ज्वालामुखी के मुंह पर बसा ‘नरक जैसा’ इलाका
डालोल दरअसल नमक से भरे एक ज्वालामुखी क्रेटर के ऊपर बसा है। यहां लगातार हाइड्रोथर्मल गतिविधियां होती रहती हैं, जिससे उबलता पानी, जहरीली गैसें और खनिज सतह पर निकलते रहते हैं। जमीन से निकलते ये उबलते झरने किसी उबलते हुए “पृथ्वी के जख्म” जैसे लगते हैं। तापमान इतना ज्यादा होता है कि कई जगह पानी 90 डिग्री सेल्सियस से ऊपर तक पहुंच जाता है।
रंगों का मायाजाल, लेकिन बेहद खतरनाक
NASA के अनुसार, डालोल का इलाका देखने में बेहद रंगीन और आकर्षक लगता है—पीला रंग सल्फर से, लाल आयरन ऑक्साइड से और हरा कॉपर सॉल्ट से बनता है। लेकिन यह खूबसूरती बेहद खतरनाक है, क्योंकि यहां का पानी अत्यधिक अम्लीय (pH 0.25 तक) और बेहद नमकीन है। जमीन पर बनी नमक की चिमनियां और रंग-बिरंगे झरने इसे किसी दूसरे ग्रह जैसा बना देते हैं।
जहरीली हवा, जहां इंसानों का रहना लगभग नामुमकिन
इस क्षेत्र की हवा में क्लोरीन और सल्फर जैसी जहरीली गैसें मौजूद रहती हैं। यही कारण है कि यहां लंबे समय तक इंसानों का रहना लगभग असंभव माना जाता है। इसके बावजूद, यह इलाका पूरी तरह निर्जीव नहीं है।
मौत के बीच जीवन की खोज
वैज्ञानिकों के लिए डालोल किसी खजाने से कम नहीं है। स्पेन के एस्ट्रोबायोलॉजी सेंटर के डॉ. फेलिप गोमेज की टीम ने यहां ऐसे सूक्ष्म जीव (बैक्टीरिया) खोजे हैं जो अत्यधिक गर्मी, अम्लता और नमक के बीच भी जीवित रह सकते हैं। ये बैक्टीरिया सामान्य जीवों से 20 गुना तक छोटे हैं और बेहद कठिन परिस्थितियों में भी पनपते हैं। इससे यह सवाल उठता है कि जीवन कितनी चरम परिस्थितियों में संभव हो सकता है।
मंगल ग्रह से कनेक्शन
वैज्ञानिक डालोल को मंगल ग्रह के पुराने वातावरण का मॉडल मानते हैं। यहां की हाइड्रोथर्मल गतिविधियां, खनिज और अम्लीय स्थितियां मंगल के कुछ क्षेत्रों से काफी मिलती-जुलती हैं। इसी वजह से इस इलाके का अध्ययन अंतरिक्ष में जीवन की संभावनाओं को समझने में मदद करता है।
पृथ्वी का सबसे गर्म और अनोखा इलाका
समुद्र तल से 125 मीटर नीचे स्थित डालोल का औसत तापमान सालभर 34-35 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। यह पृथ्वी के सबसे गर्म बसे हुए इलाकों में से एक माना जाता है। यहां जिंक, मैंगनीज, सल्फाइड और रॉक सॉल्ट जैसे खनिज लगातार बनते रहते हैं, जो इसे भूवैज्ञानिक रूप से बेहद खास बनाते हैं।
रहस्य और खतरे का अनोखा संगम
डालोल सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि प्रकृति की चरम सीमाओं का जीवंत उदाहरण है। जहां एक तरफ यह इलाका जीवन के लिए लगभग असंभव है, वहीं दूसरी ओर यहां मौजूद सूक्ष्म जीव यह साबित करते हैं कि जीवन हर मुश्किल परिस्थिति में अपना रास्ता खोज ही लेता है।