ईरान-यूएई तनाव पर बड़ा खुलासा: रिफाइनरी हमले में गुप्त भूमिका के दावे से मिडिल ईस्ट में हलचल

नई दिल्ली। मिडिल-ईस्ट में ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच तनाव लंबे समय से जारी है, लेकिन हाल ही में कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के बाद यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अप्रैल की शुरुआत में ईरान के लावान द्वीप स्थित एक तेल रिफाइनरी पर हमला हुआ था, जिसमें कुछ सूत्रों ने यूएई की संभावित भूमिका की बात कही है। रिपोर्ट के अनुसार यह हमला उस समय हुआ जब क्षेत्र में ईरान और उसके विरोधी देशों के बीच सैन्य तनाव चरम पर था। हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस पूरे मामले में किसी भी देश ने आधिकारिक रूप से सीधे तौर पर हमले की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। यूएई की तरफ से पहले दिए गए बयानों में कहा गया है कि उसे अपनी सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई का अधिकार है, खासकर तब जब क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में हो। वहीं ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कई बार यूएई और अन्य खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के आरोप लगाए हैं, जिनसे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ा है। अमेरिका की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए कुछ सैन्य कार्रवाइयों पर सख्त रुख नहीं अपनाया, हालांकि इस पर भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा क्षेत्र पहले से ही ऊर्जा सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक मार्गों को लेकर संवेदनशील स्थिति में है, जहां किसी भी छोटे सैन्य टकराव का वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, यूएई की कथित भूमिका को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह अभी तक पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है और यह मामला फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच और राजनीतिक चर्चाओं के घेरे में है। मिडिल-ईस्ट में ईरान और क्षेत्रीय देशों के बीच तनाव लंबे समय से जारी है, लेकिन हाल ही में कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के बाद यूएई (संयुक्त अरब अमीरात) को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि अप्रैल की शुरुआत में ईरान के लावान द्वीप स्थित एक तेल रिफाइनरी पर हमला हुआ था, जिसमें कुछ सूत्रों ने यूएई की संभावित भूमिका की बात कही है। रिपोर्ट के अनुसार यह हमला उस समय हुआ जब क्षेत्र में ईरान और उसके विरोधी देशों के बीच सैन्य तनाव चरम पर था। हालांकि यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस पूरे मामले में किसी भी देश ने आधिकारिक रूप से सीधे तौर पर हमले की जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की है। यूएई की तरफ से पहले दिए गए बयानों में कहा गया है कि उसे अपनी सुरक्षा और जवाबी कार्रवाई का अधिकार है, खासकर तब जब क्षेत्रीय सुरक्षा खतरे में हो। वहीं ईरान ने इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कई बार यूएई और अन्य खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमलों के आरोप लगाए हैं, जिनसे दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ा है। अमेरिका की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि उसने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए कुछ सैन्य कार्रवाइयों पर सख्त रुख नहीं अपनाया, हालांकि इस पर भी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा क्षेत्र पहले से ही ऊर्जा सुरक्षा और होर्मुज स्ट्रेट जैसे रणनीतिक मार्गों को लेकर संवेदनशील स्थिति में है, जहां किसी भी छोटे सैन्य टकराव का वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर बड़ा असर पड़ सकता है। कुल मिलाकर, यूएई की कथित भूमिका को लेकर जो रिपोर्ट सामने आई है, वह अभी तक पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई है और यह मामला फिलहाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जांच और राजनीतिक चर्चाओं के घेरे में है।
