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हेडफोन 60-60 रूल: दिनभर हेडफोन यूज करने वालों के लिए जरूरी चेतावनी, नहीं तो सुनने की क्षमता हो सकती है प्रभावित

नई दिल्ली। आज के समय में Headphones और ईयरबड्स का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है, लेकिन लंबे समय तक तेज आवाज में म्यूजिक सुनना कानों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसी जोखिम को कम करने के लिए विशेषज्ञ “60-60 रूल” अपनाने की सलाह देते हैं। 60-60 रूल का मतलब है कि हेडफोन की अधिकतम वॉल्यूम के लगभग 60 प्रतिशत स्तर पर सिर्फ 60 मिनट तक ही लगातार म्यूजिक सुनना चाहिए। इसके बाद कुछ समय का ब्रेक लेना जरूरी होता है, ताकि कानों पर लगातार दबाव न पड़े और सुनने की क्षमता सुरक्षित रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार तेज आवाज में हेडफोन यूज करने से कानों की अंदरूनी सेंसरी सेल्स को नुकसान पहुंच सकता है, जो ध्वनि को मस्तिष्क तक पहुंचाने का काम करती हैं। एक बार ये सेल्स डैमेज हो जाएं तो इन्हें दोबारा ठीक करना संभव नहीं होता, जिससे सुनने की क्षमता पर स्थायी असर पड़ सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक 80 डेसिबल से ज्यादा आवाज लंबे समय तक सुनना खतरनाक हो सकता है। सामान्य बातचीत लगभग 60 डेसिबल होती है, जबकि ट्रैफिक और तेज शोर इससे कहीं ज्यादा होता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि मोबाइल में वॉल्यूम लिमिट सेट करके और हर 60 मिनट पर ब्रेक लेकर हेडफोन का इस्तेमाल किया जाए। यह छोटी-सी सावधानी लंबे समय में सुनने की क्षमता को सुरक्षित रखने में मदद कर सकती है।

हंता वायरस का बढ़ता खतरा: कैसे फैलता है संक्रमण, किन देशों में पहुंचा और कितना जानलेवा है यह वायरस

