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Pakistan US Relations: ‘पाकिस्तान पर भरोसा नहीं किया जा सकता’, पूर्व पेंटागन अधिकारी माइकल रुबिन का बड़ा बयान

नई दिल्ली। अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में हाल के महीनों में भले ही नरमी और नजदीकी देखने को मिली हो, लेकिन भरोसे को लेकर सवाल अब भी कायम हैं। इसी बीच पेंटागन के पूर्व अधिकारी और मिडिल ईस्ट मामलों के विशेषज्ञ Michael Rubin ने पाकिस्तान को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका को पाकिस्तान पर भरोसा नहीं करना चाहिए और भविष्य में इस्लामाबाद से किए गए किसी भी वादे को निभाने के लिए वॉशिंगटन बाध्य नहीं होगा। माइकल रुबिन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी विदेश नीति में पाकिस्तान को कभी स्थायी सहयोगी के रूप में नहीं देखा गया। उनके मुताबिक, वॉशिंगटन ने हमेशा पाकिस्तान को केवल रणनीतिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल किया और मौजूदा नेतृत्व भी उसी नीति का हिस्सा है। रुबिन ने कहा कि Donald Trump प्रशासन का कार्यकाल खत्म होने के बाद चाहे रिपब्लिकन सरकार आए या डेमोक्रेट, दोनों इस बात पर सहमत होंगे कि पाकिस्तान पूरी तरह भरोसेमंद साझेदार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका पाक सेना प्रमुख Asim Munir से किए गए किसी भी वादे को निभाने के लिए खुद को मजबूर महसूस नहीं करेगा। दरअसल, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्तों में बदलाव देखने को मिला है। ट्रंप कई मौकों पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और आर्मी चीफ असीम मुनीर की तारीफ कर चुके हैं। इतना ही नहीं, ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव और वार्ता में भी अमेरिका ने पाकिस्तान की भूमिका को अहम बताया है। हालांकि, पाकिस्तान और अमेरिका के संबंधों का इतिहास उतार-चढ़ाव भरा रहा है। साल 2001 में अमेरिका में हुए 9/11 आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव बढ़ गया था। अमेरिका को शक था कि आतंकी संगठन अल-कायदा सरगना Osama bin Laden को पाकिस्तान में पनाह मिली हुई है। इसके बाद साल 2011 में अमेरिकी सेना ने पाकिस्तान के एबटाबाद में ऑपरेशन चलाकर ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। इस घटना के बाद दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहे। स्थिति यह रही कि साल 2006 के बाद से किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया। वहीं 2011 के बाद लंबे समय तक अमेरिका के बड़े अधिकारी भी इस्लामाबाद जाने से बचते रहे। हालांकि हाल ही में अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance ने ईरान वार्ता के सिलसिले में पाकिस्तान का दौरा किया, जिसे दोनों देशों के बीच नए समीकरण के तौर पर देखा जा रहा है।

ट्रंप पर दबाव बढ़ा, सीनेट में डेमोक्रेट नेताओं ने ईरान संघर्ष की आलोचना की

वाशिंगटन । वाशिंगटन अमेरिका में ईरान के साथ जारी संघर्ष को लेकर सियासी माहौल गर्म हो गया है। शीर्ष डेमोक्रेट नेताओं ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर दबाव बनाते हुए युद्ध की बढ़ती लागत, स्पष्ट रणनीति की कमी और लंबे संघर्ष के खतरे को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। सीनेट में डेमोक्रेटिक नेता चक शूमर ने कहा कि इस युद्ध का कोई स्पष्ट लक्ष्य या रणनीति नहीं है। उन्होंने कहा, “ट्रंप का ईरान के साथ युद्ध चौथे हफ्ते में है और इसका कोई अंत नजर नहीं आ रहा।” शूमर ने आरोप लगाया कि राष्ट्रपति आगे की योजना को लेकर साफ जवाब देने में विफल हैं। उन्होंने व्हाइट हाउस के बयान भी विरोधाभासी बताया और कहा, “यह क्या हो रहा है? कमांडर-इन-चीफ की लीडरशिप नहीं दिख रही। या तो भ्रमित हैं, या सच नहीं बोल रहे, या दोनों एक साथ हैं।” शूमर ने युद्ध को अमेरिका में बढ़ती पेट्रोल कीमतों से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि एक महीने पहले गैस की औसत कीमत लगभग 2.93 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अब बढ़कर 3.94 डॉलर हो गई है। यह वृद्धि यूक्रेन पर रूसी आक्रमण के बाद देखी गई सबसे बड़ी मासिक उछालों में से एक है। सीनेटर ग्रेग लैंड्समैन ने कहा कि अब समय आ गया है कि ईरान में अभियान समाप्त किया जाए। उन्होंने चेतावनी दी कि और गहराई से शामिल होने पर अमेरिका बिना रणनीति वाले लंबे युद्ध में फंस सकता है। उनके अनुसार अमेरिकी बलों ने ईरान की मिसाइल और ड्रोन लॉन्च क्षमता लगभग पूरी तरह नष्ट कर दी है और हथियारों के ढांचे को निशाना बनाने का उद्देश्य पूरा हो चुका है। सीनेटर पीटर वेल्च ने सरकार के रुख की आलोचना करते हुए 200 अरब डॉलर के युद्ध फंड का विरोध किया। उन्होंने आर्थिक असर पर चिंता जताई और बताया कि पेट्रोल की कीमतें कम से कम 1 डॉलर बढ़ गई हैं, जिससे आम अमेरिकी परिवार को सालाना लगभग 2,000 डॉलर अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा। इसके अलावा, उर्वरक और हीटिंग ऑयल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिससे परिवारों पर लगभग 1,000 डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। सीनेटर सारा जैकब्स ने इसे अमेरिकी विदेश नीति की बड़ी गलती बताया। उन्होंने कहा सरकार के पास आगे की कोई स्पष्ट योजना नहीं है और आम लोगों को यह तक नहीं बताया जा रहा कि यह युद्ध है क्या, इसका लक्ष्य क्या है और इसकी लागत कितनी होगी। इस तरह, डेमोक्रेट नेताओं ने ट्रंप पर दबाव बढ़ाया है कि वह युद्ध की स्पष्ट रणनीति पेश करें, पारदर्शिता सुनिश्चित करें और अमेरिका के आर्थिक और सामाजिक नुकसान को ध्यान में रखते हुए कार्रवाई करें।