TMC में बढ़ी कलह? भाजपा का दावा- 60 विधायक नाराज, ममता-अभिषेक से बना रहे दूरी..

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी All India Trinamool Congress के भीतर कथित असंतोष को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता Shehzad Poonawalla ने दावा किया है कि पार्टी के भीतर बड़े स्तर पर नाराजगी बढ़ रही है और कई नेता वर्तमान नेतृत्व से दूरी बना रहे हैं। पूनावाला ने आरोप लगाया कि करीब 60 विधायक खुद को “असली टीएमसी” बता रहे हैं और Mamata Banerjee तथा Abhishek Banerjee के नेतृत्व से असहज हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में परिवारवाद हावी हो गया है, जिससे संगठन के भीतर असंतोष बढ़ रहा है। भाजपा प्रवक्ता ने यह भी दावा किया कि कुछ सांसद भी पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं और संगठन के भीतर मतभेद लगातार गहराते जा रहे हैं। उनके अनुसार यह स्थिति तृणमूल कांग्रेस के अंदर नेतृत्व संकट की ओर इशारा करती है। विवाद उस समय और बढ़ गया जब सोशल मीडिया पर एक कथित सूची वायरल हुई। इस सूची में दावा किया गया कि टीएमसी के 20 सांसदों का एक समूह केंद्र की एनडीए सरकार को समर्थन देने की तैयारी कर रहा है। सूची में पार्टी के कई वरिष्ठ और नए सांसदों के नाम होने की बात कही गई। हालांकि टीएमसी ने इन दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। पार्टी नेता Kirti Azad ने वायरल सूची को फर्जी और मनगढ़ंत बताया। उन्होंने कहा कि सूची में शामिल कई सांसदों ने ऐसे किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से साफ इनकार किया है। कीर्ति आजाद ने भाजपा पर “ऑपरेशन लोटस” के जरिए पार्टी में फूट डालने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस एकजुट है और विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम का कोई असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल भाजपा के आरोपों और टीएमसी के खंडन के बीच पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। पार्टी के भीतर वास्तविक स्थिति को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर जारी है।
TMC बगावत पर भड़कीं सागरिका घोष, बोलीं- अमित शाह का एक फोन आते ही खत्म हो जाती है नैतिकता

नई दिल्ली । तृणमूल कांग्रेस (TMC) में जारी राजनीतिक उठापटक के बीच Sagarika Ghose ने पार्टी से बगावत करने वाले नेताओं और सांसदों पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लंबा पोस्ट लिखकर दल-बदल की राजनीति को शर्मनाक बताते हुए इसकी नैतिकता पर सवाल खड़े किए। सागरिका घोष ने कहा कि वह राजनीति में इसलिए आईं क्योंकि उनका मानना है कि Narendra Modi के नेतृत्व वाली बीजेपी देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर रही है। उन्होंने कहा कि संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए विपक्ष की लड़ाई में उनका विश्वास है। टीएमसी सांसद ने Mamata Banerjee के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए कहा कि उनका भरोसा ममता बनर्जी पर पहले भी था और आगे भी रहेगा। उन्होंने ममता को साहस और मूल्य आधारित राजनीति का प्रतीक बताया। सागरिका घोष ने पार्टी छोड़ने वाले नेताओं पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि किसी की प्रतिबद्धता चुनाव परिणामों के साथ बदल जाती है, तो फिर उसकी प्रतिबद्धता कभी वास्तविक थी ही नहीं। उन्होंने कहा कि किसी नेता और पार्टी के नाम पर चुनाव जीतने के बाद मुश्किल समय में उनका साथ छोड़ देना समझ से परे है। अपने बयान में उन्होंने सीधे तौर पर Amit Shah पर निशाना साधते हुए कहा कि क्या एक फोन कॉल आते ही सारी नैतिकता खत्म हो जाती है? उन्होंने इसे लोकतांत्रिक राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण बताया। यह बयान ऐसे समय आया है जब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के कई नेताओं और सांसदों के अलग रुख अपनाने की खबरों ने राज्य की राजनीति को गरमा दिया है। बागी खेमे के कुछ नेताओं ने दावा किया है कि कई सांसद एनडीए को समर्थन देने के पक्ष में हैं, जिससे राज्य की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
