कांग्रेस में वंदे मातरम विवाद ने पकड़ा राजनीतिक तूफ़ान, केके मिश्रा ने दी खुली चेतावनी

इंदौर । इंदौर में वंदे मातरम को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कांग्रेस के अंदर ही बड़ा राजनीतिक तूफ़ान बन गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केके मिश्रा ने इस मामले पर अपनी पार्टी के भीतर खुले तौर पर विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने अपने ट्वीट्स में न सिर्फ भाजपा पर हमला बोला बल्कि कांग्रेस की पार्षद रूबीना खान को भी आड़े हाथों लिया। मिश्रा ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि जो लोग राष्ट्रधर्म नहीं निभा सकते और वंदे मातरम नहीं बोल सकते वे भाड़ में जाएं और पाकिस्तान जाकर बसें। उनके इस बयान ने राजनीतिक माहौल को और गर्मा दिया है। रूबीना खान के बयान को मिश्रा ने राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि पूरा मामला भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर खेला गया है। मिश्रा ने यह भी कहा कि रूबीना खान के बयान से उन मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों का अपमान हुआ है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देश के लिए दी। उनके अनुसार यह केवल एक व्यक्तिगत विवाद नहीं बल्कि राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को चुनौती देने वाला मामला है। केके मिश्रा ने भाजपा पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि भाजपा को इस मुद्दे पर राजनीति करने का कोई अधिकार नहीं है क्योंकि उसने अपने ही मंत्री विजय शाह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। मिश्रा ने भाजपा पर राष्ट्रधर्म के मुद्दे पर दोहरा चरित्र अपनाने का आरोप लगाया। उनके अनुसार केवल राजनीतिक लाभ के लिए मुद्दों को उछालना और अपने ही लोगों की अनदेखी करना लोकतंत्र और राष्ट्रीय भावना के लिए खतरनाक है। मिश्रा ने कांग्रेस नेतृत्व को भी खुली चुनौती दी। इंदौर कांग्रेस अध्यक्ष चिंटू चौकसे को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ नोटिस देने से काम नहीं चलेगा। उनके अनुसार रूबीना खान को पार्टी से बर्खास्त किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा जहां जाना चाहती हैं चली जाएं। मिश्रा ने पार्टी को चेतावनी दी कि ऐसे संदिग्ध निष्ठा वाले लोगों को शामिल करने से पहले गंभीरता से विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यह केवल पार्टी का मामला नहीं बल्कि देश के प्रति प्रतिबद्धता का भी सवाल है। इस पूरे विवाद ने कांग्रेस के अंदरूनी मतभेद को खुलकर सामने ला दिया है। एक तरफ भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक लाभ उठाने के लिए भुनाने की कोशिश कर रही है तो वहीं कांग्रेस के भीतर नेताओं के बीच टकराव और तेज होता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इस मामले में कांग्रेस की छवि और संगठनात्मक क्षमता दोनों चुनौतीपूर्ण स्थिति में हैं। इंदौर के यह विवाद केवल स्थानीय स्तर पर सीमित नहीं है बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकता है। केके मिश्रा का यह कड़ा रुख और पार्टी नेतृत्व को खुली चुनौती देना इस बात का संकेत है कि कांग्रेस को अपने भीतर अनुशासन और संगठनात्मक मजबूती बनाए रखने की आवश्यकता है। इस विवाद का राजनीतिक भविष्य और असर आने वाले दिनों में साफ होगा लेकिन फिलहाल यह वंदे मातरम विवाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़े अंदरूनी तूफानों में से एक बन चुका है।