नई दिल्ली। दुनिया एक बार फिर एक नए स्वास्थ्य संकट की आशंका से जूझ रही है। हंता वायरस के ताज़ा मामलों ने वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में अटलांटिक महासागर में यात्रा कर रहे एक क्रूज शिप में संक्रमण और मौतों की पुष्टि के बाद यह वायरस फिर सुर्खियों में आ गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) भी इस स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। WHO की विशेषज्ञ डॉ. मारिया वान केरकोव ने स्पष्ट किया है कि हंता वायरस न तो कोविड-19 जैसा है और न ही सामान्य इन्फ्लूएंजा। यह वायरस अलग तरीके से फैलता है और इसकी प्रकृति भी अलग है। अच्छी बात यह है कि यह व्यक्ति से व्यक्ति में आसानी से नहीं फैलता, जिससे इसका व्यापक प्रसार सीमित रहता है। कैसे शुरू हुआ संक्रमणताजा मामला एक डच झंडे वाले क्रूज शिप MV Hondius से जुड़ा है, जो अटलांटिक और दक्षिणी महासागर के मार्ग से गुजर रहा था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यात्रा के दौरान 70 वर्षीय एक यात्री में शुरुआती लक्षण दिखे, जिनमें बुखार, सिरदर्द और कमजोरी शामिल थे। बाद में उनकी मौत हो गई। इसके बाद दो और मौतों की पुष्टि हुई, जिनमें एक दक्षिण अफ्रीका और दूसरी जर्मनी की महिला यात्री शामिल थी। जहाज पर लगभग 150 लोग सवार थे, जो अर्जेंटीना से यात्रा पर निकले थे। यात्रा के दौरान सेंट हेलेना और अन्य द्वीपों पर कुछ यात्रियों ने उतरकर संपर्क किया, जिससे संक्रमण के फैलाव की आशंका और जांच तेज कर दी गई। किन देशों तक पहुंचा मामलाWHO और संबंधित स्वास्थ्य एजेंसियों ने कई देशों को अलर्ट किया है, जिनमें शामिल हैं: अर्जेंटीना (जहां से यात्रा शुरू हुई) सेंट हेलेना दक्षिण अफ्रीका नीदरलैंड ब्रिटेन केप वर्डे इसके अलावा कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, डेनमार्क, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, तुर्की, सिंगापुर और न्यूजीलैंड जैसे देशों को भी जानकारी दी गई है क्योंकि इनके नागरिक इस यात्रा से जुड़े हुए थे या संपर्क में आए थे। हंता वायरस कितना खतरनाक हैहंता वायरस को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जाता है।पहला “ओल्ड वर्ल्ड हंता वायरस” जो यूरोप और एशिया में पाया जाता है और मुख्य रूप से किडनी पर असर डालता है। इसकी मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम होती है, लगभग 1% से 15% के बीच। दूसरा और अधिक खतरनाक “न्यू वर्ल्ड हंता वायरस” है, जो अमेरिका में पाया जाता है। यह हंता वायरस कार्डियोपल्मोनरी सिंड्रोम का कारण बनता है, जिसमें फेफड़ों में तेजी से तरल भर जाता है और सांस लेने में गंभीर दिक्कत होती है। इसकी मृत्यु दर 35% से 50% तक हो सकती है, जिससे यह बेहद घातक संक्रमणों में शामिल है। कैसे फैलता है वायरसयह वायरस मुख्य रूप से चूहों और अन्य कृंतकों के मूत्र, मल या लार के संपर्क से फैलता है। संक्रमित धूल या सतहों को सांस के जरिए शरीर में लेने से संक्रमण हो सकता है। हालांकि, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में इसका संक्रमण दुर्लभ माना जाता है। क्या कहती हैं स्वास्थ्य एजेंसियांWHO का कहना है कि फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्कता बेहद जरूरी है। प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी बढ़ा दी गई है और यात्रियों की ट्रैकिंग की जा रही है। वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर पहचान और सावधानी से इसके फैलाव को नियंत्रित किया जा सकता है।

पाकिस्तान में फिर मंडराया पोलियो का खतरा, पांच नए मामलों से मचा हड़कंप; WHO समेत दुनिया अलर्ट

नई दिल्ली। पाकिस्तान में पोलियो वायरस एक बार फिर गंभीर चिंता का कारण बनता जा रहा है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कराची समेत कई इलाकों से लिए गए पांच नए नमूनों में पोलियो वायरस की पुष्टि हुई है। इसके बाद स्वास्थ्य अधिकारियों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की चिंता बढ़ गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार सिंध में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक के दौरान अधिकारियों ने बताया कि कम संक्रमण वाले मौसम में भी वायरस का सक्रिय रहना बेहद चिंताजनक संकेत है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह संक्रमण के लगातार फैलने का संकेत देता है और इसे रोकने के लिए तुरंत सख्त कदम उठाने होंगे। WHO और यूनिसेफ भी अलर्टबैठक में विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ़, बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन और पाकिस्तान मेडिकल एसोसिएशन समेत कई संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए।डब्ल्यूएचओ के प्रतिनिधियों ने कहा कि अफ्रीका में सफल रही रणनीतियों को अब पाकिस्तान में भी लागू किया जा रहा है ताकि वायरस के फैलाव को रोका जा सके। इस साल सामने आए कई मामलेरिपोर्ट्स के मुताबिक हाल ही में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के बन्नू और उत्तरी वजीरिस्तान से पोलियो के नए मामले सामने आए थे। इस साल अब तक पाकिस्तान में पोलियो के कई मामलों की पुष्टि हो चुकी है।विशेषज्ञों का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान दुनिया के ऐसे देश हैं जहां अब भी पोलियो वायरस पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है। टीकाकरण अभियान के सामने बड़ी चुनौतीपोलियो उन्मूलन अभियान को सुरक्षा और जागरूकता दोनों स्तर पर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में टीकाकरण टीमों पर हमलों की घटनाएं भी सामने आई हैं। इसके अलावा टीकों को लेकर फैली गलत जानकारी और अभिभावकों द्वारा पोलियो ड्रॉप्स से इनकार भी बड़ी समस्या बन चुका है। केवल कराची में ही हजारों परिवारों ने बच्चों को पोलियो ड्रॉप्स पिलाने से मना कर दिया है, जिससे वायरस के खतरे को लेकर चिंता और बढ़ गई है।