"जमीन पर काम करने वालों को सीख न दें", महुआ पर काकोली घोष का तीखा हमला

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में चल रही अंदरूनी कलह अब सार्वजनिक रूप से सामने आने लगी है। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने वरिष्ठ सांसद महुआ मोइत्रा पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें राजनीति से ज्यादा प्रचार में रुचि रखने वाली नेता बताया है। उनके बयान ने टीएमसी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर उठ रहे सवालों को और तेज कर दिया है। एक समाचार चैनल से बातचीत के दौरान काकोली घोष ने कहा कि जब ममता बनर्जी ने राजनीति में अपनी पहचान बनानी शुरू की थी, तब आज खुद को उनका करीबी बताने वाले कई चेहरे राजनीतिक परिदृश्य में मौजूद भी नहीं थे। उन्होंने बिना नाम लिए महुआ मोइत्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि विदेश में बैठकर ट्वीट करने वाले लोग वास्तविक राजनीति नहीं करते, बल्कि केवल मीडिया का ध्यान आकर्षित करने और अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बयानबाजी करते हैं। काकोली घोष की यह प्रतिक्रिया उस समय सामने आई है जब हाल ही में महुआ मोइत्रा ने पार्टी के बागी सांसदों को “लालची”, “मतलबी” और “गद्दार” करार दिया था। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई है। घोष ने कहा कि कुछ नेता लगातार ऐसे बयान देते हैं, जिनसे मीडिया में उनकी चर्चा बनी रहे, लेकिन इससे पार्टी संगठन को नुकसान पहुंचता है। इस बीच बागी खेमे ने दावा किया है कि उसके साथ करीब 20 सांसदों का समर्थन मौजूद है। काकोली घोष ने स्वयं को भी इस गुट का हिस्सा बताया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसदों ने हाल के दिनों में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं के साथ भी बैठकें की हैं, जिससे टीएमसी नेतृत्व की चिंताएं बढ़ गई हैं। उधर, पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के इस्तीफे ने भी टीएमसी में असंतोष की खबरों को बल दिया है। बताया जा रहा है कि रॉय कई सांसदों के साथ केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर पहुंचे थे, जहां महत्वपूर्ण राजनीतिक चर्चा हुई। इस बैठक में तृणमूल कांग्रेस के कई लोकसभा सांसदों की मौजूदगी की खबरें सामने आई हैं। दिल्ली में चल रहे इस राजनीतिक घटनाक्रम के समानांतर पश्चिम बंगाल में भी पार्टी के भीतर उथल-पुथल जारी है। रिपोर्टों के अनुसार, विधानसभा चुनाव के बाद कई विधायक पार्टी नेतृत्व से नाराज बताए जा रहे हैं। बागी गुट का दावा है कि बड़ी संख्या में विधायकों ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग रुख अपनाया है और संगठनात्मक बदलाव की मांग कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि टीएमसी के भीतर यह असंतोष और बढ़ता है, तो इसका असर आगामी राजनीतिक रणनीतियों और विपक्षी गठबंधन की एकजुटता पर भी पड़ सकता है। फिलहाल ममता बनर्जी विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिशों में जुटी हैं, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रहे विरोध के स्वर उनके लिए नई चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।
बंगाल में TMC के भीतर बढ़ी हलचल! सांसदों की दिल्ली बैठक से तेज हुई अटकलें, ममता के सामने नई चुनौती?

