नींद की कमी पर अनोखी पहल: सियोल में ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’, 80 साल के बुजुर्ग ने मारी बाजी

नई दिल्ली। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में एक अनोखा और दिलचस्प आयोजन देखने को मिला, जहां लोगों को सोने के लिए आमंत्रित किया गया। ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ नाम की इस प्रतियोगिता का मकसद सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश में बढ़ती नींद की कमी की गंभीर समस्या की ओर ध्यान खींचना था। सियोल मेट्रोपॉलिटन गवर्नमेंट द्वारा आयोजित इस इवेंट में हजारों युवा हान नदी किनारे स्थित पार्क में पहुंचे और खुले आसमान के नीचे सुकून की नींद लेने की कोशिश की। तेज-रफ्तार जिंदगी और काम के भारी दबाव के लिए मशहूर दक्षिण कोरिया में युवाओं के बीच नींद की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है। यही वजह है कि इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए प्रतिभागियों को थका हुआ और पेट भरकर आने की शर्त दी गई थी, ताकि वे गहरी नींद ले सकें। कई प्रतिभागी मजेदार वेशभूषा में पहुंचे। कोई ‘स्लीपिंग ब्यूटी’ बना तो कोई ‘स्लीपिंग प्रिंस’। प्रतियोगिता में शामिल 20 वर्षीय छात्र पार्क जून-सियोक पारंपरिक शाही पोशाक पहनकर आए और बताया कि पढ़ाई और पार्ट-टाइम जॉब के कारण उन्हें रोजाना सिर्फ 3-4 घंटे ही नींद मिल पाती है। वहीं, अनिद्रा से जूझ रही एक शिक्षिका कोआला की ड्रेस में नजर आईं, ताकि वह इस मौके पर सुकून से सो सकें। इस अनोखे मुकाबले में प्रतिभागियों की नींद की गुणवत्ता को मापने के लिए उनकी हार्ट रेट मॉनिटर की गई, जिससे पता चल सके कि कौन सबसे गहरी और शांत नींद ले रहा है। प्रतियोगिता की शुरुआत दोपहर में हुई और कुछ ही देर में पूरे पार्क में सन्नाटा छा गया, मानो शहर की भागदौड़ थम गई हो। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि इस ‘नींद की जंग’ में 80 वर्षीय बुजुर्ग ने बाजी मार ली, जबकि दूसरे स्थान पर एक 37 वर्षीय ऑफिस वर्कर रहे, जो नाइट शिफ्ट और काम के दबाव से बेहद थके हुए थे। यह प्रतियोगिता सिर्फ एक इवेंट नहीं, बल्कि एक बड़ा संदेश है कि आधुनिक जीवनशैली में नींद की अनदेखी किस हद तक बढ़ चुकी है। OECD देशों में सबसे कम सोने वाले देशों में शामिल दक्षिण कोरिया अब इस समस्या को लेकर जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है और यह ‘पावर नैप कॉन्टेस्ट’ उसी दिशा में एक अनोखी पहल बनकर सामने आया है।
मप्रः शिवपुरी में युवक की पीट-पीटकर हत्या, नाले में मिला शव

