दुर्लभ महीना जो देता है महापुण्य लाभ-लेकिन छोटी सी भूल बढ़ा सकती है पाप

नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार हर कुछ वर्षों में एक विशेष महीना आता है, जिसे Adhik Maas या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है। यह महीना सामान्य 12 महीनों से अलग होता है और इसे अतिरिक्त (13वां) महीना माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पवित्र महीना 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक चलेगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस माह का संबंध सीधे भगवान विष्णु से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि जब इस अतिरिक्त महीने को कोई नाम नहीं मिल पाया, तब स्वयं भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर ‘पुरुषोत्तम मास’ बनाया। इसी कारण यह महीना विष्णु भक्ति, साधना और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि इस अवधि में किए गए जप, तप, पूजा-पाठ और दान का फल कई गुना बढ़कर मिलता है। इसे “अक्षय पुण्य” प्राप्त करने वाला समय भी कहा जाता है। इसलिए भक्तजन इस महीने में भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और अपने जीवन को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, जितना यह महीना पुण्यदायी माना गया है, उतना ही इसमें कुछ नियमों का पालन करना भी जरूरी बताया गया है। मान्यताओं के अनुसार इस दौरान कुछ कार्यों से बचना चाहिए, अन्यथा उसका विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। इस महीने में विवाह, सगाई, गृह प्रवेश या किसी नए कार्य की शुरुआत को शुभ नहीं माना जाता। इसी तरह, नए निर्माण कार्य या बड़े निवेश से भी बचने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा, इस अवधि में शारीरिक और मानसिक पवित्रता का विशेष ध्यान रखने की बात कही गई है। ब्रह्मचर्य का पालन और संयमित जीवनशैली अपनाना इस माह का मुख्य नियम माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मांस, मछली, अंडा, प्याज, लहसुन और नशीले पदार्थों का सेवन इस महीने में वर्जित माना गया है। ऐसा करने से आध्यात्मिक पुण्य कम होने की बात कही जाती है। इसी तरह झूठ बोलना, धोखा देना, किसी का धन हड़पना या बुरे कर्म करना इस महीने में कई गुना पाप का कारण बन सकता है। इसलिए इस समय को आत्ममंथन और सुधार का अवसर माना जाता है। दान-पुण्य को इस महीने में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया गया है, लेकिन यह भी कहा गया है कि दान का दिखावा नहीं करना चाहिए और न ही अशुद्ध या खराब वस्तुओं का दान करना चाहिए। कांसे के बर्तन में भोजन करने से भी परहेज करने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इसे भी शास्त्रीय नियमों के विरुद्ध माना गया है। कुल मिलाकर Adhik Maas को आत्मशुद्धि, संयम और भक्ति का महीना माना गया है, जिसमें सही आचरण व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनाता है और जीवन में सकारात्मकता लाता है।
गुरुवार के उपाय: शादी में आ रही रुकावट होगी दूर, धन-संपत्ति से भर जाएगा घर

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति को समर्पित माना जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर होता है, उन्हें विवाह में देरी, आर्थिक परेशानी और पारिवारिक तनाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में गुरुवार के दिन कुछ विशेष उपाय करने से जीवन में सुख-समृद्धि और सकारात्मक बदलाव आने की मान्यता है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, जिन युवकों और युवतियों की शादी में लगातार बाधाएं आ रही हैं, उन्हें गुरुवार के दिन पीले वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। पूजा में हल्दी, चने की दाल, पीले फूल और बेसन के लड्डू अर्पित करना शुभ माना जाता है। साथ ही “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करने से विवाह योग मजबूत होता है। आर्थिक तंगी से परेशान लोगों के लिए भी गुरुवार के उपाय काफी असरदार बताए गए हैं। मान्यता है कि इस दिन केले के पेड़ की पूजा करने और जल में हल्दी मिलाकर अर्पित करने से धन संबंधी समस्याएं दूर होने लगती हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को पीली वस्तुओं जैसे चना दाल, हल्दी, पीले कपड़े या केले का दान करना भी बेहद शुभ माना गया है। गुरुवार के दिन घर में सत्यनारायण कथा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ कराने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। धार्मिक मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और रुके हुए कार्यों में गति मिलती है। वहीं, जिन लोगों को नौकरी या व्यापार में लगातार नुकसान हो रहा हो, उन्हें इस दिन नमक का कम इस्तेमाल करने और सात्विक भोजन ग्रहण करने की सलाह दी जाती है। ज्योतिष शास्त्र में यह भी कहा गया है कि गुरुवार के दिन बाल और नाखून काटने से बचना चाहिए। ऐसा करने से गुरु ग्रह कमजोर होता है और शुभ फल में कमी आ सकती है। इस दिन पीले रंग का अधिक प्रयोग करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ किए गए ये उपाय व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। हालांकि किसी भी धार्मिक उपाय को आस्था और विश्वास के साथ करना ही सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
गुरुवार व्रत से चमक सकती है किस्मत, जानिए कब और कैसे करें बृहस्पति देव की पूजा

