मुख्यमंत्री आज रंगपंचमी पर उज्जैन में श्री कृष्ण-सुदामा रंग उत्सव में होंगे शामिल

उज्जैन। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आज रविवार को रंग पंचमी के अवसर पर उज्जैन में आयोजित श्री कृष्ण-सुदामा रंग उत्सव कार्यक्रम में सम्मिलित होंगे। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. यादव सुबह 09 बजे श्री कृष्ण सुदामा रंग उत्सव गेर (चल समारोह) में सिंधी कॉलोनी से सम्मिलित होकर टॉवर चौराहे तक जाएंगे। टॉवर चौराहे पर मुख्य कार्यक्रम आयोजित होंगे। इन सभी कार्यक्रमों में मुख्यमंत्री सम्मिलित होंगे। रंग उत्सव कार्यक्रम में सामाजिक संस्थाओं द्वारा स्वागत द्वार, मंच लगाकर मुख्यमंत्री डॉ. यादव का स्वागत किया जाएगा। इस अवसर पर प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्र से आने वाली मंडली, झांकियां, फाग उत्सव करने वाले संस्थाओं के द्वारा विशेष आयोजन भी किए जाएंगे। लाइव झांकियां भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित होगी।
Women’s Day Special: पैरों की थकान से राहत दिलाएगा टोगा योगा, 5 मिनट की ये एक्सरसाइज देगी शरीर और दिमाग को एनर्जी

नई दिल्ली। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में महिलाएं एक साथ कई जिम्मेदारियां निभाती हैं। घर संभालना, ऑफिस का काम करना और परिवार की देखभाल करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। ऐसे में अक्सर महिलाएं अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं। दिनभर खड़े रहना, ज्यादा चलना या लंबे समय तक बैठकर काम करना पैरों में दर्द, सूजन और थकान का कारण बन सकता है। इन्हीं समस्याओं से राहत दिलाने के लिए एक बेहद आसान और असरदार एक्सरसाइज है टोगा योगा। यह एक सरल फुट एक्सरसाइज है जो पैरों की उंगलियों और तलवों की मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करती है। टोगा शब्द Toe यानी पैर की उंगलियों और Yoga यानी योग से मिलकर बना है। इसे करने के लिए किसी विशेष उपकरण या ज्यादा समय की जरूरत नहीं होती। दिन में सिर्फ पांच मिनट इस एक्सरसाइज को करने से शरीर और दिमाग दोनों को नई ऊर्जा मिल सकती है। टोगा योगा में पैरों की उंगलियों को अलग अलग तरीके से हिलाया और स्ट्रेच किया जाता है। देखने में यह एक्सरसाइज बहुत आसान लगती है लेकिन इसके फायदे काफी प्रभावी होते हैं। हमारे पैरों में कई छोटी छोटी मांसपेशियां होती हैं जो शरीर के संतुलन, चलने फिरने और खड़े रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। टोगा योगा इन मांसपेशियों को सक्रिय और मजबूत बनाने में मदद करता है। इस एक्सरसाइज का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे पैरों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। जब पैरों की मसल्स मजबूत होती हैं तो लंबे समय तक खड़े रहने या चलने के दौरान थकान कम महसूस होती है। खासतौर पर उन महिलाओं के लिए यह एक्सरसाइज काफी फायदेमंद हो सकती है जिन्हें काम के दौरान लंबे समय तक खड़ा रहना पड़ता है। टोगा योगा करने से पैरों में ब्लड सर्कुलेशन भी बेहतर होता है। जब पैरों की उंगलियों को हिलाया और स्ट्रेच किया जाता है तो रक्त प्रवाह में सुधार होता है जिससे सूजन और भारीपन की समस्या कम हो सकती है। बेहतर ब्लड सर्कुलेशन पूरे शरीर में ऊर्जा बनाए रखने में भी मदद करता है। यह एक्सरसाइज मानसिक तनाव और थकान को कम करने में भी सहायक मानी जाती है। जब हम ध्यानपूर्वक पैरों की मांसपेशियों को स्ट्रेच करते हैं तो शरीर में रिलैक्सेशन का एहसास होता है। इससे दिनभर की थकान कम होती है और मन भी शांत महसूस करता है। टोगा योगा करने के लिए कुछ आसान एक्सरसाइज अपनाई जा सकती हैं। इसमें टो स्प्रेड एक्सरसाइज के तहत पैरों की सभी उंगलियों को