भारतीय मूल के रणनीतिक विशेषज्ञ एशले जे. टेलिस को अमेरिकी अदालत से बड़ी राहत, जासूसी कानून के तहत मामला खारिज

नई दिल्ली। अमेरिकी अदालत ने भारतीय मूल के प्रसिद्ध रणनीतिक विशेषज्ञ एशले जे. टेलिस के खिलाफ दर्ज जासूसी कानून से जुड़े मामले को तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया है। यह फैसला अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा और गोपनीय दस्तावेजों से जुड़े मामलों में चल रही सख्ती के बीच आया है। अदालत का अहम फैसलावर्जीनिया स्थित अमेरिकी संघीय अदालत के जज माइकल एस. नाचमैनॉफ ने 16 अप्रैल को दिए आदेश में टेलिस के खिलाफ मामला खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने गलत कानूनी प्रावधान के तहत आरोप लगाए थे, इसलिए मामला आगे नहीं चल सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह खारिजी “बिना पूर्वाग्रह” (without prejudice) की गई है, यानी कानूनी प्रक्रिया के आधार पर भविष्य में अलग धारा के तहत मामला फिर से दायर किया जा सकता है। क्या था पूरा मामला?एशले जे. टेलिस अमेरिका की विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति के प्रमुख विशेषज्ञ माने जाते हैं। उन पर आरोप था कि उन्होंने अमेरिकी विदेश विभाग और रक्षा तंत्र से जुड़े कई गोपनीय दस्तावेज अपने निजी आवास में रखे थे। अभियोजन पक्ष का दावा था कि टेलिस के पास लगभग 11 संवेदनशील फाइलें थीं, जिनमें हजारों पन्नों की जानकारी शामिल थी। इनमें से कुछ दस्तावेजों को टॉप सीक्रेट श्रेणी में रखा गया था, और कुछ चीन की सैन्य व परमाणु क्षमताओं से संबंधित बताए गए थे। बचाव पक्ष की दलीलटेलिस की कानूनी टीम ने अदालत में कहा कि सरकार ने जासूसी अधिनियम (Espionage Act) की गलत धारा 793(e) के तहत मामला दर्ज किया। वकीलों का तर्क था कि यह धारा उन मामलों में लागू होती है जहां दस्तावेज अवैध रूप से रखे गए हों, जबकि टेलिस के पास उच्च स्तरीय सुरक्षा मंजूरी (security clearance) थी और उन्हें यह दस्तावेज आधिकारिक रूप से सौंपे गए थे। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि सरकार ने यह साबित नहीं किया कि टेलिस ने दस्तावेज चोरी किए या अनधिकृत तरीके से हासिल किए, बल्कि वे उनके आधिकारिक कार्यक्षेत्र का हिस्सा थे। सरकार की दलील और चिंताअमेरिकी अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि टेलिस के पास अत्यंत संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा दस्तावेजों तक पहुंच थी और उन्होंने इन्हें अपने निजी घर में रखा, जो सुरक्षा नियमों का उल्लंघन है। सरकार ने यह भी कहा था कि टेलिस के पास हजारों पन्नों की गोपनीय जानकारी थी, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता था। इसी आधार पर उनकी जमानत का भी विरोध किया गया था।अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष ने गलत कानूनी आधार चुना, इसलिए मौजूदा आरोप टिक नहीं पाए। इसके बाद अदालत ने मामला खारिज कर दिया और टेलिस ने अपनी जमानत राशि वापस करने की मांग भी रखी, जिस पर सरकार ने आपत्ति नहीं जताई। क्यों अहम है यह मामला?यह मामला अमेरिका में गोपनीय दस्तावेजों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े बढ़ते विवादों की पृष्ठभूमि में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। हाल के वर्षों में अमेरिका में कई पूर्व और वर्तमान अधिकारियों पर संवेदनशील दस्तावेजों के गलत उपयोग के आरोप लगे हैं।एशले जे. टेलिस लंबे समय से अमेरिकी सरकार के रणनीतिक सलाहकार रहे हैं और इंडो-पैसिफिक नीति व भारत-अमेरिका संबंधों पर उनकी विशेषज्ञता को महत्वपूर्ण माना जाता है।
