इजरायल, ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव पर बड़ा दावा: ‘युद्ध भड़काने की थी साजिश, लेकिन MBS ने रोका बड़ा संकट’

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया की राजनीति एक बार फिर बड़े दावों और आरोपों को लेकर सुर्खियों में है। सऊदी अरब के पूर्व खुफिया प्रमुख और पूर्व राजदूत प्रिंस तुर्की अल-फैसल ने दावा किया है कि यदि इजरायल की कथित रणनीति सफल हो जाती, तो ईरान और सऊदी अरब के बीच सीधा सैन्य संघर्ष भड़क सकता था, जिससे पूरा क्षेत्र विनाशकारी युद्ध की चपेट में आ जाता। हालांकि उन्होंने कहा कि क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (MBS) की सूझबूझ और संयम की नीति के चलते सऊदी अरब इस बड़े संकट से बच गया। पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ते आरोपतुर्की अल-फैसल ने अपने लेख में दावा किया कि हाल के वर्षों में क्षेत्र में बढ़ते तनाव के बीच कुछ बाहरी ताकतें चाहती थीं कि सऊदी अरब और ईरान सीधे टकराव में आ जाएं। उनके अनुसार, यदि यह स्थिति बनती तो खाड़ी देशों की तेल अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था। हालांकि यह सभी दावे उनके व्यक्तिगत विश्लेषण और राय पर आधारित हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद यह बयान क्षेत्रीय भू-राजनीति की जटिलता को उजागर करता है। सऊदी अरब की ‘संयम नीति’ का दावातुर्की अल-फैसल का कहना है कि सऊदी नेतृत्व ने इस पूरे तनाव के दौरान आक्रामक प्रतिक्रिया देने के बजाय कूटनीति और संयम का रास्ता अपनाया। उनके मुताबिक, अगर सऊदी अरब ईरान के हमलों का सैन्य जवाब देता, तो हालात तेजी से युद्ध में बदल सकते थे और खाड़ी क्षेत्र की तेल सुविधाएं गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती थीं। उन्होंने दावा किया कि सऊदी अरब ने पर्दे के पीछे रहकर तनाव को कम करने और बातचीत के जरिए समाधान निकालने की कोशिश की। ‘युद्ध में धकेलने की कोशिश’ का आरोपपूर्व खुफिया प्रमुख ने यह भी आरोप लगाया कि सोशल मीडिया और कुछ राजनीतिक समूहों के जरिए सऊदी अरब पर दबाव बनाने और उसे संघर्ष में खींचने की कोशिश की गई। लेकिन नेतृत्व ने सार्वजनिक बयानबाजी से दूरी बनाकर स्थिति को बिगड़ने से रोका। उनके अनुसार, यदि उस समय स्थिति नियंत्रण से बाहर जाती तो क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचे को भारी नुकसान पहुंच सकता था। MBS की रणनीति पर फोकसतुर्की अल-फैसल ने क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीति को “दूरदर्शी और व्यावहारिक” बताया। उनके अनुसार, सऊदी अरब ने सीधे टकराव से बचकर क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता दी, जिससे एक बड़े युद्ध की आशंका टल गई। क्षेत्रीय राजनीति पर असरयह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और खाड़ी देशों के बीच तनाव पहले से ही उच्च स्तर पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के दावे भले ही राजनीतिक दृष्टिकोण हों, लेकिन ये क्षेत्र में जारी शक्ति संतुलन और कूटनीतिक संघर्ष को दर्शाते हैं। तुर्की अल-फैसल का यह दावा एक बार फिर दिखाता है कि पश्चिम एशिया की राजनीति कितनी जटिल और संवेदनशील है। जहां एक ओर सैन्य तनाव की आशंकाएं बनी रहती हैं, वहीं दूसरी ओर कूटनीति और संयम कई बार बड़े युद्धों को टालने में अहम भूमिका निभाते हैं।
किसी भी हालत में झुकेंगे नहीं…. युद्ध के बीच ईरान ने फिर दी अमेरिका को चेतावनी

तेहरान। अमेरिका (America) और ईरान (Iran) के बीच जारी युद्ध में अब डेडलॉक की स्थिति बन गई है। एक तरफ जहां दोनों पक्षों के बीच सीजफायर (Ceasefire) को लेकर बातचीत जारी है, वहीं दूसरी तरफ दोनों देश स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) में एक दूसरे के जहाजों पर हमले भी कर रहे हैं। ऐसे में युद्ध खत्म होने की संभावना खत्म हो रही है। इस बीच ईरान ने अमेरिका को एक बार फिर बड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह किसी भी हालत में झुकेगा नहीं। इस दौरान ईरान ने यह भी दावा किया कि वह पहले से ज्यादा ताकतवर हो गया है और उसके मिसाइलों का स्टॉक 120 फीसदी बढ़ गया है। शुक्रवार को ईरान के विदेश मंत्री सैय्यद अब्बास अराघची (Iranian Foreign Minister Seyyed Abbas Araghchi.) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में यह बातें कही हैं। उन्होंने दावा किया कि ईरान की मिसाइल क्षमता और लॉन्चरों की संख्या काफी बढ़ गई है। अराघची ने लिखा, “जब भी मेज पर कूटनीतिक समाधान निकल रहा होता है, अमेरिका एक लापरवाह सैन्य दुस्साहस का विकल्प चुनता है। क्या यह दबाव बनाने की घटिया चाल है या फिर अमेरिकी राष्ट्रपति को एक बार फिर किसी दलदल में धकेलने की कोशिश?” क्या बोले अराघची?पोस्ट में उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट की उस रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि ईरान के पास अब केवल 75 फीसदी लॉन्चर और 70 फीसदी मिसाइल भंडार बचा है। अराघची ने कहा कि ईरान राष्ट्र की रक्षा के लिए 1000 फीसदी तैयार है और 28 फरवरी की तुलना में उसके मिसाइल स्टॉक 120 फीसदी ज्यादा बढ़ चुके हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में फिर तनावइस बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) की नौसेना ने शुक्रवार सुबह अमेरिकी जहाजों पर हमले का दावा किया है। ईरान का दावा है कि यह कार्रवाई संघर्ष विराम के उल्लंघन और उसके एक तेल टैंकर के खिलाफ अमेरिकी सेना की आक्रामक गतिविधियों के जवाब में की गई है। ईरानी नौसेना ने बताया कि खुफिया निगरानी से पता चला है कि इस हमले में अमेरिकी सैन्य जहाजों को काफी नुकसान पहुंचा है। ईरान का दावा है कि हमले के बाद अमेरिकी सेना के तीन जहाज इस रास्ते से तेजी से पीछे हट गए हैं। वहीं अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड ने शुक्रवार को कहा है कि उसने दो और ईरानी टैंकरों को निष्क्रिय कर दिया है। अमेरिकी सेना ने कहा कि यह जहाज अमेरिकी नाकाबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। युद्धविराम पर अब भी जारी है चर्चाइस बीच युद्धविराम को लेकर बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच 30 दिनों के लिए युद्धविराम और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से खोलने के प्रस्ताव पर बातचीत चल रही है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने एक बयान में कहा है कि अमेरिका अब भी ईरान के जवाब का इंतजार कर रहा है।
ईरान के दुश्मन बढ़े! युद्ध में उतर सकते हैं खाड़ी के ताकतवर देश; इस बात का सता रहा डर

तेहरान। खाड़ी अरब देश ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध में शामिल होने पर विचार कर रहे हैं। यदि तेहरान उनके महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर हमला करता है, तो उन्हें इसमें कूदने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। मामले की जानकारी रखने वाले कई लोगों के हवाले से ब्लूमबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। सऊदी यूएई धैर्य खो रहे नाम न छापने की शर्त पर इन लोगों ने बताया कि खाड़ी के सबसे शक्तिशाली देश, विशेष रूप से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), ईरानी हमलों से अपना धैर्य खो रहे हैं। ईरान ने इन देशों में पहले ही बंदरगाहों, ऊर्जा सुविधाओं और हवाई अड्डों को निशाना बनाया है। हालांकि, उन्होंने जोड़ा कि वे युद्ध में तभी शामिल होंगे जब तेहरान खाड़ी के महत्वपूर्ण बिजली और पानी के बुनियादी ढांचे पर हमला करने की अपनी धमकियों को हकीकत में बदल देगा। अधिकांश खाड़ी देश युद्ध में शामिल होने के पक्ष में सूत्रों के अनुसार, ओमान जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर अधिकांश खाड़ी देश इसी दिशा में बढ़ रहे हैं। फिर भी, वे युद्ध में शामिल होने से कतरा रहे हैं क्योंकि ईरान उन पर हमले तेज कर सकता है। एक यूरोपीय राजनयिक ने कहा कि वे ऐसी स्थिति में भी नहीं फंसना चाहते जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तेहरान के साथ कोई समझौता कर लें और उन्हें एक घायल व गुस्से से भरे ईरानी शासन के साथ अकेले निपटना पड़े। खाड़ी देशों पर ड्रोन और मिसाइल हमले पिछले 24 घंटों में बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब और यूएई सभी ने ईरान द्वारा दागे गए ड्रोन और मिसाइलों को बीच में ही मार गिराया है। ईरान का दावा है कि खाड़ी देश वैध लक्ष्य हैं क्योंकि अमेरिका उनके हवाई क्षेत्र और क्षेत्रों का उपयोग उस पर हमला करने के लिए करता है। सूत्रों ने कहा कि सऊदी अरब की राजधानी रियाद में पिछले सप्ताह हुई विदेश मंत्रियों की बैठक में सैन्य कार्रवाई का विकल्प मेज पर था। इस बैठक में मिस्र, पाकिस्तान और तुर्की जैसे क्षेत्रीय देश भी शामिल