मंत्रालय में गूंजा वंदे मातरम और जन गण मन सामूहिक गायन से देशभक्ति का माहौल

भोपाल । भोपाल स्थित मंत्रालय में अप्रैल माह के प्रथम शासकीय कार्य दिवस की शुरुआत राष्ट्रभक्ति के भाव से ओतप्रोत वातावरण में हुई सरदार वल्लभभाई पटेल पार्क में आयोजित कार्यक्रम में अधिकारियों कर्मचारियों और पुलिस कर्मियों ने एक साथ राष्ट्रगीत वंदे मातरम और राष्ट्रगान जन गण मन का सामूहिक गायन किया इस दौरान पूरे परिसर में देशभक्ति का उल्लासपूर्ण माहौल दिखाई दिया कार्यक्रम में पुलिस बैंड द्वारा प्रस्तुत की गई मधुर धुनों ने वातावरण को और भी भावपूर्ण बना दिया बैंड की स्वर लहरियों के साथ जब उपस्थित सभी लोगों ने एक स्वर में राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान गाया तो पूरा परिसर देशभक्ति की भावना से गूंज उठा इस अवसर पर मुख्य सचिव अनुराग जैन अपर मुख्य सचिव डॉ राजेश राजौरा श्री अशोक बर्णवाल और श्री संजय कुमार शुक्ला सहित मंत्रालय वल्लभ भवन सतपुड़ा और विंध्याचल भवन के अनेक अधिकारी कर्मचारी मौजूद रहे सभी ने पूरे उत्साह और गरिमा के साथ इस आयोजन में भाग लिया हर माह के पहले कार्य दिवस पर आयोजित होने वाला यह सामूहिक गायन कार्यक्रम न केवल देशभक्ति की भावना को सुदृढ़ करता है बल्कि शासकीय कार्यों के प्रति समर्पण और जिम्मेदारी का भी संदेश देता है इस तरह के आयोजन कर्मचारियों में एकता अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैंकार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि राष्ट्र सर्वोपरि है और उसकी सेवा ही प्रत्येक नागरिक का सर्वोच्च कर्तव्य है
ALL INDIA RDIO CHANGES: आकाशवाणी में बड़ा बदलाव अब बजेगा ‘वंदे मातरम’ का पूरा संस्करण All India Radio

ALL INDIA RDIO CHANGES: नई दिल्ली: भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तहत संचालित All India Radio यानी आकाशवाणी ने अपने सुबह के प्रसारण में एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है अब तक जहां सुबह की शुरुआत प्रतिष्ठित धुन और उसके बाद ‘वंदे मातरम’ के दो छंदों वाले संस्करण से होती थी वहीं अब इसकी जगह राष्ट्रीय गीत का पूरा संस्करण प्रसारित किया जाएगा यह बदलाव 26 मार्च 2026 से लागू हो रहा है आजादी के बाद से आकाशवाणी की यह परंपरा रही है कि वह अपने सुबह के कार्यक्रम की शुरुआत एक खास धुन से करता है और उसके बाद ‘वंदे मातरम’ का छोटा संस्करण बजाया जाता था जिसकी अवधि लगभग 65 सेकंड होती थी लेकिन गृह मंत्रालय द्वारा 28 जनवरी 2026 को जारी नए दिशानिर्देशों के बाद अब इस परंपरा में बदलाव किया गया है नए नियम के अनुसार अब राष्ट्रीय गीत के छह छंदों वाला पूर्ण संस्करण हर दिन प्रसारित किया जाएगा इस नए संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड है और इसकी प्रस्तुति प्रसिद्ध हिंदी शास्त्रीय गायक Pandit Chandrashekhar Vaze द्वारा राग देश में की गई है उनकी आवाज में गाया गया यह संस्करण देशभक्ति की भावना और संगीत की गहराई को और अधिक प्रभावी बनाता है अब श्रोता पूरे गीत के माध्यम से ‘वंदे मातरम’ की मूल भावना और उसकी भावनात्मक शक्ति को बेहतर तरीके से अनुभव कर सकेंगे इस पहल का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब देशभर के अलग अलग राज्यों के लिए ‘वंदे मातरम’ के क्षेत्रीय संस्करण भी तैयार किए जाएंगे इन संस्करणों में स्थानीय संगीत वाद्ययंत्रों और शास्त्रीय धुनों का उपयोग किया जाएगा जिससे हर क्षेत्र के लोग अपनी भाषा और संगीत के अंदाज में इस गीत को सुन और महसूस कर सकेंगे यह कदम भारत की सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देने और उसे और अधिक समृद्ध बनाने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है आकाशवाणी का यह नया कदम न केवल राष्ट्रीय गीत को एक नए स्वरूप में प्रस्तुत करेगा बल्कि नई पीढ़ी को भी इसकी पूरी गहराई से परिचित कराएगा इससे श्रोताओं को एक समग्र और समृद्ध देशभक्ति का अनुभव मिलेगा और सुबह की शुरुआत पहले से कहीं अधिक प्रेरणादायक और ऊर्जावान बन जाएगी
