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Donald Trump vs Iran: बढ़ता टकराव, ‘महायुद्ध’ की धमकी से वैश्विक तनाव चरम पर

नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच एक बार फिर टकराव तेज हो गया है, जहां हालात खुली जंग की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के ताजा बयानों ने तनाव को और भड़का दिया है, जबकि ईरान ने पलटवार करते हुए ‘महायुद्ध’ की चेतावनी दे दी है। दोनों देशों के बीच यह बयानबाजी ऐसे समय में हो रही है जब क्षेत्र पहले से ही अस्थिर है और वैश्विक समुदाय की नजरें इस टकराव पर टिकी हैं। ईरानी सेना ने साफ संकेत दिया है कि अमेरिका और इजरायल किसी भी समय दोबारा हमला शुरू कर सकते हैं। ईरान के सैन्य मुख्यालय के उप-प्रमुख मोहम्मद जाफर असादी ने कहा कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता और उसकी नीतियां अस्थिरता पैदा कर रही हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका कोई “नई हिमाकत” करता है, तो ईरान पूरी ताकत से जवाब देगा। दूसरी ओर, Donald Trump ने भी सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि ईरान के साथ बातचीत अभी अनिश्चित है और अगर जरूरत पड़ी तो सैन्य कार्रवाई से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा समझौते के प्रस्ताव उन्हें स्वीकार नहीं हैं और आगे क्या होगा, यह हालात तय करेंगे। ट्रंप ने ईरान के नेतृत्व को “बिखरा हुआ” बताते हुए दावा किया कि वहां अंदरूनी मतभेद गहरे हैं, जिससे बातचीत मुश्किल हो रही है। तनाव के बीच एक और बड़ी खबर सामने आई है, जिसमें Islamic Revolutionary Guard Corps के 14 जवानों की मौत हो गई। यह हादसा तेहरान के पास जंजन इलाके में हुआ, जहां युद्ध के दौरान बचे विस्फोटक सामग्री में धमाका हो गया। युद्धविराम के बाद यह सबसे बड़ा नुकसान माना जा रहा है, जिसने हालात की गंभीरता को और बढ़ा दिया है। इधर, होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। अमेरिका लगातार ईरान पर इसे खोलने का दबाव बना रहा है, जबकि ईरान अपने रुख पर कायम है। यह जलमार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है, ऐसे में यहां किसी भी टकराव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा हालात में दोनों देशों के बीच कूटनीतिक रास्ते बेहद सीमित होते जा रहे हैं। एक तरफ जहां बातचीत की कोशिशें जारी हैं, वहीं दूसरी तरफ सैन्य विकल्प भी खुले हैं, जो किसी बड़े संघर्ष का संकेत दे रहे हैं। अगर तनाव इसी तरह बढ़ता रहा, तो यह टकराव क्षेत्रीय नहीं बल्कि वैश्विक संकट में बदल सकता है।

flight cancellations : केंद्र ने बताया, सुरक्षा कारणों से West Asia जाने वाली फ्लाइट्स पर लगाया ब्रेक!

  flight cancellations : नई दिल्ली: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से पश्चिम एशिया के लिए भारतीय उड़ानों में भारी रद्दीकरण हुआ है। नागर विमानन मंत्रालय के संयुक्त सचिव असंगबा चुबा आओ ने बताया कि युद्ध से पहले भारतीय एयरलाइंस प्रतिदिन 300-350 उड़ानें संचालित करती थीं, जो अब घटकर सिर्फ 80-90 रह गई हैं। fishery statistics India : भारत का मछली उत्पादन रिकॉर्ड तोड़कर 106% बढ़ा, FY 2025 में 197.75 लाख टन! अधिकारियों के अनुसार, ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी के हमलों के बाद पूरे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ गया। इसके बावजूद, भारतीय एयरलाइंस लगातार काम कर रही हैं और कार्गो सेवा भी जारी है। डीजीसीए ने पायलटों के लिए छूट दी मध्य पूर्व के एयरस्पेस बंद होने के कारण लंबी दूरी की उड़ानों में पायलटों को ड्यूटी टाइम लिमिट का पालन करना मुश्किल हो रहा था। इसलिए नागर विमानन महानिदेशालय (DGCA) ने अस्थायी रूप से पायलटों के फ्लाइट ड्यूटी समय (FDTL) बढ़ाने की अनुमति दी। Scindia viral video : ग्वालियर की एलिवेटेड रोड पर ‘दौड़ते’ दिखे सिंधिया, निरीक्षण बना चर्चा का विषय नए नियमों के अनुसार, पायलटों को 48 घंटे का लगातार आराम मिलना अनिवार्य है, जो पहले 36 घंटे था। यह छूट लंबी उड़ानों में थकान कम करने और उड़ान सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दी गई है।