थे। मंगलवार को कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजेद अल-अंसारी ने प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि खाड़ी देशों को ईरान के साथ मिल-जुलकर रहने के तरीके खोजने होंगे। उन्होंने कहा, यह युद्ध के बाद ईरानियों पर निर्भर करेगा कि वे विश्वास को फिर से कैसे बहाल करते हैं। खार्ग द्वीप पर खतरा सुरक्षा तंत्र के करीबी एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी के अनुसार, यदि ट्रंप खार्ग द्वीप पर कब्जा करने की अपनी धमकी पर आगे बढ़ते हैं तो इससे पूरे क्षेत्र में तेहरान की ओर से और भी बड़ी जवाबी कार्रवाई होगी। ईरानी अधिकारी ने कहा कि इस मिशन के लिए आवश्यक अमेरिकी सैनिकों को संभवतः यूएई से भेजा जाएगा, जहां अल धफरा एयर बेस स्थित है। अधिकारी ने चेतावनी दी कि यदि अमीरात ने इसकी अनुमति दी, तो ईरान इस खाड़ी देश पर भीषण हमला करेगा। अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि यदि अमेरिका द्वीप पर कब्जा कर लेता है, तो ईरान इसे बम से उड़ाने में संकोच नहीं करेगा और जलडमरूमध्य व फारस की खाड़ी में बारूदी सुरंगें बिछा देगा। दुबई पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर के निदेशक मोहम्मद बहारून ने कहा, यह हमारा युद्ध नहीं है, लेकिन ईरान इसे हमारा बना रहा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि ईरान यही रवैया जारी रखता है, तो क्षेत्रीय देशों को तेहरान के राज्य प्रायोजित आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक गठबंधन बनाना पड़ सकता है, जैसा कि ‘इस्लामिक स्टेट’ के खिलाफ बनाया गया था। 5 हजार मिसाइलें दागी युद्ध की शुरुआत से अब तक ईरान ने खाड़ी देशों पर लगभग 5000 मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। इसमें तेल-गैस सुविधाओं, अमेरिकी ठिकानों और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाया गया है, जिसमें यूएई ने सबसे ज्यादा मार झेली है। खाड़ी अरब देशों में अब तक कम से कम 20 लोग मारे जा चुके हैं।
मिडिल ईस्ट में कब खत्म होगी जंग? ईरान ने अमेरिका से युद्ध खत्म करने को रख दीं 6 शर्तें ते

तेहरान। ईरान ने मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध समाप्त करने के लिए नए कानूनी और रणनीतिक ढांचे के हिस्से के रूप में छह शर्तें रखी हैं। यह युद्ध रविवार को अपने 23वें दिन में प्रवेश कर गया। ईरान की ओर से रखी गयी शर्तें हैं- होर्मुज स्ट्रेट के लिए नया कानूनी ढांचा तैयार करना, युद्ध की पुनरावृत्ति रोकने की गारंटी, क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद करना, ईरान के इस्लामी गणराज्य को हर्जाने का भुगतान करना, सभी क्षेत्रीय मोर्चों पर युद्धों को समाप्त करना और ईरान के प्रति शत्रुता रखने वाले मीडिया जगत के लोगों पर मुकदमा चलाना और उनका प्रत्यर्पण करना। ईरान के ये प्रस्ताव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस दावे के एक दिन बाद आये हैं, जिसमें उन्होंने शनिवार को कहा था कि अमेरिका पश्चिम एशिया में सैन्य प्रयासों को ‘समेटने’ के लक्ष्यों को पूरा करने के ‘बहुत करीब’ है। उन्होंने संकेत दिया कि वह पश्चिम एशिया के अभियानों को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। ईरान की मेहर न्यूज एजेंसी ने अज्ञात वरिष्ठ राजनीतिक और सुरक्षा अधिकारी के हवाले से कहा कि ईरान अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपने रक्षात्मक युद्ध में पूर्व-नियोजित, बहु-चरणीय योजना लागू कर रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह रणनीति महीनों पहले विकसित की गयी थी और इसे उच्च रणनीतिक धैर्य के साथ अंजाम दिया जा रहा है। अधिकारी ने कहा कि पूरे क्षेत्र में अमेरिकी-इजरायली हवाई रक्षा प्रणालियों और रडार बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने और नष्ट करने के बाद ईरान ने अब इजरायली सत्ता के हवाई क्षेत्र पर ‘पूर्ण नियंत्रण’ स्थापित कर लिया है। अधिकारी ने कहा कि ईरान ‘आक्रमणकारी को सजा देने’ की अपनी नीति तब तक जारी रखने का इरादा रखता है, जब तक वह अमेरिका-इजरायली आक्रामकता और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ‘ऐतिहासिक सबक’ नहीं सिखा देता। अधिकारी ने आगे बताया कि कई क्षेत्रीय पक्षों और मध्यस्थों ने युद्ध समाप्त करने के उद्देश्य से ईरान को प्रस्ताव भेजे हैं। ईरान ने उनके सामने ऐसी शर्तें रखी