महिला आरक्षण की अधूरी यात्रा और लोकतंत्र

– विवेक रंजन श्रीवास्तव भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताक़त उसकी विविधता और समावेशिता है। लेकिन जब लोकसभा में ही महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का संविधान संशोधन वर्षों तक पारित नहीं हो सका, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमारा लोकतंत्र वास्तव में आधी आबादी को बराबरी का अवसर देने की इच्छा रखता है। विधेयक का महत्व महिला आरक्षण विधेयक केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि यह भारतीय राजनीति में समानता और न्याय की दिशा में ऐतिहासिक कदम होता। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% सीटें मिलतीं तो उनकी आवाज़ अधिक मज़बूती से गूँजती। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर नीतियाँ अधिक संवेदनशील और व्यावहारिक बनतीं। राजनीतिक विश्लेषण सेवा आज भी संसद में महिलाओं की संख्या 15% से कम है। यह आँकड़ा बताता है कि लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी कितनी सीमित है। आरक्षण से यह अंतर मिटाने का अवसर मिलता। असफलता के कारण विधेयक पारित न हो पाने के पीछे कई कारण रहे जिनमें राजनीतिक असहमति प्रमुख है। कुछ दलों ने जनगणना आधारित सीटों के पुनर्वितरण (परिसीमन) पर आपत्ति जताई। भारतीय जनता पार्टी ने विपक्ष को दो धारी तलवार पर खड़ा कर दिया। उनके लिए संविधान संशोधन हेतु जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाना कठिन साबित हुआ। सपा जैसे कुछ दलों को आशंका थी कि आरक्षण से उनके पारंपरिक वोट बैंक प्रभावित होंगे, इसलिए वे विरोध में रहे। इन कारणों ने मिलकर एक ऐतिहासिक अवसर का गर्भपात कर दिया। 2023 का नया अध्याय लंबे संघर्ष और बहस के बाद 2023 में संसद ने आखिरकार महिला आरक्षण विधेयक पारित कर दिया। इसमें यह प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33% सीटें मिलेंगी, लेकिन यह आरक्षण परिसीमन (delimitation) और जनगणना के बाद ही लागू होगा। इस शर्त ने इसे एक अधूरी जीत बना दिया है, क्योंकि वास्तविक प्रभाव तब तक नहीं दिखेगा जब तक नई जनगणना और सीटों का पुनर्वितरण पूरा नहीं होता। समकालीन परिप्रेक्ष्य 2024 के आम चुनावों में महिला उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी, लेकिन प्रतिनिधित्व अब भी सीमित रहा। महिला संगठनों ने 2023 के विधेयक को “ऐतिहासिक लेकिन अधूरा” कहा। कई राजनीतिक दलों ने इसे समर्थन दिया, पर साथ ही यह मांग भी उठी कि इसे शीघ्र लागू किया जाए ताकि केवल कागज़ी प्रावधान न रह जाए। असर और चुनौती महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना और फिर विलंबित रूप से पारित होना कई स्तरों पर असर डालता है। महिला नेतृत्व का अवसर फिलहाल टल गया लगता है। महिला संगठनों और नागरिक समाज में गहरी निराशा है। राजनीतिक दलों पर इसे शीघ्र लागू करने का दबाव बढ़ेगा। लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना केवल एक विधायी पराजय नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की अधूरी प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसमें राजनीति व्यापक राष्ट्रहित से बड़ी सिद्ध हुई। जब तक संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या पर्याप्त नहीं होगी, तब तक नीतियाँ समाज के हर वर्ग का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाएँगी। भारत की आधी आबादी को बराबरी का अधिकार देना केवल संवैधानिक दायित्व नहीं, बल्कि नैतिक जिम्मेदारी भी है। यह विधेयक पारित होना हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारी राजनीति वास्तव में समावेशी है। महिला आरक्षण विधेयक का अधूरा रहना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक चुनौती है। यह आवश्यक है कि सभी राजनीतिक दल अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर इस मुद्दे पर सहमति बनाएँ। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33% प्रतिनिधित्व देना भारतीय लोकतंत्र को अधिक सशक्त, न्यायपूर्ण और संतुलित बनाएगा। आज नहीं तो कल यह होकर रहेगा, क्योंकि यह जन आकांक्षा है।
जन-जन को मिले जलाधिकार

– डॉ.वेदप्रकाशकुछ लोग जल का व्यापार करें और कुछ लोग बूंद बूंद को तरसें। क्या यह जन-जन के जलाधिकार का हनन नहीं है? शासन- प्रशासन मौन क्यों है? क्या हम नहीं जानते कि जल जीवन तत्व है,अमृत है और प्रत्येक जीवधारी के लिए परमात्मा द्वारा दिया गया उपहार है। जल के बिना न तो जीवन संभव है और न ही प्रकृति-संस्कृति की संकल्पना साकार हो सकती है। पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल होने पर भी पेयजल लगभग 03 प्रतिशत ही है। आज जब जनसंख्या की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। नदी, कुएं ,तालाब, बावड़ियां, झरनें और भूजल निरंतर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। तब क्या हमें जल के संरक्षण- संवर्धन और सदुपयोग पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए? ध्यातव्य है कि विगत दिनों इंदौर सहित देश में कई स्थानों पर प्रदूषित पानी पीने से कई लोग असमय मृत्यु के शिकार हो गए। यदि उन्हें स्वच्छ जल का अधिकार मिला होता तो आज वे जीवित होते। भारत की त्यागपूर्वक भोग की संस्कृति ने सर्वे भवंतु सुखिन: के माध्यम से सबके सुख की कामना की है। कुएं, हैंडपंप, झरने और बावड़ियों से उतना ही जल लिया जाता था, जितनी आवश्यकता होती थी। सभी की चिंता करते हुए सभी को पर्याप्त और स्वच्छ जल की उपलब्धता हेतु धनी लोग जगह-जगह कुंए और प्याऊ बनवाते थे। पानी खरीदने और बेचने का विचार ही नहीं था। आज भारत में मानक व अमानक, वैध एवं अवैध से परे सैकड़ों नामों से पैकेज्ड पानी बिक रहा है। पैकेज्ड पानी का व्यापार करने वाली 10 शीर्ष कंपनियों में बिसलेरी, किनले,एक्वाफिना, रेल नीर, टाटा वाटर प्लस, ऑक्सीरिच, किंगफिशर, हिमालयन, बेले एवं नेस्ले प्रमुख हैं। इन कंपनियों का वार्षिक व्यापार लगभग 20 हजार करोड़ रुपए है जिसमें 32 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ बिसलेरी सबसे ऊपर है। बाजार में एक लीटर पानी की कीमत लगभग 20 रुपये है। एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन में लगभग 3 लीटर पानी पीना चाहिए, यानी एक व्यक्ति दिन में लगभग 60-70 रुपये का पानी पीता है। परिवार के हिसाब से यह खर्च लगभग 300-400 रुपये प्रति परिवार हो जाता है। क्या यह परिवार की आर्थिकी को प्रभावित नहीं करता? क्या किसी गरीब व्यक्ति के लिए खरीद कर पानी पीना संभव है? जानकारी के अनुसार भारत में पैकेज्ड पानी का चलन 1960 के दशक में शुरू हुआ। कुएं, तालाब, बावड़ी और प्याऊ आदि पर उपलब्ध जल में सभी का अधिकार होता था लेकिन धीरे-धीरे औद्योगीकरण एवं भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रदूषणों से ये जल स्रोत प्रदूषित होने लगे। प्याऊ खत्म कर दी गई और विज्ञापनों के माध्यम से बोतल बंद पानी पीने वालों को ही स्वस्थ और सभ्य दिखाया जाने लगा। प्रश्न यह है कि जब जल पर मानव सहित सभी जीवधारियों का अधिकार है तो उसे भूगर्भ से निकालकर, नदी- झरनों