मेष राशि मेष राशि के जातकों के लिए यह गोचर आत्मविश्वास और पराक्रम बढ़ाने वाला माना जा रहा है। लंबे समय से अटके हुए कार्य पूरे होने की संभावना बन सकती है। कार्यस्थल पर आपकी मेहनत की सराहना हो सकती है और नए अवसर प्राप्त हो सकते हैं। कन्या राशि कन्या राशि वालों के लिए करियर और व्यापार में प्रगति के संकेत हैं। रुकी हुई पदोन्नति मिलने, आय बढ़ने और अचानक आर्थिक लाभ के अवसर बनने की संभावना मानी जा रही है। नए व्यावसायिक संपर्क भी लाभकारी साबित हो सकते हैं। धनु राशि धनु राशि के जातकों के लिए यह समय आय के नए स्रोत विकसित करने वाला हो सकता है। सामाजिक सम्मान बढ़ सकता है और निवेश से जुड़े मामलों में सोच-समझकर लिया गया निर्णय लाभदायक साबित हो सकता है। इस दौरान किन बातों का रखें विशेष ध्यान? ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार अंगारक योग के दौरान— जल्दबाजी में बड़े फैसले लेने से बचें। क्रोध और आवेग पर नियंत्रण रखें। निवेश या आर्थिक निर्णय पूरी जानकारी के बाद ही लें। विवादों और अनावश्यक बहस से दूरी बनाए रखें। पारंपरिक ज्योतिषीय उपाय अंगारक योग के प्रभाव को संतुलित करने के लिए पारंपरिक रूप से ये उपाय बताए जाते हैं— प्रत्येक मंगलवार हनुमान चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। भगवान हनुमान की पूजा करें। जरूरतमंद लोगों की सहायता करें। मूक पशुओं को गुड़ और रोटी खिलाएं। धैर्य और विवेक के साथ निर्णय लें।महत्वपूर्ण सूचना यह लेख वैदिक ज्योतिष की पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित है। इसमें बताए गए फल और उपाय वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं हैं तथा इन्हें निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी महत्वपूर्ण आर्थिक, निवेश, करियर या व्यक्तिगत निर्णय के लिए योग्य विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

Guru Gochar 2026: कर्क राशि में गुरु का गोचर, इन 4 राशियों के लिए बन सकते हैं धन लाभ के योग