हैं, जिन्हें किसी भी समझौते पर पहुंचने से पहले पूरा किया जाना और गंभीरता से लिया जाना जरूरी है। युद्ध के दो-तीन हफ्ते चलने की और उम्मीद वहीं, ‘एक्सियोस’ ने व्हाइट हाउस के करीबी सूत्रों के हवाले से बताया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को कहा था कि वह संघर्ष को समेटने पर विचार कर रहे हैं, हालांकि अमेरिकी अधिकारियों ने संकेत दिया कि वे अभी दो-तीन सप्ताह और सैन्य अभियानों की उम्मीद कर रहे हैं। इसके समानांतर सलाहकारों ने बातचीत के लिए जमीन तैयार करना शुरू कर दिया है, ताकि यदि कोई अवसर मिले तो उसका लाभ उठाया जा सके। पर्दे के पीछे काम करते हुए विशेष दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ पहले से ही तेहरान के अधिकारियों के साथ कूटनीतिक संपर्क की शुरुआती योजना बनाने में जुटे हैं। अधिकारियों ने कहा है कि ईरान के साथ किसी भी समझौते के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खुलवाना, इस्लामिक गणराज्य के अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम के विशाल भंडार का समाधान करना और उसके परमाणु व मिसाइल कार्यक्रमों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रॉक्सी मिलिशिया और आतंकी समूहों के समर्थन पर दीर्घकालिक सीमाएं तय करना आवश्यक होगा।
युद्ध के लिए फंडिंग…. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से एक जहाज निकालने के 20 लाख डॉलर वसूल रहा ईरान

तेहरान। अमेरिका और इजरायल (America and Israel) से युद्ध लड़ रहा ईरान (Iran) स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) पर जहाजों से वसूली (Recovery Ships) कर रहा है। खबर है कि कुछ जहाजों को गुजरने देने के लिए लाखों डॉलर लिए जा रहे हैं। ईरान के एक सांसद ने ही ऐसा दावा किया है। इससे पहले ईरान ने धमकी दी थी कि अगर अमेरिका की तरफ से हमले किए जाते हैं, तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा। ईरान इंटरनेशनल के अनुसार, ईरान की संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के सदस्य, अलादीन ब्रूजेर्दी ने कहा कि यह कदम पहले ही लागू किया जा चुका है। उन्होंने कहा, ‘अब, चूंकि युद्ध की अपनी लागत होती है, इसलिए स्वाभाविक रूप से हमें यह करना चाहिए और Strait of Hormuz से गुजरने वाले जहाजों से ट्रांजिट शुल्क लेना चाहिए।’ ब्रूजेर्दी ने डोनाल्ड ट्रंप की उस चेतावनी का भी जिक्र किया, जिसमें ट्रंप ने कहा था कि यदि 48 घंटों के भीतर स्ट्रेट को नहीं खोला गया, तो अमेरिका ईरान के बिजली और ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है। इसके जवाब में ब्रूजेर्दी ने कहा कि इजरायल का ऊर्जा ढांचा भी ईरान की पहुंच में है और उसे ‘एक दिन के भीतर’ पूरी तरह तबाह किया जा सकता है। अमेरिका अलर्टसंयुक्त राष्ट्र में अमेरिका के राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने रविवार को कहा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के साथ अपनी ‘रेड लाइन्स’ पर अडिग हैं। उन्होंने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की लगभग नाकेबंदी का जिक्र करते हुए कहा कि ईरान को दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को बंधक नहीं बनाने देंगे। ट्रंप ने कहा था 48 घंटे में होर्मुज खोले ईरानअमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने रविवार को अल्टीमेटम देते हुए कहा था कि अगर ईरान ने 48 घंटों के अंदर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से फिर नहीं खोला तो ईरान के बिजली संयंत्रों को पूरी तरह तबाह कर देंगे। ट्रंप का यह बयान शनिवार को दिए उनके बयान से उलट था। उन्होंने कहा था कि वह युद्ध को खत्म करने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन रविवार तड़के उन्होंने ईरान को नई धमकी दे डाली। ट्रंप की यह धमकी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी नौसैनिक और भारी लैंडिंग क्राफ्ट क्षेत्र की ओर बढ़ रहे हैं। आईजी मार्केट विश्लेषक टोनी साइकैमोर ने कहा, राष्ट्रपति ट्रंप की धमकी ने अब बाजारों पर 48 घंटे की अनिश्चितता का टिक टिक करता हुआ टाइम बम रख दिया है। यदि इस अल्टीमेटम को वापस नहीं लिया गया, तो हम सोमवार को दुनियाभर के शेयर बाजारों को ‘ब्लैक मंडे’ के रूप में गिरते हुए और तेल की कीमतों को काफी ऊंचे स्तर पर जाते हुए देखेंगे। बंद कर सकता है ईरानईरान की सेना ने चेतावनी दी कि यदि ट्रंप देश के बिजली संयंत्रों को निशाना बनाते हैं, तो वे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर देंगे। सेना की ऑपरेशनल कमांड ‘खातम अल-अंबिया’ ने सरकारी टीवी द्वारा प्रसारित बयान में कहा, यदि ईरान के बिजली संयंत्रों के संबंध में अमेरिका की धमकियों पर अमल किया गया, तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा, और इसे तब तक नहीं खोला जाएगा जब तक कि हमारे नष्ट किए गए बिजली संयंत्रों का पुनर्निर्माण नहीं हो जाता।
