9 अगस्त 1933 को अजमेर में जन्मे जोशी की जड़ें उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के सुसंस्कृत कुमाऊंनी ब्राह्मण परिवार में थीं। दिलचस्प बात यह है कि इस हिंदी साहित्य के पुरोधा ने अपने करियर की शुरुआत विज्ञान से की। लखनऊ विश्वविद्यालय से बीएससी करने वाले जोशी की सोच में तार्किकता और विश्लेषण का वो दम था जो बाद में उनके साहित्य में नजर आया। उनका लेखन भावनाओं का रुदन नहीं बल्कि समाज का सर्जिकल विश्लेषण पेश करता था।
लखनऊ में उनकी मुलाकात हिंदी साहित्य के दिग्गज अमृतलाल नागर से हुई। नागर के मार्गदर्शन में उन्होंने सीखा कि महान साहित्य वह है जो सीधे आम आदमी के दिल तक पहुंचे। यहीं से मनोहर श्याम जोशी के भीतर ‘किस्सागो’ की आत्मा जन्मी।
लेखक बनने से पहले वे पत्रकार थे। ऑल इंडिया रेडियो में काम करते हुए उन्होंने आवाज की शक्ति को महसूस किया और फिल्म्स डिवीजन में वृत्तचित्र लिखते हुए सिनेमाई दृष्टि पाई। साहित्यकार अज्ञेय ने उन्हें ‘दिनमान’ पत्रिका का सहायक संपादक बनाया। इसके बाद जब वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादक बने, तो हिंदी पट्टी के हर घर में उनकी लेखनी की मौजूदगी महसूस होने लगी।
1984 में आए 154 एपिसोड तक चलने वाले ‘हम लोग’ ने उन्हें भारतीय सोप ओपेरा का जनक बना दिया। अगर ‘हम लोग’ टीवी का रामायण था, तो 1986 में आई ‘बुनियाद’ उसका महाभारत थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पीड़ा और विस्थापन को उन्होंने मास्टर हवेलीराम और लाजो की कहानी के माध्यम से जिस शिद्दत से पेश किया, उसने पूरे देश को रुला दिया। निर्देशक रमेश सिप्पी ने भी माना कि ‘बुनियाद’ की सफलता की असली बुनियाद मनोहर श्याम जोशी की कलम ही थी।
इसके बाद उन्होंने ‘कक्काजी कहिन’, ‘मुंगेरीलाल के हसीन सपने’ और कई अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से टीवी पर व्यंग्य, हास्य और मनोवैज्ञानिक गहराई का अनोखा मिश्रण पेश किया। उनकी शैली हमेशा पारंपरिक व्याकरण और शब्दों की सीमाओं को चुनौती देती रही।
उनका पहला उपन्यास ‘कुरु कुरु स्वाहा’ (1980) साहित्य जगत में तहलका मचा गया। ‘कसप’ और ‘क्याप’ जैसे उपन्यासों ने उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिलाया। उनके उपन्यासों में सिनेमा का असर भी साफ दिखाई देता है; कैमरा, साइलेंट शॉट और म्यूट फेस जैसे शब्दों से पाठक मानो फिल्म देख रहे हों। कमल हासन की फिल्म ‘हे राम’ के हिंदी संवाद भी उनकी ही देन हैं।
30 मार्च 2006 को 72 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में मनोहर श्याम जोशी ने अंतिम सांस ली। लेकिन उनके साहित्य और टीवी के योगदान ने हिंदी सिनेमा और टेलीविजन को एक नई दिशा दी, और उन्हें ‘किस्सागोई’ का उस्ताद बना दिया।