इस एमओयू के तहत एनडीएमए के सहयोग से सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर में एसीएसआईआर के तहत आपदा प्रबंधन में पीएचडी कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। इसके साथ ही डीएमआरआर में संयुक्त अनुसंधान नीति अध्ययन और विज्ञान संचार पहलें संचालित की जाएंगी।
इस अवसर पर अपने संबोधन में एनडीएमए के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने कहा कि आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर प्रधानमंत्री के नौ सूत्री एजेंडा के अनुरूप यह समझौता ज्ञापन वैज्ञानिकों और नीति विशेषज्ञों के बीच एक मजबूत सेतु का काम करेगा। उन्होंने कहा हम प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों जोखिम संचार और सामुदायिक संपर्क के माध्यम से आपदा तैयारियों को मजबूत कर सकते हैं। आपदा के बाद व्यवस्थित अध्ययन और दस्तावेज़ीकरण से हम हर आपदा से सीखने की संस्कृति को संस्थागत रूप दे सकते हैं।
एसीएसआईआर के निदेशक प्रोफेसर मनोज कुमार धर ने बताया कि उनके संस्थान में 7 000 से अधिक छात्र नामांकित हैं और यह देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थानों में से एक है। उन्होंने कहा कि यह समझौता ज्ञापन छात्रों और शोधकर्ताओं के लिए आपदा प्रबंधन चुनौतियों के लिए नवीन और अनुसंधान-आधारित समाधान विकसित करने के नए अवसर खोलेगा। इस पहल से भारत 2047 की दिशा में आपदा-प्रतिरोधी ढांचे को मजबूत करने के लिए विशेषज्ञों की नई पीढ़ी तैयार होगी।
सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर की निदेशक डॉ. गीता वानी रायसम ने डीएमआरआर में विज्ञान संचार और नीति अनुसंधान की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह साझेदारी नीति और जन जागरूकता ढांचों में वैज्ञानिक ज्ञान को एकीकृत करेगी। उनका कहना था कि वैज्ञानिक अनुसंधान को नीति निर्माण के साथ जोड़कर समाज और राष्ट्र के लिए मजबूत और उत्तरदायी समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
इस त्रिपक्षीय सहयोग में गृह मंत्रालय के अधीन एनडीएमए कार्यनीतिक दिशा-निर्देश और विशेषज्ञता प्रदान करेगा एसीएसआईआर शैक्षणिक और अनुसंधान पहलें संचालित करेगा और सीएसआईआर-एनआईएससीपीआर नीति अनुसंधान जन सहभागिता और विज्ञान संचार को बढ़ावा देगा। यह कदम भारत के आपदा प्रबंधन तंत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण को एकीकृत करने में मील का पत्थर साबित होगा।