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अमेरिका-ईरान तनाव, एआई शेयरों की गिरावट और कच्चे तेल की कीमतें तय करेंगी भारतीय बाजार की दिशा: निवेशक सतर्क

नई दिल्ली । भारतीय शेयर बाजार के लिए अगला सप्ताह महत्वपूर्ण संकेत लेकर आ सकता है। अमेरिका और ईरान के बीच लगातार बढ़ते तनाव ने वैश्विक निवेशकों को सतर्क कर दिया है। मध्य पूर्व में अमेरिका के ठिकानों पर ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और इजरायल की लेबनान में बमबारी की खबरें बाजार की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। निवेशक इन geopolitical घटनाओं पर नजर रखकर जोखिम और अवसर का मूल्यांकन करेंगे। कच्चे तेल की कीमतें भी बाजार के मूड पर सीधे असर डाल रही हैं। ब्रेंट क्रूड वर्तमान में 93 डॉलर प्रति बैरल और डब्ल्यूटीआई क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर कारोबार कर रहे हैं। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव ऊर्जा और इनर्जी सेक्टर से जुड़े शेयरों की चाल को प्रभावित कर सकता है। उच्च तेल मूल्य न केवल ए너지 कंपनियों के मुनाफे को प्रभावित करता है, बल्कि आर्थिक महंगाई को भी बढ़ा सकता है। अमेरिका में एआई से जुड़े शेयरों की गिरावट ने वैश्विक निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिकी टेक्नोलॉजी इंडेक्स नैस्डैक में शुक्रवार को 5 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई। विशेष रूप से एनवीडिया, माइक्रोन टेक्नोलॉजी और मार्वल टेक्नोलॉजी जैसी एआई थीम वाले शेयरों में लगभग 17 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। इस प्रवृत्ति से भारतीय निवेशक भी प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि कई एआई और टेक्नोलॉजी कंपनियों के शेयर वैश्विक निवेश प्रवाह से जुड़े हैं। भारत में निवेशकों की निगाह 12 जून को जारी होने वाले खुदरा महंगाई आंकड़ों पर भी रहेगी। महंगाई के आंकड़े समग्र आर्थिक स्थिति और केंद्रीय बैंक की नीतियों पर असर डालते हैं। यदि महंगाई दर उम्मीद से अधिक होती है, तो इससे ब्याज दरों में संभावित बदलाव और निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है। बीते सप्ताह भारतीय शेयर बाजार नुकसान के साथ बंद हुआ। निफ्टी 181.05 अंक या 0.77 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 23,366.70 पर रहा। सेंसेक्स 532.40 अंक या 0.71 प्रतिशत की गिरावट के साथ 74,243.34 पर बंद हुआ। हालांकि, कुछ सेक्टरों ने बेहतर प्रदर्शन किया। मीडिया और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स शेयरों में तेजी रही। निफ्टी मीडिया 6.69 प्रतिशत, निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स 1.49 प्रतिशत और निफ्टी पीएसयू बैंक 1.26 प्रतिशत की बढ़त के साथ बंद हुए। वहीं, निफ्टी एफएमसीजी, निफ्टी कमोडिटीज, निफ्टी इन्फ्रा, निफ्टी रियल्टी, निफ्टी मेटल, निफ्टी पीएसई और निफ्टी एनर्जी सेक्टरों में कमजोरी देखने को मिली। क्रमशः 1.30 से 2.19 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज हुई। यह संकेत है कि निवेशकों ने जोखिम वाले और साइकिलिक सेक्टरों से परहेज किया और सुरक्षित या अधिक स्थिर क्षेत्रों की ओर रुख किया। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले सप्ताह में बाजार की दिशा कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करेगी। अमेरिका-ईरान तनाव, कच्चे तेल की कीमत, एआई शेयरों की चाल और महंगाई के आंकड़े मिलकर निवेशकों की रणनीति और बाजार की उतार-चढ़ाव की सीमा तय करेंगे। इस अवधि में निवेशक सतर्क रहकर बाजार की हर छोटी-सी प्रतिक्रिया का अध्ययन करेंगे। कुल मिलाकर, अगले सप्ताह भारतीय इक्विटी बाजार में सतर्कता और रणनीति की आवश्यकता होगी। निवेशक वैश्विक और घरेलू आर्थिक संकेतकों के आधार पर अपने निवेश निर्णय लेंगे। सुरक्षित सेक्टरों और स्थिर प्रदर्शन वाले शेयरों में निवेश को प्राथमिकता मिल सकती है, जबकि जोखिम वाले क्षेत्र अस्थिर रह सकते हैं।