नई दिल्ली । वैदिक ज्योतिष में देवगुरु बृहस्पति को ज्ञान, धर्म, सुख, समृद्धि, संतान, शिक्षा और धन का कारक ग्रह माना जाता है। जब भी गुरु अपनी राशि बदलते हैं, तो ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इसका प्रभाव सभी 12 राशियों पर अलग-अलग रूप में पड़ता है। 5 जून 2026 को गुरु का कर्क राशि में प्रवेश होने जा रहा है। कर्क राशि में गुरु को उच्च (Exalted) माना जाता है। इसलिए कई ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह गोचर कुछ राशियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो सकता है। हालांकि, किसी व्यक्ति के जीवन पर वास्तविक प्रभाव उसकी जन्म कुंडली, दशा और अन्य ग्रहों की स्थिति पर भी निर्भर करता है। आर्थिक दृष्टि से क्यों खास माना जाता है यह गोचर? ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार गुरु के कर्क राशि में प्रवेश से— आय के नए स्रोत बनने की संभावना बढ़ सकती है। निवेश से जुड़े अच्छे अवसर मिल सकते हैं। करियर में उन्नति के योग बन सकते हैं। व्यापार में नई साझेदारियां लाभदायक साबित हो सकती हैं। बचत और वित्तीय योजना मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। इन 4 राशियों के लिए शुभ मानी जा रही है अवधि मेष राशि मेष राशि के जातकों के लिए यह समय करियर में प्रगति का संकेत दे सकता है। नौकरी में नई जिम्मेदारियां मिलने, पदोन्नति के अवसर बनने और वरिष्ठ अधिकारियों से सहयोग मिलने की संभावना है। पारिवारिक संपत्ति से जुड़े मामलों में भी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। मिथुन राशि मिथुन राशि वालों के लिए आर्थिक स्थिति में सुधार के संकेत माने जा रहे हैं। लंबे समय से रुके हुए धन की प्राप्ति या आय के नए स्रोत बनने की संभावना बन सकती है। परिवार में सुखद वातावरण रहने के योग भी बताए गए हैं। सिंह राशि सिंह राशि के जातकों के लिए यह समय निवेश और नए व्यवसाय की शुरुआत के लिहाज से अनुकूल माना जा रहा है। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है और कार्यक्षेत्र में आपकी पहचान मजबूत बनने के संकेत हैं। धनु राशि धनु राशि वालों के अधूरे कार्य पूरे होने की संभावना बन सकती है। धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों में रुचि बढ़ सकती है। पारिवारिक संबंध बेहतर होने और स्वास्थ्य में सुधार के भी योग बताए गए हैं। गुरु के शुभ प्रभाव के लिए पारंपरिक उपाय ज्योतिष शास्त्र में गुरु ग्रह को मजबूत करने के लिए कुछ उपाय बताए गए हैं— प्रत्येक गुरुवार को भगवान विष्णु या देवगुरु बृहस्पति की पूजा करें। “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः” मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप करें। जरूरतमंद लोगों को पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी या बेसन से बनी मिठाई का दान करें। केले के वृक्ष या भगवान विष्णु को पीले फूल अर्पित करें। गुरुजनों और शिक्षकों का सम्मान करें। ध्यान रखें यह सभी फल वैदिक ज्योतिष की पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इन्हें निश्चित भविष्यवाणी या वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। किसी भी महत्वपूर्ण आर्थिक, निवेश या करियर संबंधी निर्णय से पहले विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

क्या घर की खुशबू बदल सकती है भाग्य? जानिए वास्तु शास्त्र में सुगंध का महत्व

नई दिल्ली । घर की साफ-सफाई और सजावट जितनी महत्वपूर्ण होती है, उतना ही महत्व वहां के वातावरण का भी माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार, कुछ प्राकृतिक सुगंध घर में सकारात्मक ऊर्जा का माहौल बनाने में सहायक मानी जाती हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इन मान्यताओं का वैज्ञानिक प्रमाण सीमित है और इन्हें पारंपरिक विश्वासों के रूप में देखा जाता है। अगर आप घर का माहौल शांत और सुखद बनाना चाहते हैं, तो इन प्राकृतिक सुगंधों का उपयोग कर सकते हैं। चंदन चंदन की सुगंध को पवित्रता और शांति का प्रतीक माना जाता है। वास्तु मान्यताओं के अनुसार, यह घर के वातावरण को सकारात्मक बनाए रखने में सहायक मानी जाती है। मोगरा मोगरे की भीनी-भीनी खुशबू मन को सुकून देती है। यह तनाव कम करने और घर में ताजगी का एहसास कराने के लिए लोकप्रिय है। पारिजात हरसिंगार के फूलों की सुगंध को शांति और सकारात्मक वातावरण से जोड़ा जाता है। कई लोग इसे घर के आंगन या बगीचे में लगाना शुभ मानते हैं। केवड़ा केवड़े की ठंडी और मनमोहक खुशबू मानसिक शांति का अनुभव कराती है। इसकी सुगंध ध्यान और एकाग्रता के लिए भी पसंद की जाती है। लैवेंडर लैवेंडर की खुशबू तनाव कम करने और अच्छी नींद के लिए दुनियाभर में लोकप्रिय है। अरोमाथेरेपी में भी इसका व्यापक उपयोग किया जाता है। दालचीनी दालचीनी की गर्म और मीठी महक घर में आरामदायक माहौल बनाने में मदद करती है। इसकी सुगंध सर्द मौसम में विशेष रूप से पसंद की जाती है। पुदीना  पुदीने की ताजगीभरी खुशबू मन को तरोताजा रखने और वातावरण में ताजगी का एहसास कराने के लिए जानी जाती है। लेमन ग्रास लेमन ग्रास की हल्की साइट्रस सुगंध घर को फ्रेश महसूस कराती है और कई लोग इसे प्राकृतिक एयर फ्रेशनर के रूप में इस्तेमाल करते हैं।  कपूर पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाला कपूर वातावरण को सुगंधित बनाने के साथ-साथ पारंपरिक रूप से पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। गुलाब गुलाब की खुशबू प्रेम, शांति और सकारात्मक भावनाओं का प्रतीक मानी जाती है। यह घर के वातावरण को सुखद बनाने में मदद करती है। सुगंध का सही उपयोग कैसे करें? घर में प्राकृतिक फूलों का इस्तेमाल करें। एसेंशियल ऑयल डिफ्यूजर का उपयोग कर सकते हैं। कृत्रिम तेज केमिकल वाली खुशबुओं की बजाय प्राकृतिक सुगंध चुनें। घर में नियमित सफाई और उचित वेंटिलेशन बनाए रखें, ताकि ताजगी बनी रहे। ध्यान रखें वास्तु शास्त्र में इन सुगंधों को शुभ माना जाता है, लेकिन आर्थिक सफलता, स्वास्थ्य या भाग्य पर इनके प्रभाव के दावों के पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी प्राकृतिक और मनभावन खुशबुएं तनाव कम करने, मन को शांत रखने और घर का माहौल सुखद बनाने में निश्चित रूप से मदद कर सकती हैं।