फैलाकर कुछ सेकंड तक उसी स्थिति में रखा जाता है। बिग टो लिफ्ट में पैर की बाकी उंगलियों को जमीन पर रखते हुए केवल अंगूठे को ऊपर उठाने की कोशिश की जाती है। टो कर्ल एक्सरसाइज में पैरों की उंगलियों को अंदर की ओर मोड़कर फिर सीधा किया जाता है। टो टैपिंग में उंगलियों को धीरे धीरे जमीन पर टैप किया जाता है। वहीं तौलिया ग्रिप एक्सरसाइज में जमीन पर रखे छोटे तौलिये को पैरों की उंगलियों से पकड़कर अपनी ओर खींचा जाता है। महिलाएं अक्सर अपने परिवार और काम की जिम्मेदारियों के बीच खुद को समय नहीं दे पातीं। लेकिन दिन में सिर्फ कुछ मिनट का यह छोटा सा प्रयास सेहत के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है। टोगा योगा एक ऐसी आसान और प्रभावी एक्सरसाइज है जिसे रोजाना अपनाकर पैरों की मजबूती, बेहतर ब्लड सर्कुलेशन और मानसिक राहत हासिल की जा सकती है।
मध्य प्रदेश में ग्राम सभाओं से सशक्त होंगी महिलाएं

– प्रद्युम्न शर्मा हर वर्ष आठ मार्च को मनाया जाने वाला अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के अधिकारों, समानता और सम्मान के संघर्ष का प्रतीक है। यह दिन समाज को यह याद दिलाने का अवसर भी है कि महिलाओं की भागीदारी और सशक्तिकरण के बिना समावेशी विकास संभव नहीं है। इसी सोच को व्यवहार में उतारने की दिशा में मध्यप्रदेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। राज्य सरकार ने इस विशेष प्रसंग के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रदेश की ग्राम पंचायतों में विशेष ग्राम सभाओं का आयोजन किया जाना सुनिश्चित किया है। इन ग्राम सभाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के अधिकारों, सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा करना और स्थानीय स्तर पर ठोस निर्णय लेना है। मध्यप्रदेश में पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए न्यूनतम पचास प्रतिशत पदों के आरक्षण की व्यवस्था की गई है। वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायतों के पंचवर्षीय कार्यकाल में निर्वाचित महिला पंचायत प्रतिनिधियों का प्रतिशत पचास से भी अधिक, लगभग बावन प्रतिशत है। यह स्थिति दर्शाती है कि पंचायत व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है और वे अब केवल औपचारिक प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाली ग्राम सभाओं को सार्थक और प्रभावी बनाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी इन्हीं महिला पंचायत प्रतिनिधियों के कंधों पर है। यदि वे सक्रिय रूप से अपनी भूमिका निभाती हैं, तो ग्राम स्तर पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों के समाधान की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति संभव है। यदि हम एक नजर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर डालें तो इसका इतिहास महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा हुआ है। बीसवीं सदी के प्रारंभ में यूरोप और उत्तरी अमेरिका में महिला श्रमिकों ने अपने अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किए थे। इन आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य कार्य के बेहतर घंटे, उचित पारिश्रमिक और समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता को समाप्त करना था। धीरे-धीरे यह आंदोलन वैश्विक स्तर पर फैल गया और महिलाओं के अधिकारों की आवाज मजबूत होती गई। वर्ष 1975 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया और उसी वर्ष आठ मार्च को आधिकारिक रूप से अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। तब से यह दिन दुनिया भर में महिलाओं की उपलब्धियों को सम्मान देने और