इटली ने US फाइटर जेट को नहीं दी लैंडिंग परमिशन, ट्रंप हुए नाराज

नई दिल्ली! ईरान जंग के बीच इटली ने अमेरिका को बड़ा झटका दिया है. मध्य पूर्व की ओर जा रहे एक विमान को इटली की सरकार ने सिसली में उतरने नहीं दिया है. यह खबर स्थानीय अखबार कोरिएरे डेला सेरा ने दी है. रिपोर्ट के मुताबिक इटली की सरकार ने ईरान जंग से खुद को दूर रखने के लिए यह कदम उठाया है. यह पहली बार है, जब जॉर्जिया मेलोनी की सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के खिलाफ कोई फैसला लिया है. रिपोर्ट के मुताबिक सिसली में अमेरिकी विमानों को लैंडिंग की अनुमति न मिलने से इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अभियानों पर असर पड़ सकता है, क्योंकि सिसिली मध्य पूर्व में मिशनों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण स्थान रखता है. स्पेन के बाद इटली का एक्शन एक दिन पहले स्पेन ने अमेरिकी विमानों के लिए अपने एयर स्पेस को बंद कर दिया था. अब इटली ने लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है. हालांकि, इटली का मामला इसलिए भी अहम है, क्योंकि इटली नाटो मेंबर है. यूरोप में इटली की अहम दखलअंदाजी है. साथ ही वहां की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का काफी करीबी माना जाता है. मेलोनी एकमात्र यूरोप की प्रमुख नेत्री थीं, जिन्हें ट्रंप ने अपने शपथ ग्रहण के दौरान व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया था. कई मौकों पर मेलोनी ने ट्रंप के लिए कवच का काम किया है. ऐसे में अब ईरान जंग के दौरान इटली के इस रूख से अमेरिका को बड़ा झटका लगा है. इटली ने यह फैसला क्यों लिया है? आधिकारिक तौर पर इटली ने इस पर कोई भी बयान नहीं दिया है, लेकिन इस फैसले को हाल ही में इटली में कराए गए जनमत संग्रह से जोड़ा जा रहा है. इटली में जनमत संग्रह में मेलोनी की पार्टी को जबरदस्त हार मिली थी. इस हार की एक वजह ईरान जंग को भी बताया गया. जनमत संग्रह को लेकर कराए गए कई सर्वे में यह खुलासा हुआ कि ट्रंप से मेलोनी की दोस्ती की वजह से अधिकांश इटली के लोग नाराज हैं. उन्हें ईरान जंग से आर्थिक परेशानियों का डर सता रहा है. इटली में अगले साल आम चुनाव प्रस्तावित है, जिसमें मेलोनी दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के लिए मैदान में उतरेंगी.

US Iran War : कितना पावरफुल है अमेरिका का USS अब्राहम लिंकन जंगी जहाज,

अमेरिका और इजरायल से चल रही जंग के बीज ईरान ने एक बड़ा दावा किया है. ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड ने दावा किया है कि उसने अमेरिका के फाइटर जेट ले जाने में सक्षम जंगी जहाज USS अब्राहम लिंकन (CVN-72) पर चार बैलिस्टिक मिसाइलों से हमला किया है. अमेरिका ने इसे झूठ बताया है और कहा है कि यह विमानवाहक जहाज पूरी तरह से काम कर रहा है. इस बयानबाजी ने दुनिया का ध्यान उस पावरफुट जंगी जहाज की ओर खींच लिया है, जो तीन दशकों से भी अधिक समय से अमेरिकी सैन्य ताकत दिखाने के केंद्र में रहा है. क्यों इतना पावरफुल है USS अब्राहम लिंकन? USS अब्राहम लिंकन का हुल नंबर CVN-72 है. हुल नंबर (Hull Number) एक विशिष्ट पहचान कोड होता है, जो जहाज के प्रकार और विशिष्ट पहचान को दर्शाता है. USS अब्राहम लिंकन ने अमेरिकी नौसेना में अपना करियर नवंबर 1989 में शुरू किया था. यह परमाणु ऊर्जा से चलने वाले विमानवाहक जहाज़ों की श्रृंखला का पांचवां जहाज है. यह निमित्ज श्रेणी (Nimitz-class) का विमानवाहक जहाज है.

अमेरिका-ईरान युद्ध का भारत पर पड़ सकता है असर, जानिए क्‍या-क्‍या होंगे प्रभावित?

नई दिल्ली। अमेरिका और Iran के बीच बढ़ते सैन्य टकराव का असर सिर्फ इन देशों या Israel तक सीमित नहीं है। मध्य पूर्व के अन्य देशों जैसे सऊदी अरब, यूएई, कतर और बहरीन पर भी इसके प्रभाव दिख रहे हैं। युद्ध के विस्तार की स्थिति में भारत पर इसका व्यापक आर्थिक असर पड़ सकता है। आइए जानते हैं कि किस तरह सोना-चांदी, शेयर बाजार और बासमती चावल प्रभावित हो सकते हैं। क्रूड ऑयल की कीमतों में उछालपूरा मध्य पूर्व क्षेत्र तेल का प्रमुख उत्पादक है और भारत कच्चे तेल के आयात पर पूरी तरह निर्भर है। हाल के महीनों में रूस की जगह सऊदी अरब से तेल खरीद बढ़ी थी, लेकिन युद्ध के कारण सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर युद्ध लंबा खिंचता है तो क्रूड ऑयल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। शेयर बाजार पर दबावअमेरिका-ईरान युद्ध की अनिश्चितता का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ रहा है। शुक्रवार को बाजार में गिरावट देखी गई, और विशेषज्ञों का अनुमान है कि सोमवार को यह गिरावट जारी रह सकती है। वैश्विक तनाव हमेशा शेयर बाजार में भारी दबाव डालता है, और निवेशक सतर्क हो जाते हैं। सोने और चांदी की कीमतों में तेजीशेयर बाजार में गिरावट के बीच निवेशक सुरक्षित विकल्प की ओर रुख करते हैं। इससे सोने और चांदी की कीमतों में इजाफा होने की संभावना है। विशेषज्ञों के अनुसार सोने का भाव 1,70,000 रुपये प्रति 10 ग्राम और चांदी 30 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच सकता है। बासमती चावल के निर्यात पर असरभारत मध्य पूर्व के कई देशों को बासमती चावल निर्यात करता है, जिसमें ईरान भी शामिल है। युद्ध के कारण इस निर्यात पर असर पड़ सकता है, जिससे किसानों और निर्यातकों की आमदनी प्रभावित हो सकती है। डॉलर मजबूत, रुपये कमजोरतेल की बढ़ती कीमतों का असर डॉलर और रुपये पर भी पड़ेगा। डॉलर की मांग युद्ध के कारण बढ़ेगी, जिससे अमेरिकी मुद्रा और मजबूत होगी। वहीं, रुपये में गिरावट देखने को मिल सकती है। महंगाई पर दबावक्रूड ऑयल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे देश में महंगाई को बढ़ा सकती है। ईंधन और परिवहन लागत बढ़ने से अन्य वस्तुओं की कीमतों में भी इजाफा होगा, जिससे आम नागरिक पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा। अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर मध्य पूर्व में संघर्ष जारी रहा, तो भारत की आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ताओं की जेब पर इसका असर लंबी अवधि तक महसूस होगा।