कोलकाता। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों हलचल तेज है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के कुछ सांसदों की दिल्ली में भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर हुई मुलाकात ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चाओं को जन्म दे दिया है। हालांकि पार्टी की ओर से इसे सामान्य शिष्टाचार भेंट बताया गया, लेकिन घटनाक्रम को लेकर कई तरह के राजनीतिक कयास लगाए जा रहे हैं। इस बैठक में राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दे चुके सुखेंदु शेखर रॉय की मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा का विषय रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हाल के दिनों में पार्टी के भीतर उभर रहे असंतोष के संकेत अब खुलकर सामने आने लगे हैं। दिल्ली में जुटे कई सांसददिल्ली में हुई इस मुलाकात में TMC के सांसद जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन समेत कई नेता शामिल बताए गए। वहीं शाम को सांसद शताब्दी रॉय के आवास पर भी एक बैठक हुई, जिसमें विभिन्न राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की खबरें सामने आईं। इसी बीच TMC सांसद काकोली घोष ने दावा किया कि प्रदेश के विकास से जुड़े मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है और इसी उद्देश्य से संवाद किया जा रहा है। इस्तीफे के बाद सुखेंदु शेखर रॉय के आरोपराज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा देने के बाद सुखेंदु शेखर रॉय ने पार्टी नेतृत्व पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने संगठन में भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा को लेकर चिंता और आंतरिक लोकतंत्र की कमी जैसे मुद्दों का जिक्र किया था। उनके बयान को पार्टी के अंदरूनी असंतोष का संकेत माना गया। कई महीनों से चल रही है नाराजगी की चर्चाराजनीतिक सूत्रों के अनुसार, TMC के भीतर पिछले कुछ समय से असंतोष की चर्चा लगातार होती रही है। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से ऐसे दावों को खारिज किया जाता रहा है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने इन चर्चाओं को फिर हवा दे दी है। हाल के दिनों में पार्टी की बैठकों में कई नेताओं की अनुपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी रही है। इससे संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों को लेकर राजनीतिक अटकलें और तेज हो गई हैं। ऋतब्रत बंद्योपाध्याय की भूमिका पर नजरविपक्ष के नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय का नाम भी इस पूरे घटनाक्रम में प्रमुखता से सामने आ रहा है। उन्होंने दावा किया है कि TMC के कई नेता उनके संपर्क में हैं और पार्टी के भीतर चल रही हलचलों को लेकर लगातार संवाद जारी है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विपक्ष इसे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत के रूप में पेश कर रहा है। फिरहाद हाकिम की मुलाकात ने बढ़ाई चर्चामुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी माने जाने वाले फिरहाद हाकिम की विपक्षी नेताओं से हुई मुलाकात ने भी राजनीतिक हलकों में चर्चा को और तेज कर दिया है। इसे लेकर अलग-अलग राजनीतिक अर्थ निकाले जा रहे हैं। कुछ इसे संवाद की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे पार्टी के भीतर की स्थिति को समझने की कवायद बता रहे हैं। ममता बनर्जी की चुप्पी भी बनी चर्चा का विषयदिल्ली दौरे के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मीडिया से अपेक्षाकृत दूरी बनाए रखी। आमतौर पर राष्ट्रीय राजनीति और केंद्र सरकार के मुद्दों पर मुखर रहने वाली ममता की इस बार की चुप्पी को भी राजनीतिक विश्लेषक अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। आगे क्या?फिलहाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने यह संकेत जरूर दिया है कि TMC के भीतर कुछ महत्वपूर्ण राजनीतिक गतिविधियां चल रही हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी नेतृत्व इन चुनौतियों से कैसे निपटता है और क्या संगठन में किसी बड़े बदलाव की स्थिति बनती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब TMC के अगले कदम और संभावित रणनीति पर टिकी हुई है, क्योंकि बंगाल की राजनीति में होने वाला हर बदलाव राज्य के भविष्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
