नारी सम्मान ही सभ्य, सुसंस्कृत होने की पहचान

विनोद बब्बरयस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता अथार्त जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। इसी प्रकार कहा गया- ‘न गृहं गृह मित्याहु गृहिणी गृह मुच्यते’. सच ही है परिवार संस्था की संकल्पना नारी के बिना व्यर्थ है। महल हो या टूटी झोंपड़ी गृहलक्ष्मी के प्रवेश से ही घर बनता है। परिवार के विस्तार, पोषण, विकास का प्रश्न हो या हास- उल्लास, सृजन, संयम, धर्म, परोपकार का, नारी नायिका की भूमिका में है। पुरुष जीविका अर्जन के नाम पर अपनी जिम्मेवारी से पल्ला झाड़ सकते हैं परंतु परिवार को सुसंस्कृत, परिष्कृत और समुन्नत बनाने के अपने उत्तरदायित्व को नारी कभी नहीं भूलती। नारी को परिवार का हृदय और प्राण कहा जाता है तो समाज का सेतुबंध भी नारी ही है। उदारचेत्ता और सुव्यवस्था की अभ्यस्त सुसंस्कारी देवी अपनी कोमलता, संवेदना, करुणा, स्नेह और ममता के स्वाभाविक गुणों से परिवार की जिम्मेवारी निभाते हुए सामाजिक रिश्तों को भी निभाती है। इतिहास साक्षी है, मातृशक्ति ने सदैव अपनी संतान में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा के संस्कार विकसित किये। माता जीजाबाई को कौन नहीं जानता जिसने वीर शिवा को छत्रपति बनाया था। हाड़ा रानी ने अपने नवविवाहित पति को मातृभूमि के प्रति कर्तव्य याद दिलाने के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान प्रस्तुत किया। पद्मीनी संग हजारों देवियों ने जौहर कर धर्म रक्षा का स्वर्णिम अध्याय लिखा। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने इतिहास पर ऐसी छाप छोड़ी की हर नारी में उनकी छवि तलाशी जाती है क्योंकि कोमल हृदय देवी आवश्यकता पड़ने पर चंडी का रूप भी धारण कर सकती है। स्वतंत्रता संग्राम में कित्तूर कर्नाटक की रानी चेनम्मा से लखनऊ की बेगम हजरत महल, मध्यप्रदेश के रामगढ़ की रानी अवन्तीबाई, मुंडभर की महावीरी देवी सहित असंख्य वीरांगनाओं ने अपने युद्ध कौशल से दुश्मन के छक्के छुड़ाये। इतिहास साक्षी है, 1857 की क्रान्ति के दौरान दिल्ली के आस-पास के गाँवों की 255 महिलाओं ने क्रांति की मशाल को अपने प्राण देकर भी बूझने न दिया। इन्हें अंग्रेजों ने मुजफ्फरनगर में गोली से उड़ा दिया गया था। इतना ही नहीं, स्वामी श्रद्धानन्द की पुत्री वेद कुमारी और आज्ञावती ने महिलाओं को संगठित कर अंग्रेजी वस्तुओं के बहिष्कार और उनकी होली जलाने का अभियान शुरु किया। नागा रानी गुइंदाल्यू, दुर्गा भाभी, सरोजिनी नायडू सहित अनेक वीरांगनाओं के अनन्य राष्ट्रप्रेम, अदम्य साहस, अटूट प्रतिबद्धता की गौरवशाली दास्तान हमारी मातृशक्ति के इस रूप से भी साक्षात्कार कराती है। नारी ने समाज को अपना सब दिया लेकिन भटके हुए लोगों ने उसके साथ न्याय नहीं किया। 