नई दिल्ली। हिंदू धर्म में सप्ताह का हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है, लेकिन गुरुवार का दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की पूजा के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति ग्रह को ज्ञान, भाग्य, विवाह, संतान और सुख-समृद्धि का कारक कहा गया है। मान्यता है कि यदि कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर हो या जीवन में लगातार रुकावटें आ रही हों, तो गुरुवार का व्रत बेहद लाभकारी साबित होता है। यह व्रत व्यक्ति के गुडलक को मजबूत करता है और जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार का व्रत किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष से शुरू करना सबसे शुभ माना जाता है। यदि इस दिन पुष्य नक्षत्र का संयोग बन जाए तो इसका महत्व और बढ़ जाता है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए और पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद सूर्य देव को हल्दी मिले जल से अर्घ्य देना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति की प्रतिमा या तस्वीर को साफ स्थान पर स्थापित करें। पूजा में पीले फूल, हल्दी, चने की दाल, केला, बेसन की मिठाई और तुलसी दल अर्पित करना शुभ माना गया है। केले के पेड़ की पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि उसमें भगवान विष्णु का वास माना जाता है। पूजा के समय “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मंत्र का जाप करने से गुरु ग्रह मजबूत होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। गुरुवार व्रत में नियमों का पालन करना बेहद जरूरी माना गया है। इस दिन नमक का सेवन नहीं करना चाहिए और केवल एक समय भोजन करना शुभ माना जाता है। तामसिक भोजन, झूठ, क्रोध और अपशब्दों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, गुरुवार को बाल, नाखून काटना और कपड़े धोना भी वर्जित माना गया है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह व्रत विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने में मदद करता है। जिन लोगों की शादी में देरी हो रही हो या रिश्तों में समस्याएं आ रही हों, उन्हें नियमित रूप से गुरुवार का व्रत रखने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा आर्थिक तंगी, करियर में असफलता और मानसिक तनाव से जूझ रहे लोगों के लिए भी यह व्रत लाभकारी माना गया है। गुरुवार के दिन पीली वस्तुओं का दान विशेष फलदायी माना गया है। चने की दाल, हल्दी, पीले वस्त्र, केसर और बेसन से बनी मिठाइयों का दान करने से गुरु ग्रह की कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-शांति, धन और समृद्धि का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया गुरुवार का व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है, निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है और परिवार में खुशहाली बनी रहती है।
एकादशी व्रत के नियम क्या हैं? जानिए सही पूजा विधि और धार्मिक महत्व

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। हर माह कृष्ण और शुक्ल पक्ष में एक-एक एकादशी आती है, यानी सालभर में कुल 24 एकादशी व्रत रखे जाते हैं। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। किसकी पूजा होती है?एकादशी के दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु के विभिन्न स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व माना गया है। कई भक्त भगवान कृष्ण की पूजा भी करते हैं, क्योंकि उन्हें विष्णु का अवतार माना जाता है। भगवान विष्णु का यह मंत्र अत्यंत शुभ माना जाता है: ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवाय एकादशी व्रत के नियव्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह जल्दी उठकर स्नान करना चाहिए।घर और पूजा स्थल की साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें।इस दिन सात्विक भोजन करें और कई लोग निर्जला व्रत भी रखते हैं।लहसुन, प्याज, चावल और तामसिक भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।क्रोध, झूठ और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की सलाह दी जाती है।भगवान विष्णु के मंत्रों और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करना शुभ माना जाता है।जरूरतमंदों को दान करना पुण्यदायी माना गया है। एकादशी व्रत की पूजा विधिएकादशी के दिन सुबह स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें। इसके बाद पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, धूप, दीप, फल और मिठाई अर्पित करें।पूजा के दौरान विष्णु चालीसा या विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें और मंत्र जाप करें। तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। अंत में भगवान की आरती करें और परिवार में प्रसाद बांटें। एकादशी व्रत का महत्वधार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी व्रत मन और शरीर को शुद्ध करने वाला माना जाता है। यह व्रत आत्मिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का माध्यम माना जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया एकादशी व्रत व्यक्ति को मोक्ष और पुण्य फल प्रदान करता है।
अपरा एकादशी व्रत का महत्व क्या है? जानिए पूजा के नियम और सही तिथि

