राजधानी में संसाधन बचाने की मुहिम तेज: दिल्ली सरकार ने विदेश यात्राओं और सरकारी खर्चों में कटौती का किया ऐलान

नई दिल्ली । राजधानी दिल्ली में अब सरकारी कार्यप्रणाली को अधिक सादगीपूर्ण और संसाधन-केंद्रित बनाने की दिशा में बड़े कदम उठाए जा रहे हैं। ऊर्जा बचत, सरकारी खर्चों में कटौती और सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दिल्ली सरकार ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। इन फैसलों के तहत आने वाले एक वर्ष तक सरकार का कोई भी मंत्री या अधिकारी सरकारी विदेश यात्रा पर नहीं जाएगा। इसके साथ ही प्रशासनिक स्तर पर भी कई नई व्यवस्थाएं लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। सरकार का मानना है कि मौजूदा समय में ईंधन और संसाधनों का संतुलित उपयोग बेहद जरूरी है। इसी सोच के साथ राजधानी में एक व्यापक जन-अभियान की शुरुआत की जा रही है, जिसका उद्देश्य केवल सरकारी स्तर पर बदलाव करना नहीं बल्कि आम लोगों को भी इस पहल से जोड़ना है। सरकार का कहना है कि यदि प्रशासन और जनता दोनों मिलकर छोटे-छोटे कदम उठाएं तो बड़े स्तर पर बचत और सकारात्मक बदलाव संभव हो सकते हैं। वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था को इस अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया है। सरकारी विभागों में सप्ताह में दो दिन घर से काम करने की योजना तैयार की गई है। साथ ही निजी कंपनियों और संस्थानों से भी अपील की जाएगी कि वे अपने कर्मचारियों को सीमित दिनों के लिए घर से काम करने की सुविधा दें। माना जा रहा है कि इससे सड़कों पर वाहनों की संख्या कम होगी, ट्रैफिक का दबाव घटेगा और पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी आएगी। सरकारी वाहनों के इस्तेमाल को भी सीमित करने का फैसला लिया गया है। प्रशासनिक अधिकारियों और मंत्रियों के काफिलों में गाड़ियों की संख्या कम की जाएगी और जहां संभव होगा वहां सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिकता दी जाएगी। अगले छह महीनों तक नई पेट्रोल, डीजल, सीएनजी या हाइब्रिड गाड़ियों की खरीद नहीं की जाएगी। इसके साथ ही कर्मचारियों को मेट्रो और बस जैसे सार्वजनिक परिवहन के उपयोग के लिए प्रोत्साहित करने की योजना भी बनाई गई है। राजधानी में मेट्रो स्टेशनों तक पहुंच आसान बनाने के लिए विशेष बस सेवाएं शुरू करने की तैयारी की गई है। इसके अलावा बैठकों और प्रशासनिक गतिविधियों को अधिक से अधिक ऑनलाइन मोड में करने की योजना बनाई जा रही है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और अन्य संस्थानों से भी ऑनलाइन क्लास और मीटिंग्स को बढ़ावा देने की अपील की गई है, ताकि अनावश्यक यात्रा को कम किया जा सके। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगले कुछ महीनों तक बड़े सरकारी आयोजन और खर्चीले कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। इसके साथ ही “मेड इन India” उत्पादों को बढ़ावा देने और सरकारी विभागों में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग को प्राथमिकता देने की दिशा में भी काम किया जाएगा। ऊर्जा बचत के तहत सरकारी दफ्तरों में बिजली उपयोग को नियंत्रित करने के लिए विशेष दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। एयर कंडीशनर के तापमान को सीमित रखने और बिजली की अनावश्यक खपत रोकने पर भी ध्यान दिया जाएगा। कुल मिलाकर राजधानी में शुरू की गई यह पहल केवल खर्च कम करने का प्रयास नहीं बल्कि एक नई प्रशासनिक सोच का संकेत मानी जा रही है। सरकार इस अभियान के जरिए सादगी, जिम्मेदारी और संसाधनों के संतुलित उपयोग का संदेश जनता तक पहुंचाना चाहती है।
रिलायंस कम्युनिकेशंस मामले में जांच तेज, कई शहरों में पूर्व अधिकारियों के ठिकानों पर बड़ी कार्रवाई

