Chambalkichugli.com

यूपी मंत्रिमंडल विस्तार के बाद विभाग बंटवारे में देरी, अंदरखाने चल रहा बड़ा राजनीतिक मंथन..

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों मंत्रिमंडल विस्तार के बाद एक नया सस्पेंस बना हुआ है। राज्य सरकार के हालिया कैबिनेट विस्तार को कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन नए मंत्रियों को अब तक उनके विभागों की जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। इस देरी ने राजनीतिक हलकों में चर्चाओं को तेज कर दिया है और इसे सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बड़े रणनीतिक फेरबदल के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। 10 मई 2026 को हुए मंत्रिमंडल विस्तार में कुल आठ नेताओं को नई जिम्मेदारी दी गई थी। इनमें छह नए चेहरे शामिल हैं, जबकि दो मौजूदा राज्य मंत्रियों को प्रमोशन देकर स्वतंत्र प्रभार दिया गया है। इसके साथ ही राज्य मंत्रिपरिषद अब अपनी अधिकतम संवैधानिक सीमा के करीब पहुंच गई है। लेकिन इसके बावजूद विभागों का अंतिम बंटवारा अब तक नहीं हो पाया है, जिससे राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर इंतजार की स्थिति बनी हुई है। सूत्रों के अनुसार, विभागों के बंटवारे में सबसे बड़ी चुनौती उन अहम मंत्रालयों को लेकर है जिनका राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव काफी अधिक है। विशेष रूप से लोक निर्माण विभाग जैसे बड़े और प्रभावशाली मंत्रालय को लेकर अंदरखाने गहन चर्चा चल रही है। यह माना जा रहा है कि इन महत्वपूर्ण विभागों को नए शामिल किए गए मजबूत नेताओं को सौंपने पर विचार किया जा रहा है, ताकि संगठनात्मक संतुलन और प्रशासनिक दक्षता दोनों को साधा जा सके। इसके साथ ही पुराने मंत्रियों के विभागों में भी संभावित बदलाव की संभावना जताई जा रही है। नए चेहरों को जगह देने के लिए कुछ पुराने विभागों का पुनर्वितरण भी किया जा सकता है। इसी कारण पूरे कैबिनेट स्तर पर संतुलन साधने की कोशिश चल रही है, जिससे किसी भी स्तर पर असंतोष या राजनीतिक असंतुलन न पैदा हो। बताया जा रहा है कि इस पूरे मामले में निर्णय प्रक्रिया केवल राज्य स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि शीर्ष नेतृत्व की मंजूरी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। मुख्यमंत्री की हालिया दिल्ली यात्रा को इसी प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है, जहां उन्होंने वरिष्ठ नेताओं के साथ विभागों के बंटवारे और अंतिम सूची पर विस्तार से चर्चा की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह देरी केवल प्रशासनिक कारणों से नहीं, बल्कि आगामी चुनावी रणनीति से भी जुड़ी हो सकती है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए सरकार हर क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहती है। पूर्वांचल, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ओबीसी, दलित और अन्य सामाजिक समूहों के प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की कोशिश इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बताई जा रही है। इसी रणनीति के तहत यह भी देखा जा रहा है कि किस मंत्री को कौन सा विभाग दिया जाए, जिससे क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बना रहे और राजनीतिक संदेश भी सही तरीके से जाए। बड़े और प्रभावशाली मंत्रालयों का आवंटन इस बार बेहद सोच-समझकर किया जा रहा है, ताकि भविष्य में किसी भी प्रकार का राजनीतिक विवाद न उत्पन्न हो। वर्तमान स्थिति यह है कि उच्च स्तर पर लगभग सहमति बन चुकी है और अंतिम सूची को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही विभागों का औपचारिक ऐलान कर दिया जाएगा, जिससे मंत्रियों को उनकी जिम्मेदारियां सौंप दी जाएंगी और सरकार का प्रशासनिक ढांचा पूरी तरह सक्रिय हो सकेगा।

योगी कैबिनेट विस्तार के बाद BJP के भीतर उठे असंतोष के स्वर, आशा मौर्य और बृजभूषण ने जताई नाराजगी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले योगी सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार ने सियासी हलचल तेज कर दी है। रविवार को हुए कैबिनेट विस्तार में 2 कैबिनेट मंत्री और 4 नए राज्य मंत्रियों को शामिल किया गया, जबकि दो राज्य मंत्रियों को प्रमोट कर स्वतंत्र प्रभार दिया गया। हालांकि विस्तार के तुरंत बाद भाजपा के भीतर नाराजगी के स्वर भी खुलकर सामने आने लगे हैं। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने राजभवन की बजाय जन भवन में आयोजित समारोह में सभी नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। पश्चिमी यूपी और ब्राह्मण समीकरण पर फोकसपूर्व प्रदेश अध्यक्ष और जाट नेता भूपेंद्र चौधरी को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है। वहीं रायबरेली की ऊंचाहार सीट से विधायक और समाजवादी पार्टी से भाजपा में आए मनोज पांडे को भी कैबिनेट में जगह मिली है। ब्राह्मण चेहरे के तौर पर उनकी एंट्री को अहम माना जा रहा है। मनोज पांडे पहले अखिलेश यादव सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। इन मंत्रियों को मिला प्रमोशनराज्य मंत्री अजीत पाल सिंह और सोमेंद्र तोमर को बेहतर प्रदर्शन के आधार पर स्वतंत्र प्रभार देकर पदोन्नत किया गया है। चार नए चेहरों को मौकायोगी सरकार में चार नए राज्य मंत्रियों को शामिल किया गया है। कृष्णा पासवान, जो फतेहपुर की खागा सीट से चार बार विधायक रह चुकी हैं, दलित-पासी समाज का प्रतिनिधित्व करती हैं। अलीगढ़ के खैर से विधायक सुरेंद्र दिलेर को भी मंत्री बनाया गया है। वे वाल्मीकि समाज से आते हैं और राजनीतिक परिवार से जुड़े हैं। वाराणसी में लंबे समय तक भाजपा संगठन में सक्रिय रहे हंसराज विश्वकर्मा को OBC चेहरे के रूप में शामिल किया गया। कन्नौज की तिरवा सीट से विधायक कैलाश राजपूत को भी मंत्रिमंडल में जगह मिली है। BJP के भीतर असंतोष के स्वरमंत्रिमंडल विस्तार के बाद पार्टी के भीतर नाराजगी भी सामने आई है। सीतापुर के महमूदाबाद से विधायक आशा मौर्य का नाम मंत्री पद के लिए चर्चा में था, लेकिन अंतिम सूची में जगह नहीं मिलने पर उन्होंने सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने लिखा कि ऐसा लग रहा है जैसे पार्टी को अब मौर्य समाज की जरूरत नहीं रह गई और दलबदल कर आने वालों को प्राथमिकता दी जा रही है। बृजभूषण शरण सिंह का तंजपूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने भी सोशल मीडिया पर शायराना अंदाज में अपनी नाराजगी जाहिर की। माना जा रहा है कि वे अपने बेटे प्रतीक भूषण के लिए मंत्री पद की उम्मीद कर रहे थे। किसी ठाकुर चेहरे को जगह न मिलने पर उन्होंने लिखा –“शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है,जिस शाख पर बैठे हो वह टूट भी सकती है।” अब सभी 60 मंत्री पद भर गए91वें संविधान संशोधन के तहत उत्तर प्रदेश में अधिकतम 60 मंत्री बनाए जा सकते हैं। इस विस्तार के बाद योगी सरकार में मंत्रियों की कुल संख्या 60 हो गई है। इनमें 23 कैबिनेट मंत्री, 16 स्वतंत्र प्रभार राज्य मंत्री और 21 राज्य मंत्री शामिल हैं। जातीय और राजनीतिक समीकरणवर्तमान मंत्रिमंडल में अब 22 सवर्ण, 25 OBC, 11 दलित, 1 मुस्लिम और 1 सिख मंत्री शामिल हैं। विधानसभा में भाजपा के 257 विधायक हैं, जबकि समाजवादी पार्टी के पास 102 विधायक हैं। इसके अलावा सहयोगी दलों और अन्य पार्टियों के भी सदस्य सदन में मौजूद हैं।

नई दिल्ली में महिला आरक्षण को लेकर बड़ा राजनीतिक प्रदर्शन, सीएम योगी ने विपक्ष पर साधा निशाना