अफगानिस्तान में पाकिस्तान का एयरस्ट्राइक हमला, हॉस्पिटल पर वार में 400 नागरिकों की मौत; 1,15,000 लोग बेघर

नई दिल्ली। अफगानिस्तान में हालात तेजी से बिगड़ते जा रहे हैं। हाल ही में पाकिस्तान के पाकिस्तान द्वारा अफगानिस्तान में किए गए एयरस्ट्राइक में 400 आम नागरिकों की मौत हुई है। यह हमला स्थानीय समयानुसार रात 9 बजे एक ड्रग ट्रीटमेंट हॉस्पिटल पर हुआ जिसमें करीब 2,000 मरीज उपचाराधीन थे। वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही हैं जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ गई है। अधिकारियों ने बताया कि यह हमला फरवरी से शुरू हुए पाकिस्तान अफगानिस्तान संघर्ष का हिस्सा है। सीमा क्षेत्रों में दोनों पक्षों के बीच लगातार झड़पें हो रही हैं। पाकिस्तान का दावा है कि उसने केवल आतंकवाद समर्थित ठिकानों और अफगान तालिबान के तकनीकी व एम्युनिशन स्टोरेज को निशाना बनाया जबकि अफगान पक्ष इसे आम नागरिकों के खिलाफ जानबूझकर हमला बता रहा है। अफगानिस्तान के उप सरकारी प्रवक्ता मंदुल्लाह फितरत के अनुसार 2,000 बेड वाले अस्पताल का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया है। मरने वालों की संख्या 400 पहुंच गई है जबकि 250 लोग गंभीर रूप से घायल हैं। रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है और आग को नियंत्रित करने तथा शवों को निकालने का काम चल रहा है। यह हमला 2021 में तालिबान के कब्जे और अमेरिकी सैनिकों की वापसी के दौरान हुए हमले के बाद सबसे खतरनाक हमला माना जा रहा है। फरवरी के बाद पाकिस्तान अफगानिस्तान में शासन बदलने और तालिबान को दबाने की कोशिश में है लेकिन इसके परिणामस्वरूप आम नागरिकों को भारी नुकसान हुआ है। अब तक कम से कम 475 नागरिक मारे गए हैं और 1,15,000 लोग बेघर हो गए हैं। अफगान अधिकारियों का कहना है कि पाकिस्तान का यह कदम देश में आतंक फैलाने और आम लोगों को डराने की कोशिश है। इसके उलट अफगान नागरिक बॉर्डर पर जाकर पाकिस्तानी सेना के खिलाफ मुकाबले के लिए तैयार हैं। हालांकि पाकिस्तान ने हमले में शामिल होने से इनकार किया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के प्रवक्ता मुशर्रफ जैदी ने कहा कि अस्पताल को कोई निशाना नहीं बनाया गया और सभी हमले केवल सैन्य ठिकानों पर हुए। यह हमला न केवल अफगान नागरिकों के लिए खतरनाक साबित हुआ है बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी गंभीर चेतावनी है।
पश्चिम एशिया युद्ध की स्थिति में भी अफवाह फैला रही कांग्रेस : मोदी

गुवाहाटी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वैश्विक संकट और युद्ध की परिस्थितियों के बीच भी कांग्रेस देश में अफवाह फैलाने और गलत जानकारी देने में लगी हुई है, जबकि भाजपा-एनडीए सरकार किसानों के हित, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और पूर्वोत्तर के विकास के लिए लगातार काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने यहां एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान असम के लिए 19,500 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि कांग्रेस ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह किसी भी स्थिति में देश के प्रति ईमानदार नहीं है। उन्होंने कांग्रेस नेताओं को सलाह देते हुए कहा कि वे 15 अगस्त को लाल किले से दिए गए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भाषण को सुनें। मोदी ने कहा कि पंडित नेहरू ने एक बार कहा था कि उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच चल रहे युद्ध की वजह से भारत में महंगाई बढ़ रही है। आज कांग्रेस के लोग भी उसी तरह देश को गुमराह करने में लगे हैं, जबकि वैश्विक संकटों का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भाजपा-एनडीए सरकार ने ऊर्जा क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए व्यापक काम किया है। आज भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों का ध्यान रख रहा है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। असम सहित पूरे पूर्वोत्तर में गैस पाइपलाइन और ऊर्जा बुनियादी ढांचे के विकास पर अभूतपूर्व निवेश किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि किसानों के लिए भी बड़ा कदम उठाया गया है। उन्होंने कहा कि कुछ ही समय पहले पूरे देश के करोड़ों किसानों के खातों में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत 18 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे भेजी गई है। यह योजना देश के छोटे और सीमांत किसानों के लिए सामाजिक सुरक्षा का मजबूत माध्यम बन चुकी है। उन्होंने कहा कि 2014 से पहले ऐसे लाखों किसान थे जिनके पास न तो मोबाइल फोन था और न ही बैंक खाता, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में वित्तीय समावेशन के माध्यम से करोड़ों किसानों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया है और अब तक उनके खातों में सवा चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की सहायता राशि भेजी जा चुकी है। प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि जब प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना शुरू की गई थी, तब कांग्रेस के लोगों ने इसके बारे में झूठ फैलाया था। कांग्रेस के नेता किसानों से कहते थे कि चुनाव के बाद उन्हें यह पैसा वापस करना पड़ेगा, लेकिन आज यह योजना किसानों के लिए एक मजबूत सहारा बन चुकी है। मोदी ने कहा कि भाजपा-एनडीए सरकार के लिए किसान हित सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 से पहले केंद्र में दस वर्षों तक कांग्रेस की सरकार रही और उस दौरान किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के रूप में लगभग 6.5 लाख करोड़ रुपये मिले थे। इसके विपरीत पिछले दस वर्षों में उनकी सरकार ने किसानों को एमएसपी के रूप में 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया है। एमएसपी, सस्ता कृषि ऋण, फसल बीमा और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं ने किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान की है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी सुनिश्चित किया है कि वैश्विक संकटों का असर भारत की खेती पर कम से कम पड़े। प्रधानमंत्री ने कहा कि कोविड महामारी और उसके बाद हुए वैश्विक संघर्षों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई थी। कई देशों में इसकी कमी हो गई थी, लेकिन भारत सरकार ने किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होने दी। जहां अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की एक बोरी की कीमत लगभग 3000 रुपये तक पहुंच गई थी, वहीं भारत में किसानों को यह मात्र 300 रुपये में उपलब्ध कराई गई। इसके लिए केंद्र सरकार ने 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी दी है। उन्होंने कहा कि पिछले दशक में देश को कृषि और ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। लंबे समय तक कांग्रेस सरकारों ने देश को कई क्षेत्रों में विदेशों पर निर्भर बनाए रखा, जिससे अंतरराष्ट्रीय संकटों का सीधा असर भारत के किसानों और आम लोगों पर पड़ता था। प्रधानमंत्री ने बताया कि खेती को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए सरकार ने “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” नीति लागू की है, जिसके तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके साथ ही किसानों को सोलर पंप से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं ताकि डीजल पर उनकी निर्भरता कम हो सके। असम के विकास का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्य आज पूरे पूर्वोत्तर के लिए एक मॉडल बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि असम की प्रगति का प्रभाव पूरे नॉर्थ ईस्ट क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है और यह क्षेत्र देश के विकास में नई गति प्रदान कर रहा है। प्रधानमंत्री ने असम के चाय बागानों में काम करने वाले श्रमिक परिवारों का जिक्र किया और कहा कि राज्य सरकार ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करते हुए चाय बागान श्रमिकों को भूमि के पट्टे प्रदान कर रही है। इससे हजारों परिवारों को पहली बार भूमि का अधिकार मिल रहा है। असम आज शांति, विकास और आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और आने वाले वर्षों में यह राज्य पूरे पूर्वोत्तर के उज्ज्वल भविष्य का मार्गदर्शक बनेगा।
