पश्चिम एशिया संकट पर ईरान का पलटवार, अमेरिका-इजराइल को बताया जिम्मेदार, ट्रंप की सख्ती से बढ़ा तनाव

वॉशिंगटन । पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई देशों में जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर असर पड़ा है। इस बीच ईरान ने इन हालात के लिए खुद को जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था को बुरी तरह प्रभावित किया है। कई देशों में जरूरी वस्तुओं की सप्लाई पर असर पड़ा है। इस बीच ईरान ने इन हालात के लिए खुद को जिम्मेदार मानने से इनकार करते हुए अमेरिका और इजराइल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि भारत समेत कई देशों में पैदा हुई मौजूदा स्थिति के लिए ईरान नहीं, बल्कि अमेरिका और इजराइल जिम्मेदार हैं। उन्होंने दावा किया कि यह संघर्ष ईरान पर थोपा गया है और देश इससे खुश नहीं है। “हमने नहीं शुरू की यह जंग”एक साक्षात्कार में बघाई ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अमेरिका और इजराइल की भूमिका की जवाबदेही तय करनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि इन देशों की कार्रवाई से ही मौजूदा हालात पैदा हुए हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से प्रभावित देशों के सवाल पर उन्होंने कहा कि पहले यह समुद्री मार्ग पूरी तरह सुरक्षित था और हर देश के लिए खुला था। होर्मुज पर ईरान का दावाबघाई ने यह भी कहा कि ईरान ने जो भी कदम उठाए हैं, वे अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हैं। उनका कहना है कि अमेरिका और इजराइल ने खाड़ी क्षेत्र के देशों की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए किया, जिसके जवाब में ईरान को कार्रवाई करनी पड़ी। ईरान का कहना है कि वह खुद भी इस जलमार्ग पर निर्भर है, इसलिए उसकी प्राथमिकता इसकी सुरक्षा है। अमेरिका की सख्त नीतिदूसरी ओर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है। अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने वैश्विक बैंकों को ईरानी मनी लॉन्ड्रिंग और तेल नेटवर्क पर कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए हैं। अमेरिका का आरोप है कि ईरान शेल कंपनियों और क्रिप्टो नेटवर्क के जरिए प्रतिबंधित तेल का व्यापार कर रहा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि ईरान के साथ संघर्ष विराम “कमजोर स्थिति” में पहुंच चुका है और उन्होंने तेहरान के शांति प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। तेल कारोबार पर सख्तीअमेरिकी प्रशासन ने बैंकों से संदिग्ध कंपनियों की पहचान करने को कहा है, खासकर उन फर्मों पर नजर रखने के लिए जो अचानक बड़े वित्तीय लेनदेन कर रही हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2024 में ईरान से जुड़ी कंपनियों ने करीब 4 अरब डॉलर का तेल कारोबार किया है। अब अमेरिका इराक, यूएई और ओमान जैसे देशों पर भी दबाव बना रहा है ताकि ईरान की आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगाई जा सके।
ट्रम्प का ईरान को बड़ा झटका, शांति प्रस्ताव खारिज; परमाणु शर्तों पर बढ़ा टकराव, होर्मुज में तनाव गहराया

नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर तेज हो गया है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के शांति प्रस्ताव को खारिज करते हुए कड़े रुख का संकेत दिया है। ट्रम्प ने साफ कहा कि ईरान की ओर से भेजा गया प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं है, जिससे क्षेत्र में कूटनीतिक हलचल और बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार ईरान ने पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका को नया प्रस्ताव भेजा था, जिसमें युद्धविराम, प्रतिबंधों में राहत और परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत की बात शामिल थी। इसके जवाब में अमेरिका ने शर्त रखी कि ईरान को उच्च