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4 अप्रैल 2026 का राशिफल : जानिए किस राशि को मिलेगा लाभ और किसे रहना होगा सावधान

नई दिल्ली । ग्रह-नक्षत्रों की चाल के आधार पर आज 4 अप्रैल 2026 का दिन कई राशियों के लिए शुभ संकेत लेकर आया है, जबकि कुछ राशि वालों को सतर्क रहने की जरूरत है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार दिन का प्रभाव हर राशि पर अलग-अलग पड़ेगा। आइए जानते हैं आज किन राशि वालों को लाभ मिलेगा और किनकी परेशानियां बढ़ सकती हैं। मेष राशि: आज काम थोड़ा धीरे चलेगा इसलिए धैर्य बनाए रखें और जल्दबाजी ना करें। कोई बड़ा फैसला लेने से पहले अच्छे से सोचें, नहीं तो बाद में पछताना पड़ सकता है। परिवार का साथ मिलेगा जिससे मन हल्का महसूस होगा। खानपान का ध्यान रखें और अपने लिए समय निकालें। वृषभ राशि: आज आपका आत्मविश्वास ठीक रहेगा और काम में मन लगेगा। ऑफिस या बिजनेस में नई जिम्मेदारी मिल सकती है, जो भविष्य में लाभदायक रहेगी। पैसों से जुड़े फैसले सोच-समझकर लें। लोगों की बातों को दिल पर न लें। प्रैक्टिकल सोच से दिन अच्छा रहेगा। मिथुन राशि: आज आपका मूड अच्छा रहेगा और आप सकारात्मक महसूस करेंगे। नौकरी या बिजनेस में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा। किसी खास व्यक्ति से बात करके मन खुश होगा। खाने में प्रोटीन और फाइबर की मात्रा बढ़ाएं। कर्क राशि: आज पैसों की स्थिति पहले से बेहतर हो सकती है, जिससे मन खुश रहेगा। घर और परिवार के साथ अच्छा समय बिताने का मौका मिलेगा। काम थोड़ा ज्यादा रहेगा लेकिन मेहनत का फल जरूर मिलेगा। सीनियर्स आपके काम की तारीफ कर सकते हैं। पानी पर्याप्त मात्रा में पिएं। ओवरथिंकिंग कम करें। सिंह राशि: आज कोई बड़ा फैसला जल्दी में न लें और सोच-विचार जरूर करें। मन थोड़ा परेशान हो सकता है, लेकिन समय के साथ स्थिति सुधरेगी। धैर्य रखें और कहीं बाहर जाने की योजना बन सकती है। स्वास्थ्य पर ध्यान दें। कन्या राशि: आज बिजनेस में कुछ नया करने का मौका मिलेगा जिससे कमाई बढ़ सकती है। किसी दोस्त या जानकार की मदद काम आएगी। कोई अच्छी खबर मिलने से मन प्रसन्न रहेगा। पानी खूब पिएं और खाने में प्रोटीन बढ़ाएं। तुला राशि: आज काम ज्यादा रह सकता है, जिससे थोड़ी भागदौड़ होगी। किसी दोस्त या सहकर्मी की मदद से काम आसान होगा। स्वास्थ्य का ध्यान रखें और जरूरत पड़ने पर आराम भी करें। बीच-बीच में छोटे ब्रेक्स लें, इससे फायदा होगा। वृश्चिक राशि: आज गुस्सा करने से बचें और शांत रहकर फैसले लें। पैसों को लेकर सही योजना बनाना जरूरी है। घर में बड़ों की सेहत का ध्यान रखें। अपना ख्याल रखें और तला-भुना खाने से बचें। एक्सरसाइज शुरू कर दें। धनु राशि: आज नौकरी में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा और सीनियर्स का साथ भी मिलेगा। काम धीरे-धीरे आसान होता दिखेगा। कुछ नया सीखने का मौका भी मिलेगा। ओवरथिंकिंग न करें। अपनी गलतियों को समझें और दूसरों को दोष न दें। मकर राशि: आज मन थोड़ा ऊपर-नीचे हो सकता है, लेकिन खुद पर भरोसा रखें। ज्यादा नेगेटिव सोचने से बचें और अपने काम पर ध्यान दें। किसी काम से यात्रा भी करनी पड़ सकती है। लोगों की बातों पर ध्यान न दें। अपने साथ समय बिताएं और खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान दें। कुंभ राशि: आज पढ़ाई या करियर से जुड़ी कोई अच्छी खबर मिल सकती है। लव लाइफ में छोटी बातों पर टेंशन न लें और प्यार से बात करें। समय का सही इस्तेमाल करें। घूमने का प्लान न बनाएं। परिवार के साथ समय बिताएं और तनाव होने पर किसी खास दोस्त से बात करें। मीन राशि: आज काम में उतार-चढ़ाव रह सकता है लेकिन ज्यादा चिंता न करें। घर में छोटी-मोटी बात पर बहस हो सकती है, इसलिए शांत रहें। अपने लिए समय निकालें और खाने-पीने का ध्यान रखें। ज्यादा न सोचें। स्थिति जल्द ही पहले से बेहतर हो जाएगी। डिस्क्लेमर: हम यहां दी गई जानकारी के पूर्णतया सत्य होने का दावा नहीं करते हैं। यह केवल सामान्‍य जानकारी के उद्देश्‍य से दी गई है। विस्तृत जानकारी के लिए ज्‍योतिष विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें।

