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हमारे जनप्रतिनिधि और संविधान: जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व

डॉ राकेश कुमार आर्य. देश की संसद अर्थात शीर्ष सभा के सभासद कैसे हों ? – इस पर अपना मत व्यक्त करते हुए ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि ” सभा में चारों वेद, कारण अकारण का ज्ञाता न्यायशास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि के वेत्ता विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों। देश विषयक प्रमुख निर्णय लेने वाली सभा में दस विद्वानों से न्यून न होने चाहियें। स्वामी दयानंद जी महाराज ने यहां पर स्पष्ट किया है की सभा में चारों वेदों के ज्ञाता उपस्थित होने चाहिए। प्रश्न है कि स्वामी जी ने सबसे पहले चारों वेदों के ज्ञाता को ही शीर्ष सभा का सभासद होने के लिए योग्य क्यों माना ? इसका उत्तर केवल एक है कि वेद सृष्टि का आदि संविधान है। ईश्वर प्रदत्त सबसे पहला संविधान है। यह संविधान हमें चार अरब 32 करोड़ के सृष्टि काल के लिए मिला है। यद्यपि ईश्वर का यह ज्ञान सृष्टि दर सृष्टि यथावत चलता रहता है। वेद नाम के इस संविधान की व्यवस्थाओं का अर्थात विधिक व्यवस्थाओं का मर्मज्ञ होता है, वही धर्मज्ञ होता है। उससे अपेक्षा की जा सकती है कि वह संसार के लिए उपयोगी चिंतन करेगा और ऐसा कोई भी कार्य नहीं करेगा जिससे किसी का अहित होता हो। वह अपने विवेक का संतुलन बनाकर काम करेगा। विवेक का संतुलन बनाकर ही नीतियों का निर्धारण करेगा और विवेक का संतुलन बनाकर ही उन नीतियों को लागू करेगा। ऐसे व्यक्ति से कभी भी किसी भी प्रकार के उत्पात, उन्माद या उग्रवाद की अपेक्षा नहीं की जा सकती। तीन सभासद मिलकर व्यवस्था करेंस्वामी दयानंद जी की यह भी मान्यता रही है कि ” जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के जानने वाले तीन सभासद् होके व्यवस्था करें उस सभा की की हुई व्यवस्था का भी कोई उल्लंघन न करे। यदि एक अकेला सब वेदों को जानने वाला द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म, कर्तव्य, सिद्धान्त व नीति की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म व न्याय है क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों लाखों करोड़ों लोग मिल के जो कुछ व्यवस्था करें उस को कभी न मानना चाहिये।” स्वामी दयानंद जी महाराज ने कहा कि सभाओं में विद्वान् ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ सभासद् हों’ जब ऐसे लोगों को प्रजा के बीच से निकालकर संसद तक भेजा जाएगा या संसद में स्थान दिया जाएगा तो वह विद्वानों की सभा होगी। न्यायकारी सभासदों से सुभूषित होगी। ऐसे लोग भूसुर कहलाते हैं। भूसुर ही संसार में व्यवस्था बना सकते हैं।इसलिए भूसुरों को संसद में स्थान मिले, सम्मान मिले – यही ऋषि दयानंद जी का मंतव्य रहा। भूसुरों को जब आप संसद में भेजेंगे तो वे वहां रहकर न्यायपूर्ण नीतियों का विधान करेंगे। महर्षि दयानन्द जी महाराज की स्पष्ट मान्यता रही कि यदि आप किसी एक व्यक्ति विशेष के हाथों में सारे अधिकार सौंप देंगे तो न्याय, नीति और धर्म तीनों ही मर जाएंगे। स्वामी जी का स्पष्ट कहना था कि ” एक व्यक्ति वा राजा को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति, तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन और प्रजा राजसभा के आधीन रहें।”