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से LNG सप्लाई को बड़ा झटका… भारत में 40% घटी सप्लाई

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध (West Asia War) के कारण भारत में तरलीकृत प्राकृतिक गैस (Liquefied Natural Gas) यानी LNG की सप्लाई को बड़ा झटका लगा है। लगभग 40% LNG सप्लाई प्रभावित होने के बाद, सरकार उर्वरक (फर्टिलाइजर) जैसे प्राथमिकता वाले क्षेत्रों सहित विभिन्न उद्योगों के लिए एक गैस वितरण योजना (‘ऑप्टिमाइजेशन प्लान’) पर तेजी से काम कर रही है। फर्टिलाइजर क्षेत्र पर प्रभाव और सरकार की रणनीतिटाइम्स ऑफ इंडिया ने मामले की जानकारी रखने वाले सूत्रों के हवाले से लिखा है कि पेट्रोलियम मंत्रालय जल्द ही नई वितरण व्यवस्था को अंतिम रूप दे सकता है। हो सकता है कि ये व्यवस्था आज ही यानी मंगलवार तक लागू भी हो जाए। इसमें उर्वरक क्षेत्र की सप्लाई में कुछ कमी किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस कटौती का असर खेती पर नहीं पड़ेगा। पर्याप्त गैस आपूर्ति: उर्वरक इकाइयों को उनकी क्षमता के इष्टतम स्तर पर काम करने के लिए पर्याप्त गैस दी जाएगी। रखरखाव का समय: गैस की कम उपलब्धता फिलहाल बड़ी चिंता का विषय नहीं है क्योंकि कुछ उर्वरक कंपनियां इस समय का इस्तेमाल अपने कारखानों के नियमित रखरखाव (मेंटेनेंस शटडाउन) के लिए कर रही हैं। सुस्ती का दौर: फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के अनुसार, कृषि क्षेत्र में अभी मांग कम है। खरीफ फसलों की बुवाई जून में शुरू होगी। इस दौरान खपत मध्यम रहती है, जिससे उद्योग को अपना स्टॉक भरने और रखरखाव का समय मिल जाता है। बंपर स्टॉक से दूर हुई चिंताआंकड़ों के अनुसार, भारत के पास उर्वरकों का पर्याप्त भंडार है, जो संकट के समय एक बड़े ‘कुशन’ (सुरक्षा कवच) का काम करेगा। शुक्रवार तक कुल उर्वरक स्टॉक 36.5% बढ़कर 17.7 मिलियन टन (MT) हो गया है, जो पिछले साल इसी समय लगभग 13 MT था। FAI के मुताबिक, DAP और NPK का भंडार पिछले साल की तुलना में 70-80% अधिक है। फरवरी के अंत तक एजेंसियों ने 9.8 MT उर्वरक का आयात किया है। इसके अलावा, अगले तीन महीनों के लिए 1.7 MT का अतिरिक्त आयात तय किया जा चुका है। उर्वरक विभाग ने स्पष्ट किया है कि भारत ने फॉस्फेटिक उर्वरकों के आयात स्रोतों में विविधता लाई है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक समस्याओं के कारण किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े। गैर-प्राथमिकता वाले उद्योगों की चुनौतियांविशेषज्ञों की मानें तो उर्वरक सरकार की प्राथमिकता है, इसलिए इसमें भारी कटौती नहीं होगी। हालांकि, गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को कम गैस सप्लाई से ही काम चलाना होगा। इन उद्योगों को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तुरंत वैकल्पिक ईंधन की व्यवस्था करनी होगी। नए LNG स्रोतों की तलाश और बाधाएंभारत वर्तमान में अपनी कुल जरूरत का 60% LNG पश्चिम एशिया के अलावा अन्य स्रोतों से प्राप्त करता है। अब सरकार और कंपनियां बचे हुए हिस्से की भरपाई के लिए ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों से अतिरिक्त आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही हैं।इसमें दो मुख्य चुनौतियां हैं:शिपिंग: गैस के परिवहन के लिए विशेष LNG टैंकरों की व्यवस्था करना।क्षमता: यह सुनिश्चित करना कि नए सप्लायर देशों के पास जहाजों पर लादने से पहले गैस को लिक्विफाई (तरलीकृत) करने की अतिरिक्त क्षमता हो। संकट का मुख्य कारण क्या है?भारत में यूरिया निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाली 60% LNG कतर से आयात की जाती है। हाल ही में ईरान द्वारा कतर की कतरएनर्जी फैसिलिटी पर किए गए हमले के बाद, कतर को अपना उत्पादन रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इसी कारण भारत की सप्लाई चेन में यह बड़ी रुकावट आई है।
ईरान-USA-इजराइल जंग: मजबूरी में लड़ रहा ईरान, नए सुप्रीम लीडर घायल, UAE ने मिसाइलों को नष्ट किया