नई दिल्ली । हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व बताया गया है। ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को अपरा एकादशी कहा जाता है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से व्यक्ति को पुण्य फल की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। अपरा एकादशी 2026 की सही तिथिवर्ष 2026 में अपरा एकादशी का व्रत 13 मई, बुधवार को रखा जाएगा। उदया तिथि के अनुसार इसी दिन व्रत और पूजा करना शुभ माना गया है। बुधवार को पड़ने के कारण इस बार इस व्रत का महत्व और भी अधिक माना जा रहा है। अपरा एकादशी का धार्मिक महत्वधार्मिक ग्रंथों में अपरा एकादशी को अत्यंत फलदायी व्रत माना गया है। मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक व्रत रखने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत सुख, शांति, धन, समृद्धि और मोक्ष प्रदान करने वाला माना जाता है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ और तीर्थ स्नान के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। जो लोग आर्थिक परेशानियों, मानसिक तनाव या जीवन की कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, उनके लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना गया है। पूजा के नियमअपरा एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। इसके बाद घर के मंदिर में भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले फूल, तुलसी दल, फल और मिठाई अर्पित करें।पूजा के दौरान भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। विशेष रूप से यह मंत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है: ॐ नमो भगवते वासुदेवायmathrm{ॐ नमो भगवते वासुदेवाय}ॐ नमो भगवते वासुदेवायइस दिन सात्विक भोजन करना चाहिए और लहसुन, प्याज, चावल तथा तामसिक भोजन से दूरी बनानी चाहिए। कई श्रद्धालु निर्जला व्रत भी रखते हैं। जरूरतमंदों को दान करने का भी विशेष महत्व बताया गया है। इन बातों का रखें ध्यानक्रोध और नकारात्मक विचारों से दूर रहेंभगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा श्रद्धा से करेंतुलसी पूजा जरूर करेंअगले दिन द्वादशी तिथि में व्रत का पारण करें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्रद्धा और नियमपूर्वक किया गया अपरा एकादशी व्रत जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सुख-समृद्धि लेकर आता है।
17 मई से शुरू अधिक मास: 27 साल बाद खास संयोग, जानें क्या करें और क्या बिल्कुल न करें

नई दिल्ली। हिंदू पंचांग के अनुसार 17 मई से अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की शुरुआत हो रही है, जो 15 जून तक चलेगा। इस बार खास बात यह है कि यह ज्येष्ठ मास में लग रहा है, जिससे पूरा महीना 60 दिनों का हो गया है। धार्मिक मान्यताओं में भगवान विष्णु को समर्पित इस मास को अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है, लेकिन इसमें शुभ मांगलिक कार्यों पर रोक रहती है। क्या करें अधिक मास को भक्ति और साधना का महीना कहा गया है। इस दौरान भगवान विष्णु की रोज पूजा-अर्चना करें “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें विष्णु सहस्त्रनाम, गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करें जरूरतमंदों को वस्त्र, फल, जल और अन्न का दान करें पवित्र नदी में स्नान करें या घर पर ही शुद्ध जल से स्नान कर पुण्य अर्जित करें माना जाता है कि इस महीने किए गए जप-तप और दान का फल कई गुना बढ़ जाता है। क्या न करें इस पूरे मास में कुछ कामों से बचना जरूरी माना गया है शादी-विवाह, गृह प्रवेश, सगाई जैसे शुभ कार्य न करें नया बिजनेस या बड़ा काम शुरू करने से बचें तामसिक भोजन (लहसुन, प्याज) से दूरी रखें झूठ बोलने और किसी का अपमान करने से बचें अधिक मास क्यों लगता है?हिंदू पंचांग चंद्र गणना पर आधारित है, जो सौर वर्ष से करीब 11 दिन छोटा होता है। यह अंतर हर साल बढ़ता जाता है और करीब 32 महीने बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता है इसी को अधिक मास कहा जाता है। कुल मिलाकर, अधिक मास को आत्मशुद्धि, भक्ति और दान-पुण्य का विशेष समय माना जाता है, जहां सांसारिक कार्यों की बजाय आध्यात्मिक साधना को महत्व दिया जाता है।
फाल्गुन पूर्णिमा 2026: इस विधि से रखें व्रत, बरसेगी विष्णु लक्ष्मी की असीम कृपा

