उज्जैन। सप्तपुरियों में स्थित प्राचीन धर्म नगरी उज्जैन में मां हरसिद्धि मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि इसी स्थल पर देवी सती का दाहिना हाथ कोहनी का अंश गिरा था, जिससे यह स्थान अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मंदिर का स्थान और विशेषताएँ
स्थान: महाकाल वन क्षेत्र, रुद्रसागर के किनारे मुख्य आकर्षण: 51 फीट ऊँचे दो दीप स्तंभ, जिन पर प्रतिदिन संध्या समय दीप प्रज्वलित होते हैं धार्मिक महत्व: यह स्थल तंत्र साधना और महालक्ष्मी-महासरस्वती के संयुक्त स्वरूप के लिए प्रसिद्ध है
सम्राट विक्रमादित्य और माता हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य माता हरसिद्धि के अनन्य भक्त थे। उन्होंने अपनी कृपा प्राप्त करने हेतु 11 बार अपने मस्तक की बलि दी, जो हर बार पुनः जुड़ गया। 12वीं बार जब सिर नहीं जुड़ा, माना गया कि उनका शासन सम्पूर्ण हुआ। इस स्थान को परमार वंशीय राजाओं की कुलदेवी का स्थान भी कहा जाता है। मंदिर के पीछे सिरसिन्दूर चढ़े हुए रखे हैं, जिन्हें विक्रमादित्य के सिर के रूप में जाना जाता है।
देवी हरसिद्धि का नामकरण और दैत्य वध
कीवदंति अनुसार, उज्जैन की रक्षा के लिए कई देवीयाँ तैनात हैं, जिनमें हरसिद्धि देवी प्रमुख हैं। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार, दैत्य चण्ड और मुण्ड कैलाश पर कब्जा करने आए। शिवजी के आदेश पर देवी चंडी ने उनका वध किया। शंकरजी ने प्रसन्न होकर कहा कि आपने दुष्टों का वध किया, इसलिए आपका नाम हरसिद्धि से प्रसिद्ध होगा।
शक्तिपीठ का महत्व
उज्जैन स्थित माता हरसिद्धि शक्तिपीठ में माता सती की दाहिनी कोहनी गिरने के कारण यह स्थान प्रमुख माना जाता है।यह शक्तिपीठ भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से खंडित सती से संबंधित है और श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत पवित्र है।