Reservation in Promotions Case: जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को प्रमोशन में आरक्षण (Reservation in Promotion) से जुले मामलों की सुनवाई के दौरान सरकार को बड़ी फटकार लगी। अदालत ने राज्य सरकार द्वारा सीलबंद लिफाफे में पेश किए गए कर्मचारी और मात्रात्मक आंकड़ों पर नाराजगी जताई।
कोर्ट ने पाया कि एक विभाग में सभी पद आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के पास हैं, जबकि सामान्य वर्ग का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश संजिव सचदेवा और न्यायमूर्ति विनय सराफ की खंडपीठ ने कहा कि कई विभागों में पहले से ही बड़ी संख्या में आरक्षित वर्ग के कर्मचारी कार्यरत हैं। कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी विभागों का एकीकृत चार्ट तैयार कर पेश करे, जिसमें यह स्पष्ट रूप से दर्शाया जाए कि किस विभाग में किस वर्ग का कितना प्रतिनिधित्व है।
न्यायालय ने यह भी कहा कि यह केवल आंकड़े इकट्ठे करने की औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि नियमों और वास्तविक डेटा के आधार पर सटीक गणना की जानी चाहिए।
सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह अदालत में मौजूद रहे, जबकि वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पक्ष रखा।
याचिकाकर्ता सामान्य पिछड़ा अल्पसंख्यक कल्याण समाज संस्था (सपाक्स) के वकील नरेश कौशिक ने बताया कि “हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि वह सभी विभागों के आरक्षण से जुड़े आंकड़े दोबारा तैयार कर कोर्ट में प्रस्तुत करे।
कोर्ट ने पाया कि एक विभाग में आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों ने सभी पदों पर कब्जा कर रखा है, जबकि सामान्य वर्ग का कोई उल्लेख नहीं किया गया है। अदालत ने पूछा कि सरकार इसे किस आधार पर उचित ठहराएगी।”
मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर को निर्धारित की गई है।
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