ईरान पर अमेरिकी हमले की योजना टली, खाड़ी देशों की अपील पर ट्रंप ने लिया फैसला, समझौता पर जोर

वॉशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर प्रस्तावित एक बड़े सैन्य हमले को फिलहाल के लिए रोक दिया है। यह हमला मंगलवार को होने वाला था, लेकिन अंतिम समय पर खाड़ी देशों के नेताओं की अपील के बाद इसे टाल दिया गया। ट्रंप ने सोमवार को सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मौजूदा समय में दोनों पक्षों के बीच गंभीर बातचीत चल रही है, इसलिए सैन्य कार्रवाई को फिलहाल रोक दिया गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई ठोस समझौता नहीं होता है तो हालात फिर से बिगड़ सकते हैं। इससे पहले ट्रंप ने ईरान को सख्त चेतावनी दी थी कि अगर वार्ता विफल रहती है तो युद्धविराम के कमजोर होने के बाद स्थिति गंभीर संघर्ष में बदल सकती है। जानकारी के मुताबिक, इस संभावित हमले को लेकर अमेरिकी सेना को पहले से तैयार रहने के निर्देश दिए गए थे। राष्ट्रपति ट्रंप ने सैन्य अधिकारियों से कहा था कि यदि ईरान के साथ कोई स्वीकार्य समझौता नहीं होता, तो पल भर के नोटिस पर बड़े सैन्य हमले के लिए तैयार रहें। इससे यह संकेत मिला था कि अमेरिका कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था। हालांकि यह हमला अचानक टाल दिया गया। ट्रंप ने बताया कि यह फैसला मध्य पूर्व में अमेरिका के सहयोगी देशों—कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की अपील के बाद लिया गया है। इससे पहले सप्ताहांत में ट्रंप ने ईरान को बेहद कड़े शब्दों में चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि ईरान के पास समय बहुत कम है और अगर समझौता नहीं हुआ तो परिणाम गंभीर होंगे। उन्होंने यह भी कहा था कि स्थिति लगातार तनावपूर्ण बनी हुई है और युद्धविराम किसी भी समय टूट सकता है।

अमेरिका-ईरान तनाव से तेल बाजार में भूचाल, ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर के पार

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक तेल बाजार पर साफ नजर आने लगा है। लगातार तीसरे दिन कच्चे तेल की कीमतों में उछाल दर्ज किया गया। होर्मुज स्ट्रेट में बढ़ती सख्ती और जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। इसी के चलते ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) करीब 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। फरवरी से अब तक 50% से ज्यादा महंगा हुआ तेलविशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में शामिल है। यहां तनाव बढ़ने से वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। फरवरी से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हो चुकी है। वहीं पिछले सप्ताह ही कीमतों में करीब 8 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया था। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान जल्द समझौते के लिए तैयार हो जाए। माना जा रहा है कि यदि दोनों देशों के बीच सहमति बनती है तो होर्मुज स्ट्रेट में बाधाएं कम हो सकती हैं और तेल परिवहन सामान्य हो सकता है। ट्रंप ने दी सख्त चेतावनीपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि तेहरान के पास समय बहुत कम है और उसे जल्द फैसला लेना होगा। ट्रंप ने कहा कि ईरान को केवल एक परमाणु साइट संचालित करने की अनुमति होगी, जबकि बाकी साइटों को बंद करना पड़ेगा। इसके अलावा ट्रंप ने हाई एनरिच्ड यूरेनियम का भंडार अमेरिका को सौंपने की बात कही। उन्होंने यह भी साफ किया कि अमेरिका ईरान की विदेशों में फ्रीज की गई संपत्तियों का बड़ा हिस्सा जारी नहीं करेगा। ईरान ने भी दी जवाबी धमकीट्रंप के बयान के बाद ईरान की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। ईरानी सैन्य प्रवक्ता अबोलफजल शेकर्ची ने कहा कि यदि ईरान पर दोबारा हमला हुआ तो उसके गंभीर परिणाम होंगे। उन्होंने चेतावनी दी कि क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संसाधनों और ठिकानों को निशाना बनाने में देर नहीं लगेगी। यूएई के न्यूक्लियर प्लांट के पास ड्रोन हमलाइसी बीच संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के अल धफरा क्षेत्र स्थित बराकाह न्यूक्लियर पावर प्लांट के बाहरी हिस्से में ड्रोन हमला होने की खबर सामने आई है। हमले के बाद इलाके में आग लग गई, हालांकि सुरक्षा और दमकल टीमों ने तुरंत मौके पर पहुंचकर स्थिति को नियंत्रित कर लिया। अधिकारियों के मुताबिक, इस घटना में किसी के हताहत होने की सूचना नहीं है।

नया वर्ल्ड ऑर्डर की तरफ दुनिया बढ़ रही है, अमेरिका-इजरायल दबाव बेअसर होगा: ईरान का बड़ा दावा, गालिबाफ ने दिया सख्त संदेश

नई दिल्ली। अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव के बीच ईरान ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति को लेकर बड़ा बयान दिया है। ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा है कि दुनिया अब एक नए वैश्विक व्यवस्था (New World Order) की ओर बढ़ रही है और पश्चिमी देशों का दबदबा तेजी से कमजोर हो रहा है। गालिबाफ ने दावा किया कि भविष्य अब ग्लोबल साउथ और विकासशील देशों का होगा। उन्होंने कहा कि ईरान ने हाल के समय में अमेरिका और इजरायल के दबाव के खिलाफ जो प्रतिरोध दिखाया है, उसने इस वैश्विक बदलाव की गति को और तेज कर दिया है। उन्होंने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बयान का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया में ऐतिहासिक बदलाव हो रहा है और शक्ति का संतुलन बदल रहा है। गालिबाफ ने यह भी कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अब पुराने ढांचे पर टिक नहीं सकती। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए गालिबाफ ने कहा कि ईरान का प्रतिरोध उस बदलाव का हिस्सा है, जो आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को नई दिशा देगा। उनका दावा है कि अब वे देश आगे बढ़ेंगे जिन्हें पहले पश्चिमी प्रभाव में माना जाता था। The world stands at the cusp of a new order. As President Xi said “The transformation unseen in a century is accelerating across the globe,” and I emphasize that the Iranian nation’s 70-day resistance has accelerated this transformation. The future belongs to the Global South. — محمدباقر قالیباف | MB Ghalibaf (@mb_ghalibaf) May 16, 2026 यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक मंच पर अमेरिका और चीन के बीच तनाव, व्यापार युद्ध और ताइवान जैसे मुद्दों को लेकर पहले से ही टकराव की स्थिति बनी हुई है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की मुलाकात में भी वैश्विक शक्ति संतुलन पर चर्चा हुई थी। विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान का यह बयान सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं बल्कि पश्चिमी दबदबे को चुनौती देने की रणनीतिक कोशिश भी माना जा रहा है, जिससे अंतरराष्ट्रीय तनाव और बढ़ सकता है।

ईरान-पाकिस्तान विमान विवाद से मचा भू-राजनीतिक तूफान: अमेरिका में बढ़ी हलचल, पाकिस्तान ने किया दावों का खंडन

नई दिल्ली। अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण हालात के बीच पाकिस्तान को लेकर सामने आए कुछ मीडिया दावों ने अंतरराष्ट्रीय बहस को और तेज कर दिया है। CBS न्यूज सहित कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि संघर्षविराम के बाद ईरान के कुछ सैन्य विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस (रावलपिंडी) पर देखे गए थे, जिनमें निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने वाले विमान भी शामिल बताए गए। हालांकि इन दावों की किसी भी स्वतंत्र या सरकारी स्तर पर पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया कि ईरान ने अपने कुछ सैन्य संसाधनों को संभावित हमलों से बचाने के लिए सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया हो सकता है, लेकिन पाकिस्तान में उनकी मौजूदगी को लेकर स्पष्ट सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसी वजह से यह मामला अभी भी विवाद और अटकलों के घेरे में है। इस बीच अमेरिका में राजनीतिक प्रतिक्रिया भी देखने को मिली। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने सोशल मीडिया पर कहा कि अगर ये रिपोर्ट सही साबित होती है तो पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका और उसके अंतरराष्ट्रीय रिश्तों पर पुनर्विचार जरूरी होगा। हालांकि यह बयान भी एक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, न कि किसी आधिकारिक जांच का परिणाम। पाकिस्तान सरकार ने इन सभी आरोपों को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि नूर खान एयरबेस एक संवेदनशील और कड़ी निगरानी वाला सैन्य ठिकाना है, जहां किसी भी तरह के विदेशी सैन्य विमानों की गुप्त मौजूदगी संभव नहीं है। पाकिस्तान ने इन रिपोर्ट्स को “बिना आधार वाली और भ्रामक” बताया है। विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा अमेरिका-ईरान तनाव के दौर में क्षेत्रीय देशों को लेकर कई तरह की अपुष्ट खबरें और दावे सामने आ रहे हैं, जिनका उद्देश्य राजनीतिक दबाव बनाना या रणनीतिक संदेश देना भी हो सकता है। ऐसे मामलों में केवल आधिकारिक और प्रमाणित सूचनाओं पर ही भरोसा करना उचित माना जाता है। फिलहाल यह पूरा मुद्दा मीडिया रिपोर्ट्स, राजनीतिक बयानों और कूटनीतिक खंडनों के बीच फंसा हुआ है, और इसकी वास्तविकता को लेकर स्पष्ट स्थिति अभी तक सामने नहीं आई है।