मध्य प्रदेश सरकार का बड़ा फैसला… 489 मदिरा दुकानों के संचालन के लिए बनेगा निगम-मंडल

भोपाल। मध्य प्रदेश में आबकारी विभाग के लिए गठित मंत्री-मंडलीय समिति की शुक्रवार को हुई वर्चुअल बैठक में 12 दौर की नीलामी प्रक्रिया के बाद शेष बची दुकानों की स्थिति की समीक्षा की गई। बैठक में निर्णय लिया गया कि नीलामी के बाद शेष 489 दुकानों के संचालन के लिए आबकारी विभाग स्वयं एक निगम/मंडल गठित कर इन दुकानों के संचालन की संभावना पर विचार करेगा। मंत्री-मंडल समिति में उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, स्कूल शिक्षा एवं परिवहन मंत्री राव उदय प्रताप सिंह, वाणिज्यिक कर विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर और आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना मौजूद रहे। उप मुख्यमंत्री देवड़ा की अध्यक्षता में हुई बैठक में नीलामी के बाद शेष बची 489 मदिरा दुकानों को सीधे निगम/मंडल के माध्यम से संचालित करने के विकल्प पर चर्चा की गई। यह कदम शेष शराब दुकानों का निस्तारण करने और राजस्व सुनिश्चित करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

वाराणसी की पावन धरा पर महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का हुआ ऐतिहासिक मंचन

भोपाल। उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) की पावन धरती पर शुक्रवार शाम को महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का ऐतिहासिक मंचन हुआ। महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ के भव्य मंचन और ओजस्वी प्रस्तुति से दर्शकों को हजारों वर्ष पुराने स्वर्णिम युग की यात्रा कराई। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित इस महानाट्य का आरंभ सम्राट विक्रमादित्य के उस संकल्प से हुआ, जब वे विदेशी आक्रांताओं के चंगुल से मातृ भूमि को मुक्त कराने का प्रण लेते हैं। रंगमंच पर कलाकारों के सजीव अभिनय ने उस कालखंड को जीवंत कर दिया, जब शकों के आतंक से त्रस्त प्रजा की रक्षा के लिए एक महानायक का उदय हुआ था। विशाल और भव्य सेट, ऊंचे दुर्ग और उस दौर के राजसी वैभव को दर्शाते दृश्यों ने दर्शकों को से बांधे रखा। प्रकाश संयोजन और संगीत की स्वर लहरियों ने हर दृश्य को इतना प्रभावशाली बना दिया कि युद्ध के दृश्यों में जहाँ वीरता का सजीव आभास हुआ, वहीं सम्राट की न्यायप्रियता के प्रसंगों ने दर्शकों को गौरव की भावना से भर दिया। महानाट्य की सबसे बड़ी विशेषता इसका यथार्थवादी चित्रण था, जिसमें मदमस्त हाथियों, सरपट दौड़ते घोड़ों और ऊंटों के काफिलों के प्रयोग ने युद्ध के दृश्यों और राजसी वैभव को अभूतपूर्व भव्यता प्रदान की। हाथियों की चिंघाड़ और घोड़ो की टापों ने मंच पर रणभूमि का साक्षात दृश्य उपस्थित कर दिया, जिससे दर्शक रोमांचित हो उठे। लगभग 400 से अधिक कलाकारों ने आधुनिक लाइट-एंड-साउंड तकनीक के साथ सम्राट की न्यायप्रियता, अदम्य शौर्य और विक्रम संवत की स्थापना के प्रसंगों को बड़े प्रभावशाली रूप प्रस्तुत किया। मंच पर निर्मित ऊंचे दुर्ग और राजप्रासाद के सेट ने इतिहास को जीवंत कर दिया। महानाट्य में सम्राट विक्रमादित्य के व्यक्तित्व के उन अनछुए पहलुओं को भी प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया, जो उन्हें एक साधारण राजा से ‘चक्रवर्ती सम्राट’ बनाते हैं। वह दृश्य अत्यंत ह्रदय