नई दिल्ली। दिल्ली से जुड़े व्यापक राजनीतिक माहौल के बीच लखनऊ में महिला आरक्षण विधेयक को लेकर एक विशाल जन आक्रोश महिला पदयात्रा आयोजित की गई। इस कार्यक्रम ने राजनीतिक स्तर पर बड़ा शक्ति प्रदर्शन प्रस्तुत किया, जिसमें हजारों महिलाओं और कार्यकर्ताओं ने भाग लेकर विधानसभा तक पैदल मार्च किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने मंत्रिमंडल सहयोगियों के साथ इस पदयात्रा में शामिल हुए और पूरे समय जनता के बीच सक्रिय रूप से मौजूद रहे। लगभग एक दशमलव सात पांच किलोमीटर लंबी इस यात्रा ने राजनीतिक वातावरण को और अधिक गरमा दिया। विधानसभा के बाहर आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने विपक्षी दलों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बल्कि देश की आधी आबादी के अधिकारों और सम्मान से जुड़ा विषय है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह अपनी संकीर्ण सोच के कारण इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर रहा है। मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और लगातार इस दिशा में कार्य कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि समाज में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है और उन्हें राजनीति एवं निर्णय प्रक्रिया में अधिक अवसर देने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश के विकास में महिला, युवा, गरीब और किसान चार प्रमुख आधार हैं जिनमें महिलाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी करने वाले राजनीतिक दलों को जनता भविष्य में जवाब देगी। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण लागू होने तक यह संघर्ष जारी रहेगा। वहीं उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने इस प्रदर्शन को महिलाओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता और शक्ति का प्रतीक बताया।

उज्जैन पहुंचे यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य, बाबा महाकाल के दर्शन कर शयन आरती में हुए शामिल

उज्जैन । उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य गुरुवार को मध्य प्रदेश के धार्मिक शहर उज्जैन पहुंचे। उज्जैन पहुंचने के बाद उन्होंने सबसे पहले विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में भगवान महाकाल के दर्शन किए। इस दौरान उनके साथ उनकी पत्नी, बेटा और अन्य सहयोगी भी मौजूद रहे। मंदिर पहुंचने पर महाकालेश्वर मंदिर प्रबंध समिति की ओर से उनका स्वागत और सम्मान किया गया। मंदिर परिसर में पहुंचकर डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने नंदी हॉल में बैठकर कुछ समय ध्यान लगाया और बाबा महाकाल की भक्ति में लीन दिखाई दिए। इस दौरान मंदिर में मौजूद श्रद्धालुओं और पुजारियों ने भी उनका स्वागत किया। भगवान महाकाल के दर्शन के बाद उन्होंने मंदिर में आयोजित शयन आरती में भी भाग लिया और विधि विधान से पूजा अर्चना की। दर्शन के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि बाबा महाकाल के दरबार में आकर उन्हें आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा मिलती है। उन्होंने कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि उन्हें बाबा महाकाल की संध्या और शयन आरती में शामिल होने का अवसर मिला। उन्होंने भगवान महाकाल से प्रार्थना करते हुए कहा कि वे उन्हें और देश के सभी लोगों को सेवा का अवसर देते रहें और इसी तरह अपने दरबार में बुलाते रहें। इस दौरान उन्होंने विकास के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। डिप्टी सीएम ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार मध्य प्रदेश के साथ साथ उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी तेजी से विकास कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं। देशभर के प्रमुख तीर्थ स्थलों का तेजी से विकास किया जा रहा है, जिससे श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें। उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जहां हर दिन हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। खासतौर पर महाकाल की भस्म आरती और शयन आरती में शामिल होना श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का यह दौरा भी धार्मिक आस्था से जुड़ा रहा, जिसमें उन्होंने बाबा महाकाल का आशीर्वाद लेकर प्रदेश और देश की खुशहाली की कामना की।

कांग्रेस छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सपा में एंट्री तय? सियासत में हलचल तेज