संवर्धित यूरेनियम (Enriched Uranium) अमेरिका को सौंपना होगा और लंबे समय तक परमाणु संवर्धन रोकना होगा। इस पूरे विवाद की जड़ ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ी है, जहां अमेरिका और पश्चिमी देश इसे सुरक्षा के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा जरूरतों से जोड़कर देखता है। इसी टकराव के कारण दोनों देशों के बीच बातचीत बार-बार रुकती और शुरू होती रही है। तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य में हालात भी संवेदनशील बने हुए हैं, जहां वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। किसी भी टकराव का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इस कूटनीतिक गतिरोध के साथ-साथ क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां और बयानबाजी भी तेज हो गई हैं, जिससे पश्चिम एशिया में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। कुल मिलाकर यह स्थिति दिखाती है कि ईरान-अमेरिका संबंध एक बार फिर टकराव की दिशा में बढ़ रहे हैं, जहां बातचीत और दबाव की राजनीति दोनों साथ-साथ चल रही हैं और किसी भी फैसले का असर वैश्विक स्तर पर महसूस किया जा सकता है।
ईरान का ट्रंप को 14 सूत्रीय अल्टीमेटम: ‘युद्ध खत्म करो, प्रतिबंध हटाओ, मुआवजा दो’

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच कूटनीतिक हल की कोशिशें तेज हो गई हैं। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के 9 सूत्रीय शांति फ्रेमवर्क के जवाब में ईरान ने नया 14 सूत्रीय प्रस्ताव भेजकर साफ संकेत दिया है कि वह अपने शर्तों पर समझौता चाहता है। पाकिस्तान की मध्यस्थता के जरिए वॉशिंगटन तक पहुंचाए गए इस प्रस्ताव में तेहरान ने युद्ध खत्म करने से लेकर प्रतिबंध हटाने और मुआवजे तक की सख्त मांगें रख दी हैं, जिससे वैश्विक राजनीति में हलचल बढ़ गई है। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस प्रस्ताव में सबसे अहम शर्त यह है कि अमेरिका सभी मोर्चों पर सैन्य कार्रवाई तुरंत रोके, लेबनान समेत पूरे क्षेत्र में युद्ध खत्म किया जाए और अमेरिकी सेना को वापस बुलाया जाए। इसके अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य के लिए नई व्यवस्था बनाने, नौसैनिक नाकेबंदी हटाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने की भी बात कही गई है। ईरान ने साफ तौर पर आर्थिक प्रतिबंध खत्म करने, जब्त संपत्तियां लौटाने और युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा देने की मांग भी शामिल की है। तेहरान ने अमेरिका के 2 महीने के युद्धविराम प्रस्ताव को खारिज करते हुए 30 दिन में सभी मुद्दों के समाधान की समयसीमा सुझाई है। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने दो टूक कहा कि अब फैसला अमेरिका को करना है या तो कूटनीति का रास्ता चुने या फिर टकराव के लिए तैयार रहे। उनका कहना है कि ईरान दोनों परिस्थितियों के लिए तैयार है और अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा। वहीं दूसरी ओर ट्रंप ने इस 14 सूत्रीय प्रस्ताव पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका इसकी समीक्षा कर रहा है, लेकिन इसे स्वीकार करना आसान नहीं होगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि ईरान ने आक्रामक रुख जारी रखा तो सैन्य कार्रवाई दोबारा हो सकती है। ट्रंप के मुताबिक, “ईरान समझौता करना चाहता है, लेकिन नेतृत्व और शर्तों को लेकर स्पष्टता नहीं है।” इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि एक तरफ बातचीत के दरवाजे खुले हैं, तो दूसरी तरफ युद्ध का खतरा अभी टला नहीं है। आने वाले दिनों में यह तय होगा कि अमेरिका और ईरान कूटनीति की राह पकड़ते हैं या फिर मध्य पूर्व एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ता है।
Middle East Tensions: हाइपरसोनिक हमले की आशंका; क्या ईरान-अमेरिका टकराव नए मोड़ पर?

