GWALIOR HIGH COURT: सिर्फ बरी होना काफी नहीं; हाईकोर्ट बोला- पुलिस भर्ती में चरित्र सबसे अहम

HIGHLIGHTS: हाईकोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति पर दिया अहम फैसला पुलिस नौकरी के लिए “ससम्मान बरी” होना जरूरी समझौते या गवाह मुकरने पर मिली राहत पर्याप्त नहीं योगेश शर्मा की रिट अपील खारिज चोरी और मारपीट को माना गंभीर नैतिक अपराध GWALIOR HIGH COURT: मध्यप्रदेश। ग्वालियर हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पुलिस विभाग में अनुकंपा नियुक्ति को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि सिर्फ किसी आपराधिक मामले से बरी हो जाना पुलिस सेवा के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। यदि आरोपी को गवाहों के मुकर जाने, सबूतों की कमी या समझौते के आधार पर राहत मिली है, तो उसे ससम्मान दोषमुक्ति नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि पुलिस जैसे अनुशासित विभाग में नियुक्ति के लिए चरित्र और विश्वसनीयता सबसे अहम है। कड़वा खीरा घर लाने से बचना है तो जान लें ये सीक्रेट तरीका, मीठे खीरे की पहचान मिनटों में आरक्षक भर्ती में खारिज हुई याचिकाकर्ता की अपील यह फैसला जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की खंडपीठ ने योगेश शर्मा की रिट अपील खारिज करते हुए दिया। योगेश के पिता पुलिस विभाग में कार्यरत थे और सेवा के दौरान उनका निधन हो गया था। इसके बाद योगेश ने अनुकंपा नियुक्ति के तहत आरक्षक पद के लिए आवेदन किया था। लेकिन चरित्र सत्यापन में उसके खिलाफ चोरी और गंभीर मारपीट समेत तीन आपराधिक मामले सामने आए। पुलिस विभाग ने 11 जुलाई 2017 को आवेदन यह कहते हुए निरस्त कर दिया था कि वह तकनीकी आधार पर बरी हुआ है। कमजोर और सूखे नाखूनों की समस्या: जानिए कैसे वापस पा सकते हैं मजबूत और चमकदार नाखून सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने आदेशों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि अभियोजन पक्ष पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाता या गवाह बयान बदल देते हैं, तो आरोपी को केवल संदेह का लाभ मिलता है। ऐसी स्थिति में उसे पूरी तरह निर्दोष नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि ससम्मान बरी होने और तकनीकी आधार पर छूटने में बड़ा अंतर है। बलूचिस्तान में अपहरण के नए मामले, मानवाधिकार संगठनों ने उठाए गंभीर सवाल, PAK सेना पर आरोप पात्रता और उपयुक्तता में अंतर समझाया हाईकोर्ट ने कहा कि किसी पद के लिए पात्र होना और उस पद के लिए उपयुक्त होना दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत चयन प्रक्रिया की वैधता की समीक्षा कर सकती है, लेकिन विभाग के निर्णय में दखल नहीं दे सकती कि कौन व्यक्ति पुलिस सेवा के लिए उपयुक्त है। कोर्ट ने चोरी और मारपीट जैसे अपराधों को नैतिक अधमता से जुड़ा गंभीर मामला माना।