से लेकर व्यावसायिक प्रयोग के लिए कुछ कंपनियां अथवा लोग कैसे दोहन कर सकते हैं? देश के अनेक हिस्सों में अवैध रूप से नदियों, झरनों और भूगर्भ से जल निकालकर खुलेआम बेचा जा रहा है। नदियां और झरनें सूख रहे हैं। उनके बहाव क्षेत्र में रहने वाले लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ये लोग आवश्यकता के लिए पानी खरीदने को मजबूर हैं। क्या यह इन लोगों के जलाधिकार का हनन नहीं है? क्या व्यवसाय के लिए दोहन कर रहे लोग इस जल के बदले किसी को कोई कीमत दे रहे हैं? देश के कई हिस्सों में और विशेष रूप से महानगरों व पर्वतीय क्षेत्रों में शासन- प्रशासन की मिलीभगत से जल माफिया पनप रहे हैं। नहर, बांध एवं पाइपलाइन से स्थानांतरित किए जाने वाले जल का बड़ा हिस्सा लीकेज के कारण बर्बाद होता है। विभिन्न स्थानों पर घरों में सप्लाई हेतु बिछाई गई पाइपलाइन जर्जर हैं। कई स्थानों पर उन्हें अवैध रूप से तोड़कर पानी लिया जाता है और बाकी व्यर्थ बहता रहता है। इसकी निगरानी हेतु कोई व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती। क्या यह जिन्हें जल नहीं मिल पा रहा है और पानी के लिए सरकार को पैसा भी दे रहे हैं उनके जलाधिकार का हनन नहीं है? 23 मार्च 2026 को छपा एक समाचार बताता है कि भूजल के अवैध दोहन के कारण राष्ट्रीय राजधानी डे जीरो की तरफ बढ़ रही है, अर्थात् राजधानी में वर्षा जल संचयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। न ही उपचारित पानी के उपयोग को बढ़ावा मिल रहा है और न ही पानी की बर्बादी रुक रही है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भूजल का अवैध दोहन हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार राजधानी में लगभग 1250 मिलियन गैलन पानी की प्रतिदिन आवश्यकता है। इसकी तुलना में केवल 1000 मिलियन गैलन पानी ही उपलब्ध है। जितना उपलब्ध है उसमें से भी लगभग आधा चोरी या रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है जबकि समय-समय पर पाइप लाइन की मरम्मत एवं रखरखाव के लिए करोड़ों रुपया आवंटित किया जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व के कई शहर डे जीरो की स्थिति में पहुंच सकते हैं। जिसमें भारत के दिल्ली, जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद व बेंगलूर जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। चिंताजनक यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी जैसे स्थान पर वर्षा जल संचयन की विभिन्न योजनाएं होने पर भी उचित व्यवस्था न होने के कारण प्रतिवर्ष वर्षा जल का लगभग 85 प्रतिशत नालों में बेकार बह जाता है। क्या इस प्रकार की स्थिति जन-जन के जलाधिकार हेतु एक बड़ी समस्या नहीं है? नदियां सिंचाई पेयजल एवं औद्योगिक आपूर्ति की एक बड़ी स्रोत हैं। देश की छोटी बड़ी कई नदियां भयानक रूप से प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। कई नदियों में अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट एवं सीवेज खुलेआम बहाया जा रहा है। कई नदियों पर बांध बना दिए गए हैं, जिससे नदी को उसके जीवन के लिए बहाव हेतु जल ही नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में नदी का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। नदियां दम तोड़ रही हैं। इन नदियों के आसपास रहने वाले लोग विस्थापन को मजबूर हैं। नदियों को जोड़ने से सभी को पेयजल की सुनिश्चितता संभव है। चिंताजनक है कि विगत दिनों जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताजा रिपोर्ट में नदी जोड़ो परियोजना के