Middle East Tensions: नई दिल्ली। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित सैन्य टकराव को लेकर गंभीर संकेत सामने आ रहे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका पहली बार ईरान के खिलाफ हाइपरसोनिक मिसाइलों के इस्तेमाल पर विचार कर रहा है, जिससे हालात और भी विस्फोटक हो सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के कमांडर एडमिरल ब्रैड कूपर ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को संभावित सैन्य विकल्पों की जानकारी दी है। व्हाइट हाउस में हुई इस बैठक में एक ‘छोटा लेकिन बेहद प्रभावशाली’ हमले का प्रस्ताव रखा गया, जिसमें ईरान के सैन्य ढांचे, मिसाइल सिस्टम और शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाने की बात कही गई है। इस रणनीति में ‘डार्क ईगल’ जैसी अत्याधुनिक हाइपरसोनिक मिसाइलों का इस्तेमाल शामिल हो सकता है। यह मिसाइल 3,000 किलोमीटर से अधिक दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम मानी जाती है। इसके अलावा B-1B लांसर जैसे भारी बमवर्षक विमानों की तैनाती भी बढ़ाई जा रही है, जो इस तरह के हमलों को अंजाम देने में सक्षम हैं। CSK vs MI: आईपीएल 2026 में बड़ा मुकाबला, सीएसके-एमआई के लिए ‘करो या मरो’ जैसी स्थिति.. तनाव सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है। मुजतबा खामेनेई ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी है कि अगर हमला हुआ तो उसका जवाब समुद्र में दिया जाएगा। वहीं तेल बाजार में भी इसका असर साफ दिख रहा है कच्चे तेल की कीमतें अचानक उछलकर 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का संकेत है। इसी बीच इजराइल ने लेबनान में हमले तेज कर दिए हैं और गाजा जाने वाले सहायता जहाजों को भी रोका है, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया है। दूसरी ओर होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट आई है, जो वैश्विक व्यापार के लिए एक बड़ा झटका साबित हो सकता है। Labour Day: मजदूर दिवस की कहानी: खून, संघर्ष और हक की जीत की ऐतिहासिक गाथा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हाइपरसोनिक हथियारों का इस्तेमाल होता है, तो यह सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि युद्ध की प्रकृति में बड़ा बदलाव होगा। ऐसे हथियारों को रोकना बेहद मुश्किल होता है, जिससे जवाबी कार्रवाई का जोखिम भी बढ़ जाता है। कुल मिलाकर, हालात बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुके हैं। एक छोटी सी चूक भी बड़े युद्ध में बदल सकती है। ऐसे में दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि कूटनीति हावी होती है या फिर हथियारों की भाषा आगे बढ़ती है।
‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी नहीं चलेगी’, ईरान की अमेरिका को सख्त चेतावनी

तेहरान। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। ईरान ने अमेरिका पर ‘समुद्री डकैती और गुंडागर्दी’ का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि अगर कथित समुद्री नाकेबंदी जारी रही तो जल्द ही उसे “व्यावहारिक और अभूतपूर्व सैन्य कार्रवाई” का सामना करना पड़ेगा। ईरान के सरकारी मीडिया के मुताबिक, एक वरिष्ठ सुरक्षा सूत्र ने कहा कि देश की सशस्त्र सेनाएं अब और संयम बरतने के पक्ष में नहीं हैं। उनका कहना है कि धैर्य की सीमा होती है और यदि अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट में अपनी ‘गैरकानूनी’ गतिविधियां जारी रखता है, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा। अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरानी जहाजों की जब्ती को लेकर भी विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि अमीर सईद इरावानी ने इस कार्रवाई को “कानूनी व्यापार में अवैध हस्तक्षेप” करार दिया है। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद को लिखे पत्र में कहा कि अमेरिकी कदम ‘समुद्री डकैती’ के समान हैं। दूसरी ओर, वॉशिंगटन डीसी की जिला अटॉर्नी जीनीन पिरो ने हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर दो जहाज ‘एमटी मजेस्टिक’ और ‘एमटी टिफनी’ को जब्त करने की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि इन जहाजों में मौजूद लगभग 3.8 मिलियन बैरल ईरानी तेल को कब्जे में लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट में यह नाकेबंदी उस समय लागू की, जब 11 और 12 अप्रैल को पाकिस्तान के इस्लामाबाद में ईरान के साथ हुई वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। गौरतलब है कि 8 अप्रैल को ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच युद्धविराम लागू हुआ था, जो करीब 40 दिनों तक चले संघर्ष के बाद संभव हो पाया। यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ था, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान के कई शहरों पर हमले किए थे, जिसमें शीर्ष नेतृत्व, सैन्य अधिकारी और नागरिकों की जान गई थी। इसके जवाब में ईरान ने इजरायल और मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट पर अपनी रणनीतिक पकड़ को और मजबूत कर लिया, जिससे क्षेत्र में तनाव लगातार बना हुआ है।
होर्मुज से जहाजों पर 20 लाख डॉलर टोल की खबर पर मचा हड़कंप, भारत पर टैक्स को लेकर सरकार ने दिया जवाब

नई दिल्ली। अमेरिका के साथ सीजफायर के बाद ईरान द्वारा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर भारी शुल्क वसूलने की संभावित योजना को लेकर वैश्विक हलचल तेज हो गई है। खबरों के अनुसार ईरान की संसद में मंगलवार को एक प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है, जिसके तहत इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर 20 लाख डॉलर तक का टोल लगाया जा सकता है। भारत-ईरान टोल चर्चा पर सरकार का स्पष्ट बयानइस मुद्दे पर भारत सरकार ने स्थिति साफ करते हुए कहा है कि ईरान के साथ इस तरह के किसी टोल टैक्स को लेकर कोई बातचीत नहीं हुई है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि भारत और ईरान के बीच इस विषय पर कोई चर्चा नहीं हुई है।होर्मुज में आंशिक संचालन की तैयारीरिपोर्ट्स के मुताबिक बुधवार को ईरानी अधिकारी ने संकेत दिए कि शुक्रवार से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में सीमित स्तर पर जहाजों की आवाजाही शुरू हो सकती है। यह मार्ग युद्ध के दौरान लगभग छह सप्ताह तक बाधित रहा था, हालांकि कुछ मित्र देशों के जहाजों को गुजरने की अनुमति दी गई थी, जिनमें भारत भी शामिल था।20 लाख डॉलर तक हो सकता है शुल्कसूत्रों के अनुसार ईरान स्थायी शांति व्यवस्था के तहत इस मार्ग से गुजरने वाले जहाजों पर भारी शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है। अनुमान है कि यह शुल्क लगभग 20 लाख डॉलर प्रति ट्रांजिट तक हो सकता है, जो मौजूदा शिपिंग लागत के बराबर माना जा रहा है। ईरान और ओमान दोनों की भूमिकारिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इस प्रस्तावित व्यवस्था के तहत ईरान और ओमान दोनों को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क वसूलने का अधिकार मिल सकता है। इस आय का उपयोग क्षेत्रीय पुनर्निर्माण और आर्थिक जरूरतों के लिए किए जाने की बात कही जा रही है। भारत को पहले मिली थी राहतयुद्ध के दौरान ईरान ने कुछ मित्र देशों को सुरक्षित मार्ग से गुजरने की अनुमति दी थी, जिनमें भारत का नाम भी शामिल रहा। उस समय कई भारतीय जहाज जैसे एलपीजी टैंकर ‘ग्रीन आशा’ और अन्य वेसल्स सुरक्षित रूप से भारत पहुंचे थे। वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर नजरहोर्मुज स्ट्रेट दुनिया के तेल और गैस व्यापार के लिए बेहद अहम माना जाता है। ऐसे में किसी भी तरह का नया शुल्क या नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा कीमतों और आपूर्ति श्रृंखला पर बड़ा असर डाल सकता है।
अमेरिका के लिए स्पेन ने सैन्य विमानों के लिए बंद किया एयरस्पेस

वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच स्पेन ने बड़ा फैसला लेते हुए अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद कर दिया है। इस कदम के बाद अमेरिका अब अपने सैन्य अभियानों के लिए स्पेन के आसमान या वहां के सैन्य ठिकानों का उपयोग नहीं कर पाएगा। इसे ईरान से जुड़े हालात के बीच अमेरिका के लिए रणनीतिक झटका माना जा रहा है। स्पेन की रक्षा मंत्री ने स्पष्ट कहा कि उनका देश ईरान (Iran) के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेगा। उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी विमानों को न तो एयरस्पेस मिलेगा और न ही सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति दी जाएगी। इस बयान से संकेत मिला है कि स्पेन इस पूरे संघर्ष से दूरी बनाए रखना चाहता है। इस फैसले का सीधा असर अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, अब अमेरिकी विमानों को वैकल्पिक मार्ग अपनाने होंगे, जिससे उड़ान का समय बढ़ेगा और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। हालांकि स्पेन ने मानवीय और आपातकालीन उड़ानों को छूट दी है, लेकिन सैन्य मिशनों पर यह प्रतिबंध अहम माना जा रहा है। स्पेन सरकार का कहना है कि वह ऐसे किसी भी युद्ध का समर्थन नहीं करती जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो। इसी आधार पर उसने यह निर्णय लिया है। स्पेन के नेताओं का मानना है कि इस तरह के संघर्ष से वैश्विक तनाव बढ़ता है और शांति प्रयास प्रभावित होते हैं। विश्लेषकों का कहना है कि इस कदम से अमेरिका और स्पेन के संबंधों में तनाव बढ़ सकता है। दोनों देशों के बीच पहले भी इस मुद्दे पर मतभेद रहे हैं, और अब एयरस्पेस बंद करने के फैसले से यह दूरी और बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
मिडिल ईस्ट जंग और भड़केगी? ट्रंप के बड़े सैन्य कदम के संकेत

वाशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच हालात और गंभीर होते नजर आ रहे हैं। Iran, United States और Israel के बीच बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच अब संकेत मिल रहे हैं कि अमेरिका बड़ा कदम उठा सकता है, जिससे जंग और फैलने की आशंका बढ़ गई है। 19 दिन से जारी भीषण टकराव पिछले करीब तीन हफ्तों से जारी संघर्ष में दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर तीखे हमले किए हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान के शीर्ष ठिकानों और नेतृत्व को निशाना बनाया, वहीं ईरान ने जवाब में इजरायल और खाड़ी देशों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए हैं। हाल ही में ईरान ने Saudi Arabia, Qatar और United Arab Emirates के तेल-गैस ठिकानों को भी निशाना बनाया, जिससे युद्ध का दायरा और बढ़ गया है। हजारों अमेरिकी सैनिक भेजने की तैयारी रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने पर विचार कर रहा है। सूत्रों का कहना है कि हजारों अमेरिकी सैनिकों की तैनाती का प्लान तैयार किया जा रहा है, ताकि ईरान के खिलाफ ऑपरेशन को और मजबूत किया जा सके। क्या है अमेरिका की रणनीति? सूत्रों के अनुसार, सैनिकों की तैनाती से अमेरिका को कई सैन्य विकल्प मिल सकते हैं। इनमें सबसे अहम है Strait of Hormuz में तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करना। यह मिशन मुख्य रूप से एयरफोर्स और नेवी के जरिए चलाया जा सकता है। हालांकि कुछ विकल्प ऐसे भी हैं, जिनमें ईरान के तटीय इलाकों के पास सैनिकों की तैनाती की बात सामने आई है। खतरनाक योजना: खर्ग द्वीप पर नजर अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से यह भी जानकारी सामने आई है कि Kharg Island पर जमीनी सेना भेजने के विकल्प पर चर्चा हुई है। यह द्वीप ईरान के लगभग 90% तेल निर्यात का केंद्र है, इसलिए यहां कोई भी सैन्य कार्रवाई बेहद संवेदनशील और जोखिम भरी मानी जा रही है। ईरान की मिसाइल और ड्रोन क्षमता इसे और खतरनाक बना देती है। राजनीतिक जोखिम भी कम नहीं विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिकी सैनिकों की सीधी तैनाती Donald Trump के लिए राजनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है। अमेरिकी जनता में इस युद्ध को लेकर समर्थन सीमित है ट्रंप पहले ही मिडिल ईस्ट में नए युद्ध से दूर रहने का वादा कर चुके हैं हाल में एक अमेरिकी अधिकारी ने नाराजगी जताते हुए इस्तीफा भी दिया है इसके अलावा, इस संघर्ष में अब तक 13 अमेरिकी सैनिकों की मौत और करीब 200 के घायल होने की खबर है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका के संभावित सैन्य कदम हालात को और विस्फोटक बना सकते हैं। यदि सैनिकों की तैनाती होती है, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध में बदल सकता है, जिसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा।