मध्य-पूर्व में बड़ा खुलासा: UAE पर ईरान हमले का आरोप, अमेरिका-ईरान तनाव और तेल संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता

नई दिल्ली। ईरान और मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसमें दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान पर गुप्त सैन्य कार्रवाई की थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में ईरान के लावान द्वीप स्थित ऑयल रिफाइनरी को निशाना बनाया गया था। इस हमले के बाद रिफाइनरी में भीषण आग लग गई थी और उत्पादन लंबे समय तक प्रभावित रहा। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह हमला अप्रैल की शुरुआत में हुआ था, उसी समय जब अमेरिका युद्धविराम की घोषणा कर रहा था। ईरान ने उस दौरान दावा किया था कि उसकी रिफाइनरी पर दुश्मन देश ने हमला किया है। इसके बाद जवाबी कार्रवाई में ईरान ने UAE और कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हालांकि UAE ने कभी भी इस हमले की आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन उसके विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा कि देश को किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई का जवाब देने का अधिकार है, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण रिश्तों पर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरानी नेतृत्व को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें “बेईमान” बताया है। ट्रम्प ने आरोप लगाया कि ईरान बातचीत को लंबा खींचता है और बार-बार अपने रुख बदलता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन दस्तावेजों को कुछ मिनटों में पहुंचना चाहिए, उन्हें ईरान कई दिनों तक रोककर रखता है, जिससे बातचीत की प्रक्रिया बाधित होती है। दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कई विवादित मुद्दों में उलझी हुई है। इनमें होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, ईरानी जहाजों पर अमेरिकी प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम प्रमुख हैं। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। हाल के 24 घंटों में कई बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है। अमेरिका ने मांग की है कि ईरान कम से कम 12 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन बंद करे और अपने पास मौजूद 60% एनरिच्ड यूरेनियम भी सौंप दे। इसके जवाब में तनाव और बढ़ गया है। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में संभावित बाधा और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने बाजार को अस्थिर कर दिया है, क्योंकि दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ चल रहा युद्धविराम अब “बहुत कमजोर स्थिति” में पहुंच चुका है और उन्होंने ईरानी प्रस्ताव को “कूड़ा” बताते हुए अमेरिका के लिए “पूर्ण जीत” की बात कही है। वहीं ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि फ्रांस और ब्रिटेन के युद्धपोत होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करते हैं तो उसे जवाब दिया जाएगा। इससे समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच लेबनान सीमा पर भी तनाव तेज हो गया है। हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच संघर्ष में तेजी देखी गई है। दक्षिणी लेबनान में इजराइली एयरस्ट्राइक में 6 लोगों की मौत और 7 के घायल होने की खबर है। वहीं हिजबुल्लाह ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है, जिससे सीमा क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। इसी बीच एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस पर अस्थायी रूप से जगह दी थी, ताकि उन्हें संभावित हमलों से बचाया जा सके। हालांकि पाकिस्तान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि नूर खान एयरबेस पर बड़े पैमाने पर विमानों को छिपाना संभव नहीं है। कुल मिलाकर ईरान, अमेरिका और मध्य-पूर्व में हालात तेजी से बदल रहे हैं और हर दिन नए तनाव और नए खुलासे सामने आ रहे हैं, जिससे वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों पर गहरा असर पड़ रहा है।