नई दिल्ली/लखनऊ। उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। कांग्रेस से हाल ही में इस्तीफा देने वाले वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी अब नई राजनीतिक पारी की तैयारी में बताए जा रहे हैं। चर्चाओं के मुताबिक, वह 15 फरवरी को समाजवादी पार्टी (सपा) की सदस्यता ले सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो यह कांग्रेस के लिए बड़ा झटका और सपा के लिए अहम सियासी संदेश माना जाएगा। अखिलेश यादव करा सकते हैं सदस्यतासूत्रों के अनुसार, सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी की सदस्यता दिला सकते हैं। बताया जा रहा है कि उनके साथ कुछ पूर्व विधायक और क्षेत्रीय नेता भी सपा में शामिल हो सकते हैं। ऐसे में यह केवल एक व्यक्ति का दल बदल नहीं, बल्कि एक छोटे राजनीतिक समूह का पुनर्संयोजन भी हो सकता है। कांग्रेस से अलग होने के बाद सिद्दीकी के अगले कदम को लेकर अटकलें तेज थीं। पार्टी नेतृत्व ने उन्हें मनाने की कोशिश की, लेकिन अब सपा में संभावित एंट्री की खबरों ने यूपी की राजनीतिक फिजा बदल दी है। बसपा से कांग्रेस और अब सपा की ओरनसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। वे कभी बहुजन समाज पार्टी का बड़ा चेहरा रहे और पार्टी प्रमुख मायावती के करीबी सहयोगी माने जाते थे। 2017 में बसपा से निष्कासन के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा था। हालांकि कांग्रेस में उनकी पारी लंबी नहीं चली। 24 जनवरी को उन्होंने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी। उनके इस फैसले ने कांग्रेस संगठन में भी हलचल मचा दी थी। अब सपा में संभावित शामिल होने की चर्चा ने इसे और ज्यादा सियासी रंग दे दिया है। इस्तीफे के पीछे क्या वजह?सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़ते समय संकेत दिए थे कि वह पार्टी की कार्यप्रणाली और अंदरूनी माहौल से संतुष्ट नहीं थे। चर्चा यह भी रही कि उन्हें अपेक्षित सम्मान और भूमिका नहीं मिल पा रही थी। ऐसे में उनका असंतोष धीरे-धीरे सार्वजनिक फैसले में बदल गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम अहम साबित हो सकता है। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोट बैंक और पारंपरिक समीकरणों को लेकर दलों की रणनीति पहले से ही तेज है। ऐसे में सिद्दीकी जैसे अनुभवी नेता का सपा के साथ जाना विपक्षी राजनीति में नए समीकरण बना सकता है। बदलते सियासी समीकरणयूपी की राजनीति में दल-बदल नई बात नहीं है, लेकिन चुनाव से पहले बड़े चेहरों की हलचल हमेशा संकेत देती है कि जमीन पर तैयारी शुरू हो चुकी है। यदि 15 फरवरी को सिद्दीकी की सपा में औपचारिक एंट्री होती है, तो यह आने वाले महीनों में और राजनीतिक पुनर्संयोजन का रास्ता खोल सकती है।

यूपी पंचायत चुनाव टल सकते हैं? पंचायती राज मंत्री ओपी राजभर ने दिया अपडेट, क्या बोले

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर पिछले कुछ दिनों से जारी संशय के बाद अब कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने चुनाव टलने की सभी चर्चाओं को केवल एक भ्रम करार दिया है। राजभर ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा करने के लिए जमीनी स्तर पर काम चल रहा है। चुनावों के लिए सबसे महत्वपूर्ण कड़ी यानी मतपत्रों की छपाई का काम पूरा हो चुका है। यही नहीं, ये मतपत्र अब विभिन्न जिलों में पहुंचाए भी जा रहे हैं। भारत समाचार चैनल से बातचीत में ओपी राजभर ने कहा कि मतदाता सूची का काम अपने अंतिम चरण में है और 28 फरवरी को मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन भी कर दिया जाएगा। निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार दोनों ही चुनाव को समय पर संपन्न कराने के लिए कटिबद्ध हैं। चुनाव टलने जैसी कोई संभावना अभी नहीं दिखती है।भ्रम के पीछे का कारण चुनाव टलने की खबरों पर सफाई देते हुए राजभर ने कहा कि लोग अपनी-अपनी सुविधा के अनुसार राग अलाप रहे हैं। भ्रम का मुख्य कारण यह है कि वर्तमान में कर्मचारी एसआईआर  के काम में व्यस्त हैं। इसके अलावा, आगामी जनगणना और बोर्ड परीक्षाओं को लेकर भी लोग कयास लगा रहे हैं कि चुनाव टल सकते हैं। राजभर ने जोर देकर कहा कि सरकार और निर्वाचन आयोग अपना काम कर रहे हैं।पिछड़ा वर्ग आरक्षण और पिछड़ा आयोग का गठन ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर मंत्री ने जानकारी दी कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में पिछड़ा आयोग के गठन की प्रक्रिया चल रही है। जैसे ही इसका गठन होगा, वह पिछड़ों के आरक्षण को लेकर अपना काम शुरू कर देगा। भाजपा से गठबंधन और पिछड़ों-वंचितों को टिकट पर उन्होंने अपनी चिरपरिचित शैली में कहा, जिसकी जितनी हिस्सेदारी है, उसको उतना हिस्सा दिया जाएगा। कब होगी तारीखों की घोषणा? चुनाव की सटीक तारीख के सवाल पर पंचायती राज मंत्री ने कहा कि यह निर्णय निर्वाचन आयोग और सरकार के बीच संयुक्त बैठक के बाद लिया जाएगा। उन्होंने आश्वस्त किया कि सही समय आने पर तारीखों का ऐलान हो जाएगा। लेकिन फिलहाल सभी का ध्यान तैयारियों को अंतिम रूप देने पर है। मंत्री के इस बयान के बाद उन भावी प्रत्याशियों ने राहत की सांस ली है जो पिछले काफी समय से गांवों में चुनाव प्रचार और जनसंपर्क में जुटे हुए हैं।