मध्य-पूर्व में बड़ा खुलासा: UAE पर ईरान हमले का आरोप, अमेरिका-ईरान तनाव और तेल संकट ने बढ़ाई वैश्विक चिंता

नई दिल्ली। ईरान और मध्य-पूर्व में चल रहे तनाव के बीच एक बड़ा खुलासा सामने आया है, जिसमें दावा किया गया है कि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने ईरान पर गुप्त सैन्य कार्रवाई की थी। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल महीने में ईरान के लावान द्वीप स्थित ऑयल रिफाइनरी को निशाना बनाया गया था। इस हमले के बाद रिफाइनरी में भीषण आग लग गई थी और उत्पादन लंबे समय तक प्रभावित रहा। रिपोर्ट में बताया गया है कि यह हमला अप्रैल की शुरुआत में हुआ था, उसी समय जब अमेरिका युद्धविराम की घोषणा कर रहा था। ईरान ने उस दौरान दावा किया था कि उसकी रिफाइनरी पर दुश्मन देश ने हमला किया है। इसके बाद जवाबी कार्रवाई में ईरान ने UAE और कुवैत पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे, जिससे क्षेत्रीय तनाव और बढ़ गया था। हालांकि UAE ने कभी भी इस हमले की आधिकारिक जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन उसके विदेश मंत्रालय ने यह जरूर कहा कि देश को किसी भी शत्रुतापूर्ण कार्रवाई का जवाब देने का अधिकार है, जिसमें सैन्य कार्रवाई भी शामिल हो सकती है। इसी बीच अमेरिका और ईरान के बीच तनावपूर्ण रिश्तों पर एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरानी नेतृत्व को लेकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें “बेईमान” बताया है। ट्रम्प ने आरोप लगाया कि ईरान बातचीत को लंबा खींचता है और बार-बार अपने रुख बदलता है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन दस्तावेजों को कुछ मिनटों में पहुंचना चाहिए, उन्हें ईरान कई दिनों तक रोककर रखता है, जिससे बातचीत की प्रक्रिया बाधित होती है। दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता कई विवादित मुद्दों में उलझी हुई है। इनमें होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा, ईरानी जहाजों पर अमेरिकी प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम प्रमुख हैं। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। हाल के 24 घंटों में कई बड़े घटनाक्रम सामने आए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार ट्रम्प ने ईरान के नए शांति प्रस्ताव को पूरी तरह अस्वीकार कर दिया है। अमेरिका ने मांग की है कि ईरान कम से कम 12 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन बंद करे और अपने पास मौजूद 60% एनरिच्ड यूरेनियम भी सौंप दे। इसके जवाब में तनाव और बढ़ गया है। इसी बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। ब्रेंट क्रूड 104 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट में संभावित बाधा और मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव ने बाजार को अस्थिर कर दिया है, क्योंकि दुनिया का लगभग 20% तेल इसी रास्ते से गुजरता है। ट्रम्प ने कहा है कि ईरान के साथ चल रहा युद्धविराम अब “बहुत कमजोर स्थिति” में पहुंच चुका है और उन्होंने ईरानी प्रस्ताव को “कूड़ा” बताते हुए अमेरिका के लिए “पूर्ण जीत” की बात कही है। वहीं ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि फ्रांस और ब्रिटेन के युद्धपोत होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करते हैं तो उसे जवाब दिया जाएगा। इससे समुद्री सुरक्षा को लेकर चिंता और बढ़ गई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच लेबनान सीमा पर भी तनाव तेज हो गया है। हिजबुल्लाह और इजराइल के बीच संघर्ष में तेजी देखी गई है। दक्षिणी लेबनान में इजराइली एयरस्ट्राइक में 6 लोगों की मौत और 7 के घायल होने की खबर है। वहीं हिजबुल्लाह ने भी जवाबी कार्रवाई का दावा किया है, जिससे सीमा क्षेत्र में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। इसी बीच एक और रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान ईरानी सैन्य विमानों को अपने एयरबेस पर अस्थायी रूप से जगह दी थी, ताकि उन्हें संभावित हमलों से बचाया जा सके। हालांकि पाकिस्तान ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा है कि नूर खान एयरबेस पर बड़े पैमाने पर विमानों को छिपाना संभव नहीं है। कुल मिलाकर ईरान, अमेरिका और मध्य-पूर्व में हालात तेजी से बदल रहे हैं और हर दिन नए तनाव और नए खुलासे सामने आ रहे हैं, जिससे वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजार दोनों पर गहरा असर पड़ रहा है।