Type-2 Diabetes से बचाव है संभव: अपनाएं ये 4 आसान आदतें और रहें स्वस्थ

नई दिल्ली। आज के समय में तेजी से बढ़ती लाइफस्टाइल बीमारियों में Type 2 Diabetes एक बड़ी चुनौती बन चुकी है। खराब खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और बढ़ता तनाव इस बीमारी के प्रमुख कारण माने जाते हैं। हालांकि, अच्छी बात यह है कि World Health Organization (WHO) का मानना है कि कुछ आसान और नियमित आदतों को अपनाकर इस बीमारी से बचाव संभव है। WHO के अनुसार, सबसे जरूरी है अपने शरीर के वजन को संतुलित रखना। बढ़ता हुआ वजन डायबिटीज के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। ऐसे में नियमित रूप से वजन पर नजर रखना और जरूरत पड़ने पर उसे नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। संतुलित वजन न सिर्फ डायबिटीज बल्कि कई अन्य बीमारियों से भी बचाता है। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है शारीरिक रूप से सक्रिय रहना। विशेषज्ञों की सलाह है कि रोजाना कम से कम 20 से 30 मिनट तक व्यायाम जरूर करना चाहिए। इसमें तेज चलना, साइकिल चलाना या हल्का-फुल्का खेलकूद शामिल हो सकता है। नियमित शारीरिक गतिविधि शरीर में इंसुलिन के प्रभाव को बेहतर बनाती है और ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखने में मदद करती है। तीसरा अहम पहलू है संतुलित और पौष्टिक आहार। WHO के अनुसार, अपनी डाइट में फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और प्रोटीन से भरपूर खाद्य पदार्थों को शामिल करना चाहिए। वहीं, ज्यादा चीनी, प्रोसेस्ड फूड और सैचुरेटेड फैट से दूरी बनाना बेहद जरूरी है। सही खानपान न केवल डायबिटीज के खतरे को कम करता है, बल्कि शरीर को ऊर्जा और पोषण भी देता है। चौथा और बेहद जरूरी उपाय है तंबाकू से दूरी बनाना। तंबाकू का सेवन न केवल डायबिटीज बल्कि दिल और फेफड़ों से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है। WHO का स्पष्ट कहना है कि तंबाकू छोड़ने से शरीर की ओवरऑल हेल्थ बेहतर होती है और कई बीमारियों से बचाव संभव होता है। आज के व्यस्त जीवन में छोटी-छोटी आदतों में बदलाव करना ही सबसे बड़ा उपाय है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, वजन नियंत्रण और तंबाकू से दूरी बनाकर न केवल Type 2 Diabetes बल्कि कई अन्य गंभीर बीमारियों से भी बचा जा सकता है। कुल मिलाकर, अगर समय रहते जागरूकता दिखाई जाए और सही जीवनशैली अपनाई जाए, तो डायबिटीज जैसी बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।