शिवपुरी। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में रन्नौद थाना क्षेत्र के नेगमा गांव में एक युवक की पीट-पीटकर हत्या करने का मामला सामने आया है। सोमवार को सुबह उसका शव गांव के पास नाले में मिला। पुलिस ने पांच लोगों पर हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस के अनुसार, ग्राम नेगमा निवासी अर्जुन पाल (26) का कोलारस की 20 वर्षीय युवती से प्रेम संबंध था। सोमवार को युवती की सगाई तय थी। एक दिन पहले उसने अर्जुन को जानकारी दी, जिसके बाद दोनों ने भागने की योजना बनाई। रविवार देर शाम अर्जुन अपने रिश्तेदार कल्ला पाल के साथ कोलारस पहुंचा। रात करीब एक बजे दोनों युवती के घर के पास पहुंचे, लेकिन पहले से सतर्क परिजनों ने दोनों को पकड़ लिया। कल्ला मौके से भाग निकला, जबकि अर्जुन को परिजन घर ले गए। आरोप है कि परिजनों ने अर्जुन को घर में बंधक बनाकर रातभर बेरहमी से पीटा, जिससे उसकी मौत हो गई। इसके बाद शव को घर से करीब 100 मीटर दूर नाले में फेंक दिया गया। सोमवार सुबह ग्रामीणों ने नाले में शव देखा और पुलिस को सूचना दी। पहचान अर्जुन पाल के रूप में हुई। बताया जा रहा है कि युवती का दादा खुद थाने पहुंचा और मारपीट की जानकारी दी। कल्ला पाल के मुताबिक अर्जुन पास के एक कृषि फार्म पर मजदूरी करता था। करीब 4-6 माह पहले उसी फार्म पर युवती भी काम करने आई थी, जहां दोनों की मुलाकात हुई। इसके बाद दोनों ने मोबाइल नंबर बदले और बातचीत शुरू हो गई। करीब डेढ़ माह पहले युवती को फोन पर बात करते हुए परिजनों ने पकड़ लिया था। अलग-अलग समाज होने के कारण परिवार ने उस पर पाबंदियां लगा दी थीं। परिजनों को प्रेम संबंध का पता चलने के बाद अर्जुन को फोन पर धमकियां दी जा रही थीं। इसके चलते वह कोलारस छोड़कर ट्रक पर काम करने चला गया था, हालांकि दोनों के बीच संपर्क बना रहा। कल्ला के मुताबिक, अर्जुन ने उसे फोन कर युवती को भगाने में मदद मांगी थी। प्लान था कि युवती खुद घर से निकलेगी और वे बस से शिवपुरी जाकर कोर्ट मैरिज करेंगे। लेकिन युवती की जगह उसके परिजन मौके पर पहुंच गए और हमला कर दिया। कल्ला पाल की शिकायत पर पुलिस ने युवती के पिता, दादा और तीन अन्य के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। थाना प्रभारी गब्बर सिंह गुर्जर ने बताया कि आरोपियों की तलाश जारी है।
Report: भारत में 40% युवाओं को नहीं मिल पाती नौकरी… 1.1 करोड़ स्तानक हैं बेरोजगार

नई दिल्ली । देश (India) में 20 से 29 साल के 6.3 करोड़ स्नातकों में से 1.1 करोड़ बेरोजगार (Graduate Unemployment) हैं। चिंता की बात यह है कि बेरोजगार के रूप में पंजीकरण कराने के एक वर्ष के भीतर सिर्फ सात फीसदी स्नातकों को स्थायी वेतन वाली नौकरी (Job) मिल पाती है। हाल के वर्षों में स्नातकों की बढ़ती संख्या के कारण यह समस्या और बढ़ गई है। अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय (Azim Premji University) की ओर से जारी रिपोर्ट ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’ के मुताबिक, देश में युवाओं (15-29 वर्ष) की उच्च शिक्षा तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, रोजगार से जुड़ी चुनौतियां अब भी कायम हैं। स्नातकों में बेरोजगारी दर उच्च बनी हुई है। 15 से 25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर करीब 40 फीसदी और 25 से 29 वर्ष की आयु वर्ग में 20 फीसदी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि स्नातक युवाओं को आय के मामले में लाभ मिलता है और उनकी शुरुआती कमाई गैर-स्नातकों के मुकाबले लगभग दोगुनी होती है। इसके बावजूद 2011 के बाद युवा पुरुष स्नातकों के वेतन में वृद्धि की रफ्तार धीमी पड़ी है। रिपोर्ट की मुख्य लेखिका प्रोफेसर रोजा अब्राहम ने कहा, यह अध्ययन शिक्षा से रोजगार तक युवाओं की यात्रा और उसमें आए बदलावों को दर्शाता है। पुरुषों की नामांकन दर में गिरावटपिछले चार दशक में उच्च शिक्षा में नामांकन दर 28 फीसदी तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है। हालांकि, पुरुषों के नामांकन में गिरावट आई है। यह 2017 के 38 फीसदी से घटकर 2024 के अंत तक 34 फीसदी रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि पुरुष परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए कमाने के मौके तलाशने लगते हैं। उच्च शिक्षण संस्थानों का दायरा भी बढ़ा है। प्रति लाख युवाओं पर कॉलेज की संख्या 2010 के 29 से बढ़कर 2021 में 45 पहुंच गईं, जिसमें निजी संस्थानों की बड़ी भूमिका रही है। गरीब परिवारों की उच्च शिक्षा में बढ़ी भागीदारीरिपोर्ट के मुताबिक, उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो 2007 के आठ फीसदी से बढ़कर 2017 में 15 फीसदी हो गई है। लेकिन, आर्थिक बाधाएं अब भी बनी हुई हैं। महंगे पेशेवर पाठ्यक्रमों मसलन इंजीनियरिंग और मेडिकल में अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग के छात्र-छात्राओं की भागीदारी अधिक है। युवा तेजी से कृषि से हटकर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2010 के बाद औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में करीब 300 फीसदी की वृद्धि हुई है। साथ ही, निजी संस्थानों में गुणवत्ता को लेकर चिंताएं भी सामने आई हैं।