MOJTABA KHAMENEI: ईरान में मोजतबा खामेनेई बने सुप्रीम लीडर, एक्सपर्ट बोले- अमेरिका से और बढ़ सकता है टकराव

MOJTABA KHAMENEI: नई दिल्ली। ईरान के मौजूदा नेतृत्व ने देश के नए सुप्रीम लीडर के रूप में मोजतबा खामेनेई को नियुक्त कर दिया है। उन्हें अयातुल्ला अली खामेनेई का उत्तराधिकारी बनाया गया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला ईरान के अमेरिका के साथ समझौते की बजाय टकराव की नीति को मजबूत करने का संकेत देता है। ईरान में सुप्रीम लीडर देश का सबसे शक्तिशाली पद होता है। विदेश नीति, रक्षा और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम फैसलों पर अंतिम अधिकार उसी के पास होता है। साथ ही वह राष्ट्रपति और संसद के कामकाज को भी दिशा देता है। यानी कई मामलों में सुप्रीम लीडर की ताकत राष्ट्रपति से भी अधिक मानी जाती है। ट्रंप के लिए झटका माना जा रहा फैसला विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए भी झटका माना जा सकता है। ट्रंप ने पहले मोजतबा को कमजोर नेता बताते हुए उनकी संभावित नियुक्ति को खारिज किया था और यह भी संकेत दिए थे कि नए सुप्रीम लीडर के चयन में उनकी राय अहम होनी चाहिए। गौरतलब है कि युद्ध के शुरुआती दौर में अमेरिका और इजरायल के हमलों के दौरान अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी। इसके बाद मोजतबा को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया है। इस कदम को तेहरान में कट्टरपंथी ताकतों के प्रभाव को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। अमेरिका के लिए ‘बेइज्जती’ जैसा कदम मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो एलेक्स वटांका के मुताबिक इतने बड़े सैन्य अभियान के बाद भी अगर 86 वर्षीय नेता की जगह उसके और ज्यादा कट्टरपंथी बेटे को सत्ता मिल जाए तो यह अमेरिका के लिए बड़ी असहज स्थिति है। विश्लेषकों का कहना है कि मोजतबा का चयन एक स्पष्ट संदेश देता है कि ईरान फिलहाल समझौते की राह नहीं, बल्कि सख्त रुख और जवाबी कार्रवाई की नीति अपनाने की तैयारी में है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, मिडिल ईस्ट इंस्टीट्यूट के वरिष्ठ फेलो पॉल सलेम ने कहा कि मोजतबा के नेतृत्व में ईरान के लिए आने वाले दिन कठिन हो सकते हैं। उनका मानना है कि मोजतबा ऐसे नेता नहीं हैं जो अमेरिका के साथ समझौता करने या अपनी रणनीति बदलने के लिए तैयार हों। पिता से भी ज्यादा कट्टर बताए जाते हैं मोजतबा पूर्व अमेरिकी राजनयिक और ईरान विशेषज्ञ एलन आयर के मुताबिक मोजतबा खामेनेई को उनके पिता से भी ज्यादा सख्त और कट्टर माना जाता है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) भी उन्हें पसंदीदा उम्मीदवार मानती रही है। 56 वर्षीय मोजतबा खामेनेई ने शिया इस्लाम की शिक्षा ईरान के कोम स्थित धार्मिक मदरसों में प्राप्त की है। उन्हें ‘हुज्जतुल इस्लाम’ की उपाधि मिली हुई है, जो शिया धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक दर्जा माना जाता है। अमेरिका ने 2019 में मोजतबा खामेनेई पर प्रतिबंध भी लगाया था। अमेरिकी वित्त मंत्रालय का आरोप था कि किसी आधिकारिक सरकारी पद पर न होने के बावजूद वे अपने पिता के प्रतिनिधि की तरह काम करते हुए सत्ता के फैसलों पर प्रभाव डालते रहे हैं। आर्थिक संकट और सख्त नीतियों की चुनौती ईरान पहले से ही कमजोर अर्थव्यवस्था, बढ़ती महंगाई, गिरती मुद्रा और बढ़ती गरीबी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसके साथ ही सरकार की कड़ी नीतियों के कारण जनता में असंतोष और विरोध प्रदर्शन भी बढ़े हैं।ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि मोजतबा के सामने देश की आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय दबाव से निपटना भी बड़ी चुनौती होगी। कई विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा हालात में उनके पास सख्त रुख अपनाने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं हैं, चाहे युद्ध समाप्त ही क्यों न हो जाए।