लेटेंट टीबी को न करें नजरअंदाज वरना बन सकती है एक्टिव टीबी का बड़ा खतरा

नई दिल्ली:टीबी यानी ट्यूबरकुलोसिस एक संक्रामक बीमारी है, जो Mycobacterium tuberculosis नामक बैक्टीरिया के कारण होती है और मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करती है। हालांकि यह दिमाग, हड्डियों, किडनी और शरीर के अन्य हिस्सों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। यह बीमारी हवा के जरिए फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर गंभीर रूप ले सकती है लेकिन टीबी की एक स्थिति ऐसी भी होती है, जिसे लेटेंट टीबी कहा जाता है। इस स्थिति में टीबी के बैक्टीरिया शरीर में मौजूद तो रहते हैं, लेकिन निष्क्रिय अवस्था में होते हैं। इसका मतलब यह है कि संक्रमित व्यक्ति को कोई लक्षण महसूस नहीं होते और न ही वह दूसरों में संक्रमण फैलाता है हर साल विश्व टीबी दिवस 24 मार्च को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस बीमारी के प्रति जागरूकता फैलाना है। विशेषज्ञों के अनुसार लेटेंट टीबी को समझना बेहद जरूरी है, क्योंकि यह छुपी हुई स्थिति कभी भी सक्रिय टीबी में बदल सकती हैजब लेटेंट टीबी सक्रिय हो जाती है, तब इसके लक्षण सामने आने लगते हैं। इनमें लगातार खांसी, बुखार, वजन कम होना, रात में पसीना आना और थकान जैसे संकेत शामिल हैं। इसलिए अगर इन लक्षणों को नजरअंदाज किया जाए, तो यह बीमारी गंभीर रूप ले सकती है लेटेंट टीबी का खतरा उन लोगों में ज्यादा होता है जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है। इसमें एचआईवी संक्रमित, डायबिटीज के मरीज, कैंसर से पीड़ित लोग या लंबे समय से स्टेरॉयड दवाएं लेने वाले लोग शामिल हैं। इसके अलावा छोटे बच्चों और बुजुर्गों में भी इसका जोखिम अधिक होता हैविश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया की बड़ी आबादी लेटेंट टीबी से प्रभावित है और भारत जैसे देशों में इसका खतरा और अधिक है। इसलिए समय रहते इसकी जांच और इलाज बेहद जरूरी है लेटेंट टीबी की पहचान के लिए ब्लड टेस्ट या ट्यूबरकुलिन स्किन टेस्ट किया जाता है। अगर रिपोर्ट पॉजिटिव आती है, तो डॉक्टर आमतौर पर 3 से 9 महीने तक दवाएं देते हैं, जिससे यह संक्रमण सक्रिय टीबी में बदलने से रोका जा सके बचाव के लिए जरूरी है कि अगर परिवार में किसी को लंबे समय तक खांसी, बुखार या अचानक वजन कम होने जैसी समस्या हो, तो तुरंत जांच कराई जाए। सही समय पर पहचान और इलाज से इस बीमारी को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता हैलेटेंट टीबी एक छिपा हुआ खतरा है, जिसे नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। समय पर जांच और उपचार ही इससे बचने का सबसे प्रभावी तरीका है TagsTuberculosis, LatentTB, HealthAwareness, WHO, DiseasePrevention

परमाणु ठिकानों पर हमलों से बढ़ा खतरा, डब्ल्यूएचओ ने दी गंभीर चेतावनी

जिनेवा। अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान पर किए हमले से पश्चिम एशिया में संकट की स्थिति बनी हुई है। इस बीच ईरान के परमाणु ठिकानों पर हो रहे हमलों को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने गंभीर चिंता जताई है। संगठन ने चेतावनी दी है कि ऐसे हमले सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस ने बताया कि नतांज एनरिचमेंट कॉम्प्लेक्स और डिमोना जैसे संवेदनशील परमाणु स्थलों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी इन घटनाओं की जांच कर रही है। फिलहाल किसी तरह के रेडिएशन स्तर में वृद्धि के संकेत नहीं मिले हैं, लेकिन स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। टेड्रोस ने चेतावनी दी कि परमाणु ठिकानों को निशाना बनाना बेहद खतरनाक है, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर जनस्वास्थ्य संकट और पर्यावरणीय नुकसान हो सकता है। अगर ऐसे हमले जारी रहते हैं, तो हालात और गंभीर हो सकते हैं। डब्ल्यूएचओ ने बताया कि युद्ध शुरू होने के बाद से 13 देशों में अपने स्टाफ और संयुक्त राष्ट्र के कर्मियों को संभावित न्यूक्लियर आपात स्थितियों से निपटने के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। डब्ल्यूएचओ प्रमुख ने सभी पक्षों से सैन्य कार्रवाई में संयम बरतने और तनाव कम करने की अपील की। उन्होंने कहा कि आम नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए और मौजूदा संकट का समाधान केवल शांति और संवाद के जरिए ही संभव है।