वंदे मातरम मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी कोई दंड नहीं केवल सलाह…

नई दिल्ली: देश के सर्वोच्च न्यायालय ने वंदे मातरम के गायन को अनिवार्य किए जाने से जुड़े एक सर्कुलर के खिलाफ दायर याचिका को खारिज करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने साफ किया कि इस मामले में अभी हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं बनता क्योंकि याचिका समय से पहले यानी प्री मेच्योर है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के सर्कुलर में वंदे मातरम के गायन को लेकर केवल एक सुझाव या एडवाइजरी दी गई है न कि कोई बाध्यकारी आदेश या दंड का प्रावधान। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने याचिकाकर्ता से सवाल किया कि क्या 28 जनवरी को जारी सरकारी अधिसूचना में कहीं यह उल्लेख है कि यदि कोई व्यक्ति वंदे मातरम नहीं गाता है तो उसे किसी तरह की सजा दी जाएगी या उसके खिलाफ कोई कार्रवाई होगी। इस पर अदालत ने यह समझने की कोशिश की कि याचिकाकर्ता की आशंका किस आधार पर है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने दलील दी कि भले ही सरकार ने सीधे तौर पर दंड का प्रावधान न किया हो, लेकिन इस तरह की एडवाइजरी के कारण सामाजिक दबाव उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को गाने या सम्मान करने के लिए मजबूर किया जाना उसके अधिकारों के खिलाफ हो सकता है और इस तरह की स्थिति में अप्रत्यक्ष रूप से दबाव बन सकता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाते हुए कहा कि क्या राष्ट्रगीत के सम्मान के लिए किसी एडवाइजरी की आवश्यकता होती है। वहीं अदालत ने इस मामले में स्पष्ट किया कि सर्कुलर में “may” यानी “सकते हैं” जैसे शब्द का उपयोग किया गया है, जो किसी भी प्रकार के अनिवार्य आदेश या दंड को इंगित नहीं करता। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी में यह भी सामने आया कि इस सर्कुलर में न तो किसी प्रकार की सजा का प्रावधान है और न ही किसी व्यक्ति को इसे गाने के लिए मजबूर किया जा रहा है। अदालत ने कहा कि अगर भविष्य में इस एडवाइजरी के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव किया जाता है या उसके खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई होती है, तो उस स्थिति में वह व्यक्ति न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह भी सलाह दी कि अभी उनके द्वारा उठाई गई आशंकाएं अस्पष्ट हैं और किसी ठोस आधार पर नहीं हैं। अदालत ने कहा कि यदि वास्तव में किसी के साथ अन्याय या भेदभाव होता है तभी वह कोर्ट में आए। यह कोई धमकी नहीं बल्कि एक स्पष्ट सलाह है। इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फिलहाल हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि वंदे मातरम को लेकर जारी सर्कुलर में किसी प्रकार का दंडात्मक प्रावधान नहीं है और यह केवल एक सलाह के रूप में देखा जाना चाहिए।
मंत्रालय में मार्च माह के प्रथम कार्य दिवस पर हुआ सामूहिक राष्ट्र-गीत एवं राष्ट्र-गान गायन