अमेरिका-ईरान तनाव के बावजूद सोना-चांदी में गिरावट, बाजार में दबाव कायम..

नई दिल्ली।अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बावजूद घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में गिरावट देखने को मिली है। वैश्विक संकेतों के बीच निवेशकों का रुख सतर्क बना हुआ है, जिसके चलते कीमती धातुओं पर दबाव बना हुआ है। सोने के वायदा बाजार में कारोबार की शुरुआत कमजोरी के साथ हुई और कीमतें पिछली क्लोजिंग से नीचे स्तर पर खुलीं। दिनभर के कारोबार में भी सोने में बहुत ज्यादा मजबूती नहीं देखी गई और यह सीमित दायरे में ही बना रहा। चांदी की कीमतों में भी गिरावट का रुख देखने को मिला। शुरुआती कारोबार में चांदी कमजोर खुली और पूरे सत्र के दौरान दबाव में बनी रही। बाजार में खरीदारी कमजोर रहने के कारण इसमें कोई बड़ी रिकवरी नहीं दिखी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी सोना और चांदी दोनों में नरमी दर्ज की गई है। निवेशक फिलहाल सुरक्षित निवेश से हटकर अन्य विकल्पों की ओर देख रहे हैं, जिससे कीमती धातुओं की मांग पर असर पड़ा है। हालांकि भू-राजनीतिक तनाव अभी भी बना हुआ है, लेकिन बाजार ने इस पर सीमित प्रतिक्रिया दी है। ऊर्जा बाजार और वैश्विक आर्थिक संकेतों के बीच निवेशक फिलहाल इंतजार की स्थिति में हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक वैश्विक स्तर पर कोई स्पष्ट दिशा नहीं मिलती, तब तक सोना और चांदी में बड़े उतार-चढ़ाव की संभावना कम है। फिलहाल बाजार में सतर्कता का माहौल बना हुआ है और निवेशक बड़े फैसलों से बच रहे हैं।

होर्मुज में टकराव चरम पर: ईरानी जहाज छोड़ा, US का रेस्क्यू मिशन शुरू, क्या बढ़ेगा युद्ध का खतरा?