1947 में धर्म के आधार पर देश विभाजन के समय हमारी मातृशक्ति को अपमान और अपार कष्ट सहने पड़े। यही नहीं, एक काल विशेष अक्रांताओं द्वारा नारी अपहरण, हरम, हत्या, पर्दा, सौतन, जबरन धर्मांतरण से आरंभ हुआ। इससे कालांतर में कुछ कुरीतियां पनपी। यथा नवजात कन्या की हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, देवदासी प्रथा, अशिक्षा, विधवा का अभिशाप। कामुक सोच के कारण नारी को सुरक्षित पिंजरे में बंद करने वाली कुप्रथाएं हावी हो गई। आखिर राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अकारण तो नहीं कहा होगा- अबला जीवन तेरी हाय यही कहानी! आंचल में है दूध और आंखों में पानी। कारण कुछ भी हो लेकिन एक काल विशेष से नारी शोषित रही है। परिस्थितियों ने ऐसा दबाव बनाया कि वह लगातार डरी, सहमी रही। इसी बीच कुछ क्रूर बादशाहों और समाजों ने नारी श्रद्धा और सम्मान को ‘सामान’ बना दिया। विकृतियों ने ऐसा विकराल रूप धारण किया कि राजाओं को जन्म देने वाली नारी की जिंदगी का फैसला करते हुए भी उससे बात तक नहीं जाती थी। ज्ञातव्य है कि गुरु नानक देव जी ने नारी निंदा करने वालों को चेताते हुए कहा है – सो क्यों मंदा आखिए जिस जम्मे राजान । नामधारी संप्रदाय के संस्थापक सद्गुरु राम सिंह जी ने सर्वप्रथम बेटियों के जीवन के अधिकार के पक्ष में कुड़ी मार से नहीं, व्यवहार को जन जन तक पहुंचते हुए ऐसे राक्षसों से संबंध न रखने का आह्वान किया था ! कल नहीं, आज भी कन्या भ्रूण हत्या होती है। पर्दाप्रथा, दहेज या बालविवाह जैसी कुप्रथाएं अभी कायम है। एक संप्रदाय विशेष में हलाला जैसी घृणित परंपराएं आज भी कायम है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के विपरीत तलाक के बाद महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा गया है। हर काल में भेदभाव और अन्याय की स्थिति को बदलने और नारी को सम्मान दिलाने वाले कुछ महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने ढंग से ऐसी कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठा नारी सशक्तिकरण का उद्घोष किया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज स्थिति बहुत बदली है। आज भारत की नारी वायुसेना के लड़ाकू विमान उड़ाने से राजनीति, प्रशासन, व्यवसाय और शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना चुकी है। देश के सर्वोच्च राष्ट्रपति के पद को आज आदिवासी समाज से संबंध रखने वाली एक देवी सुशोभित कर रही है। तो इससे पूर्व देश की प्रधानमंत्री और अनेक राज्यों में मुख्यमंत्री भी नारी रह चुकी हैं। देश की राजधानी दिल्ली की वर्तमान मुख्यमंत्री भी एक नारी है। यह सर्वाधिक है कि मोदी सरकार के प्रयासों से संसद और विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण विधेयक नई संसद में सर्वप्रथम सर्वसम्मति से पारित होकर कानून बना जो जनगणना व नए परिसीमन के बाद शीघ्र लागू होगा। स्वाभाविक है इस क्रांतिकारी परिवर्तन के बाद लोकतंत्र और प्रशासन की सूरत भी बदलेगी। पंचायतों में महिलाओं को पचास फीसदी आरक्षण पहले से ही प्राप्त है। इसके बावजूद देश के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में बदलाव की गति अत्यंत धीमी है। उसपर कन्या भ्रूण हत्या गंभीर असंतुलन पैदा कर रही है। यह स्थिति तब हैजबकि भारतीय संस्कृति के मूल आधार वेदों में नारी जाति को उच्च स्थान दिया गया है। नारी के प्रति ऐसा सम्मान और स्थान विश्व के किसी भी मत की पुस्तक में देखने को नहीं मिलता। महिला दिवस की सार्थकता तब है जब राजनीति और समाज की धारणा बदलें। नारी को उसका खोया सम्मान, अधिकार मिलें। अन्यथा ऐसे दिवस केवल शाब्दिक कर्मकांड बनकर रह जाएगे। ध्यान रहे अपनी मातृशक्ति के अशिक्षित, अस्वस्थ, असंतुलित, अपमानित, असमान रहते कोई भी समाज न तो विकास कर सकता है और न ही विश्व में सम्मान प्राप्त कर सकता है। हॉ कृतघन जरूर कहला सकता है। देश की सभी बेटियों को उच्चतम स्तर तक की शिक्षा तथा अन्य सुविधाएं बिना शुल्क, बिना भेदभाव दी जानी चाहिए । महिलाओं से संबंधित अपराधों की
