ईरान-अमेरिका तनाव: कैरोलिन लेविट को बधाई के साथ ‘मीनाब स्कूल’ हमले का जिक्र, कूटनीतिक बयानबाजी तेज

नई दिल्ली। ईरान और अमेरिका के बीच पहले से जारी तनाव के बीच एक बार फिर बयानबाजी तेज हो गई है। ईरान ने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट को उनकी बेटी के जन्म पर बधाई दी, लेकिन उसी संदेश में “मीनाब स्कूल हमले” का उल्लेख कर अमेरिका पर तीखा राजनीतिक वार भी किया। बधाई के साथ तीखा संदेशआर्मेनिया स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा, बच्चे मासूम होते हैं और उनकी भावनाएं सार्वभौमिक हैं लेविट को अपनी खुशी के साथ उन मांओं का दर्द भी याद रखना चाहिए जिन्होंने संघर्ष में अपने बच्चे खोए मीनाब स्कूल में मारे गए बच्चों को भी उतना ही मासूम बताया गया।ईरान ने अपने संदेश में यह भी संकेत दिया कि इस तरह की घटनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। क्या है मीनाब स्कूल हमला मामला?ईरान का दावा है कि 28 फरवरी को मीनाब क्षेत्र के एक स्कूल पर हुए हमले में भारी जनहानि हुई थी।ईरान के अनुसार: करीब 168 लोगों की मौत। मृतकों में बच्चे, शिक्षक और आम नागरिक शामिल ईरान ने इस घटना के लिए अमेरिका और इजरायल को जिम्मेदार बताया हालांकि, इस घटना को लेकर अलग-अलग देशों और रिपोर्ट्स में भिन्न दावे सामने आते रहे हैं और आधिकारिक पुष्टि को लेकर मतभेद हैं। Congratulations to you. Children are innocent and lovable. Those 168 children that your boss killed in the school in Minab, and you justified, were also children. When you kiss your baby, think of the mothers of those children. https://t.co/uhypZFhRRf — IRI Embassy in Armenia (@iraninyerevan) May 9, 2026 अमेरिका का रुखअमेरिकी पक्ष ने शुरुआती प्रतिक्रिया में कहा था कि,अमेरिका नागरिकों को जानबूझकर निशाना नहीं बनाता। घटना संभवतः तकनीकी चूक या मिसफायर का परिणाम हो सकती हैमामले की अलग-अलग जांच रिपोर्ट सामने आई हैं। ट्रंप के बयानों से बढ़ा विवादइस मामले में पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयान भी सुर्खियों में रहे! उन्होंने बिना प्रमाण ईरान को जिम्मेदार ठहराया थाबाद में दावा किया कि ईरान के पास ऐसी मिसाइल क्षमता है, जिसे विशेषज्ञों ने गलत बताया।बाद में जब रिपोर्ट पर सवाल हुआ तो उन्होंने अनभिज्ञता जताई On May 1st, Viviana aka “Vivi” joined our family, and our hearts instantly exploded with love. 💕 She is perfect and healthy, and her big brother is joyfully adjusting to life with his new baby sister. We are enjoying every moment in our blissful newborn bubble. Thank you to… pic.twitter.com/wM1P1zEGsa — Karoline Leavitt (@karolineleavitt) May 7, 2026 कूटनीति से ज्यादा संदेश की राजनीतिविशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम केवल शिष्टाचार संदेश नहीं, बल्कि अमेरिका पर नैतिक दबाव बनाने की कोशिश मानवीय संवेदनाओं के जरिए वैश्विक विमर्श प्रभावित करने का प्रयास पहले से तनावपूर्ण रिश्तों में नई तल्खी जोड़ने वाला कदम कैरोलिन लेविट को दी गई बधाई के साथ मीनाब स्कूल हमले का जिक्र एक बार फिर अमेरिका-ईरान संबंधों की जटिलता को सामने लाता है। जहां यह संदेश मानवीय भावनाओं से जुड़ा प्रतीत होता है, वहीं इसके पीछे कूटनीतिक और राजनीतिक संदेश भी साफ तौर पर देखा जा रहा है, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव और गहराने की आशंका बनी हुई है।
ट्रंप बोले पागलों के हाथ में परमाणु हथियार नहीं ; ईरान युद्ध अभी लंबा खिंच सकता है

नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध अब और लंबा चल सकता है। वॉशिंगटन स्थित व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि दुनिया पागलों के नियंत्रण में परमाणु हथियार नहीं रहने दे सकती। ट्रंप ने बताया कि अमेरिका ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई करके यह सुनिश्चित किया कि यह देश कभी परमाणु खतरा न बने। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़रायल ने मिलकर ईरान पर सैन्य कार्रवाई शुरू की थी। ट्रंप ने बताया कि बिना इस कार्रवाई के ईरान पहले ही परमाणु ताकत बन चुका होता। उन्होंने कहा कि उस समय ईरान परमाणु हथियार हासिल करने से सिर्फ दो हफ्ते दूर था और कूटनीतिक बातचीत काम नहीं आती। राष्ट्रपति ने कहा युद्ध बहुत अच्छे से आगे बढ़ रहा है। हम बहुत बढ़िया काम कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि यह संघर्ष कब तक चलेगा। ट्रंप ने यह भी बताया कि अमेरिका भविष्य में लौट सकता है लेकिन अब तक मकसद यह सुनिश्चित करना था कि किसी और राष्ट्रपति को ऐसी परेशानी न झेलनी पड़े। इस बीच ट्रंप प्रशासन को अंदरूनी झटका भी लगा है। नेशनल काउंटरटेररिज्म सेंटर के प्रमुख जोसेफ केंट ने ईरान पर सैन्य कार्रवाई के विरोध में इस्तीफा दे दिया। केंट ने सोशल मीडिया पर अपने त्याग पत्र में लिखा कि अमेरिका पर ईरान की ओर से कोई आसन्न खतरा नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि यह युद्ध इज़रायल और उसके प्रभावशाली लॉबी समूहों के दबाव में शुरू किया गया। केंट ने साफ शब्दों में कहा कि वह अपनी अंतरात्मा के खिलाफ इस युद्ध का समर्थन नहीं कर सकते। इस इस्तीफे के समय ऑपरेशन एपिक फ्यूरी अपने तीसरे सप्ताह में प्रवेश कर चुका है और क्षेत्रीय तनाव लगातार बढ़ रहा है। इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि ईरान संकट न केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बल्कि अमेरिकी प्रशासन के अंदर भी गंभीर बहस का विषय बन गया है।
ईरान संघर्ष के बीच ट्रंप ने टाली चीन यात्रा, बोले युद्ध ज्यादा लंबा नहीं चलेगा

वॉशिंगटन। डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव के बीच अपनी चीन यात्रा फिलहाल टाल दी है। उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए उनका व्हाइट हाउस में रहना जरूरी है और यही कारण है कि उन्होंने बीजिंग दौरे को करीब एक महीने के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया है। ट्रंप की यह यात्रा 28 मार्च से 1 अप्रैल के बीच प्रस्तावित थी लेकिन अब नई तारीखों की घोषणा नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि वे चीन जाने के इच्छुक हैं और दोनों देशों के रिश्ते अच्छे हैं लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में अमेरिका में रहना प्राथमिकता है। ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के साथ जारी संघर्ष पर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि यह युद्ध जल्द खत्म हो सकता है और यह ज्यादा लंबा नहीं चलेगा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह जरूरी नहीं कि युद्ध इसी सप्ताह समाप्त हो जाए। ट्रंप ने अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि यह कदम वैश्विक सुरक्षा के हित में उठाया गया है। उनके अनुसार यदि यह कार्रवाई नहीं की जाती तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते थे। उन्होंने दावा किया कि इस संघर्ष के बाद ईरान की सैन्य क्षमता काफी कमजोर हो गई है जिसमें उसकी नौसेना वायुसेना और एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वे व्यक्तिगत रूप से युद्ध से बचना चाहते थे लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें यह फैसला लेने के लिए मजबूर किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि यह कदम केवल अमेरिका के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए उठाया गया है। शेयर बाजार पर संभावित असर को लेकर ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद थी कि बाजार में ज्यादा गिरावट देखने को मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके मुताबिक अगर थोड़े समय के लिए असर पड़ता भी है तो यह बहुत छोटी कीमत है। जब उनसे भविष्य की सैन्य रणनीति या जमीनी सेना भेजने की संभावना पर सवाल किया गया तो उन्होंने इस पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। कुल मिलाकर ईरान के साथ जारी तनाव के बीच ट्रंप का यह फैसला वैश्विक कूटनीति और सुरक्षा पर गहरा असर डाल सकता है जबकि दुनिया की नजर अब इस संघर्ष के संभावित अंत पर टिकी हुई है।
ईरान युद्ध खत्म करने की घोषणा क्यों नहीं कर पा रहे ट्रंप? व्हाइट हाउस में मतभेद, फैसले पर बढ़ा दबाव

वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी युद्ध को लेकर अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump के सामने बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती खड़ी हो गई है। व्हाइट हाउस के भीतर ही इस बात को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही है कि युद्ध को कब और किस तरह खत्म घोषित किया जाए। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन के भीतर कुछ अधिकारी मानते हैं कि संघर्ष लंबा खिंचने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आ सकता है, जिसका असर अमेरिका की घरेलू राजनीति पर भी पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर कुछ सख्त रुख वाले नेता ईरान पर सैन्य दबाव जारी रखने के पक्ष में हैं। तेल की कीमतों को लेकर चिंता अमेरिकी ट्रेजरी विभाग और नेशनल इकोनॉमिक काउंसिल के अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध के कारण पेट्रोल की कीमतें तेजी से बढ़ती हैं तो अमेरिका में इस अभियान के लिए जनसमर्थन कम हो सकता है। हालांकि कुछ रिपब्लिकन नेता और रणनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अमेरिका को ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से हर हाल में रोकना होगा और अमेरिकी सैनिकों या जहाजों पर हमले का कड़ा जवाब देना चाहिए। लंबी जंग से बचना चाहते हैं कई रणनीतिकार ट्रंप के कुछ करीबी सलाहकार और समर्थक यह भी चाहते हैं कि अमेरिका मध्यपूर्व में लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में न फंसे। वे चाहते हैं कि मौजूदा संघर्ष को सीमित रखा जाए और जल्द कोई रास्ता निकाला जाए। ईरान की सरकार गिरने की संभावना कम अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि फिलहाल ईरान की मौजूदा सरकार के जल्द गिरने की संभावना कम है। इसी कारण ट्रंप प्रशासन ने हाल के दिनों में तेहरान की सरकार को हटाने की बात भी कम कर दी है। युद्ध से बाहर निकलने का रास्ता तलाश रहे ट्रंप सूत्रों के अनुसार ट्रंप प्रशासन अब इस संघर्ष से निकलने का रास्ता खोज रहा है। युद्ध शुरू होने के समय इसके कई लक्ष्य बताए गए थे—जैसे ईरान के हमलों को रोकना, उसके परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करना और उसकी सैन्य क्षमता को सीमित करना। युद्ध रोकना भी आसान नहीं विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध शुरू करने के बाद उसे खत्म करना भी उतना ही मुश्किल होता है। अगर अमेरिका अचानक जीत का ऐलान कर सैन्य कार्रवाई रोक देता है और सैनिकों की वापसी शुरू कर देता है, तो अल्पकाल में वैश्विक बाजार शांत हो सकते हैं। लेकिन यदि ईरान की धार्मिक सरकार सत्ता में बनी रहती है और उसके पास परमाणु सामग्री, मिसाइल और ड्रोन मौजूद रहते हैं, तो इससे क्षेत्रीय सुरक्षा पर नए खतरे पैदा हो सकते हैं। ऊर्जा आपूर्ति पर बड़ा असर ईरान के पास अभी भी कई कम दूरी की मिसाइलें, ड्रोन और समुद्री बारूदी सुरंगें हैं। इनके जरिए वह तेल और गैस की आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है, खासकर Strait of Hormuz के रास्ते। यह जलमार्ग दुनिया के सबसे अहम तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। होर्मुज को खोलना भी चुनौती सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित करना हो तो ईरान के तटीय इलाकों में जमीनी सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है। ऐसा कदम युद्ध को और व्यापक बना सकता है और अमेरिकी सैनिकों के लिए बड़ा जोखिम पैदा कर सकता है। इसी वजह से विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप के लिए युद्ध शुरू करना जितना आसान था, उसे खत्म करना उतना ही कठिन साबित हो रहा है।
भारत ने दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका के लिए निभाई अहम भूमिका: राजदूत सर्जियो गोर

नई दिल्ली । अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में भारत की वैश्विक ऊर्जा बाजार में भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया में तेल की कीमतें स्थिर रखने में अमेरिका का बहुत बड़ा साथी रहा है। गोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर यह बात साझा करते हुए विशेष रूप से भारत की रूस से लगातार तेल खरीद को वैश्विक ऊर्जा स्थिरता के लिए जरूरी बताया। राजदूत गोर ने लिखा भारत तेल के सबसे बड़े कंज्यूमर और रिफाइनर में से एक है। अमेरिका और भारत के लिए मार्केट में स्थिरता लाने के लिए मिलकर काम करना बेहद जरूरी है। उनके अनुसार भारत की नीति न केवल घरेलू स्तर पर बल्कि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार पर भी गहरा असर डालती है। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक तेल बाजार में ईरान संकट के चलते भारी अस्थिरता देखी जा रही है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संभावित बंदी की वजह से तेल आपूर्ति पर खतरा मंडरा रहा है और कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका जताई जा रही है। ऐसे में भारत की सक्रिय भूमिका और रूस से तेल खरीद की नीति को अमेरिका ने विशेष महत्व दिया है। व्हाइट हाउस ने पहले ही प्रेस बयान में कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए तत्कालीन छूट दी थी। प्रेस सचिव कैरोलिन लेविट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला राष्ट्रपति ट्रेजरी विभाग और नेशनल सिक्योरिटी टीम के संयुक्त विचार-विमर्श के बाद लिया गया। लेविट के अनुसार भारत में हमारे सहयोगी अच्छे रहे हैं और वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता बनाए रखने के लिए यह कदम उठाया गया। उन्होंने बताया कि ईरान संकट के कारण दुनिया भर में तेल सप्लाई में पैदा हुए अस्थायी अंतर को कम करने के मकसद से यह तत्कालीन उपाय किया गया। छूट मिलने से पहले ही भारत को शिपमेंट भेज दिए गए थे। व्हाइट हाउस का मानना है कि इस व्यवस्था से मास्को को आर्थिक रूप से कोई खास लाभ नहीं होगा। विश्लेषकों का कहना है कि भारत का यह कदम न केवल घरेलू ऊर्जा जरूरतों को पूरा करता है बल्कि वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता लाने में भी मददगार साबित होता है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल कंज्यूमर और रिफाइनर है। ऐसे में देश की नीति और तेल खरीद की रणनीति वैश्विक स्तर पर भावनाओं और कीमतों को प्रभावित करती है। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में अमेरिका और भारत के बीच ऊर्जा सहयोग की नई चुनौतियों और अवसरों का संकेत मिलता है। वैश्विक तेल बाजार की अस्थिरता और ईरान-संबंधी संकट के बीच भारत की भूमिका और रणनीतिक महत्व बढ़ गया है। राजदूत गोर के बयान से यह भी साफ होता है कि अमेरिका भारत को एक भरोसेमंद और सक्रिय साझेदार के रूप में देखता है जो अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा स्थिरता में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
अमेरिका ने भारत को दी 30 दिन की रूसी तेल खरीदने की छूट, कहा मुश्किल समय में जिम्मेदार साथी

नई दिल्ली । पश्चिमी एशिया में ईरान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर संकट पैदा कर दिया है। इस समय अमेरिकी प्रशासन ने भारत के लिए एक राहत भरा फैसला लिया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलीन लैविट ने मंगलवार को घोषणा की कि भारत को 30 दिनों के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दी गई है। कैरोलाइन लैविट ने बताया कि भारत एक भरोसेमंद सहयोगी रहा है और मुश्किल समय में हमेशा जिम्मेदारी से कदम उठाता है। इस शॉर्ट टर्म फैसले का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि युद्ध के कारण बढ़ती वैश्विक तेल कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर न डालें। व्हाइट हाउस ने यह भी स्पष्ट किया कि इस छूट से रूस को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होगा क्योंकि यह तेल पहले से समुद्र में मौजूद जहाजों में था। नेशनल सिक्योरिटी टीम और ट्रेजरी सेक्रेटरी की जांच के बाद ही यह निर्णय भारत की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया गया। 28 फरवरी से बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज की खाड़ी में युद्ध की घटनाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार उतार-चढ़ाव का सामना कर रही हैं। ऐसे कठिन दौर में अमेरिका का यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और घरेलू तेल आपूर्ति बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय वैश्विक तेल संकट और तेल निर्यातकों की बदलती स्थिति के बीच भारत के लिए समयबद्ध राहत साबित होगा। भारत ने पहले रूसी तेल की खरीद पर रोक लगाई थी लेकिन यह छूट अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति संकट के मद्देनजर अस्थायी उपाय के रूप में दी गई है।