भोपाल। मार्च माह के प्रथम शासकीय कार्य दिवस पर मंत्रालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें अधिकारियों और कर्मचारियों ने राष्ट्र गीत वंदे मातरम और राष्ट्र गान जन गण मन का सामूहिक गायन किया। यह कार्यक्रम मंत्रालय के सरदार वल्लभ भाई पटेल पार्क में आयोजित किया गया। सामूहिक गान के दौरान पुलिस बैंड ने मधुर धुनों के माध्यम से कार्यक्रम को और आकर्षक बनाया। इस अवसर पर अपर मुख्य सचिव मनु श्रीवास्तव सचिव एम. रघुराज मंत्रालय वल्लभ भवन सतपुड़ा विंध्याचल भवन के अधिकारी कर्मचारी और पुलिस अधिकारी उपस्थित थे। इस आयोजन का उद्देश्य कर्मचारियों में राष्ट्रीय भावना को जागृत करना और शासकीय कार्यों के प्रति प्रतिबद्धता को बढ़ावा देना बताया गया। अधिकारियों ने सामूहिक रूप से राष्ट्र गीत और राष्ट्र गान गाकर देशभक्ति की अनुभूति साझा की।
वंदे मातरम् के स्वर से गूंजा सदन, MP विधानसभा बजट सत्र 2026 की औपचारिक शुरुआत

भोपाल । राजधानी भोपाल में सोमवार 16 फरवरी 2026 से मध्य प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र औपचारिक रूप से शुरू हो गया। सत्र की शुरुआत राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के सामूहिक गायन से हुई, जिससे सदन में देशभक्ति और गरिमा का वातावरण बना। यह बजट सत्र 6 मार्च 2026 तक चलेगा और इस दौरान कुल 12 बैठकें प्रस्तावित हैं। सत्र के पहले दिन मंगू भाई पटेल ने सदन को संबोधित किया। अपने अभिभाषण में उन्होंने मोहन यादव सरकार की उपलब्धियों, विकास योजनाओं और राज्य की प्रगति का विस्तृत उल्लेख किया। राज्यपाल ने कहा कि प्रदेश निरंतर विकास की दिशा में अग्रसर है और विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से समाज के हर वर्ग तक लाभ पहुंचाया जा रहा है। अभिभाषण के बाद कृतज्ञता प्रस्ताव पेश किया गया, जिस पर आगामी दिनों में चर्चा होगी। इस बजट सत्र को कई मायनों में अहम माना जा रहा है। विधानसभा सचिवालय के अनुसार, विधायकों की ओर से कुल 3478 प्रश्न प्राप्त हुए हैं। इसके अलावा 236 ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, 10 स्थगन प्रस्ताव और 41 अशासकीय संकल्प सदन में प्रस्तुत किए जाने की संभावना है। इन आंकड़ों से साफ है कि सत्र के दौरान सरकार को विभिन्न मुद्दों पर विस्तार से जवाब देना होगा। सत्र का सबसे महत्वपूर्ण दिन 18 फरवरी होगा, जब उप मुख्यमंत्री एवं वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा वर्ष 2026-27 का बजट पेश करेंगे। अनुमान है कि इस बार का बजट 4.63 से 4.70 लाख करोड़ रुपये के बीच हो सकता है। खास बात यह है कि बजट पूरी तरह पेपरलेस डिजिटल प्रारूप में प्रस्तुत किया जाएगा, जो पारदर्शिता और तकनीकी दक्षता की दिशा में एक और कदम माना जा रहा है। राजनीतिक दृष्टि से भी यह सत्र काफी महत्वपूर्ण रहने वाला है। विपक्ष, विशेष रूप से कांग्रेस, बेरोजगारी, महंगाई, अवैध खनन, बढ़ते कर्ज और हालिया विवादित मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। वहीं सत्तापक्ष रोजगार सृजन, नारी सशक्तीकरण, किसान कल्याण, बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश आकर्षित करने जैसे मुद्दों को प्रमुखता से रखने की रणनीति पर काम कर रहा है। वंदे मातरम् के साथ कार्यवाही की शुरुआत को राज्य और केंद्र स्तर पर राष्ट्रगीत को बढ़ावा देने की पहल से जोड़कर देखा जा रहा है। इससे सदन में एक ऊर्जावान और सकारात्मक माहौल देखने को मिला। हालांकि राजनीतिक गर्माहट के संकेत भी साफ हैं, जिससे आगामी दिनों में तीखी बहस और हंगामे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। कुल मिलाकर, बजट सत्र 2026 प्रदेश की आर्थिक दिशा, विकास प्राथमिकताओं और राजनीतिक रणनीतियों को तय करने वाला महत्वपूर्ण मंच साबित होगा, जहां सत्ता और विपक्ष के बीच व्यापक चर्चा और टकराव दोनों देखने को मिल सकते हैं।
