संत प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार मनुष्य जो कुछ भी इस संसार में देखता है वह उसकी भौतिक दृष्टि तक सीमित होता है जो माया से प्रभावित है। यही कारण है कि हम केवल भौतिक जगत को ही देख पाते हैं। जिस प्रकार महाभारत में अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण के विराट स्वरूप के दर्शन के लिए दिव्य चक्षु प्रदान किए गए थे उसी प्रकार राधा रानी के वास्तविक स्वरूप को देखने के लिए भी दिव्य दृष्टि की आवश्यकता होती है। बिना इस आध्यात्मिक दृष्टि के उनके स्वरूप को समझ पाना असंभव है।
संतों का कहना है कि राधा रानी सौंदर्य की पराकाष्ठा हैं। उनके रूप का वर्णन करना इतना कठिन है कि यदि किसी व्यक्ति के शरीर के प्रत्येक रोम में करोड़ों जिह्वाएं भी उत्पन्न हो जाएं तब भी उनके सौंदर्य की पूर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती। यह भी कहा जाता है कि जिन भगवान श्री कृष्ण के सौंदर्य से करोड़ों कामदेव भी मोहित हो जाते हैं वही श्री कृष्ण स्वयं राधा रानी की रूप माधुरी के सामने आकर्षित हो जाते हैं। उनकी महिमा इतनी अद्भुत है कि वेद भी उनके वर्णन में असमर्थ होकर नेति-नेति कहकर मौन हो जाते हैं।
ब्रज की गोपियों का सौंदर्य भी अद्वितीय बताया गया है। कहा जाता है कि ब्रज की प्रत्येक गोपी इतनी सुंदर है कि करोड़ों लक्ष्मी भी उनके सामने फीकी पड़ जाएं। लेकिन जब यही सखियां अपनी आराध्य राधा रानी के दर्शन करती हैं तो वे भी उनके सामने नतमस्तक हो जाती हैं। राधा रानी के प्रत्येक अंग में ऐसी मधुरता और दिव्यता विद्यमान है जिसकी तुलना तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलती।
संतों के अनुसार राधा रानी के स्वरूप का अनुभव करने का सबसे सरल और प्रभावी मार्ग भक्ति और नाम जप है। यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से राधा नाम का निरंतर जप करता है तो धीरे-धीरे उसके हृदय में राधा रानी का दिव्य स्वरूप प्रकट होने लगता है। इसके साथ ही वृंदावन की पवित्र रज को माथे पर धारण करना और संतों का संग करना भी इस आध्यात्मिक यात्रा में सहायक माना जाता है।
भक्ति परंपरा में राधा और कृष्ण के प्रेम को अद्वितीय बताया गया है। उनका संबंध मछली और जल के समान है अलग होते ही अस्तित्व समाप्त हो जाता है। जब राधा और कृष्ण एक साथ होते हैं तो वृंदावन की पूरी प्रकृति उस दिव्य प्रेम में डूब जाती है। पशु-पक्षी तक शांत होकर उस अलौकिक आनंद का अनुभव करने लगते हैं।
अंततः संतों का संदेश स्पष्ट है कि राधा रानी का स्वरूप देखने के लिए बाहरी नहीं बल्कि आंतरिक दृष्टि की आवश्यकता है। सच्ची भक्ति समर्पण और नाम जप के माध्यम से ही वह क्षण आता है जब भक्त इस दिव्य प्रेम और स्वरूप का अनुभव कर पाता है।