बंगाल में BJP ऑफिस पर बुलडोजर कार्रवाई, सामने आई जमीन विवाद की कहानी

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में नई राजनीतिक परिस्थितियों के बीच प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे अतिक्रमण हटाओ अभियान के दौरान उत्तर दिनाजपुर जिले के हेमताबाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के स्थानीय कार्यालय से जुड़ा एक दिलचस्प मामला सामने आया है। सरकारी जमीन की मापी के दौरान पता चला कि पार्टी कार्यालय का एक हिस्सा निर्धारित सरकारी भूमि के दायरे में आ रहा है। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं ने खुद आगे बढ़कर उस हिस्से को हटाने का फैसला किया। मामले की शुरुआत तब हुई जब हेमताबाद के ब्लॉक विकास अधिकारी (BDO) Biswajit Dutta ने सरकारी जमीनों पर बने अवैध निर्माणों को हटाने का निर्देश जारी किया। प्रशासन की ओर से इलाके में मापी कराई गई, जिसमें शालबागान के पास राज्य राजमार्ग किनारे स्थित भाजपा ब्लॉक कार्यालय का बरामदा सरकारी जमीन पर पाया गया। प्रशासन के आने से पहले खुद शुरू कर दी कार्रवाईजांच रिपोर्ट सामने आते ही स्थानीय भाजपा नेताओं ने प्रशासन की ओर से बुलडोजर चलाए जाने का इंतजार नहीं किया। भाजपा के प्रखंड अध्यक्ष Biplab Sarkar की मौजूदगी में कार्यकर्ता हथौड़े और अन्य उपकरण लेकर कार्यालय पहुंचे और अवैध हिस्से को स्वयं तोड़ना शुरू कर दिया। कुछ ही समय में कार्यालय के उस हिस्से को पूरी तरह हटा दिया गया, जो सरकारी भूमि की सीमा के भीतर पाया गया था। यह कदम स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया, क्योंकि आमतौर पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के दौरान विरोध, धरना या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिलते हैं। सड़क चौड़ीकरण अभियान से जुड़ा मामलाप्रशासन के अनुसार, कालियागंज से दक्षिण दिनाजपुर को जोड़ने वाले राज्य राजमार्ग के दोनों ओर 15 फीट के दायरे में आने वाले सभी अवैध निर्माणों को हटाने का अभियान चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य सड़क चौड़ीकरण और यातायात व्यवस्था को बेहतर बनाना है।भाजपा नेता बिप्लव सरकार ने कहा कि जब पार्टी कार्यालय का बरामदा भी चिन्हित क्षेत्र में पाया गया तो कानून का सम्मान करते हुए उसे हटाने का निर्णय लिया गया। उन्होंने यह भी मांग की कि अभियान से प्रभावित छोटे व्यापारियों और दुकानदारों के पुनर्वास की व्यवस्था की जानी चाहिए। दुकानदारों ने भी दिखाई पहलभाजपा कार्यालय पर हुई कार्रवाई का असर आसपास के व्यापारियों पर भी देखने को मिला। रायगंज-बालुरघाट राज्य राजमार्ग के किनारे स्थित कई दुकानदारों ने प्रशासनिक कार्रवाई का इंतजार किए बिना अपने अतिक्रमण वाले हिस्सों को स्वयं हटाना शुरू कर दिया। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि अभियान शुरू होने से पहले लगातार मुनादी, लाउडस्पीकर घोषणाओं और नोटिसों के माध्यम से लोगों को सरकारी भूमि खाली करने के लिए आगाह किया गया था। BDO बिस्वजीत दत्ता ने स्पष्ट किया कि अब आधिकारिक बेदखली अभियान शुरू हो चुका है और भविष्य में सरकारी जमीन पर किसी भी तरह का अवैध निर्माण मिलने पर प्रशासन सख्त कार्रवाई करेगा।
चुनाव चिह्न विवाद के बीच TMC का सख्त संदेश, ममता बनर्जी पर सांसद का बड़ा बयान

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रहा सत्ता संघर्ष चर्चा का विषय बना हुआ है। पार्टी से निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी खेमे को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मुख्य विपक्षी दल की मान्यता दिए जाने के बाद TMC नेतृत्व और बागी गुट के बीच टकराव और तेज हो गया है। इसी बीच TMC सांसद Mahua Moitra ने बागी विधायकों पर जमकर हमला बोला है। एक इंटरव्यू में महुआ मोइत्रा ने कहा कि जिन नेताओं ने वर्षों तक Mamata Banerjee की लोकप्रियता और पार्टी के संगठनात्मक बल का लाभ उठाया, वही आज पार्टी को कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बागी नेताओं को निशाने पर लेते हुए कहा कि सत्ता में रहने की आदत पड़ चुकी है, इसलिए वे विपक्ष में संघर्ष करने के बजाय आसान रास्ता चुन रहे हैं। महुआ ने दो टूक कहा कि यदि किसी नेता को पार्टी छोड़नी है तो वह खुलकर जाए, लेकिन खुद को तृणमूल कांग्रेस बताने का अधिकार नहीं है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बागी नेता चाहें तो अपनी अलग पार्टी बना लें, लेकिन TMC के नाम और पहचान का इस्तेमाल न करें। भाजपा पर गंभीर आरोमहुआ मोइत्रा ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भारतीय जनता पार्टी की भूमिका होने का आरोप भी लगाया। उनका कहना है कि भाजपा योजनाबद्ध तरीके से TMC को तोड़ने की कोशिश कर रही है। उन्होंने पश्चिम बंगाल के नेता Suvendu Adhikari का नाम लेते हुए कहा कि वे कभी तृणमूल का हिस्सा रहे हैं और पार्टी के नेताओं की राजनीतिक कमजोरियों से भली-भांति परिचित हैं। इसी जानकारी का इस्तेमाल कर भाजपा नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है। महुआ ने दावा किया कि कुछ नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर पक्ष बदलने के लिए मजबूर किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ विधायकों और नेताओं को गिरफ्तारी की धमकियां दी गईं, जिसके चलते वे बागी खेमे के साथ चले गए। “असली TMC ममता के साथ”बागी गुट के बढ़ते प्रभाव और चुनाव चिह्न पर संभावित विवाद के सवाल पर महुआ मोइत्रा ने स्पष्ट कहा कि असली तृणमूल कांग्रेस आज भी ममता बनर्जी और उनके साथ खड़े नेताओं के पास ही है। उन्होंने कहा कि पार्टी का मूल संगठन, विचारधारा और जनाधार ममता बनर्जी के नेतृत्व में कायम है। महुआ ने यह भी कहा कि यदि कभी ऐसी स्थिति आती है कि पार्टी को अपना मौजूदा चुनाव चिह्न छोड़ना पड़े, तब भी उन्हें कोई चिंता नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर नई राजनीतिक राह चुनी थी, तब उन्होंने अपनी पहचान और चुनावी प्रतीक खुद तैयार किया था। नया सिंबल बनाकर भी जीत सकती हैं ममतामहुआ मोइत्रा ने विश्वास जताया कि ममता बनर्जी का राजनीतिक कद किसी चुनाव चिह्न का मोहताज नहीं है। उन्होंने कहा कि जिस नेता ने नया दल बनाकर और नया प्रतीक लेकर पश्चिम बंगाल में तीन बार सरकार बनाई, वह भविष्य में भी नया चुनावी चिह्न बनाकर जनता का समर्थन हासिल कर सकती हैं। उनके अनुसार, चुनाव चिह्न या पार्टी का नाम बदल सकता है, लेकिन जनता के बीच ममता बनर्जी की पहचान और राजनीतिक प्रभाव को कोई नहीं छीन सकता।
टीएमसी पर हमले को लेकर सियासत गरम, भाजपा-विपक्ष में तकरार

नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी नेताओं पर हुए कथित हमलों को लेकर सियासी माहौल गरमा गया है। इस घटना के बाद सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) और विपक्षी दलों के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। टीएमसी की ओर से दावा किया जा रहा है कि उसके नेताओं पर हमले लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हमला हैं, जबकि विपक्षी दलों का कहना है कि यह घटनाएं जनता में बढ़ते आक्रोश का परिणाम हैं। इसी बीच विभिन्न दलों के नेताओं ने अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देकर राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है। कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने पश्चिम बंगाल की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि राज्य में हालात चिंताजनक हैं और वहां तक कि सांसद भी सुरक्षित नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य में भय का माहौल बनाया गया है और आम जनता भी असुरक्षित महसूस कर रही है। वहीं जेडीयू नेता हरि नारायण सिंह ने पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य में लंबे समय से तनावपूर्ण माहौल रहा है। उन्होंने कहा कि हालिया घटनाएं अचानक नहीं हैं, बल्कि यह जनता की नाराजगी का परिणाम हैं। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि पार्टी के भीतर भी असंतोष और टूट की स्थिति बन रही है। दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने इन घटनाओं को जनता की प्रतिक्रिया बताते हुए विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है। भाजपा नेता टी.आर. श्रीनिवास ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि जब पहले हिंसा की घटनाएं हुईं, तब वही नेता चुप थे, और अब स्थिति बदलने पर सवाल उठा रहे हैं। उन्होंने इसे राजनीतिक अवसरवाद करार दिया। इसी मुद्दे पर जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि टीएमसी के भीतर असंतोष और इस्तीफों की खबरें यह संकेत देती हैं कि पार्टी आंतरिक चुनौतियों से जूझ रही है। पूरा विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे राज्य में कानून-व्यवस्था और लोकतांत्रिक माहौल से जोड़कर देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर और राजनीतिक टकराव बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
चुनावी झटकों के बाद मैदान में उतरे अभिषेक बनर्जी, हिंसा प्रभावित कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर साधेंगे संगठन

नई दिल्ली । पश्चिम बंगाल की राजनीति में विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद एक बार फिर हलचल तेज होती दिखाई दे रही है। चुनावी झटकों और लगातार बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी अब दोबारा सक्रिय राजनीति में उतरते नजर आ रहे हैं। लंबे समय तक सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाए रखने के बाद उनका मैदान में लौटना राज्य की राजनीति में नए संकेतों के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल सामान्य जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं बल्कि पार्टी संगठन और कैडर को फिर से मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद से अभिषेक बनर्जी की सार्वजनिक गतिविधियां काफी सीमित हो गई थीं। वह मुख्य रूप से सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी बात रख रहे थे, लेकिन अब उन्होंने सीधे पार्टी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच जाने का निर्णय लिया है। उनके कार्यक्रमों का केंद्र वे कार्यकर्ता बताए जा रहे हैं, जो चुनाव बाद हिंसा की घटनाओं से प्रभावित हुए हैं। इसे तृणमूल कांग्रेस की ओर से संगठनात्मक एकजुटता और राजनीतिक संदेश दोनों के रूप में देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि हाल के घटनाक्रमों ने अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक स्थिति को प्रभावित किया है। चुनाव के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव, संपत्तियों से जुड़े प्रशासनिक नोटिस और एक चुनावी भाषण को लेकर दर्ज मामला लगातार चर्चा में बने हुए हैं। हालांकि अदालत से उन्हें अस्थायी राहत मिली है, लेकिन इन घटनाओं ने राजनीतिक वातावरण को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच जाकर संवाद स्थापित करना तृणमूल कांग्रेस के लिए संगठनात्मक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है। चुनावी नतीजों के बाद पार्टी के भीतर भी कई स्तरों पर असंतोष और पुनर्समीक्षा की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में वरिष्ठ नेतृत्व की सक्रियता कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने और संगठन को एकजुट रखने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। राज्य की राजनीति में चुनाव बाद हिंसा लंबे समय से बड़ा मुद्दा रही है और विपक्ष लगातार इसे लेकर राज्य सरकार पर सवाल उठाता रहा है। अब जब तृणमूल कांग्रेस नेतृत्व स्वयं प्रभावित कार्यकर्ताओं से मिलने की रणनीति अपना रहा है, तो यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश भी मानी जा रही है कि पार्टी अपने समर्थकों के साथ खड़ी है। इसके साथ ही कानूनी चुनौतियां भी अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चा का विषय बनी हुई हैं। एक चुनावी बयान को लेकर उनके खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप और तेज हो गए हैं। अदालत ने फिलहाल राहत जरूर दी है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीतिक गर्मी को और बढ़ा दिया है। पश्चिम बंगाल में आने वाले समय में राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। तृणमूल कांग्रेस जहां संगठन को मजबूत करने और कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने में जुटी है, वहीं विपक्ष भी सरकार और पार्टी नेतृत्व पर लगातार हमलावर बना हुआ है। ऐसे माहौल में अभिषेक बनर्जी की सक्रियता राज्य की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हलचल के बीच TMC नेता दीपांकर भट्टाचार्य को लेकर गंभीर आरोप, जांच की मांग तेज

नई दिल्ली । बंगाल से आई भ्रष्टाचार की एक तस्वीर की चर्चा पूरे देश में हो रही है. उत्तर 24 परगना ज़िले में एक खेत में नोट से भरी हुई बोरियां बरामद हुई हैं. पुलिस को बोरियों में मिले ये नोट गिनने में कई घंटे लग गए. जब नोटों की गिनती ख़त्म हुई तो पता चला कि कुल मिलाकर 2 करोड़ 24 लाख रुपये खेत में गाड़े गए थे. ये नोट बदुरिया नगरपालिका के चेयरमैन और TMC नेता दीपांकर भट्टाचार्य के हैं. TMC नेता दीपांकर भट्टाचार्य का भ्रष्टाचार उजागरदीपांकर भट्टाचार्य वही नेता है जिसको 3 दिन पहले भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था. गिरफ़्तारी के समय भी दीपांकर के पास से 80 लाख रुपये बरामद हुए थे. इस तरह पुलिस ने अभी तक दीपांकर की काली कमाई के 3 करोड़ 4 लाख रुपये ज़ब्त कर लिए हैं. जनसेवा के नाम पर राजनीति में आने वाले दीपांकर भट्टाचार्य ने दोनों हाथों से जनता को लूटा और नोटों की बोरी खेत में दबा दी. ज़ी न्यूज की टीम ने बदुरिया के उस खेत में जाकर पता लगाया कि पैसे किस तरह छिपाकर रखे गए थे. कैसे पुलिस को बोरियों में छिपाकर रखे गए पैसे का पता चला. आख़िर दीपांकर भट्टाचार्य के पास इतने पैसे कहां से आए. एक समय में जो दीपांकर मज़दूरी का काम करता था, वो करोड़ों का मालिक कैसे बन गया. कहते हैं कि पैसे पेड़ पर नहीं उगते लेकिन बंगाल में पैसे इन दिनों खेत से निकल रहे हैं और ये पैसे भ्रष्टाचार के हैं. खेत में दबी मिली नोटों की बोरीउत्तर 24 परगना के बदुरिया में जूट का यही वो खेत है जहां नोटों से भरी बोरियां और ट्रॉली बैग मिले थे. कोई सोच भी नहीं सकता था कि लगभग 7 फीट लंबे जूट के पौधों के बीच पैसे से भरी बोरियां और बैग छिपाए गए होंगे. स्थानीय लोगों के मुताबिक़ जूट का ये खेत शमीम नाम के व्यक्ति का है. शमीम को बदुरिया नगरपालिका के अध्यक्ष दीपांकर भट्टाचार्य का दाहिना हाथ बताया जाता है. एक व्यक्ति जब घास काटने के लिए खेत में आया तो उसे ये गड्ढे दिखाई दिए. फिर उसने एक स्थानीय नेता के जरिए पुलिस को इसकी जानकारी दी. इसी सूचना के आधार पर आधे घंटे में पुलिस खेत में पहुंच गई. कुछ घंटों की जांच-पड़ताल के बाद नोटों से भरी ये बोरियां मिलीं. मजदूर से शुरू करके बना भ्रष्ट नेतास्थानीय लोगों के मुताबिक, दीपांकर का शुरुआती जीवन बेहद साधारण था. उसके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. शुरुआत में उसने दिहाड़ी मज़दूर का भी काम किया. बाद में परिवार की मदद से एक कार खरीदी. उसी गाड़ी से वो सवारी ढोने का काम करने लगा.वर्ष 2010 के करीब राजनीति में एंट्री के बाद उसकी ज़िंदगी बदल गई. दीपांकर ने राजनीति की शुरुआत कांग्रेस से की. लेकिन 2011 में ममता बनर्जी के मुख्यमंत्री बनने के बाद वो TMC में शामिल हो गया. यहीं से उसकी ज़िंदगी बदल गई. पहले वो पार्षद बना और उसके बाद बदुरिया नगरपालिका का चेयरमैन भी बन गया. आरोप है कि वो सरकारी योजनाओं के नाम पर लोगों से वसूली करता था. इन्हीं पैसों को उसने खेत में छिपा रखा था. योजनाओं के नाम पर लेता था रिश्वतरिपोर्टर अमित भारद्वाज से बातचीत में एक व्यक्ति ने बताया कि लोगों से आवास योजना के नाम पर दीपांकर रिश्वत लेता था. खुद उस व्यक्ति ने 40 हज़ार रुपये दिए. लेकिन सरकार बदलते ही दीपांकर भट्टाचार्य के बुरे दिन शुरू हो गए. उसके खिलाफ शिकायत की गई कि उसने सरकारी तिरपाल लोगों के बीच बांटने के बदले अपने पास रख लिए. इसी सिलसिले में पुलिस ने उसके गोदाम पर छापा मारा तो 4,000 सरकारी तिरपाल ज़ब्त हुए. बाद में उसके कंप्यूटर सेंटर से 80 लाख रुपये भी मिले. इसी के बाद 25 मई को पुलिस ने दीपांकर भट्टाचार्य को गिरफ़्तार किया. खेत में दबे उसके पैसे का कभी सुराग नहीं मिलता, अगर अनजाने में स्थानीय व्यक्ति की नज़र नहीं गई होती. आलीशान घर में रहता था भ्रष्ट दीपांकर नोटों से भरी बोरियां मिलने के बाद बदुरिया में TMC नेता दीपांकर भट्टाचार्य के ख़िलाफ़ जांच का दायरा बढ़ता ही जा रहा है. दीपांकर के जिस आलीशान घर पर दिन में ताला लगा हुआ था, वहां शाम होते-होते पुलिस पहुंच गई. CRPF की टीम के साथ स्थानीय पुलिस ने दीपांकर के घर की जांच की. जिस नेता ने खेत में पैसा छिपा रखा था, उसने घर में भी अपने भ्रष्टाचार का कोई न कोई निशान ज़रूर छोड़ा होगा. घर में तलाशी पूरी होने के बाद ही सच्चाई सामने आ पाएगी.
बंगाल में TMC में अंदरूनी संकट गहराया, दो और पार्षदों ने छोड़े पद, नेतृत्व पर उठाए सवाल

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है। अब पार्टी के मजबूत माने जाने वाले शहरी निकायों और नगर निगमों में भी बगावत के सुर सुनाई देने लगे हैं। ताजा घटनाक्रम में कोलकाता नगर निगम के दो वरिष्ठ पार्षदों ने अपने महत्वपूर्ण पदों से इस्तीफा दे दिया है। बुधवार को टीएमसी नेता सुशांत घोष ने बरो-12 चेयरमैन पद से इस्तीफा दे दिया, जबकि अरूप चक्रवर्ती ने नगर निगम की अकाउंट्स कमेटी के चेयरमैन पद छोड़ने का ऐलान किया। हालांकि दोनों नेताओं ने फिलहाल पार्षद पद नहीं छोड़ा है। नेतृत्व के खिलाफ खुलकर नाराजगीइस्तीफे के साथ दोनों नेताओं ने पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि चुनावी हार को स्वीकार करना जरूरी है, क्योंकि हार मानने से इनकार करने पर पिछली जीतों का महत्व भी खत्म हो जाता है। राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को पार्टी नेतृत्व पर सीधा हमला माना जा रहा है। दोनों नेताओं का आरोप है कि चुनाव परिणाम आने के बाद पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री आम कार्यकर्ताओं और पार्षदों से दूरी बना चुके हैं। चक्रवर्ती ने कहा कि लंबे समय तक कुछ प्रभावशाली नेताओं ने मुख्यमंत्री तक पहुंच को भी सीमित कर दिया था और अब हार के बाद वही नेता सार्वजनिक जीवन से गायब हैं। भाजपा सरकार की तारीफ से बढ़ीं अटकलेसुशांत घोष ने अपने घर के बाहर हुए जानलेवा हमले का जिक्र करते हुए पुलिस जांच पर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। भवानीपुर से शुरू हुआ असंतोषटीएमसी के भीतर विरोध का यह सिलसिला हाल ही में तब शुरू हुआ था, जब पार्षद देबोलीना बिस्वास ने केएमसी के बरो-9 अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया था। भवानीपुर विधानसभा सीट पर पार्टी के खराब प्रदर्शन के बाद यह नाराजगी सामने आई थी। भवानीपुर को लंबे समय तक टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। पार्टी के भीतर बढ़ रहा संकटराज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद टीएमसी में लगातार अंदरूनी खींचतान बढ़ती जा रही है। हाल ही में वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने भी पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था। कई विधायक, सांसद और पार्षद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बैठकों से दूरी बनाए हुए हैं और संगठन की कार्यप्रणाली पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, सत्ता परिवर्तन के बाद अब तक 60 से ज्यादा टीएमसी पार्षद विभिन्न नगरपालिकाओं और नगर निगमों में अपने पद छोड़ चुके हैं या संगठनात्मक गतिविधियों से अलग हो गए हैं। कई पार्षदों ने कार्यालय आना भी बंद कर दिया है, जिससे नगर निकायों के कामकाज पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक दशक तक नगरपालिकाएं और नगर निगम टीएमसी की सबसे मजबूत राजनीतिक ताकत रहे, लेकिन अब वहीं पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनते दिखाई दे रहे हैं।