नई दिल्ली। अमेरिका और इजराइल के साथ जारी ईरान संघर्ष आज 10वें दिन पहुंच गया है। ईरान ने साफ किया है कि यह जंग उनकी पसंद नहीं, बल्कि मजबूरी में लड़नी पड़ रही है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने सोमवार को प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि इस जंग को देश पर जबरन थोप दिया गया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल मध्यस्थता या सीजफायर पर चर्चा करना संभव नहीं है, क्योंकि सैन्य टकराव जारी है और प्राथमिकता देश की सुरक्षा पर है।बघाई ने जोर देकर कहा कि ईरान ने जंग शुरू नहीं की थी, और किसी अन्य देश तुर्किये, साइप्रस और अजरबैजान पर हमला नहीं किया गया। नए सुप्रीम लीडर पर हमलाईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की 28 फरवरी को अमेरिका-इजराइल हमले में मौत हुई थी। 1989 से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज अली खामेनेई ने 1979 की इस्लामिक क्रांति में अहम भूमिका निभाई थी और 1981 में आठ साल के लिए राष्ट्रपति भी रहे। उनके उत्तराधिकारी, मुजतबा खामेनेई, बीती रात नए सुप्रीम लीडर घोषित हुए, लेकिन उन्हें हाल ही में इजराइली हमले में चोट लगी। ईरानी सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी ने कहा कि नए नेतृत्व से देश में उम्मीद और एकजुटता बढ़ी है, जबकि अमेरिका और इजराइल के लिए यह निराशाजनक संकेत है। UAE ने रोकी ईरान की मिसाइलें और ड्रोनसंयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने दावा किया कि उसकी वायु रक्षा प्रणाली ने ईरान से दागी गई 12 बैलिस्टिक मिसाइलें और 17 ड्रोन हवा में ही नष्ट कर दिए। युद्ध शुरू होने के बाद UAE की तरफ कुल 253 मिसाइलें और 1,440 ड्रोन दागे जा चुके हैं। स्थिति तनावपूर्ण, लेकिन ईरान ने मजबूती दिखाईईरानी अधिकारियों ने कहा कि देश की सुरक्षा मजबूत है और नए सुप्रीम लीडर के नेतृत्व में ईरान और भी एकजुट दिखाई देगा। उन्होंने यह भी कहा कि देश की रक्षा के लिए मजबूरी में जंग लड़नी पड़ रही है, और किसी अन्य क्षेत्र पर आक्रामकता नहीं दिखाई जा रही।
ईरान पर हमलों के बीच ट्रंप ने ब्रिटेन के PM पर साधा निशाना, कहा युद्ध जीतने के बाद सहयोग की ज़रूरत नहीं

नई दिल्ली । अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के बीच ब्रिटेन के समर्थन की कमी को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी है। शनिवार को ट्रंप ने प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर पर निशाना साधते हुए कहा कि यूरोपीय देश अब पश्चिम एशिया में एयरक्रॉफ्ट कैरियर भेजने पर विचार कर रहे हैं लेकिन अमेरिका को युद्ध जीतने के बाद ऐसे सहयोगियों की ज़रूरत नहीं है। ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट में लिखा यूनाइटेड किंगडम जो कभी हमारा महान सहयोगी था अब मिडिल ईस्ट में 2 विमानवाहक पोत भेजने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। ठीक है प्रधानमंत्री स्टार्मर हमें उनकी अब ज़रूरत नहीं है। हमें ऐसे लोग चाहिए ही नहीं जो युद्ध जीतने के बाद इसमें शामिल हों। इससे पहले ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने 7 मार्च के ऑपरेशन अपडेट में बताया कि अमेरिका ने ईरान पर रक्षात्मक अभियानों के लिए ब्रिटिश ठिकानों का उपयोग शुरू कर दिया है। इसका मकसद क्षेत्र में मिसाइल दागने से रोकना और ब्रिटिश नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। ट्रंप ने इससे पहले भी ईरान पर ब्रिटेन के रुख को असहयोगी बताया था। उन्होंने कीर स्टार्मर की आलोचना करते हुए कहा कि वे विंस्टन चर्चिल नहीं हैं और दोनों देशों के संबंधों को बिगाड़ने का प्रयास कर रहे हैं। ब्रिटेन की संसद में बुधवार को प्रधानमंत्री स्टार्मर ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी विमान ब्रिटिश ठिकानों से उड़ान भर रहे हैं और ब्रिटिश जेट संयुक्त ठिकानों से मिडिल ईस्ट में अमेरिकी नागरिकों की सुरक्षा के लिए ड्रोन और मिसाइलों को मार गिरा रहे हैं। उन्होंने कहा यही स्पेशल रिलेशनशिप है – अपने लोगों की सुरक्षा के लिए रोज़ खुफिया जानकारी साझा करना। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान अमेरिका-यूके के बीच संबंधों में तनाव बढ़ा सकता है जबकि ब्रिटेन अपनी भूमिका को रक्षात्मक और सुरक्षा-केंद्रित बताते हुए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है। इस बीच क्षेत्र में तनाव और बढ़ता नजर आ रहा है क्योंकि ईरान अमेरिका और इजराइल के बीच सैन्य गतिवधियों की तीव्रता बढ़ रही है।