वन्दे मातरम्: राष्ट्र चेतना का सनातन गीत और आधुनिक भारत का पुनर्जागरण

– कैलाश चंद “वन्दे मातरम्” ये दो शब्द सिर्फ एक नारा नहीं, भारत की आत्मा का गूढ़ और दिव्य उद्गार हैं। यह केवल एक गीत नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्रवाद की आध्यात्मिक जड़ है, जो भूमि, संस्कृति, शक्ति और ज्ञान इन चारों को मातृभाव में एक सूत्र में पिरोता है। जब कोई भारतीय “वन्दे मातरम्” कहता है तो वह केवल मातृभूमि को प्रणाम नहीं करता बल्कि उस चेतना, परंपरा और जीवन दर्शन को नमन करता है जिसने इस देश को हजारों वर्षों से जीवित और गतिशील बनाए रखा है। आज, जब इस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारत सरकार के 2026 के नए दिशा-निर्देश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राष्ट्रीय अपील सामने आई है, तब यह गीत एक बार फिर राष्ट्रीय चेतना के केंद्र में स्थापित होता दिखाई दे रहा है। भारतीय सभ्यता में भूमि को केवल भौगोलिक सीमा या प्राकृतिक संसाधनों का समूह नहीं माना गया है। यहां धरती को “माता” कहा गया है, एक ऐसी माता जो जीवन देती है, पोषण करती है और संस्कार प्रदान करती है। अथर्ववेद का प्रसिद्ध वाक्य “माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः” भारतीय चिंतन की इसी भावना को प्रकट करता है। यह वाक्य बताता है कि मनुष्य और भूमि का संबंध केवल उपयोग का नहीं बल्कि आत्मीयता और मातृत्व का है। यही वैदिक आधार “वन्दे मातरम्” की आत्मा में समाहित है। जब बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने “वन्दे मातरम्” की रचना की, तब उन्होंने केवल एक राजनीतिक नारा नहीं दिया। उन्होंने भारत की प्राचीन आत्मा को आधुनिक युग में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उनके लिए भारत केवल एक देश नहीं था बल्कि एक जीवित मातृशक्ति थी, जो लक्ष्मी के रूप में समृद्धि देती है, सरस्वती के रूप में ज्ञान प्रदान करती है और दुर्गा के रूप में शक्ति का संचार करती है। इसीलिए इस गीत की हर पंक्ति में प्रकृति, शक्ति, ज्ञान और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। सन् 1875 का वह काल भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। ब्रिटिश शासन का दमन, सांस्कृतिक अपमान और आत्मगौरव का संकट समाज में गहराई तक समा चुका था। भारतीयों के भीतर अपनी पहचान और आत्मसम्मान को बचाने की तीव्र आकांक्षा जन्म ले रही थी। इसी समय बंकिमचन्द्र ने “वन्दे मातरम्” की रचना की। यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था बल्कि एक जागरण का मंत्र बनकर उभरा। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में जब रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसे स्वर दिया, तब यह गीत पूरे देश में फैल गया और एक राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे यह गीत स्वतंत्रता आंदोलन का प्राण मंत्र बन गया। साल 1905 के बंग भंग आंदोलन के समय “वन्दे मातरम्” हर गली, हर सभा और हर आंदोलन की धड़कन बन गया। विद्यार्थी जुलूसों में यह गूंजता था, महिलाओं की सभाओं में यह प्रेरणा देता था, क्रांतिकारियों के शपथ पत्रों में यह आत्मबल जगाता था और राष्ट्रीय आंदोलनों में यह एकजुटता का स्वर बन जाता था। यह केवल गीत नहीं रहा, यह आत्मगौरव और स्वतंत्रता की आकांक्षा का घोष बन गया। श्री अरविन्द ने इसे राष्ट्र आत्मा का मंत्र कहा। लाला लाजपत राय, सुब्रमण्य भारती, लाला हरदयाल और भीकाजी कामा जैसे अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने अपनी पत्रिकाओं और पत्रों के शीर्षक में “वन्दे मातरम्” को स्थान दिया। महात्मा गांधी भी अपने कई पत्रों का समापन इसी मंत्र के साथ करते थे। ब्रिटिश सरकार ने इस गीत के प्रभाव को समझा और इसे रोकने के लिए प्रतिबंध लगाए, लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन जितना दमन हुआ, उतनी ही इसकी शक्ति और बढ़ती गई। यह जनता के हृदय में बस चुका था और वहां से इसे कोई नहीं हटा सकता था। समय के साथ यह गीत केवल स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृति बनकर नहीं रह गया बल्कि भारतीय पहचान का स्थायी प्रतीक बन गया। 30 से 31 अक्टूबर तथा 1 नवम्बर 2025 को जबलपुर में आयोजित अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने इसे राष्ट्र चेतना का मूल स्वरबद्ध गीत बताया। उन्होंने कहा कि “वन्दे मातरम् एक दिव्य गीत है, जो राष्ट्र चेतना को जागृत करता है और समाज को जोड़ने वाली अद्भुत डोर है।” उनके अनुसार यह गीत सभी प्रांतों, भाषाओं और समुदायों के बीच समान रूप से स्वीकार्य है और यह सांस्कृतिक पहचान, राष्ट्रीय एकता और आत्मस्वत्व का आधार है। संघ ने समाज से आह्वान किया कि इस 150 वर्ष के पावन काल में “वन्दे मातरम्” की ज्योति हर हृदय में प्रज्ज्वलित हो और इसी भाव से राष्ट्र निर्माण का संकल्प लिया जाए। इसी संदर्भ में 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार द्वारा घोषित नए दिशा-निर्देश भी महत्वपूर्ण हैं। इन निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय आयोजनों में राष्ट्रगान से पहले “वन्दे मातरम्” के सभी छह अंतरों का गायन किया जाएगा, जिसकी अवधि लगभग तीन मिनट दस सेकंड होगी। राष्ट्रपति के आगमन और प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज समारोह, पद्म पुरस्कार और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में इसे गाना अनिवार्य किया गया है। विद्यालयों में भी प्रार्थना की शुरुआत “वन्दे मातरम्” से करने का सुझाव दिया गया है। हालांकि इस संबंध में किसी प्रकार की कानूनी सजा का प्रावधान नहीं रखा गया है। यह एक दंडात्मक आदेश नहीं बल्कि सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का प्रयास है, एक ऐसा प्रयास जो समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने की दिशा में है। आज के समय में “वन्दे मातरम्” अक्सर केवल दो शब्दों तक सीमित होकर रह जाता है। लोग इसे एक नारे के रूप में बोलते हैं किंतु इसकी वास्तविक महत्ता पूरे गीत में निहित है। ये दो शब्द भावना जगाते हैं, लेकिन पूरा गीत चेतना जगाता है। इसकी संपूर्ण रचना में राष्ट्र चेतना को आध्यात्मिक ऊंचाई प्रदान करने की क्षमता है। इसमें प्रकृति का सौंदर्य है, संस्कृति का गौरव है, ज्ञान का प्रकाश है और शक्ति का तेज है। ये चारों तत्व मिलकर इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि जीवन दर्शन बना देते हैं। “वन्दे मातरम्” हमें यह सिखाता है कि राष्ट्र केवल राजनीतिक इकाई नहीं होता, यह एक जीवित सांस्कृतिक सत्ता होता है। इसकी सेवा कर्तव्य से बढ़कर है, यह तप और साधना है। मातृभूमि सिर्फ भूमि का टुकड़ा नहीं, वह हमारी चेतना, पहचान और अस्तित्व का आधार है। जब हम “वन्दे मातरम्” कहते हैं तो हम उस परंपरा को