अडानी ने SEC के खिलाफ मुकदमे को खारिज करने के लिए US फेडरल कोर्ट में दायर की याचिका

वाशिंगटन। गौतम अडानी (Gautam Adani) और उनके भतीजे सागर अडानी (Sagar Adani) ने यूएस सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमिशन (US Securities and Exchange Commission-SEC) के खिलाफ चल रहे मुकदमे को खारिज करने के लिए न्यूयॉर्क की फेडरल कोर्ट (New York Federal Court) में याचिका दायर की है। अडानी की ओर से सबसे बड़ी दलील यह है कि इस मामले में अमेरिकी अदालत का अधिकार क्षेत्र ही नहीं बनता। वकीलों के मुताबिक, कथित लेन-देन अमेरिका के बाहर हुआ, बॉन्ड किसी अमेरिकी एक्सचेंज में लिस्डेट नहीं थे और दोनों आरोपी भारत में रहते हैं, इसलिए इस मामले को अमेरिकी कानून के तहत नहीं सुना जाना चाहिए। 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड पर उठे सवालअडानी ग्रुप की ओर से कहा गया है कि जिस 750 मिलियन डॉलर के बॉन्ड को लेकर मामला बनाया गया है, वह नियम 144A के तहत जारी किया गया था। यह बॉन्ड पहले गैर-अमेरिकी अंडरराइटर्स को बेचा गया और बाद में कुछ हिस्से को संस्थागत खरीदारों को रीसेल किया गया। रॉयटर्स के मुताबिक अडानी पक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया में अमेरिका की सीधी भागीदारी नहीं थी, इसलिए SEC का हस्तक्षेप उचित नहीं है। निवेशकों को नुकसान नहीं, केस कमजोरअडानी की याचिका में यह भी कहा गया है कि SEC अब तक यह साबित नहीं कर पाया है कि किसी भी निवेशक को इस सौदे से आर्थिक नुकसान हुआ हो। कंपनी के अनुसार, ये बॉन्ड 2024 में मैच्योर हो चुके हैं और निवेशकों को मूलधन के साथ ब्याज भी पूरा लौटाया जा चुका है। ऐसे में “नो लॉस” की स्थिति में मुकदमे की वैधता पर सवाल उठता है। रिश्वतखोरी के आरोपों को किया खारिजअडानी ने रिश्वतखोरी के आरोपों को भी निराधार बताया है। उनका कहना है कि SEC के पास इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस या विश्वसनीय सबूत नहीं है। साथ ही यह भी कहा गया कि न तो गौतम अडानी और न ही सागर अडानी का इस बॉन्ड इश्यू से कोई प्रत्यक्ष संबंध साबित किया गया है। ‘भ्रामक बयान’ नहीं, सामान्य कॉर्पोरेट भाषाSEC ने जिन बयानों को भ्रामक बताया है, जैसे ESG प्रतिबद्धताएं और कॉर्पोरेट गवर्नेंस, उन्हें अडानी पक्ष ने “पफरी” यानी सामान्य कॉर्पोरेट बयान करार दिया है। उनका तर्क है कि ऐसे सामान्य दावे निवेशकों को गुमराह करने की श्रेणी में नहीं आते और इन्हें कानूनी आधार नहीं बनाया जा सकता। अडानी ग्रुप ने इस पूरे मामले को कानूनी रूप से कमजोर बताते हुए कोर्ट से इसे खारिज करने की मांग की है। अब देखना होगा कि अमेरिकी अदालत इस पर क्या रुख अपनाती है, क्योंकि यह मामला अंतरराष्ट्रीय निवेश और नियामक अधिकार क्षेत्र से जुड़ा बड़ा उदाहरण बन सकता है।