होली से पहले दिल्ली की महिलाओं और बेटियों को बड़ा तोहफा, राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने लॉन्च की चार नई योजनाएं

नई दिल्ली । होली से पहले दिल्ली की महिलाओं और बेटियों के लिए एक बड़ी सौगात दी गई है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने दिल्ली सरकार की ओर से महिलाओं और बालिकाओं के कल्याण के लिए चार महत्वपूर्ण योजनाओं का शुभारंभ किया। इसे नारी शक्ति को समर्पित एक बड़ा उपहार माना जा रहा है। इस अवसर पर 40,642 बालिकाओं को लगभग 100 करोड़ रुपये की डीबीटी सहायता प्रदान की गई। सरकार का कहना है कि इन योजनाओं से बालिकाओं की पढ़ाई जारी रखने, उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहन और सामाजिक सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी। साथ ही महिलाओं के समग्र विकास और सशक्तिकरण में भी यह कदम अहम माना जा रहा है। नई योजनाओं का विवरण सहेली पिंक स्मार्ट कार्ड: महिलाओं को सुरक्षित और सुलभ सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के लिए मुफ्त बस यात्रा की शुरुआत। यह कार्ड डीटीसी बस, मेट्रो, आरआरटीएस और अन्य सार्वजनिक परिवहन में उपयोगी होगा।मुफ्त एलपीजी सिलेंडर योजना: होली पर महिलाओं और जरूरतमंद परिवारों को राहत देने के लिए लगभग 15.50 लाख राशन कार्ड धारक परिवारों के बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से 129 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए जाएंगे। दिल्ली लखपति बिटिया योजना: पुरानी लाडली योजना की तुलना में व्यापक और प्रभावी। इसमें बेटियों के लिए कुल 56,000 रुपये विभिन्न चरणों में जमा किए जाएंगे, जो 21 वर्ष की आयु तक ब्याज समेत 1 लाख रुपये से अधिक बन जाएंगे। इसका उद्देश्य बेटियों की शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना है।महिला सशक्तिकरण और कल्याण कार्यक्रम: बेटियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना, उनकी शिक्षा और भविष्य को मजबूत करना, और समाज में उनके सशक्तिकरण को बढ़ावा देना।पुरानी लाडली योजना से क्या अंतर नई दिल्ली लखपति बिटिया योजना में शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा पर अधिक जोर दिया गया है। पहले जन्म और पढ़ाई के अलग-अलग चरणों पर सीमित राशि जमा होती थी, जबकि अब यह अधिक मजबूत वित्तीय आधार प्रदान करती है।मुफ्त LPG सिलेंडर और पिंक मोबिलिटी कार्ड मुफ्त एलपीजी सिलेंडर योजना से लाखों परिवारों को महंगाई में राहत मिलेगी। पिंक मोबिलिटी कार्ड महिलाओं की यात्रा को और सुरक्षित, सुविधाजनक और सुलभ बनाएगा। इससे अलग-अलग टिकट या पास की जरूरत कम होगी और सार्वजनिक परिवहन में महिलाओं की सुविधा बढ़ेगी।यह पहल न केवल महिलाओं और बेटियों के कल्याण को मजबूत करेगी, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाने और समाज में समान अवसर देने की दिशा में भी अहम साबित होगी।