मिडिल ईस्ट में तनाव चरम पर: UAE पर ईरान का मिसाइल-ड्रोन हमला, अमेरिका की जवाबी बमबारी से हालात और बिगड़े

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया है, जहां संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दावा किया है कि ईरान ने उसके क्षेत्र पर 2 बैलिस्टिक मिसाइल और 3 ड्रोन दागे। UAE रक्षा मंत्रालय के अनुसार, उसकी एयर डिफेंस सिस्टम ने सभी मिसाइल और ड्रोन को हवा में ही इंटरसेप्ट कर नष्ट कर दिया, हालांकि इस हमले में 3 लोगों के घायल होने की जानकारी भी सामने आई है। अभी तक ईरान की तरफ से इस दावे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने सीजफायर के बावजूद ईरान पर फिर एयरस्ट्राइक की है। अमेरिका का कहना है कि ईरानी सेना ने उसके जंगी जहाजों पर मिसाइल, ड्रोन और छोटी नावों से हमला किया था, जिसके जवाब में अमेरिकी सेना ने ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने साफ चेतावनी दी है कि अगर ईरान किसी डील पर नहीं पहुंचता, तो आगे और भी बड़े हमले किए जाएंगे। वहीं ईरान ने पलटवार करते हुए दावा किया है कि अमेरिकी हमले में सैन्य ठिकानों की बजाय नागरिक इलाकों को निशाना बनाया गया है। ईरान ने यह भी कहा है कि उसने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज स्ट्रेट और चाबहार पोर्ट के पास मौजूद अमेरिकी सैन्य जहाजों को निशाना बनाया। इसके साथ ही ईरान ने आरोप लगाया कि अमेरिकी हमले ओमान की खाड़ी में उसके तेल टैंकरों पर भी किए गए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिका के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि CIA की इंटेलिजेंस गलत है और ईरान की मिसाइल क्षमता खत्म नहीं हुई है। उन्होंने दावा किया कि देश का मिसाइल रिजर्व अभी भी मजबूत स्थिति में है और ईरान किसी भी हालात में अपनी सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा। अराघची ने यह भी कहा कि जब भी कूटनीतिक समाधान की संभावना बनती है, अमेरिका सैन्य रास्ता अपना लेता है, लेकिन ईरान दबाव में झुकने वाला नहीं है। इसी बीच होर्मुज स्ट्रेट में हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं, जहां करीब 1500 जहाज फंसे होने की जानकारी सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय समुद्री एजेंसी के अनुसार, इस संकट का असर तेल, गैस और वैश्विक सप्लाई चेन पर पड़ रहा है, जिससे कई देशों में आर्थिक और खाद्य संकट की आशंका बढ़ गई है। मध्य पूर्व में इजराइल-हिजबुल्लाह संघर्ष भी तेज हो गया है, जहां दोनों पक्ष एक-दूसरे पर हमलों का दावा कर रहे हैं। साथ ही अमेरिका ने ईरान से जुड़े नेटवर्क पर नए प्रतिबंध भी लगाए हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है।
UAE हमले पर भारत का कड़ा रुख: 3 भारतीय घायल, PM मोदी बोले- नागरिकों पर हमला बर्दाश्त नहीं

नई दिल्ली। UAE के फुजैराह स्थित ऑयल पोर्ट और पेट्रोलियम सुविधाओं पर हुए हमले में 3 भारतीय नागरिकों के घायल होने के बाद भारत ने सख्त नाराजगी जताई है। भारत सरकार ने साफ कहा है कि आम लोगों और जरूरी ढांचों को निशाना बनाना पूरी तरह अस्वीकार्य है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों पर हमला किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा। क्या हुआ फुजैराह में?रिपोर्ट्स के मुताबिक, फुजैराह के इंडस्ट्रियल एरिया में ड्रोन और मिसाइल हमले के बाद पेट्रोलियम प्लांट में आग लग गई। इस घटना में तीन भारतीय घायल हो गए, जिनका इलाज जारी है। भारत की दो टूकभारत ने सभी पक्षों से तुरंत हिंसा रोकने और कूटनीति के रास्ते अपनाने की अपील की है। साथ ही होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की बात कही है, जिसे वैश्विक व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है। UAE का दावा, ईरान पर आरोपUAE ने इस हमले के पीछे ईरान का हाथ होने का दावा किया है। अधिकारियों के मुताबिक, कई बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के साथ ड्रोन हमलों को रोका गया। हालांकि ईरान की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। 24 घंटे में बढ़ा तनाव, बड़े अपडेट्स ड्रोन प्लांट पर हमलाफुजैराह के पेट्रोलियम प्लांट पर हमले के बाद भीषण आग लगी, 3 भारतीय घायल। ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ लॉन्चअमेरिका ने होर्मुज क्षेत्र में फंसे जहाजों को सुरक्षित निकालने के लिए नई पहल शुरू की। दक्षिण कोरियाई जहाज पर अटैकदक्षिण कोरिया के जहाज पर हमले से आग लगी, कोई हताहत नहीं। जब्त जहाज पाकिस्तान को सौंपाअमेरिका ने जब्त ईरानी जहाज पाकिस्तान को सौंपा, जिसे बाद में ईरान भेजा गया। ईरान में फांसीईरान में जासूसी के आरोप में तीन लोगों को फांसी दी गई। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने साफ संकेत दिया है कि वह अपने नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर पूरी तरह सतर्क है।
तेल की राजनीति में नया तूफान! UAE के फैसले पर ईरान का हमला, OPEC में बढ़ी दरार

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट की तेल राजनीति में तनाव खुलकर सामने आ गया है। Iran ने United Arab Emirates (UAE) के OPEC से बाहर निकलने के फैसले पर कड़ी आपत्ति जताई है और इसे “नकारात्मक और बदले की भावना से लिया गया कदम” बताया है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने साफ कहा कि इस तरह का फैसला संगठन की एकजुटता को कमजोर करता है। उन्होंने यह भी दोहराया कि ईरान OPEC के भीतर अपनी जिम्मेदारियों को निभाता रहेगा और वैश्विक तेल संतुलन बनाए रखने में सक्रिय भूमिका जारी रखेगा। तनाव यहीं नहीं रुका। ईरान ने UAE पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान उसने अमेरिका और इजराइल का साथ देकर “गलत रवैया” अपनाया, जिससे भरोसे पर असर पड़ा है। वहीं दूसरी तरफ UAE ने इन आरोपों को खारिज करते हुए अपना पक्ष रखा। Sultan Al Jaber ने कहा कि OPEC और OPEC+ से अलग होने का फैसला किसी देश के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह रणनीतिक और आर्थिक हितों को ध्यान में रखकर लिया गया कदम है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह टकराव सिर्फ OPEC तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीतिक समीकरण और वैश्विक ऊर्जा बाजार की प्रतिस्पर्धा भी अहम वजह हैं। कुल मिलाकर, UAE के इस कदम और ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया ने साफ कर दिया है कि आने वाले समय में तेल बाजार के साथ-साथ क्षेत्रीय राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
ईरान ने खाड़ी में बढ़ाया तनाव, UAE को लेकर सऊदी अरब को दी कथित चेतावनी; अबू धाबी पर हमले की रणनीति का दावा

नई दिल्ली। तेहरान और खाड़ी देशों के बीच तनाव एक बार फिर तेज होता दिख रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान ने सऊदी अरब और ओमान के साथ बातचीत के दौरान संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को लेकर सख्त और आक्रामक रुख अपनाया है, जिससे पूरे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल बढ़ गई है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिमी मीडिया में दावा किया गया है कि ईरानी अधिकारियों ने बातचीत के दौरान संकेत दिया कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष और बढ़ता है तो UAE को “कड़े जवाब” का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि, इस बातचीत का आधिकारिक समय और पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे खाड़ी देशों के बीच बढ़ते अविश्वास के रूप में देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने सऊदी अरब के सामने यह भी इशारा किया कि वह खाड़ी क्षेत्र में मौजूदा शक्ति संतुलन को अच्छी तरह समझता है और जरूरत पड़ने पर रणनीतिक जवाब देने की क्षमता रखता है। इस बयानबाजी को रियाद और अबू धाबी के बीच पहले से मौजूद मतभेदों को और गहरा करने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। खाड़ी क्षेत्र में पहले से ही कई मोर्चों पर तनाव बना हुआ है। यमन संघर्ष में सऊदी अरब और UAE अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते रहे हैं, जबकि सूडान और लीबिया जैसे देशों में भी दोनों देशों की नीतियां अक्सर एक-दूसरे के विपरीत रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में ईरान की हालिया बयानबाजी ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान का यह कड़ा संदेश सिर्फ सैन्य चेतावनी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कूटनीति में दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकता है। वहीं सऊदी अरब और UAE दोनों ही अपनी सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारियों को लेकर सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। फिलहाल, इस पूरे मामले पर आधिकारिक स्तर पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन खाड़ी की राजनीति में हलचल साफ महसूस की जा रही है।