दीपक जलाने में न करें ये गलतियां, वरना पूजा का पूरा फल हो सकता है प्रभावित

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के दौरान दीपक जलाने का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दीपक केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं है बल्कि यह सकारात्मक ऊर्जा, ज्ञान, समृद्धि और आध्यात्मिक शक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। इसलिए घर के मंदिर या किसी भी पूजा स्थल पर दीपक जलाते समय शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है। मान्यता है कि विधि-विधान से जलाया गया दीपक घर में सुख, शांति और समृद्धि लाता है। वहीं नियमों की अनदेखी करने से पूजा का पूर्ण फल प्राप्त नहीं हो पाता। ऐसे में दीपक जलाने का सही समय, दिशा, मंत्र और विधि जानना जरूरी है। दीपक जलाने का सही समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दिन में दो बार दीपक जलाना शुभ माना जाता है। पहला दीपक सूर्योदय के समय और दूसरा सूर्यास्त के बाद संध्या काल में जलाना चाहिए। सुबह लगभग 5 बजे से 7 बजे के बीच तथा शाम को 5:30 बजे से 7:30 बजे के बीच दीपक जलाना शुभ माना जाता है। मौसम और स्थान के अनुसार समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है। शाम के समय मुख्य द्वार पर दीपक जलाने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि इससे माता लक्ष्मी का घर में आगमन होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ता है। दीपक जलाने की सही विधि पूजा के लिए मिट्टी, पीतल या तांबे का दीपक उपयोग किया जा सकता है। दीपक जलाने से पहले उसे अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए। यदि मिट्टी का दीपक हो तो उसे कुछ समय पानी में भिगोकर सुखा लेना उचित माना जाता है। इसके बाद दीपक में गाय का घी, तिल का तेल या सरसों का तेल डालें। बाती को अच्छी तरह घी या तेल में भिगोकर दीपक में स्थापित करें। ध्यान रखें कि दीपक टूटा हुआ, खंडित या गंदा न हो क्योंकि इसे अशुभ माना जाता है। एक दीपक की लौ से दूसरा दीपक जलाने से भी बचना चाहिए। साथ ही दीपक में पर्याप्त तेल या घी रखें ताकि वह बीच में बुझ न जाए। दीपक जलाते समय करें इस मंत्र का जाप दीपक प्रज्वलित करते समय इस मंत्र का उच्चारण करना शुभ माना जाता है— शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा।शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते॥ मान्यता है कि इस मंत्र के जाप से दीपक की आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और घर में सकारात्मक वातावरण बनता है। दीपक जलाने की सही दिशा शास्त्रों के अनुसार घी का दीपक भगवान के दाईं ओर तथा तेल का दीपक बाईं ओर रखना चाहिए। दीपक की लौ का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना शुभ माना गया है। पूर्व दिशा में रखा गया दीपक आयु और यश में वृद्धि का प्रतीक माना जाता है। वहीं उत्तर दिशा में दीपक रखने से धन, वैभव और समृद्धि प्राप्त होने की मान्यता है। दक्षिण दिशा को यम और पितरों की दिशा माना गया है। इसलिए सामान्य पूजा में इस दिशा में दीपक नहीं रखा जाता। विशेष पितृ कर्म या धार्मिक अवसरों पर ही इसका उपयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा, नियम और विधि के साथ जलाया गया दीपक जीवन में सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है तथा घर के वातावरण को पवित्र बनाता है।