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और चीन से जुड़ी घटनाओं ने वैश्विक राजनीति और समुद्री सुरक्षा को बेहद संवेदनशील मोड़ पर ला खड़ा किया है। हाल ही में अमेरिका ने जब्त किए गए ईरानी जहाज ‘टूस्का’ को पाकिस्तान के हवाले कर दिया है, जिससे इस पूरे विवाद में नया मोड़ आ गया है। अब इस जहाज को उसके क्रू मेंबर्स के साथ ईरान भेजा जाएगा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के मुताबिक, यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब होर्मुज स्ट्रेट में हालात लगातार बिगड़ रहे हैं। दरअसल, अमेरिका ने 21 अप्रैल को इस जहाज को उस वक्त कब्जे में लिया था, जब यह चीन से लौट रहा था। अमेरिकी अधिकारियों का दावा था कि जहाज पर हथियार बनाने से जुड़ा सामान मौजूद था, जिसे ईरान ने सिरे से खारिज करते हुए इस कार्रवाई को ‘समुद्री डकैती’ करार दिया था। अब जहाज की रिहाई को कई जानकार कूटनीतिक संकेत के तौर पर भी देख रहे हैं। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत होर्मुज स्ट्रेट में फंसे जहाजों को सुरक्षित बाहर निकालने का बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि कई देशों ने मदद मांगी है और अमेरिका इन जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने के लिए सोमवार से ऑपरेशन शुरू करेगा। ट्रम्प ने यह भी साफ कर दिया कि अगर इस मिशन में ईरान ने कोई रुकावट डाली, तो उसे कड़ा जवाब दिया जाएगा। हालांकि, ईरान ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरानी सैन्य नेतृत्व ने चेतावनी दी है कि अगर अमेरिकी नेवी ने होर्मुज में प्रवेश करने की कोशिश की, तो उस पर हमला किया जाएगा। IRGC के पूर्व कमांडर मोहसिन रजाई ने तो यहां तक कह दिया कि यह क्षेत्र अमेरिकी सेना की “कब्रगाह” बन सकता है। तनाव की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि Strait of Hormuz में इस समय करीब 2,000 जहाज फंसे हुए हैं। इंटरनेशनल मैरिटाइम ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, इन जहाजों पर करीब 20,000 नाविक मौजूद हैं, जो लगातार बिगड़ती स्थिति के बीच फंसे हुए हैं। खाने-पीने का सामान, ईंधन और जरूरी संसाधनों की कमी तेजी से बढ़ रही है। स्थिति को और जटिल बनाते हुए, हाल के दिनों में इस क्षेत्र में जहाजों पर हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं। छोटे नावों के जरिए कार्गो शिप पर हमला किया गया, जबकि अब तक कम से कम 49 जहाज अपने रास्ते बदल चुके हैं। इससे वैश्विक सप्लाई चेन और तेल बाजार पर भी असर पड़ा है। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़कर 4.45 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई हैं। इस पूरे संकट के बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी सेना ने एक ईरानी कंटेनर जहाज से 22 क्रू मेंबर्स को पाकिस्तान के हवाले किया है, जिन्हें बाद में ईरान भेजा जाएगा। इसे मानवीय पहल के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन इससे तनाव पूरी तरह कम होता नजर नहीं आ रहा। उधर, वैश्विक कूटनीति भी तेजी से सक्रिय हो गई है। Xi Jinping और Donald Trump के बीच 14-15 मई को संभावित मुलाकात पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। यह बैठक पहले अप्रैल में होनी थी, लेकिन युद्ध जैसे हालात के कारण टाल दी गई थी। चीन इस बैठक को बेहद अहम मान रहा है, क्योंकि इससे दोनों महाशक्तियों के बीच लंबे समय के लिए स्थिर संबंध बन सकते हैं। हालांकि, चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता भी होर्मुज ही है, जहां से वह अपनी करीब एक-तिहाई तेल और गैस की जरूरत पूरी करता है। अगर यह समुद्री रास्ता लंबे समय तक बाधित रहता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। कुल मिलाकर, होर्मुज स्ट्रेट इस वक्त दुनिया का सबसे संवेदनशील फ्लैशपॉइंट बन चुका है, जहां एक छोटी सी चूक भी बड़े युद्ध का कारण बन सकती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद अहम होगा कि कूटनीति हालात संभालती है या यह संकट और गहराता है।

सोने की कीमतों में स्थिरता, US-Iran तनाव और ऊर्जा संकट से बाजार सतर्क..