उनके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है। पंचायतों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद एक महत्वपूर्ण प्रश्न अक्सर सामने आता है कि क्या महिला पंचायत प्रतिनिधि वास्तव में स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन कर रही हैं। कई स्थानों पर महिलाएं सक्रिय रूप से पंचायत के कार्यों में भाग ले रही हैं और विकास योजनाओं के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, किंतु कुछ जगहों पर अभी भी ऐसी स्थिति देखने को मिलती है जहां महिला प्रतिनिधियों के स्थान पर उनके परिवार के पुरुष सदस्य पंचायत के निर्णय लेते हैं और कार्यों का संचालन करते हैं। इसे प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व कहा जाता है। यह स्थिति महिलाओं के वास्तविक सशक्तिकरण में बाधा उत्पन्न करती है। इसलिए महिला पंचायत प्रतिनिधियों का क्षमता संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। उन्हें योजनाओं, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और कानूनों की जानकारी देकर आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनाना जरूरी है। महिला सशक्तिकरण के लिए समाज की सक्रिय भूमिका भी आवश्यक है। महिलाओं की शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देना समय की मांग है। आज महिला साक्षरता पहले की तुलना में काफी आगे बढ़ी है, किंतु सिर्फ साक्षरता ही पर्याप्त नहीं। महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और सामाजिक सम्मान मिलना भी जरूरी है। साथ ही पारंपरिक सामाजिक सोच और पुरुषों के अनावश्यक हस्तक्षेप को भी कम करना होगा, ताकि महिलाएं स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम बन सकें। ग्राम सभाएं ग्रामीण लोकतंत्र की आधारशिला मानी जाती हैं। यही वह मंच है जहां गांव के विकास से जुड़े निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आयोजित विशेष ग्राम सभाएं महिलाओं के मुद्दों पर चर्चा करने का एक प्रभावी मंच बन सकती हैं। इन सभाओं में महिला पंचायत प्रतिनिधियों के साथ-साथ गांव की अन्य महिलाओं और किशोरी बालिकाओं की समस्याओं, आवश्यकताओं और संभावनाओं पर भी खुलकर चर्चा की जा सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर समाधान खोजने और महिलाओं के हित में ठोस निर्णय लेने का अवसर मिलता है। इन विशेष ग्राम सभाओं को प्रेरणादायक और परिणामकारी बनाने के लिए कई सकारात्मक पहलें की जा सकती हैं। गांव में उत्कृष्ट कार्य करने वाली महिलाओं और किशोरी बालिकाओं को सम्मानित किया जा सकता है, जिससे अन्य महिलाओं को भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलेगी। इसके अलावा महिलाओं की आजीविका, कौशल विकास और शिक्षा से जुड़े विषयों पर चर्चा की जा सकती है। महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सम्मान से जुड़े मुद्दों पर भी ग्राम स्तर पर महत्वपूर्ण संकल्प लिए जा सकते हैं। ग्राम सभाओं की सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि गांव की अधिक से अधिक महिलाएं इसमें भाग लें। इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ग्राम सभा के आयोजन की सूचना गांव की सभी महिलाओं तक पहुंचे। महिला स्वसहायता समूहों की सक्रिय भागीदारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ये समूह ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन ग्राम सभाओं में महिलाओं को उनके अधिकारों से जुड़े कानूनों की जानकारी देना भी अत्यंत आवश्यक है। दहेज प्रतिषेध अधिनियम 1961, घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006 और कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न से संबंधित कानूनों के बारे में जानकारी देकर महिलाओं को जागरूक बनाया जा सकता है। इसके साथ-साथ सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, नारी सशक्तिकरण मिशन और वन स्टॉप सेंटर जैसी सुविधाओं के बारे में भी जानकारी दी जा सकती है। राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार इन ग्राम सभाओं में कई सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी विषयों पर भी चर्चा की जाएगी। इनमें बाल विवाह की रोकथाम, किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य और पोषण, धात्री माताओं की देखभाल, एनीमिया से पीड़ित महिलाओं और किशोरियों के उपचार तथा व्यक्तिगत स्वच्छता जैसे महत्वपूर्ण विषय शामिल
Women’s Day Special: साइलेंट बोन लॉस से बचना है तो अपनाएं ये 6 हेल्थ टिप्स, 30 के बाद महिलाओं के लिए बेहद जरूरी

नई दिल्ली। हर साल 8 मार्च को दुनिया भर में विमेंस डे मनाया जाता है। यह दिन केवल महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाने के लिए ही नहीं बल्कि उनकी सेहत के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए भी खास माना जाता है। अक्सर महिलाएं परिवार और काम की जिम्मेदारियों में इतनी व्यस्त हो जाती हैं कि अपनी सेहत को नजरअंदाज कर देती हैं। खासतौर पर 30 की उम्र के बाद शरीर में कई ऐसे बदलाव शुरू हो जाते हैं जिनका असर हड्डियों की मजबूती पर भी पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार कई महिलाओं में 30 साल की उम्र के बाद बोन डेंसिटी धीरे धीरे कम होने लगती है। हड्डियों के कमजोर होने की इस प्रक्रिया को मेडिकल भाषा में ऑस्टियोपोरोसिस या साइलेंट बोन लॉस कहा जाता है। इसे साइलेंट बीमारी इसलिए कहा जाता है क्योंकि शुरुआती दौर में इसके लक्षण साफ दिखाई नहीं देते। जब तक इसका पता चलता है तब तक कई बार हड्डियां काफी कमजोर हो चुकी होती हैं और मामूली चोट में भी फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक महिलाओं में हड्डियों के कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का कम होना है। यह हार्मोन हड्डियों को मजबूत रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है और खासकर मेनोपॉज के दौरान इसका स्तर तेजी से घटने लगता है। इसके अलावा कैल्शियम और विटामिन D की कमी भी हड्डियों को कमजोर बना सकती है। आज की लाइफस्टाइल भी इस समस्या को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभा रही है। लंबे समय तक बैठकर काम करना, एक्सरसाइज न करना और शारीरिक गतिविधियों की कमी हड्डियों को कमजोर कर सकती है। वहीं धूम्रपान और अधिक शराब का सेवन भी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को प्रभावित करता है जिससे हड्डियों की ताकत धीरे धीरे कम होने लगती है। कुछ मामलों में पारिवारिक इतिहास भी इस समस्या का कारण बन सकता है। अगर परिवार में किसी को पहले से ऑस्टियोपोरोसिस की समस्या रही है तो महिलाओं में इसका खतरा ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा बहुत कम वजन वाली महिलाओं में भी हड्डियों के कमजोर होने की संभावना अधिक रहती है। साइलेंट बोन लॉस का खतरा इसलिए भी ज्यादा माना जाता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण आसानी से समझ नहीं आते। कई बार हल्की चोट में भी हड्डी टूट जाना, कमर या पीठ में लगातार दर्द रहना, शरीर का झुकना या उम्र के साथ लंबाई का धीरे धीरे कम होना इसके संकेत हो सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञ समय समय पर बोन डेंसिटी टेस्ट कराने की सलाह देते हैं ताकि हड्डियों की स्थिति का सही पता चल सके। हड्डियों को मजबूत बनाए रखने के लिए सही खानपान और स्वस्थ जीवनशैली बेहद जरूरी है। कैल्शियम और विटामिन D से भरपूर आहार जैसे दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम, अखरोट और मछली का सेवन हड्डियों के लिए फायदेमंद माना जाता है। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह से सप्लीमेंट भी लिए जा सकते हैं। इसके अलावा नियमित व्यायाम भी हड्डियों की मजबूती के लिए बहुत जरूरी है। रोजाना वॉकिंग, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और हल्की एक्सरसाइज करने से हड्डियां मजबूत रहती हैं और शरीर भी एक्टिव बना रहता है। विशेषज्ञ यह भी सलाह देते हैं कि कैफीन और शराब का अधिक सेवन करने से बचना चाहिए और धूम्रपान से दूरी बनाकर रखना चाहिए। साथ ही मानसिक तनाव को कम करने के लिए योग और मेडिटेशन जैसी आदतें अपनाना भी सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और समय समय पर हेल्थ चेकअप कराएं। सही डाइट, एक्टिव लाइफस्टाइल और नियमित जांच की मदद से हड्डियों को लंबे समय तक मजबूत और स्वस्थ रखा जा सकता है।
आज रंग पंचमी पर लगाएं लड्डू गोपाल को ये प्रिय भोग, घर में बनी रहेगी सुख, समृद्धि और खुशहाली

नई दिल्ली । रंग पंचमी का त्योहार भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनकी लीलाओं से जुड़ा हुआ माना जाता है। होली के पांच दिन बाद आने वाला यह पर्व भक्तों के लिए विशेष महत्व रखता है और इस दिन कई घरों और मंदिरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार और पूजा होती है। माना जाता है कि जिस घर में लड्डू गोपाल की सेवा होती है वहां हमेशा सुख समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप लड्डू गोपाल को बच्चे की तरह ही समझा जाता है। उनकी देखभाल और पूजा भी उसी तरह की जाती है जैसे घर के छोटे बच्चों की। त्योहारों के समय उनके लिए विशेष मिठाइयाँ और व्यंजन बनाना एक परंपरा रही है। रंग पंचमी पर भी भक्त लड्डू गोपाल का श्रृंगार करते हैं और उन्हें स्वादिष्ट भोग अर्पित करते हैं। इस दिन लड्डू गोपाल को भोग लगाना बेहद शुभ माना जाता है। सबसे प्रिय माना जाने वाला भोग गुजिया है। होली के समय बनने वाली यह मिठाई भगवान को बहुत प्रिय मानी जाती है। कई घरों और मंदिरों में रंग पंचमी पर सबसे पहले गुजिया लड्डू गोपाल को अर्पित की जाती है। माना जाता है कि इससे भगवान प्रसन्न होते हैं और घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गुजिया के अलावा चंद्रकला और अन्य पारंपरिक मिठाइयाँ भी भोग में लगाई जाती हैं। भगवान श्रीकृष्ण को दही बहुत प्रिय है इसलिए इस दिन लड्डू गोपाल को दही या मीठी दही का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। अगर घर में दही से कोई व्यंजन उपलब्ध हो तो उसे भी अर्पित किया जा सकता है। केवल दही और चीनी मिलाकर भोग लगाना भी भगवान को प्रिय होता है और इससे परिवार में प्रेम और आपसी सद्भाव बना रहता है। जलेबी और मालपुए का भोग भी इस दिन लगाना विशेष लाभकारी माना जाता है। कई मंदिरों में रंग पंचमी पर जलेबी और मालपुए का भोग विशेष रूप से लगाया जाता है। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और भगवान की कृपा से घर में खुशहाली आती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान को भोग लगाने में सबसे महत्वपूर्ण तत्व श्रद्धा और भक्ति है। अगर भक्त सच्चे मन से भोग अर्पित करता है तो भगवान प्रसन्न होते हैं। इसलिए रंग पंचमी पर लड्डू गोपाल की सेवा करते समय प्रेम और श्रद्धा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। भोग लगाने के बाद भगवान की आरती करना और प्रसाद को परिवार में बाँटना भी शुभ माना जाता है। रंग पंचमी का त्योहार ब्रज क्षेत्र की परंपराओं से जुड़ा है जहां इस दिन रंगों और गुलाल के साथ भगवान कृष्ण की पूजा होती है। मंदिरों में भजन-कीर्तन और उत्सव का आयोजन किया जाता है। यह पर्व प्रेम भक्ति और आनंद का प्रतीक है और भक्त इस दिन भगवान श्रीकृष्ण से सुख समृद्धि और शांति की कामना करते हैं। घर में लड्डू गोपाल की पूजा सुबह स्नान के बाद करें। सबसे पहले उनका श्रृंगार करें उन्हें नए वस्त्र पहनाएं और फूलों से सजाएं। इसके बाद मिठाइयाँ और दही का भोग लगाएं भगवान की आरती करें और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करें। छोटे बच्चों को पूजा में शामिल करना भी शुभ माना जाता है क्योंकि इससे उनमें भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति बढ़ती है।