शनि प्रदोष व्रत 2026: शिव-शनि की कृपा से मिलेगा ऋण मुक्ति का आशीर्वाद, जानें चमत्कारी उपाय

नई दिल्ली । ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर पड़ने वाला शनि प्रदोष व्रत इस वर्ष 27 जून 2026 को मनाया जाएगा। शनिवार के दिन प्रदोष व्रत होने के कारण इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और शनि देव दोनों की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसे में जो लोग लंबे समय से कर्ज के बोझ तले दबे हैं या आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हैं उनके लिए यह दिन विशेष फलदायी माना जाता है। पंचांग के अनुसार त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 26 जून की रात 10:22 बजे से होगी और 28 जून की मध्यरात्रि 12:43 बजे तक रहेगी। प्रदोष काल को ध्यान में रखते हुए 27 जून को व्रत और पूजा की जाएगी। इस दौरान भगवान शिव की आराधना और शनि देव की उपासना करने से जीवन की अनेक बाधाएं दूर होने की मान्यता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णित मान्यताओं के अनुसार शनि प्रदोष व्रत पर शिवलिंग का विशेष अभिषेक करना अत्यंत शुभ माना जाता है। प्रदोष काल में काले तिल मिले जल से शिवलिंग का अभिषेक करने और भगवान शिव का ध्यान करने से ऋण संबंधी समस्याओं में राहत मिलने की मान्यता है। श्रद्धापूर्वक की गई यह पूजा आर्थिक संकटों को कम करने का मार्ग प्रशस्त कर सकती है। शिव पुराण में वर्णित ऋणमुक्तेश्वर महादेव की उपासना भी इस दिन विशेष फलदायी मानी गई है। मान्यता है कि शनि प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करते हुए ऋणमुक्तेश्वर महादेव का स्मरण करने से भारी से भारी कर्ज से मुक्ति का मार्ग खुल सकता है। यह उपाय आर्थिक स्थिरता और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता है। दान को भी शनि प्रदोष व्रत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। जरूरतमंद लोगों को काले तिल, सरसों का तेल या काले वस्त्र दान करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इससे जीवन में आर्थिक उन्नति के नए अवसर प्राप्त होते हैं और कर्ज का बोझ कम होने लगता है। यदि धन संबंधी परेशानियां लगातार बनी हुई हैं तो शनि मंदिर में सरसों के तेल का दीपक जलाकर ॐ शं शनैश्चराय नमः मंत्र का जाप करना लाभकारी माना जाता है। वहीं पीपल के वृक्ष के नीचे दीपदान करने से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने की मान्यता है। शनि दोष, साढ़ेसाती या ढैय्या से परेशान लोग इस दिन काले तिल, भोजन और कंबल का दान कर सकते हैं। इसके अलावा शनि देव के समक्ष बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ करना भी शुभ माना गया है। मान्यता है कि इससे नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक दृष्टि से शनि प्रदोष व्रत आत्मिक शुद्धि, मानसिक शांति और ईश्वर कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। श्रद्धा और विश्वास के साथ किए गए उपाय व्यक्ति को नई ऊर्जा और सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकते हैं।