UAE का सख्त रुख: कर्ज वसूली के बाद अब पाकिस्तान से निवेश समेटने के संकेत

नई दिल्ली। आर्थिक मोर्चे पर जूझ रहे Pakistan के लिए एक और चिंताजनक खबर सामने आई है। United Arab Emirates की प्रमुख दूरसंचार कंपनी e& (पूर्व में एतिसलात) पाकिस्तान में अपने निवेश की समीक्षा कर रही है और टेलीकॉम सेक्टर से बाहर निकलने पर विचार कर रही है। जानकारी के अनुसार, e& के पास PTCL में 26 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ प्रबंधन नियंत्रण भी है। सूत्रों का कहना है कि कंपनी अब अपने शेयर बेचकर इस बाजार से बाहर निकलने की संभावनाएं तलाश रही है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब हाल ही में यूएई ने पाकिस्तान से 3.5 अरब डॉलर का कर्ज वापस लिया है। यह कर्ज लंबे समय से रोलओवर के जरिए टाला जाता रहा था, जिससे पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार को राहत मिलती थी। हालांकि, अचानक भुगतान की मांग ने देश की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा दिया है। वहीं, एतिसलात और पाकिस्तान सरकार के बीच 2005 से चला आ रहा 800 मिलियन डॉलर का विवाद भी अब तक अनसुलझा है। उस समय कंपनी ने PTCL की हिस्सेदारी 2.6 अरब डॉलर में खरीदी थी, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े विवाद के कारण रोका गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति से प्रेरित नहीं है, बल्कि यूएई की व्यापक वैश्विक निवेश रणनीति का हिस्सा है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी के बेहतर उपयोग की नीति के तहत खाड़ी देश अपने निवेश पोर्टफोलियो का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं। पाकिस्तान सरकार का कहना है कि यदि e& अपना निवेश वापस लेती है, तो वह Saudi Arabia और Qatar जैसे देशों से नए निवेश आकर्षित करने का प्रयास करेगी। यूएई के लगातार सख्त होते आर्थिक फैसले पाकिस्तान के लिए चेतावनी माने जा रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या पाकिस्तान नई निवेश संभावनाएं तलाश कर पाता है या आर्थिक दबाव और बढ़ता है।
PM मोदी अगले माह जाएंगे यूरोप दौरे पर… रास्ते में कुछ समय UAE में रुकेंगे!

दुबई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) अगले महीने संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates.- UAE) की एक संक्षिप्त यात्रा कर सकते हैं। अपनी आगामी यूरोप यात्रा (Europe trip) के दौरान पीएम मोदी बीच रास्ते में कुछ समय के लिए यूएई में रुकेंगे, जहां उनकी यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान (President Sheikh Mohammed bin Zayed Al Nahyan.- MBZ) के साथ द्विपक्षीय वार्ता होने की उम्मीद है। वर्तमान में इस यात्रा की रूपरेखा तैयार की जा रही है और अभी तक इसकी औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। यूरोप दौरे के बीच यूएई में पड़ावप्रधानमंत्री मोदी 15 से 20 मई तक चार यूरोपीय देशों- नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और इटली की अहम यात्रा पर रहेंगे। इस दौरे का मुख्य आकर्षण ओस्लो (नॉर्वे) में होने वाला ‘भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन’ होगा। इस साल की शुरुआत में यूरोपीय संघ (EU) के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को अंतिम रूप दिए जाने के बाद पीएम मोदी की यह पहली यूरोप यात्रा होगी। संकट के बीच निरंतर उच्च-स्तरीय वार्ताएंपश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध के बावजूद दोनों देशों के बीच उच्च-स्तरीय दौरों का सिलसिला