स्पर्शी था जब सम्राट अपनी प्रजा का हाल जानने के लिए रात्रि के अंधकार में वेश बदलकर निकलते हैं। उनके द्वारा स्थापित ‘विक्रम संवत’ की प्रासंगिकता और भारतीय काल-गणना के महत्व को जिस सरल और साहित्यिक भाषा में संवादों के माध्यम से पिरोया गया, वह सराहनीय था। कलाकारों के संवादों में वह ओज और स्पष्टता थी, जिसने इतिहास को मंच पर साक्षात कर दिया। सम्राट का न्याय और ‘सिंहासन बत्तीसी’ के प्रसंगों ने यह संदेश दिया कि नेतृत्व केवल सत्ता का भोग नहीं, बल्कि त्याग और न्याय की वेदी पर खुद को समर्पित करना है। तीन दिवसीय महानाट्य की पहली गरिमामयी शाम में जनता और पर्यटक इस कदर उमड़े कि कार्यक्रम स्थल छोटा प्रतीत होने लगा नाटक के चरमोत्कर्ष पर पहुंचतें ही “जय महाकाल” और “सम्राट विक्रमादित्य” के जयकारों से आकाश गुंजायमान हो गया। यह महानाट्य केवल मंचन नहीं, बल्कि अपनी जड़ों की ओर लौटने का एक सशक्त माध्यम सिद्ध हुआ। अंतिम दृश्य में जब सम्राट का राज्याभिषेक हुआ और पुष्प वर्षा हुई, तो हर नागरिक का मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया। इस अवसर पर मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तर प्रदेश के मंत्रीगण अनिल, राजेश सचान, रविंद्र जायसवाल, महापौर अशोक तिवारी जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्या, राज्यसभा सदस्य बाल योगी उमेश नाथ. विधायक, स्थानीय जन-प्रतिनिधि सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद भी देर रात तक दर्शक उस जादुई वातावरण के प्रभाव में रहे। महानाट्य के सफल आयोजन ने यह सिद्ध कर दिया कि इतिहास को सही परिप्रेक्ष्य में भव्यता के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वह आज भी जनमानस को गौरवान्वित करता है। यह महानाट्य आने वाले समय में एक सांस्कृतिक मील का पत्थर साबित होगा। वाराणसी में तीन दिवसीय सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य के विशेष आकर्षणसमारोह स्थल पर म.प्र. संस्कृति और पर्यटन विभाग द्वारा भव्य चित्र प्रदर्शनी का आयोजन किया गया है। प्रदर्शनी में ऋषियों वैदिक ज्ञान तथा सांस्कृतिक गौरव को आकर्षक ढंग से प्रदर्शित किया गया है। प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। महानाट्य में 200 से अधिक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। मुख्य मंच से दर्शकों के बीच जाकर सम्राट विक्रमादित्य के जीवन का सजीव मंचन अत्यंत आकर्षक बना हुआ है। महानाट्य में तीन भव्य मंच बनाए गए हैं, जिनमें से एक मंच पर उज्जैन के महाकाल मंदिर की प्रतिकृति प्रदर्शित की गई, जो विशेष आकर्षण का केन्द्र बनी। महानाट्य में 18 घोड़े, दो रथ, चार ऊंट एक पालकी और एक हाथी के साथ जीवंत दृश्य से विक्रमादित्य का गौरव साकार हो रहा है। महानाट्य में आधुनिक सूचना संचार तकनीक का उपयोग कर युद्ध के दृश्य आतिशबाजी और प्राचीन परंपरा को अद्भुत ढंग से संजीव किया गया है। महानाट्य में सम्राट विक्रमादित्य के जन्म से लेकर राजतिलक तक की गाथा विक्रम बेताल की कथा और सनातन धर्म के उत्थान की महाकाव्य कथा को प्रदर्शित किया जा रहा है।

सम्राट विक्रमादित्य के सुशासन का संदेश देता है महानाट्य सम्राट विक्रमादित्य: मुख्यमंत्री डॉ. यादव

भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि सुशासन की उत्कृष्ट परंपरा के नायक सम्राट विक्रमादित्य के जीवन काल से हम सब परिचित हो रहे हैं। सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य उनके सुशासन का संदेश देता है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव वाराणसी (काशी) में शुक्रवार को तीन दिवसीय सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य के मंचन पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कर्मस्थली काशी में इस महानाट्य के मंचन के अवसर पर यह कहना प्रासंगिक होगा कि प्रधानमंत्री मोदी के सुशासन से राष्ट्र को दिए जा रहे योगदान के लिए वे अभिनंदन के पात्र हैं। इससे पहले मुख्यमंत्री डॉ. यादव और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समारोह का शुभारंभ किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि आज बदलते दौर में दो राज्यों के मध्य सांस्कृतिक संबंध को प्रगाढ़ करने के लिए यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। दोनों राज्य विभिन्न क्षेत्रों में संयुक्त रूप से कार्य कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी के आशीर्वाद से दोनों राज्यों को अंतरराज्यीय केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना की सौगात मिली है। यह दोनों राज्यों में सिंचाई, कृषि उत्पादन और पेयजल प्रदाय में सहयोग करने वाली महत्वपूर्ण परियोजना है। यह प्रधानमंत्री मोदी का सुशासन भी है, जिसके अंतर्गत राज्यों के बीच परस्पर सहयोग को बढ़ाने की दिशा में कार्य हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी सुशासन के इस काल में सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में स्थापित सुशासन का स्मरण आना स्वभाविक है। उन्होंने कहा कि राष्ट्र के स्वाभिमान के सम्राट विक्रमादित्य के राष्ट्र प्रेम, पराक्रम, न्यायप्रियता, प्रजा वात्सल्य और ज्ञान विज्ञान परम्परा की पुनर्स्थापना के गुणों की जानकारी युवा पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए महानाट्य माध्यम बन रहा है। उन्होंने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य के युग का पुनर्स्मरण करने के लिए महानाट्य का मंचन किया जा रहा है। सम्राट विक्रमादित्य महानाट्य का पहले नई दिल्ली में भी मंचन हुआ है। इस नाटक में अनेक इंजीनियर, डॉक्टर, वकील और अन्य व्यवसायों से जुड़े प्रतिभाशाली व्यक्ति विभिन्न पात्रों के रूप में मंच पर भूमिका निभाते हैं। इससे प्रतिभाओं को तो मंच मिल ही रहा है, एक कुशल शासक के योगदान से देश के नागरिक भी परिचित हो रहे हैं। इस तरह यह महानाट्य लोकरंजन के साथ भारत के गौरवशाली इतिहास को भी आज जीवंत करने में माध्यम बना है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत में भाइयों की तीन जोड़ियां प्रसिद्ध हुई हैं। इनमें भगवान श्रीराम और लक्ष्मण, भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के साथ सम्राट विक्रमादित्य और राजा भतृहरि की जोडी शामिल है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार ने एक करोड़ एक लाख रुपये का सम्राट विक्रमादित्य अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रारंभ किया है। एक राष्ट्रीय सम्मान 21 लाख रुपये राशि का और तीन राज्य स्तरीय सम्मान 5-5 लाख रुपये राशि के स्थापित किए गए हैं। वर्ष 2024 में हुए विक्रमोत्सव को सर्वाधिक अवधि वाली धार्मिक- आध्यात्मिक फैस्टिवल का महाद्वीप स्तरीय वॉव अवार्ड भी मिला है। यही नहीं प्रतिष्ठित ईमैक्स ग्लोबल अवार्ड भी विक्रमोत्सव को प्राप्त हुआ है। विक्रमादित्य महानाट्य मंचन यादगार क्षण: योगी आदित्यनाथउत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विक्रमादित्य महानाट्य मंचन को यादगार क्षण बताया। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के “एक भारत-श्रेष्ठ भारत” के भाव को साकार करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बाबा विश्वनाथ की इस धरा को बाबा महाकाल की धरा से नाट्य मंचन के माध्यम से जोड़ने का विशिष्ट कार्य किया है। योगी ने भाइयों की जोड़ी का जिक्र करते हुए कहा कि सम्राट विक्रमादित्य और राजा भरथरी की जोड़ी का उल्लेख है। महाराजा ने नाथ संप्रदाय में दीक्षा लेकर काशी की भूमि और चुनार के किले में साधना की थी। सम्राट विक्रमादित्य ने ही आज से दो हजार साल पहले अयोध्या नगरी की खोज की थी और महाराज लव के बाद सबसे पहले भगवान श्रीराम के मंदिर का निर्माण करवाया था। सम्राट विक्रमादित्य नीति शास्त्र और न्याय के पर्याय थे। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उज्जैन महाकाल की नगरी है और काशी पंचांग की नगरी है दोनों मिलकर नया इतिहास बनाते हुए प्रेम और सहयोग किया परंपरा मजबूती से आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश तेजी से विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की ज्ञान परंपरा को उचित स्थान देकर पूरे विश्व में प्रतिष्ठित किया है। आज योग और आयुर्वेद की पूरी दुनिया में स्वीकार्यता बढ़ी है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वर्ष 2024 में प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया गया। इसमें 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने मां गंगा में स्नान किया। मप्र के मुख्यमंत्री ने भेंट की वैदिक घड़ीमप्र के मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ नाथ को वैदिक घड़ी भेंट की। यह घड़ी बाबा विश्वनाथ के मंदिर में वैदिक काल को वर्तमान में जनता के बीच पुनर्स्थापित करने में सहायक होगी। इस घड़ी में प्राचीन वैदिक परंपरा तथा आधुनिक ज्ञान विज्ञान का मिश्रण करके कल की अचूक गणना का समावेश किया गया है। इसके बाद वाराणसी की पावन धरा पर महानाट्य ‘सम्राट विक्रमादित्य’ का ऐतिहासिक मंचन हुआ। समारोह में उत्तर प्रदेश के मंत्रीगण अनिल, राजेश सचान, रविंद्र जायसवाल, महापौर अशोक तिवारी जिला पंचायत अध्यक्ष पूनम मौर्या, राज्यसभा सदस्य बाल योगी उमेश नाथ. विधायक, स्थानीय जन-प्रतिनिधि सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं संस्कृति प्रेमी उपस्थित रहे।

विश्व काल-गणना के केंद्र के रूप में उज्जैन की भूमिका पर विशेषज्ञों ने किया मंथन

भोपाल। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में महाकाल की पावन धरा उज्जैन में शुक्रवार को तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन “महाकाल : द मास्टर ऑफ टाइम” की शुरुआत हुई। सम्मेलन में देश-विदेश के प्रख्यात खगोलविदों, वैज्ञानिकों और शीर्षस्थ विद्वानों ने भारतीय काल-गणना की वैज्ञानिकता और उसकी प्राचीन श्रेष्ठता पर गहन मंथन किया। इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य उज्जैन की गौरवशाली पहचान को वैश्विक पटल पर पुनः स्थापित करना है। उज्जैन नगरी युगों तक विश्व के प्रधान मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) और काल-गणना का केंद्र रही है। विद्वानों ने एक स्वर में यह आह्वान किया कि अब समय आ गया है जब हम समय की वैश्विक अवधारणा के ‘भारतीयकरण’ की ओर बढ़ें और अपनी उस वैज्ञानिक विरासत को जीवंत करें, जो सदियों तक मानवता के लिए समय का बोध कराती रही है। सम्मेलन के प्रथम सत्र का मुख्य विषय “समय क्या है? इसका मापन कैसे हुआ तथा प्रधान मध्यान्ह (मेरेडियन) रेखा के रूप में उज्जैन का महत्व” रहा। सत्र का संचालन करते हुए आईआईटी गुवाहाटी के प्रो. तडीकोंडा वेंकट भारत ने समय के मूल स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्राचीन भारत काल-गणना के क्षेत्र में संपूर्ण विश्व का मार्गदर्शक था। कालांतर में सांस्कृतिक संक्रमण के कारण हमारा यह अमूल्य ज्ञान पाश्चात्य पद्धतियों के अधीन हो गया। अब समय की मांग है कि हम आधुनिक विज्ञान और शोध के माध्यम से अपनी विरासत का पुनरुद्धार करें। राज्यसभा की एस. राधाकृष्णन पीठ के इतिहासविद् डॉ. एम.एल. राजा ने गर्व के साथ भारत को ‘काल-गणना का देवता’ निरूपित किया। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य जगत जिस कालखंड की सूक्ष्मता को समझने का प्रयास कर रहा है, वह भारतीय मनीषियों के लिए हजारों वर्ष पूर्व भी प्रत्यक्ष सत्य था। डॉ. राजा ने भारतीय कैलेंडर की वैज्ञानिकता सिद्ध करते हुए बताया कि हमारी पद्धति में लीप ईयर जैसी कोई विसंगति नहीं है; यह खगोलीय पिंडों की गति का शुद्ध गणित है। उन्होंने ‘एक राष्ट्र, एक संस्कृति और एक संवत’ का दूरगामी विचार प्रस्तुत करते हुए भारतीय साक्ष्यों को अकाट्य प्रमाणों के साथ विश्व के सम्मुख रखने की आवश्यकता पर बल दिया। काशी के प्रो. विनय कुमार पांडेय ने उज्जैन (अवंतिका) के शास्त्रीय और खगोलीय महत्व को नए आयाम दिए। उन्होंने स्कंद पुराण, नारद पुराण और सूर्य सिद्धांत जैसे ग्रंथों का उदाहरण देते हुए बताया कि “काल-गणना का वास्तविक मूल केन्द्र अवंतिका ही है।” उन्होंने कहा कि उज्जैन विश्व का वह अनूठा भौगोलिक स्थल है जहाँ श्मशान और शक्तिपीठ एक साथ विद्यमान हैं, जो इसे समय की उत्पत्ति और लय का केंद्र बनाते हैं। खगोलशास्त्री पं. कैलाशपति नायक ने समय के आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष को जोड़ते हुए कहा कि समय के चक्र को गति देने वाले स्वयं भगवान महाकाल हैं। उन्होंने पंचांग की महत्ता को रेखांकित करते हुए उज्जैन को पुनः समय के मानक केंद्र के रूप में स्थापित करने के इस प्रयास की मुक्त कंठ से सराहना की। सम्मेलन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव आधुनिक विज्ञान और प्राचीन परंपरा का अद्भुत समन्वय रहा। सीएसआईआर-एनपीएल के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. दीपक शर्मा ने वर्तमान युग की परिशुद्ध समय मापन तकनीकों और एटॉमिक क्लॉक्स की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि नैनो सेकंड स्तर की सटीकता बनाए नहीं रखी जाए तो जीपीएस जैसी तकनीकों की सटीकता भी प्रभावित हो सकती है। डॉ. शर्मा ने यह महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया कि आधुनिक विज्ञान की यह सूक्ष्म परिशुद्धता वास्तव में हमारी प्राचीन भारतीय गणना पद्धतियों में पहले से ही अंतर्निहित रही है। उन्होंने पारंपरिक भारतीय ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर विशेष बल दिया। सम्मेलन का द्वितीय सत्र “काल चक्र: इनवॉल्यूशन एण्ड इवॉल्यूशन ऑफ सिविलाइजेशन इन टाइम एण्ड स्पेस” विषय पर केंद्रित रहा। सेंटर फॉर पॉलिसी स्टडीज, चेन्नई के अध्यक्ष प्रो. एम.डी. श्रीनिवास और कर्नाटक संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि भारतीय कालचक्र की अवधारणा केवल एक रेखीय गति नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित चक्रीय व्यवस्था है, जो नैतिक मूल्यों और पर्यावरणीय संतुलन को भी अपने भीतर समेटे हुए है। भारतीय ज्ञान परंपरा नवाचार को प्राचीन सिद्धांतों की पुनर्खोज के रूप में देखती है, जो ज्ञान की निरंतरता को बनाए रखते हुए उसे आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने का मार्ग प्रदान करती है। सम्मेलन के दोनों सत्रों में यह प्रतिपादित किया गया कि उज्जैन केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह विश्व के समय चक्र का वैज्ञानिक उद्गम स्थल भी है। विद्वानों ने इस संकल्प को दोहराया कि भारत की समृद्ध काल-गणना परंपरा को आधुनिक अनुसंधान के साथ जोड़कर भविष्य के लिए और अधिक उपयोगी बनाया जाएगा। यह अंतर्राष्ट्रीय मंथन न केवल उज्जैन की ऐतिहासिक भूमिका को पुनः स्थापित करने में सफल रहेगा, बल्कि इसने आने वाले समय में भारत को काल-विज्ञान के क्षेत्र में पुनः ‘विश्व गुरु’ के रूप में प्रतिष्ठित करने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा।