Chambalkichugli.com

'क्रूड ऑयल' ने बदली थी गल्फ देशों की किस्मत, फिर अमेरिका ने कैसे किया तेल साम्राज्य पर कब्जा?

नई दिल्ली। अमेरिका और इजरायल के ईरान पर हमले के बाद से पूरे मिडिल ईस्ट में खलबली मची हुई है. 28 फरवरी को हुए इस हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई. इसके बाद ईरान ने भी अमेरिका और इजरायल पर पलटवार शुरू कर दिया. इस युद्ध का असर पहले तो सिर्फ मिडिल ईस्ट पर था लेकिन अब धीरे-धीरे इसका असर पूरी दुनिया पर दिखाई दे रहा है. युद्ध की वजह से वैश्विक ऊर्जा सप्लाई, शिपिंग रूट्स और ईंधन बाजार पर भारी दबाव दिखाई दे रहा है. पूरी दुनिया की ऊर्जा के लिए तेल और गैस सबसे जरूरी है लेकिन युद्ध की वजह से ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट में नाकेबंदी कर दी है. जिसकी वजह से दुनियाभर के देशों को तेल और गैस की किल्लतों का सामना करना पड़ रहा है. क्रूड ऑयल ही खाड़ी देशों की सबसे बड़ी संपदा है जिसे पूरी दुनिया ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल करती है. इस युद्ध के पीछे कहीं न कहीं अमेरिका की मंशा उनके तेल पर कब्जे की है!

भौगोलिक तौर पर अगर देखा जाए तो गल्फ देशों में सिर्फ रेगिस्तान ही है. ऐसे में जब तेल के उपयोग के बारे में दुनिया को नहीं पता था तब यहां रहने वाले लोगों को अपना जीवन-यापन बहुत कठिनाइयों के साथ करना होता था. ऐसे में जब दुनिया को क्रूड ऑयल के बारे में जानकारी मिली तो यहां भी क्रूड ऑयल की तलाश शुरू हुई. धीरे-धीरे मिडिल ईस्ट के इलाकों में क्रूड ऑयल की एक के बाद एक करके बहुत से तेल के भंडार खोज निकाले गए. इन तेल के भंडारों के मिलने के बाद मिडिल ईस्ट की दशा बदल गई. यहां रहने वाले लोग अचानक से अमीर होते गए. अचानक इतनी तेजी से विकास कर रहे मिडिल ईस्ट देशों पर अमेरिका सहित पश्चिमी देशों की भी नजर पड़ी तो पता चला इनके विकास के पीछे इनके यहां के तेल भंडारण का पाया जाना है. ऐसे में पश्चिमी देशों ने इन तेल के भंडारों पर कब्जा करने की चाल चलनी शुरू कर दी.

अमेरिका की नजर गल्फ देशों के तेल पर थीः ब्रिटेन
बीबीसी न्यूज के मुताबिक ब्रिटेन के कुछ सरकारी दस्तावेजों से इस बात का पता चलता है कि अमेरिका ने 1973 में ही मिडिल ईस्ट देशों के तेल भंडारों पर कब्जा करने की योजना बनाई थी. साल 1973 में अरब देशों ने इजरायल के हमले के बाद तेल बिक्री पर रोक लगा दी थी. इसके बाद मिस्र और सीरिया के बीच मुकाबले में इजरायल एक बड़ी ताकत बनकर उभरा. इस युद्ध को ‘अक्तूबर युद्ध’ के नाम से जाना गया था. ब्रिटेन सरकार ने उस दौरान के कुछ सरकारी दस्तावेजों को हाल ही में सार्वजनिक किया है.

अमेरिका ने तेल भंडारों पर कब्जे की योजना बनानी शुरू कर दी
ब्रिटेन के जारी किए गए इन दस्तावेजों से पता चलता है कि ब्रिटेन सरकार ने उस संकट को इतनी गंभीरता से लिया कि इस बारे में एक आपातकालीन योजना बनाई गई कि अमेरिका तेल के भंडारों पर कब्जा करने के लिए क्या-क्या कदम उठा सकता है? ब्रिटेन ने यहां तक अनुमान लगा लिया था कि अमेरिका आने वाले दिनों में सऊदी अरब और कुवैत में तेल भंडार पर कब्जा करने के लिए वहां पर एयरफोर्स की मदद ले सकता है और अमेरिका ब्रिटेन को भी अबूधाबी में ऐसा ही करने के लिए कह सकता है. इन डॉक्यूमेंट्स से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि तेल की आपूर्ति की चिंता किस हद तक पश्चिमी देशों के लिए रही है.

अमरिका ने ब्रिटिश राजदूत को दी थी चेतावनी
गल्फ देशों में तेल पर कब्जा करने की योजना के बारे में ब्रिटेन को तब पता चलता है, जब तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स शेल्सिंगर ने अमरीका में ब्रिटिश एंबेस्डर लॉर्ड क्रोमर को चेतावनी दी थी. ब्रिटिश एंबेस्डर ने अमेरिकी रक्षामंत्री जेम्स शेल्सिंगर के हवाले से कहा था कि तेल के लिए अमेरिका बलप्रयोग करने से भी नहीं झिझकेगा. गल्फ देशों ने पश्चिमी देशों को तेल बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. गल्फ देशों ने पश्चिमी देशों पर इस बात का दबाव बढ़ाने के लिए कि वो उन्हें तेल नहीं बेचेंगे इसके लिए उन्होंने इजरायल पर दबाव बढ़ाया ताकि वो इस संदेश को पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका तक पहुंचा सके. गल्फ देशों ने ये पाबंदी खासतौर पर अमेरिका के लिए लगाई थी लेकिन इससे अन्य पश्चिमी देश भी प्रभावित हुए थे.

ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को लगी अमेरिकी रणनीति की खबर
ब्रिटेन की संयुक्त जांच समिति ने अनुमान लगाया था कि जब अमरीका ने बलप्रयोग की बात की थी तो अमरीकी रणनीति में मध्य पूर्व में तेल संस्थानों पर कब्जा किए जाने की बहुत संभावना थी. दस्तावेजों के मुताबिक, ‘तेल के भंडारों पर कब्जे के लिए अमरीकी रणनीति से ऐसा ही आभास होता है’ ब्रिटेन का ऐसा मानना था. इससे साफ पता चलता है कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसियों को अमेरिकी रणनीतियों की कुछ भनक लग गई थी. बाद में अमेरिका ने बलप्रयोग की रणनीति में अरब देशों के शासक बदले जाने या ताकत के बल पर दबाव बनाने के विकल्पों को खारिज कर दिया था.

अमेरिका 10 सालों तक तेल भंडार पर कब्जा चाहता था!
संयुक्त जांच समिति ने भरोसा जताते हुए विश्वास व्यक्त किया था कि अमेरिका की बलप्रयोग की रणनीति में एयर फोर्स अभियान चलाता और जिसके लिए वो संभवतः ईरान, तुर्की, साइप्रस, ग्रीस या इजरायल के हवाई अड्डों का इस्तेमाल करता. समिति ने ये भी कहा था कि उनका अनुमान था कि ऐसे अभियान के लिए अमेरिका को कम से कम दो ब्रिगेड की जरूरत थी. एक सऊदी अरब के लिए और एक कुवैत के लिए तीसरी ब्रिगेड अबूधाबी के लिए भी लगाई जा सकती थी. समिति ने ये चेतावनी भी दी थी कि आने वाले 10 सालों तक वहां पर अमेरिका का कब्जा रह सकता है.

क्या थी ब्रिटेन की भूमिका?
ब्रिटेन के लिए भी इस अभियान में बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी थी. समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि अमेरिका शायद यह चाहता था कि ब्रिटेन अबूधाबी के तेल संस्थानों पर कब्जे के लिए कार्रवाई करे और कुछ ब्रिटिश ऑर्मी के अफसरों के के नाम अबूधाबी डिफेंस फोर्स के लिए घोषित भी कर दिए गए थे. समिति ने इस अभियान में इराक की कार्रवाई के खतरे का भी अंदाजा लगाया था. उस समय इराक के उपराष्ट्रपति सद्दाम हुसैन ही थे. रिपोर्ट में आगे बताया गया था, ‘गल्फ देशो में किसी बड़े टकराव का खतरा कुवैत में नजर आया जहां सोवियत संघ के समर्थन से इराक दखलअंदाजी कर सकता था.’

तेल के भंडार पर गड़ी अमेरिका की नजर
रिपोर्ट में कहा गया है कि तेल संस्थानों पर कब्जा करने और टकराव बढ़ने की आशंका तब ज्यादा थी कि अगर खाड़ी देश ज्यादा लंबे समय तक तेल बेचने पर रोक लगाए रखते. ऐसा होने पर पश्चिमी देशों के हित दांव पर लग जाते और ऐसी स्थिति को पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका ने ‘काले हालात’ का नाम दिया था. लेकिन ऐसे हालात ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहे और कुछ महीनों बाद ही मिस्र और इजरायल के बीच समझौता हो गया जिसके बाद खाड़ी देशों ने तेल पर से लगी पाबंदी हटा ली. लेकिन तब तक क्रूड ऑयल भंडार पर अमेरिका की नजर गड़ चुकी थी.

प्रथम विश्व युद्ध में ही दिखाई दे गई थी तेल की अहमियत
इन सबके अलावा पहले विश्वयुद्ध में भी दुनिया को तेल की ताकत का अंदाजा लग चुका था. प्रथम विश्व युद्ध 1914 से लेकर 1918 तक चला. इस युद्ध में पूरी दुनिया को तेल की अहमियत का अंदाजा लगा. इस विश्व युद्ध ने दुनिया को इस बात का अहसास करवा दिया कि दुनिया तेल पर कितनी निर्भर हो गई है. इस बात को लेकर अब पश्चिमी देशों की नियत तेल के भंडारणों पर जम गई थी. इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले देशों को टैंक से लेकर ट्रक तक के इस्तेमाल में तेल की जरूरत पड़ती थी. इसके अलावा युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले लड़ाकू जहाजों को भी तेल से ही चलाया जाता था. नौसेना के युद्धक जहाज भी अब पारंपरिक कोयले की जगह तेल से चलने लगे थे. युद्ध में रफ्तार का बड़ा महत्व था और जिन देशों ने तेल का उपयोग किया वो इस युद्ध में विजेता बने. आगे चलकर अमेरिका ने अपनी रणनीतियों के तहत ताकत के दम पर गल्फ देशों में अपना हस्तक्षेप शुरू किया जिसका सिर्फ एक ही मकसद था तेल के भंडारों पर कब्जा किया |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *