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सऊदी प्रिंस सलमान को ईरान जंग से क्या फायदा: ट्रंप से कहा- युद्ध जारी रखें, अमेरिका फंस गया लंबी लड़ाई में?

वॉशिंगटन । सऊदी अरब के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने हालिया बातचीत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ईरान के खिलाफ युद्ध जारी रखने का आग्रह किया है। सूत्रों के अनुसार, युवराज का मानना है कि यह अमेरिका-इस्राइल के सैन्य अभियान के माध्यम से पश्चिम एशिया को फिर से आकार देने का एक ऐतिहासिक अवसर है। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध जारी रखने पर जोर पिछले सप्ताह हुई कई वार्ताओं में युवराज मोहम्मद ने राष्ट्रपति ट्रंप को स्पष्ट रूप से बताया है कि ईरान की कट्टरपंथी सरकार को समाप्त करने के लिए दबाव बनाना आवश्यक है। बातचीत से जुड़े लोगों का कहना है कि युवराज का तर्क है कि ईरान खाड़ी क्षेत्र के लिए एक दीर्घकालिक खतरा है, जिसे केवल वहां की वर्तमान सरकार को हटाकर ही समाप्त किया जा सकता है। इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी ईरान को एक गंभीर खतरे के रूप में देखते हैं। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इस्राइल शायद एक ऐसे ईरान को पसंद करेगा जो आंतरिक कलह में इतना उलझा हो कि वह इस्राइल के लिए खतरा न बने। वहीं, सऊदी अरब एक असफल ईरानी राज्य को अपने लिए एक गंभीर और सीधा सुरक्षा खतरा मानता है। सऊदी अरब को किस बात का डर? विश्लेषकों का कहना है कि “भले ही युवराज मोहम्मद युद्ध से बचना चाहते हों, लेकिन उन्हें चिंता है कि यदि राष्ट्रपति ट्रंप अब पीछे हटते हैं, तो सऊदी अरब और शेष पश्चिम एशिया को एक उग्र और क्रोधित ईरान का अकेले सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में ईरान जलडमरूमध्य को समय-समय पर बंद करने की शक्ति भी हासिल कर सकता है। हालांकि सऊदी अरब जलडमरूमध्य के बंद होने से निपटने के लिए अन्य खाड़ी देशों की तुलना में बेहतर स्थिति में है, लेकिन यदि जलमार्ग जल्द ही नहीं खोला गया तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। अमेरिका फंस गया लंबी लड़ाई में? सऊदी और अमेरिकी सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो ईरान सऊदी तेल प्रतिष्ठानों पर और भी विनाशकारी हमले कर सकता है। साथ ही, संयुक्त राज्य अमेरिका एक कभी न खत्म होने वाले युद्ध में फंस सकता है। बदल रहा ट्रंप का रुख? राष्ट्रपति ट्रंप का रुख सार्वजनिक तौर पर युद्ध को लेकर बदलता रहा है। कभी वे युद्ध के जल्द खत्म होने का संकेत देते हैं, तो कभी इसे और भड़कता हुआ बताते हैं। हाल ही में राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि उनके प्रशासन और ईरान के बीच हमारे दुश्मनी के पूर्ण और अंतिम समाधान के संबंध में उत्पादक बातचीत हुई है, हालांकि ईरान ने बातचीत की किसी भी संभावना को खारिज कर दिया है। तेल बाजार में भारी संकट ईरान के साथ युद्ध के सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। अमेरिका-इस्राइल के हमलों के जवाब में ईरान द्वारा किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों ने पहले ही तेल बाजार में भारी व्यवधान पैदा कर दिया है। युवराज मोहम्मद के साथ बातचीत में राष्ट्रपति ट्रंप ने तेल की कीमतों और अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभाव के बारे में चिंता जताई है। अमेरिकी अधिकारियों को सूचित किए गए लोगों के अनुसार, सऊदी नेता ने उन्हें आश्वासन दिया है कि यह केवल अस्थायी है। सऊदी सरकार का खंडन सऊदी अधिकारियों ने इस विचार को सिरे से खारिज कर दिया है कि युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने युद्ध को लंबा खींचने का दबाव डाला है। सरकार के एक बयान में कहा गया है “सऊदी अरब का साम्राज्य हमेशा से इस संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थक रहा है, इससे पहले कि यह शुरू भी हुआ हो। हमारे अधिकारी ट्रंप प्रशासन के साथ निकट संपर्क में हैं और हमारी प्रतिबद्धता अपरिवर्तित है।” बयान में यह भी कहा गया है “आज हमारी मुख्य चिंता अपने लोगों और नागरिक बुनियादी ढांचे पर हो रहे दैनिक हमलों से खुद को बचाना है। ईरान ने गंभीर कूटनीतिक समाधानों के बजाय खतरनाक टकराव का रास्ता चुना है। इससे हर हितधारक को नुकसान होता है, लेकिन ईरान को सबसे ज्यादा।”

क्या होते हैं ‘श्याओकांग’ गांव? LAC के पास चीन ने बसाए सैकड़ों गांव, भारत ने भी बढ़ाई सीमा पर तैयारी

बीजिंग। भारत-चीन सीमा पर बुनियादी ढांचे की होड़ तेज होती जा रही है। चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पास सैकड़ों नए गांव बसाए हैं, जिनमें बड़ी संख्या Arunachal Pradesh की सीमा के सामने स्थित है। भारतीय सेना के उपप्रमुख (रणनीति) Rajiv Ghai ने जानकारी दी कि चीन ने LAC के आसपास 600 से अधिक गांव बसाए हैं, जिनमें से करीब 72% उत्तर-पूर्वी सीमा के पास हैं। इनमें लगभग 450 गांव सीधे अरुणाचल प्रदेश की सीमा के सामने बनाए गए हैं। क्या हैं ‘श्याओकांग’ गांव? चीन इन सीमावर्ती बस्तियों को ‘श्याओकांग’ गांव कहता है। चीनी भाषा में ‘श्याओकांग’ का अर्थ समृद्ध या खुशहाल गांव होता है। इन गांवों का निर्माण मुख्य रूप से Tibet Autonomous Region से लगने वाली भारतीय सीमा के पास पिछले करीब पांच वर्षों से किया जा रहा है। इन बस्तियों में आम तौर पर दो मंजिला आधुनिक मकान, चौड़ी सड़कें और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित की गई हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इन गांवों का इस्तेमाल दोहरे उद्देश्य से किया जा सकता है—एक ओर नागरिक आबादी को बसाने के लिए और दूसरी ओर किसी सैन्य तनाव की स्थिति में सैनिकों की तैनाती, रसद और निगरानी के लिए। इसे चीन द्वारा विवादित क्षेत्रों पर अपना दावा मजबूत करने की रणनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। पहले खाली रहे, अब बसने लगी आबादी चीन ने 2019 के बाद इन गांवों का निर्माण तेज कर दिया था, लेकिन शुरुआत में कई गांव खाली पड़े रहे। रिपोर्टों के मुताबिक 2023 से चीनी नागरिकों ने इन बस्तियों में बसना शुरू किया है। खास तौर पर अरुणाचल प्रदेश के लोहित घाटी और Tawang सेक्टर के सामने वाले इलाकों में आबादी बढ़ने लगी है। बताया जाता है कि चीन ने इसी तरह के कुछ गांव Bhutan के क्षेत्रों के पास भी बनाए हैं। सीमा कानून से बढ़ी रणनीति चीन ने 1 जनवरी 2022 से नया थल सीमा कानून लागू किया, जिसका उद्देश्य सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना बताया गया। इस कानून के तहत सरकार लोगों को सीमा क्षेत्रों में बसने और काम करने के लिए प्रोत्साहित करती है, जिससे वहां नागरिक मौजूदगी बढ़े और निगरानी तंत्र मजबूत हो सके। भारत भी दे रहा जवाब चीन की इस रणनीति के जवाब में भारत सरकार ने 2022 में ‘वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम’ शुरू किया। इस योजना के तहत सीमा के पास स्थित 663 गांवों को बुनियादी सुविधाओं, सड़क, संचार और पर्यटन विकास से जोड़ा जा रहा है ताकि वहां से पलायन रोका जा सके। इस कार्यक्रम के लिए कई गांवों को प्राथमिकता दी गई है, जिनमें Kibithu, Tuting, Taksing, Chayang Tajo और Zemithang शामिल हैं। सीमा पर तेज हुआ इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण चीन तवांग और सियांग घाटी के आसपास नई सड़कें, पुल और हवाई पट्टियां भी विकसित कर रहा है। इसके जवाब में भारत ने भी LAC के पास फॉरवर्ड कनेक्टिविटी मजबूत की है। नए हेलीपैड, अंतर-घाटी सड़कें और वैकल्पिक मार्ग बनाए जा रहे हैं, जिससे भारतीय सेना की तैनाती और मूवमेंट पहले से कहीं अधिक तेज हो सके। लेफ्टिनेंट जनरल घई के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में तेजी से उभरती ये बस्तियां भारत के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर हैं, लेकिन साथ ही सीमा पर मजबूत बुनियादी ढांचा और स्थानीय आबादी को वहां बनाए रखना अब भारत की सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा बन गया है।

क्या है छत्तीसगढ़ का ‘आवा पानी झोकी’ आंदोलन, किसानों की पहल से जल संरक्षण की नई मिसाल

रायपुर। छत्‍तीसगढ़ (Chhattisgarh) में जल संरक्षण को लेकर किसानों ने एक अनोखी पहल शुरू की है, जिसे ‘आवा पानी झोकी’ नाम दिया गया है। इस आंदोलन के तहत किसान अपनी खेती की जमीन का करीब 5 प्रतिशत हिस्सा वर्षा जल संग्रह के लिए अलग रख रहे हैं, ताकि बारिश का पानी खेतों में ही संरक्षित किया जा सके। इस पहल का उद्देश्य प्रदेश में जल संरक्षण को बढ़ावा देना और लंबे समय में जल क्रांति की दिशा में कदम बढ़ाना है। खेतों में बन रहे छोटे तालाब और गड्ढे Ministry of Jal Shakti के मुताबिक, इस अभियान में किसान स्वेच्छा से अपनी कृषि भूमि के एक हिस्से में छोटे रिचार्ज तालाब और सीढ़ीनुमा गड्ढे बनवा रहे हैं। इन संरचनाओं में बारिश का पानी जमा होता है और धीरे-धीरे जमीन में समाकर भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करता है। इस व्यवस्था से मानसून के दौरान गिरने वाली पानी की हर बूंद को खेतों में ही रोका और पुनः उपयोग किया जा रहा है। इलाके में दिखने लगे सकारात्मक परिणाम मंत्रालय ने इस प्रयोग को उल्लेखनीय बताया है। पहले जो बारिश का पानी बहकर निकल जाता था, अब वह मिट्टी और भूजल स्रोतों का पुनर्भरण कर रहा है। इससे मिट्टी के कटाव में कमी आई है और सूखे के समय फसलों में नमी भी बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल साबित करता है कि सतत जल प्रबंधन के लिए भारी निवेश से ज्यादा सामूहिक भागीदारी जरूरी होती है। महिलाएं बनीं ‘नीर नायिका’, युवक ‘जल दूत’ इस अभियान में ग्रामीण समुदाय की बड़ी भूमिका है। गांवों की महिलाएं ‘नीर नायिका’ बनकर घर-घर लोगों को जल संरक्षण के लिए प्रेरित कर रही हैं और पारंपरिक लोकगीतों के जरिए जागरूकता फैला रही हैं। वहीं युवाओं को ‘जल दूत’ कहा जा रहा है, जो नालियों का मानचित्रण करने, नहरों से गाद निकालने, नुक्कड़ नाटक और भित्ति चित्रों के माध्यम से लोगों को अभियान से जोड़ने का काम कर रहे हैं। श्रमदान से तालाबों का पुनर्जीवन इस आंदोलन के दौरान सामूहिक श्रमदान से 440 से अधिक पारंपरिक तालाबों का पुनरुद्धार किया गया, जो अब प्राकृतिक जल पुनर्भरण के स्रोत बन गए हैं। इसके अलावा Pradhan Mantri Awas Yojana के 500 से ज्यादा लाभार्थियों ने भी अपने घरों के पास जल संरक्षण के गड्ढे बनवाए हैं। हजारों किसानों ने अपनाया 5% मॉडल जानकारी के अनुसार 1,260 से अधिक किसानों ने अपनी जमीन का 5 प्रतिशत हिस्सा जल पुनर्भरण के लिए अलग रखा है और पूरे Koriya District में 2,000 से ज्यादा सोख गड्ढे बनाए गए हैं। एक उदाहरण में ग्रामीणों ने सामूहिक प्रयास से सिर्फ तीन घंटे में 660 सोख गड्ढे बना दिए, जो इस अभियान में लोगों की भागीदारी को दर्शाता है। भूजल स्तर में भी हुआ सुधार मंत्रालय के अनुसार इस पहल के परिणाम अब स्पष्ट दिखने लगे हैं। कई गांवों में भूजल स्तर 3 से 4 मीटर तक बढ़ गया है, जबकि 17 दूरस्थ जनजातीय बस्तियों में सूख चुके झरने फिर से बहने लगे हैं। मिट्टी में नमी बढ़ने से कृषि उत्पादकता में सुधार हुआ है और बेहतर आजीविका के कारण मौसमी पलायन में करीब 25 प्रतिशत की कमी आई है।