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय सोने की कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर राजनीतिक तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बावजूद सोने में किसी तरह की बड़ी तेजी या गिरावट देखने को नहीं मिली है, जिससे यह साफ संकेत मिलता है कि निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। सोने का कारोबार एक सीमित दायरे में घूम रहा है, जहां न तो मजबूत खरीदारी का दबाव दिख रहा है और न ही भारी बिकवाली का। बाजार में हलचल जरूर है, लेकिन घबराहट वाली स्थिति नहीं बनी है। निवेशक फिलहाल किसी बड़े फैसले से पहले वैश्विक घटनाक्रमों के स्पष्ट होने का इंतजार कर रहे हैं। सबसे ज्यादा ध्यान इस समय होर्मुज स्ट्रेट से जुड़ी स्थिति पर है, जिसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का बेहद अहम रास्ता माना जाता है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की अस्थिरता का सीधा असर तेल की कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है, इसलिए बाजार इसे गंभीरता से देख रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में हल्की बढ़ोतरी ने महंगाई को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसी वजह से केंद्रीय बैंकों की ब्याज दर नीतियों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। आम तौर पर जब ब्याज दरें ऊंची रहती हैं या कटौती की संभावना कम होती है, तो सोने पर दबाव देखा जाता है, क्योंकि यह कोई रिटर्न देने वाला निवेश नहीं होता। इसके बावजूद लंबी अवधि के निवेशकों का भरोसा सोने पर कायम है। वैश्विक स्तर पर कई केंद्रीय बैंक लगातार सोने की खरीद कर रहे हैं, जिससे बाजार को सपोर्ट मिल रहा है। वहीं निजी निवेशक भी धीरे-धीरे सोने को सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में देख रहे हैं। चांदी और अन्य कीमती धातुओं में हल्की तेजी देखने को मिल रही है, जबकि डॉलर इंडेक्स में मामूली कमजोरी दर्ज की गई है। आने वाले दिनों में बाजार की दिशा अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों, फेडरल रिजर्व की नीति और वैश्विक राजनीतिक हालात पर निर्भर करेगी। मौजूदा समय में सोना स्थिर स्थिति में बना हुआ है और बाजार में कोई बड़ा ट्रेंड फिलहाल देखने को नहीं मिल रहा है। निवेशक अभी भी वैश्विक तनाव और ऊर्जा बाजार की दिशा साफ होने का इंतजार कर रहे हैं।

मिडिल ईस्ट में जंग की आहट तेज: अमेरिका ने 82 हजार करोड़ के हथियार उतारे, ईरान पर बड़ा घेराव तैयार

नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच हालात एक बार फिर बड़े टकराव की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को अरबों डॉलर के हथियार देकर साफ संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं। ईरान के साथ टकराव के बीच यह सैन्य तैयारी सिर्फ रक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि संभावित बड़े संघर्ष की आहट भी मानी जा रही है। अमेरिका ने इजरायल, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों को करीब 8.6 अरब डॉलर (करीब 82 हजार करोड़ रुपये) के हथियार और सैन्य सिस्टम देने की मंजूरी दी है। इस फैसले को अमेरिकी विदेश विभाग ने ‘आपात राष्ट्रीय सुरक्षा’ का मामला बताते हुए तेजी से आगे बढ़ाया। इसमें एडवांस्ड प्रिसिजन किल वेपन सिस्टम (APKWS), पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम और बैटल कमांड सिस्टम जैसे आधुनिक हथियार शामिल हैं, जो मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोकने में बेहद अहम माने जाते हैं। दरअसल, हाल के महीनों में ईरान की ओर से इजरायल और खाड़ी देशों पर किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों के बाद इन देशों के डिफेंस सिस्टम पर भारी दबाव पड़ा है। ऐसे में अमेरिका अपने सहयोगियों के हथियारों के स्टॉक को फिर से मजबूत कर रहा है, ताकि किसी बड़े हमले की स्थिति में वे तैयार रहें। इस बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन का रुख भी सख्त बना हुआ है। अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमता को खत्म करने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने के मूड में नहीं है और वह अपने प्रॉक्सी समूहों तथा मिसाइल कार्यक्रम के जरिए जवाबी रणनीति मजबूत कर रहा है। स्थिति को और संवेदनशील बनाता है हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां अमेरिका की नौसेना की मौजूदगी और नाकेबंदी के चलते वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर पड़ रहा है। यह इलाका दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है और यहां किसी भी सैन्य टकराव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। अभी भले ही सीजफायर लागू है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों पक्ष लगातार अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहे हैं। इजरायल हाई अलर्ट पर है, अमेरिका लगातार हथियारों की सप्लाई बढ़ा रहा है और ईरान भी अपने नेटवर्क के जरिए दबाव बनाए हुए है। कुल मिलाकर, शांति की कोशिशों के बीच हथियारों का यह बड़ा खेल साफ संकेत दे रहा है कि मिडिल ईस्ट में हालात बेहद नाजुक हैं। अगर बातचीत में प्रगति नहीं हुई, तो यह टकराव किसी भी वक्त बड़े युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया को झटका दे सकता है।