लगातार जारी है। अगर पीएम मोदी यूएई पहुंचते हैं, तो यह इसी कड़ी का नवीनतम हिस्सा होगा। इससे पहले यूएई के राष्ट्रपति (MBZ) एक दिवसीय यात्रा पर भारत आए थे, जहां उन्होंने पीएम मोदी के साथ वार्ता की। मार्च में ईरान युद्ध के बीच, यूएई की अंतर्राष्ट्रीय सहयोग राज्य मंत्री रीम अल-हाशिमी ने भारत का दौरा किया। अप्रैल (11-12) में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने यूएई का दौरा किया। उन्होंने राष्ट्रपति MBZ से मुलाकात कर पीएम मोदी का एक निजी संदेश उन्हें सौंपा। इसके अलावा, उन्होंने यूएई के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन जायद अल नाहयान से भी क्षेत्रीय स्थिरता और ऊर्जा सहयोग पर चर्चा की। पिछले सप्ताह ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने यूएई जाकर राष्ट्रपति MBZ से मुलाकात की। इस दौरान क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और द्विपक्षीय संबंधों पर अहम चर्चा हुई। तेजी से बढ़ते आर्थिक और रणनीतिक संबंधपिछले एक दशक में भारत और यूएई के संबंधों में अभूतपूर्व विस्तार हुआ है। दोनों देशों ने आर्थिक, सुरक्षा और ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी साझेदारी को काफी मजबूत किया है। वर्ष 2021 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ के स्तर तक बढ़ा दिया था। यूएई भारत के शीर्ष व्यापारिक साझेदारों में से एक है। 2025 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार लगभग 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। दोनों देशों का लक्ष्य 2032 तक इस व्यापार को दोगुना करना है। यूएई ऊर्जा, बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) और प्रौद्योगिकी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में भारत में सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में से एक बन गया है। ऊर्जा क्षेत्र में गहराता सहयोग (एलएनजी और ओपेक)ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से दोनों देशों के बीच हाल ही में कई बड़े कदम उठाए गए हैं। जनवरी में यूएई के राष्ट्रपति की भारत यात्रा के दौरान 10 साल का तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) आपूर्ति समझौता हुआ था। इसके तहत, यूएई 2028 से शुरू होकर अगले 10 वर्षों तक भारत को $3 बिलियन तक की एलएनजी की आपूर्ति करेगा। यूएई ने तेल निर्यातक देशों के संगठन (OPEC) से बाहर निकलने का फैसला किया है। इसके बाद यह उम्मीद की जा रही है कि यूएई अपने तेल उत्पादन में भारी वृद्धि करेगा, जिससे भारत और यूएई के बीच ऊर्जा संबंध और अधिक मजबूत होंगे। संक्षेप में कहें तो, पीएम मोदी की यह संभावित यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब दोनों देश न केवल व्यापार और ऊर्जा के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं, बल्कि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक-दूसरे के मजबूत रणनीतिक साझेदार भी बने हुए हैं।
UAE ने मांगा अरबों का कर्ज, पाकिस्तान पर बढ़ा दबाव; सऊदी अरब से बढ़ी उम्मीदें

इस्लामाबाद। आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए नया संकट खड़ा हो गया है। संयुक्त अरब अमीरात द्वारा अरबों डॉलर का कर्ज वापस मांगे जाने के बीच अब सऊदी अरब एक बार फिर उसके लिए ‘संकटमोचक’ के रूप में उभरता नजर आ रहा है। इसी कड़ी में सऊदी वित्त मंत्री मोहम्मद अल-जदान का इस्लामाबाद दौरा काफी अहम माना जा रहा है। इसे पाकिस्तान को संभावित आर्थिक राहत के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सऊदी नेतृत्व के प्रति आभार जताते हुए कहा कि सऊदी सहयोग ने देश की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। UAE का कर्ज लौटाने से बढ़ेगी मुश्किलें जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान 2018 में लिए गए 3 अरब डॉलर से अधिक के कर्ज को UAE को लौटाने की प्रक्रिया में है। यह राशि उसके विदेशी मुद्रा भंडार का करीब 18 प्रतिशत है। ऐसे में भुगतान से देश की आर्थिक स्थिति पर सीधा दबाव पड़ना तय माना जा रहा है। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के अनुसार, मार्च के अंत तक देश के पास करीब 16.4 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था, जो लगभग तीन महीने के आयात के लिए पर्याप्त माना जाता है। खाड़ी देशों के बदलते समीकरण विशेषज्ञों का मानना है कि UAE द्वारा कर्ज रोलओवर से इनकार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों का भी संकेत हो सकता है। खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े हालात के बीच यह कदम अहम माना जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान ने इसे सामान्य वित्तीय प्रक्रिया बताया है। सऊदी-पाकिस्तान रक्षा सहयोग भी मजबूत इस बीच सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रणनीतिक साझेदारी भी गहरी होती दिख रही है। सऊदी रक्षा मंत्रालय के अनुसार, पाकिस्तानी वायुसेना का एक दल पूर्वी क्षेत्र स्थित किंग अब्दुलअजीज एयर बेस पर तैनात किया गया है। इसमें लड़ाकू और सहायक विमान शामिल हैं, जिनका उद्देश्य सैन्य समन्वय और ऑपरेशनल तैयारियों को मजबूत करना है। IMF और कर्ज भुगतान की दोहरी चुनौती पाकिस्तान पर इस महीने अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को 1.3 अरब डॉलर के बॉन्ड का भुगतान भी करना है। साथ ही वह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 1.2 अरब डॉलर की अगली किस्त का इंतजार कर रहा है। आर्थिक जानकारों का कहना है कि UAE के अचानक रुख ने पाकिस्तान की वित्तीय योजना को झटका दिया है। अब देश को विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट से बचने और आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए सऊदी अरब सहित अन्य सहयोगी देशों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में पाकिस्तान के लिए आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं, और उसकी नजरें एक बार फिर सऊदी समर्थन पर टिकी हैं।
भारत की मेजबानी में आमने-सामने होंगे UAE और ईरान, BRICS बैठक से पश्चिम एशिया पर नजर

नई दिल्ली। भारत की अध्यक्षता में होने जा रही ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक कूटनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है। खास बात यह है कि मौजूदा तनाव के बावजूद ईरान और संयुक्त अरब अमीरात एक ही मंच पर बैठेंगे। यह बैठक 14 और 15 मई को नई दिल्ली में आयोजित होगी, जिसकी अध्यक्षता भारत करेगा। भारत ने इस बैठक के लिए रूस, ईरान, यूएई, ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका को निमंत्रण भेजा है। माना जा रहा है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच यह बैठक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर साबित हो सकती है, जहां टकराव की स्थिति में रहे देश भी एक साथ चर्चा करेंगे। ब्रिक्स समूह की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका से हुई थी। 2024 में इसका विस्तार कर मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया, जबकि 2025 में इंडोनेशिया भी इसमें जुड़ गया। ब्रिक्स देशों की कुल आबादी करीब 3.9 अरब बताई जाती है, जो वैश्विक जनसंख्या का लगभग 48 प्रतिशत है। रूस के उप विदेश मंत्री आंद्रेई रुडेंको ने रूसी मीडिया को बताया कि सर्गेई लावरोव बैठक में हिस्सा लेने के लिए नई दिल्ली आएंगे। इससे बैठक का महत्व और बढ़ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान ने भारत से अपील की है कि अध्यक्ष के तौर पर वह एक औपचारिक बयान जारी कर अमेरिका और इजरायल की ओर से किए गए हमलों की निंदा करे। हालांकि, समूह के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल हैं और भारत के अमेरिका व इजरायल के साथ करीबी संबंधों को देखते हुए साझा रुख तैयार करना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है। इससे पहले विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा था कि पश्चिम एशिया संघर्ष पर ब्रिक्स देशों के बीच एकमत होना आसान नहीं है। उन्होंने बिना किसी देश का नाम लिए कहा कि कुछ सदस्य सीधे इस संघर्ष से जुड़े हैं, जिसके कारण साझा बयान तैयार करना कठिन हो गया है। भारत फिलहाल ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि अलग-अलग विचार रखने वाले देशों के बीच संतुलन बनाते हुए किसी साझा रुख पर सहमति बनाई जाए।