Chambalkichugli.com

मिडिल ईस्ट जंग से बदला वैश्विक तेल समीकरण: रूस की चांदी, चीन को 400 अरब डॉलर का झटका


नई दिल्‍ली । मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के खतरे ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में बड़ा बदलाव ला दिया है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से आसमान छू रही हैं शेयर बाजारों में भारी गिरावट देखी जा रही है और कई देशों में ऊर्जा संकट की आशंका गहराने लगी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है तो दुनिया के कई हिस्सों में महंगाई और खाद्य संकट भी गहरा सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा फायदा रूस को होता दिखाई दे रहा है जबकि चीन को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

दरअसल ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर पाबंदी लगाने की आशंका और क्षेत्र में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक तेल सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल पर संकट गहराने के बाद कई देशों ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश शुरू कर दी है। इसका सीधा फायदा रूस को मिला है। यूक्रेन युद्ध के बाद जिन पश्चिमी देशों ने रूस के तेल पर प्रतिबंध लगा दिया था अब वही देश वैश्विक सप्लाई को स्थिर रखने के लिए रूसी तेल की ओर रुख कर रहे हैं।

यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों ने रूस के तेल निर्यात पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे। उस समय रूस को अपने तेल पर भारी छूट देकर बाजार बनाए रखना पड़ा था। भारत और चीन जैसे देशों ने इस मौके का फायदा उठाते हुए रूस से सस्ते दामों पर बड़ी मात्रा में तेल खरीदा। हालांकि बाद में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत तक टैरिफ भी लगाया था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट संकट के कारण हालात पूरी तरह बदल गए हैं।

तेल की मांग बढ़ने के साथ ही रूस ने अपने कच्चे तेल पर मिलने वाली छूट को भी कम कर दिया है। पहले रूसी तेल पर 10 से 13 डॉलर प्रति बैरल तक की छूट मिल रही थी लेकिन अब इसे घटाकर 4 से 5 डॉलर प्रति बैरल कर दिया गया है। फरवरी में भारतीय कंपनी HPCL ने रूसी तेल के दो कार्गो 13 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर खरीदे थे लेकिन अब भारतीय रिफाइनरियों को इतनी बड़ी छूट मिलना मुश्किल माना जा रहा है। यही स्थिति अन्य देशों के साथ भी है। इससे साफ है कि बढ़ती मांग के कारण रूस का सरकारी खजाना तेजी से भर रहा है और उसका तेल फिर से वैश्विक बाजार में मजबूत स्थिति में आ गया है।

दूसरी ओर इस युद्ध का सबसे बड़ा झटका चीन को लगा है। चीन लंबे समय से ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है और भारी छूट पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। आंकड़ों के मुताबिक ईरान के कुल तेल निर्यात का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा चीन ही खरीदता था। लेकिन युद्ध के बाद यह आपूर्ति लगभग ठप हो गई है जिससे चीन की ऊर्जा रणनीति को बड़ा झटका लगा है।

इसके अलावा चीन और ईरान के बीच 2021 में हुई दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी भी संकट में पड़ती दिख रही है। इस समझौते के तहत चीन ने ईरान में इंफ्रास्ट्रक्चर और ऊर्जा परियोजनाओं में लगभग 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था। लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव और संभावित सैन्य कार्रवाई के कारण यह पूरा निवेश अब खतरे में पड़ गया है। नतीजतन चीन को एक साथ दोहरा नुकसान झेलना पड़ रहा है—एक तरफ सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई है और दूसरी तरफ उसका विशाल निवेश भी फंसता नजर आ रहा है। इस तरह मिडिल ईस्ट की जंग ने वैश्विक तेल राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है जहां रूस को अप्रत्याशित फायदा मिल रहा है और चीन के लिए स्थिति लगातार मुश्किल होती जा रही है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Popular News