नई दिल्ली । फाल्गुन मास की पूर्णिमा सनातन परंपरा में अत्यंत पावन मानी गई है। इसे वसंत पूर्णिमा और होली पूर्णिमा भी कहा जाता है। यह हिंदू वर्ष की अंतिम पूर्णिमा होती है और इस दिन भगवान Vishnu माता Lakshmi भगवान Narasimha तथा Radha Krishna की पूजा का विशेष विधान है। मान्यता है कि इस दिन विधि विधान से व्रत और पूजा करने से सुख समृद्धि सौभाग्य और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है। फाल्गुन पूर्णिमा 2026 का शुभ मुहूर्त ज्योतिषीय गणना के अनुसार पूर्णिमा तिथि 2 मार्च 2026 को शाम 5:55 बजे से प्रारंभ होकर 3 मार्च 2026 को शाम 5:07 बजे तक रहेगी। 3 मार्च को चंद्र ग्रहण और सूतक लगने के कारण पूजा में बाधा रहेगी इसलिए 2 मार्च 2026 को व्रत रखना अधिक शुभ माना गया है। फाल्गुन पूर्णिमा का धार्मिक महत्व पूर्णिमा व्रत को अत्यंत फलदायी बताया गया है। इस दिन स्नान दान जप और पूजा करने से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त होती है। मान्यता है कि इससे धन धान्य में वृद्धि होती है और कुंडली में चंद्र दोष होने पर मानसिक शांति मिलती है। व्रत करने वालों को अगले दिन स्नान दान अवश्य करना चाहिए तभी व्रत पूर्ण फलदायी माना जाता है। फाल्गुन पूर्णिमा व्रत विधि प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें। संभव हो तो पवित्र नदी या सरोवर में स्नान करें। सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। घर में स्वच्छ स्थान पर लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। तिलक पुष्प और वस्त्र अर्पित करें। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जप करें। भोग लगाकर पूर्णिमा व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। चंद्रोदय के बाद चंद्रमा को जल में कच्चा दूध मिलाकर अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें। अगले दिन दान पुण्य अवश्य करें। विशेष मंत्र और महाउपाय फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः मंत्र का 108 बार जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। साथ ही जरूरतमंदों को अन्न वस्त्र या धन का दान करने से लक्ष्मी कृपा स्थायी होती है।यह दिन भक्ति श्रद्धा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। विधि विधान से श्री लक्ष्मीनारायण की आराधना करने पर जीवन में सुख समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
रंगभरी एकादशी 2026 : 27 या 28 फरवरी? जानें सही तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण समय

नई दिल्ली । 2026 में रंगभरी एकादशी जिसे अमलकी एकादशी भी कहा जाता है का व्रत फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि पर मनाया जाएगा। यह पवित्र व्रत होली के उत्सव से कुछ दिनों पहले आता है और विशेष रूप से भगवान विष्णु साथ ही भगवान शिव पार्वती के पूजन के लिए प्रसिद्ध है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ काशी वाराणसी आए थे जहां नगरवासियों ने उनका रंगों और गुलाल से स्वागत किया था। तब से इस दिवस को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है और काशी में होली उत्सव की शुभ शुरुआत भी इसी दिन मानी जाती है। रंगभरी एकादशी 2026 की तिथि वेदिक पंचांग के अनुसार: फाल्गुन शुक्ल एकादशी तिथि 27 फरवरी 2026 की रात 12:33 बजे से प्रारंभ होकर 10:32 बजे तक रहेगी। उदय तिथि के नियम के अनुसार सुबह के समय पर यह तिथि मौजूद रहने के कारण 27 फरवरी शुक्रवार को ही रंगभरी एकादशी का व्रत रखा जाएगा। रंगभरी एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त पूजा और उपवास के दौरान शुभ मुहूर्त निम्नलिखित हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 05:09 बजे से सुबह 05:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:11 बजे से 12:57 बजे तक विजय मुहूर्त: दोपहर 02:29 बजे से 03:15 बजे तक सर्वार्थ सिद्धि योग: लगभग सुबह 10:48 बजे से रात तक शुभ रहता है व्रत पारण कब करें? रंगभरी एकादशी का व्रत पारण 28 फरवरी 2026 को सुबह 06:47 बजे से 09:06 बजे के बीच किया जा सकता है जो पारण के लिए विशेष शुभ समय माना जाता है। इस दिन व्रत में निर्जला उपवास या फलाहारी व्रत रखा जा सकता है जैसा श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार करते हैं। पूजा का महत्व और विधि रंगभरी एकादशी के दिन श्रद्धालु स्नान के बाद भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होकर पूजा करते हैं। मुख्य पूजन में आमलकी आंवला का फल दान निवेद्य के रूप में चढ़ाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके साथ तुलसी दीप धूप और नारियल का भी प्रयोग किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से जीवन में शांति सौहार्द सुख समृद्धि और भक्ति भाव की प्राप्ति होती है। साथ ही इस व्रत से भगवान विष्णु के आशीर्वाद से मानसिक उन्नति भी होती है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ वाराणसी में रंगभरी एकादशी को होली का शुभ शुभारंभ माना जाता है। मंदिरों एवं घाटों पर भक्त रंग गुलाल के साथ पूजा करते हैं और काशी में होली खेल के प्रचलन की शुरुआत इसी दिन से होती है।