हमारे ऋषि पूर्वज इस प्रकार के मानवीय स्वभाव की तानाशाही से पूर्व में ही परिचित रहे हैं। यही कारण रहा कि उन्होंने ” शक्ति पृथक्करण ” के सिद्धांत को अपनाया। महर्षि मनु की मनुस्मृति इस संबंध में हमारा सही मार्गदर्शन करती है। न्याय और दया में है सूक्ष्म अंतरमहर्षि दयानन्द जी महाराज कहते हैं :-” ईश्वर दयालु एवं न्यायकारी है। न्याय और दया में नाम मात्र ही भेद है, क्योंकि जो न्याय से प्रयोजन सिद्ध होता है वही दया से। दण्ड देने का प्रयोजन है कि मनुष्य अपराध करने से बंद होकर दु:खों को प्राप्त न हो, वही दया कहलाती है। जिसने जैसा जितना बुरा कर्म किया है उसको उतना है दण्ड देना चाहिये , उसी का नाम न्याय है। जो अपराध का दण्ड न दिया जाय तो न्याय का नाश हो जाय। क्योंकि एक अपराधी को छोड़ देने से सहस्त्रों धर्मात्मा पुरुषों को दु:ख देना है। जब एक को छोड़ने से सहस्त्रों मनुष्यों को दु:ख प्राप्त होता हो तो वह दया किस प्रकार हो सकती है ? दया वही है कि अपराधी को कारागार में रखकर पाप करने से बचाना। निरन्तर एवं जघन्य अपराध करने पर मृत्यु दण्ड देकर अन्य सहस्त्रों मनुष्यों पर दया प्रकाशित करना। संसार में तो सच्चा झूठा दोनों सुनने में आते हैं। किन्तु उसका विचार से निश्चय करना अपना अपना काम है। ईश्वर की पूर्ण दया तो यह है कि जिसने जीवों के प्रयोजन सिद्ध होने के अर्थ जगत में सकल पदार्थ उत्पन्न करके दान दे रक्खे हैं। इससे भिन्न दूसरी बड़ी दया कौन सी है ? अब न्याय का फल प्रत्यक्ष दीखता है कि सुख दुख की व्याख्या अधिक और न्यूनता से प्रकाशित कर रही है। इन दोनों का इतना ही भेद है कि जो मन में सबको सुख होने और दुख छूटने की इच्छा और क्रिया करना है वह दया और ब्राह्य चेष्टा अर्थात बंधन छेदनादि यथावत दण्ड देना न्याय कहलाता है। दोनों का एक प्रयोजन यह है कि सब को पाप और दुख से प्रथक कर देना।” न्यायपरक लोकतंत्र और वेद की व्यवस्थास्वामी जी ने वेद मंत्रों के आधार पर इस व्यवस्था को दिया। वेद वास्तविक न्यायपरक लोकतंत्र के समर्थक हैं। वेद की लोकतंत्र की इसी पवित्र भावना का सम्मान करते हुए महर्षि मनु द्वारा मनुस्मृति में राजधर्म का प्रतिपादन किया गया। वह भी इसी मत के थे। वेद की स्पष्ट मान्यता रही है कि किसी भी एक व्यक्ति के हाथों में सत्ता सौंपना मनुष्य की अधिनायकवादी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना होता है। जैसे ही मनुष्य को यह आभास होता है कि अब वह सबसे ऊपर हो गया है और सभी लोग उसकी बुद्धि का लोहा मान रहे हैं अथवा उसके बाहुबल के समक्ष नतमस्तक हैं, तुरंत वह घमंड से फूल जाता है। ऐसा व्यक्ति सत्ता के मद में चूर होकर जनता के हितों के साथ खिलवाड़ कर सकता है। जैसा कि हमने मुस्लिम शासकों को जनता पर अत्याचार करते हुए देखा भी है। मनुष्य को कभी बेलगाम नहीं होने देना चाहिए। उस पर ऐसी दूसरी बुद्धियों का पहरा रहना चाहिए जो उसकी बुद्धि से कहीं अधिक पवित्र और निर्मल हों। यदि दुर्बुद्धि मनुष्य किसी