आज महिला दिवस पर काशी विश्वनाथ मंदिर में महिलाओं के लिए खास पहल, वीआईपी दर्शन और फ्री एंट्री

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर ने महिलाओं के लिए एक खास पहल की है। इस दिन मंदिर प्रशासन ने महिलाओं को विशेष वीआईपी दर्शन और मुफ्त प्रवेश की सुविधा देने की घोषणा की है, ताकि श्रद्धालु महिलाएं बाबा विश्वनाथ के दर्शन आसानी से कर सकें और महिला दिवस को एक आध्यात्मिक अनुभव के रूप में मना सकें। गेट नंबर 4-बी से मिलेगा निशुल्क प्रवेश मंदिर प्रशासन के अनुसार आज रविवार को सभी महिला श्रद्धालुओं के लिए गेट नंबर 4-बी से विशेष प्रवेश की व्यवस्था की गई है। चाहे महिलाएं काशी की निवासी हों या बाहर से आई हों, सभी को इस दिन निशुल्क दर्शन का अवसर मिलेगा। इस व्यवस्था के तहत महिलाएं सीधे बाबा विश्वनाथ की झांकी तक पहुँच सकेंगी और किसी भी प्रकार का टिकट लेने की आवश्यकता नहीं होगी। बच्चों के साथ आई महिलाओं को मिलेगी प्राथमिकता काशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन ने यह भी कहा कि जो महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ आएंगी, उन्हें विशेष प्राथमिकता दी जाएगी। बालक या बालिका के साथ आई महिलाओं को पहले प्रवेश मिलेगा। मंदिर में आने वाली महिलाओं को भीड़ से बचाने और सहज दर्शन कराने के लिए अलग व्यवस्था की गई है, ताकि लंबी कतारों में खड़े होने की परेशानी न हो। सीईओ ने दी जानकारी काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विश्वभूषण मिश्रा ने बताया कि महिला दिवस पर सुबह चार बजे से पांच बजे तक और शाम चार बजे से पांच बजे तक का समय काशीवासियों के लिए आरक्षित रहेगा। इस दौरान पहले से चल रही विशेष दर्शन व्यवस्था जारी रहेगी। दिन के बाकी समय में महिलाओं के लिए वीआईपी प्रवेश और दर्शन की विशेष सुविधा लागू रहेगी। आसान और सम्मानजनक दर्शन का उद्देश्य मंदिर प्रशासन का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को सम्मान देना और उन्हें सहज तरीके से दर्शन कराने का अवसर प्रदान करना है। हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं काशी विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करने आती हैं और महिला दिवस पर यह सुविधा उनके लिए एक विशेष उपहार की तरह है। महिलाओं के लिए अनूठा अनुभव वीआईपी दर्शन और मुफ्त प्रवेश की यह व्यवस्था महिला श्रद्धालुओं के लिए एक यादगार अनुभव साबित होगी। कई महिलाएं दूर-दूर से बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने आती हैं, और इस सुविधा के कारण उनकी यात्रा और भी सुखद और आरामदायक बन जाएगी। काशी विश्वनाथ मंदिर की धार्मिक महत्ता काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध और पवित्र मंदिरों में से एक है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं। काशी को भगवान शिव की नगरी माना जाता है और मंदिर के पुनर्विकास के बाद यहां आने वाले श्रद्धालुओं की संख्या और भी बढ़ गई है। मंदिर प्रशासन की सकारात्मक पहल महिला दिवस पर वीआईपी दर्शन की यह सुविधा मंदिर प्रशासन की एक सकारात्मक पहल मानी जा रही है। इससे न केवल महिलाओं को विशेष सम्मान मिलेगा, बल्कि यह दिखाता है कि धार्मिक स्थलों पर भी महिलाओं की सुविधा और सम्मान का ध्यान रखा जा रहा है।