नई दिल्ली । रिलायंस कम्युनिकेशंस से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में जांच अब और अधिक गंभीर होती दिखाई दे रही है। देश के कई बड़े शहरों में एक साथ चलाए गए तलाशी अभियान ने कारोबारी और वित्तीय जगत में नई हलचल पैदा कर दी है। यह कार्रवाई उन मामलों से जुड़ी बताई जा रही है जिनमें भारी वित्तीय नुकसान और नियमों के कथित उल्लंघन की जांच की जा रही है। जानकारी के मुताबिक जांच एजेंसियों की टीमों ने मुंबई, गुरुग्राम और बेंगलुरु समेत कई स्थानों पर एक साथ छापेमारी की। यह कार्रवाई कंपनी के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों और निदेशकों से जुड़े परिसरों पर केंद्रित रही। बताया जा रहा है कि जिन अधिकारियों के यहां तलाशी ली गई, वे वर्ष 2015 से 2017 के बीच कंपनी के महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत थे और वित्तीय संचालन से जुड़े फैसलों में उनकी अहम भूमिका थी। तलाशी के दौरान कई महत्वपूर्ण दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय लेनदेन से जुड़ी सामग्री बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई है। जांच एजेंसियां इन दस्तावेजों की गहराई से जांच कर रही हैं ताकि कथित गड़बड़ियों और पैसों के इस्तेमाल से जुड़े तथ्यों का पता लगाया जा सके। अधिकारियों का मानना है कि इन रिकॉर्ड्स से जांच को नई दिशा मिल सकती है। पिछले कुछ महीनों में इस मामले में लगातार नई कार्रवाइयां देखने को मिली हैं। कई वित्तीय संस्थानों और बैंकों की शिकायतों के बाद यह जांच शुरू हुई थी। आरोप है कि संबंधित मामलों में हजारों करोड़ रुपये के कथित वित्तीय नुकसान की आशंका है। यही कारण है कि जांच एजेंसियां लगातार अलग-अलग स्तरों पर दस्तावेजों और लेनदेन की जांच कर रही हैं। इस पूरे मामले में पहले भी कई स्थानों पर तलाशी अभियान चलाए जा चुके हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि अब तक बड़ी मात्रा में दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूत एकत्र किए गए हैं, जिनकी फॉरेंसिक जांच जारी है। अधिकारियों का मानना है कि मामले में कई जटिल वित्तीय लेनदेन शामिल हो सकते हैं, जिनकी परतें धीरे-धीरे खुल रही हैं। इससे पहले कंपनी से जुड़े कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को भी हिरासत में लिया गया था। उन पर बैंकिंग संचालन और फंड के इस्तेमाल से जुड़ी कथित अनियमितताओं में शामिल होने के आरोप लगे हैं। फिलहाल उनसे पूछताछ की प्रक्रिया जारी है और जांच एजेंसियां मामले से जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह के मामलों में वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण होती है। बड़े कॉरपोरेट संस्थानों से जुड़े मामलों में जांच एजेंसियों की सख्ती यह संदेश देती है कि वित्तीय नियमों के उल्लंघन को गंभीरता से लिया जा रहा है। वहीं, कारोबारी जगत की नजरें अब इस जांच के अगले चरण पर टिकी हुई हैं। आने वाले समय में इस मामले से जुड़े और भी बड़े खुलासे सामने आने की संभावना जताई जा रही है। लगातार बढ़ती जांच गतिविधियां यह संकेत दे रही हैं कि एजेंसियां इस पूरे मामले की हर परत तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं, ताकि वित्तीय अनियमितताओं की पूरी तस्वीर साफ हो सके।
दिल्ली में बस्तर के भविष्य पर बड़ी बैठक, अमित शाह और सीएम विष्णु देव साय ने तैयार किया विकास का खाका

नई दिल्ली ।छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र अब केवल सुरक्षा चुनौतियों के लिए नहीं बल्कि तेजी से बदलते विकास मॉडल के लिए भी चर्चा में आने लगा है। इसी बदलाव को लेकर नई दिल्ली में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के बीच एक महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें बस्तर के विकास कार्यों, स्वास्थ्य सुविधाओं और नक्सल प्रभावित इलाकों में प्रशासनिक पहुंच को लेकर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया। बैठक में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बताया कि बस्तर के दूरस्थ क्षेत्रों में अब सरकारी योजनाओं का असर जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा है। जिन गांवों तक पहले स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना बेहद कठिन माना जाता था, वहां अब डॉक्टरों और स्वास्थ्य टीमों की नियमित पहुंच सुनिश्चित की जा रही है। कई इलाकों में मेडिकल टीमें पैदल पहुंचकर लोगों की जांच कर रही हैं और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को समय पर इलाज उपलब्ध कराया जा रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि बड़े स्तर पर स्वास्थ्य जांच अभियान चलाकर लाखों लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड तैयार किए गए हैं। डिजिटल हेल्थ प्रोफाइल के जरिए अब मरीजों की स्वास्थ्य स्थिति पर लगातार निगरानी रखी जा सकेगी, जिससे इलाज की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनेगी। इसके साथ ही गंभीर मरीजों को बड़े अस्पतालों तक पहुंचाने की व्यवस्था को भी मजबूत किया गया है। बस्तर में सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ अब बुनियादी सुविधाओं पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पुराने सुरक्षा शिविरों को धीरे-धीरे जन सुविधा केंद्रों के रूप में विकसित किया जा रहा है, जहां ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा, बैंकिंग और सरकारी योजनाओं से जुड़ी सेवाएं एक ही स्थान पर मिल रही हैं। इससे उन लोगों को राहत मिली है जिन्हें पहले छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। बैठक में बस्तर के लिए तैयार किए गए विकास रोडमैप पर भी चर्चा हुई। इसमें सड़क निर्माण, रोजगार, शिक्षा और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है। सरकार का लक्ष्य है कि बस्तर के युवाओं को स्थानीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि वे मुख्यधारा से तेजी से जुड़ सकें। जगदलपुर में आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार को भी इस बदलाव का अहम हिस्सा बताया गया। नए चिकित्सा संस्थानों और आपातकालीन सेवाओं के विस्तार से अब लोगों को इलाज के लिए बड़े शहरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। प्रशासन का मानना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं की पहुंच बढ़ने से क्षेत्र में स्थायी बदलाव संभव होगा। मुख्यमंत्री ने बैठक में यह भी कहा कि बस्तर में अब सकारात्मक माहौल बन रहा है और लोगों का भरोसा सरकार की योजनाओं पर बढ़ रहा है। पहले जो इलाके लंबे समय तक विकास से दूर रहे, वहां अब सड़कें, स्वास्थ्य सेवाएं और सरकारी सहायता पहुंच रही हैं। इससे आम लोगों के जीवन में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी बस्तर में हो रहे कार्यों की सराहना की और संकेत दिए कि आने वाले समय में इस मॉडल को और मजबूत किया जाएगा। केंद्र और राज्य सरकार मिलकर बस्तर को विकास, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के नए उदाहरण के रूप में स्थापित करने की दिशा में काम कर रही हैं।
सावधान! इन गलतियों की वजह से खराब होजाता जाता है अचार, ऐसे रखें सुरक्षित

नई दिल्ली। भारतीय रसोई में अचार सिर्फ एक साइड डिश नहीं बल्कि स्वाद और परंपरा का हिस्सा होता है। आम, नींबू, मिर्च या आंवले का अचार हर घर में खास जगह रखता है। लेकिन कई बार मेहनत से तैयार किया गया अचार कुछ ही दिनों या महीनों में खराब होने लगता है और उसके ऊपर सफेद या हरे रंग की फफूंदी दिखाई देने लगती है। यह समस्या किसी एक मौसम तक सीमित नहीं है, बल्कि साल के किसी भी समय हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार अचार में फफूंदी लगने का सबसे बड़ा कारण नमी और हवा का संपर्क है। जब भी जार के अंदर नमी पहुंचती है या अचार खुले वातावरण के संपर्क में आता है, तो उसमें फफूंदी बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। कई बार छोटी-छोटी गलतियां जैसे गीला चम्मच इस्तेमाल करना या जार को खुला छोड़ देना भी इसके लिए जिम्मेदार होती हैं। गंध और स्वाद से मिलते हैं शुरुआती संकेतअचार खराब होने का पहला संकेत उसकी गंध से मिलता है। ताजा अचार की खुशबू तीखी और खट्टी होती है, लेकिन अगर उसमें सड़ी हुई या अजीब सी बदबू आने लगे, तो यह खराब होने का संकेत है। कई बार स्वाद में भी बदलाव आने लगता है, जिससे अचार कड़वा, फीका या अजीब सा लगने लगता है। ऐसे अचार का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है। बनावट और रंग में बदलाव भी खतरे का संकेतजब अचार खराब होने लगता है, तो उसकी बनावट में भी बदलाव दिखाई देता है। अगर अचार चिपचिपा, बहुत नरम या रंग बदलने लगे, तो इसे खाने से बचना चाहिए। उदाहरण के लिए आम का अचार भूरा और मुलायम हो जाए या लहसुन का अचार लिसलिसा महसूस हो, तो यह संकेत है कि उसमें खराबी शुरू हो चुकी है। तेल की स्थिति भी काफी अहम होती है। अगर अचार का तेल धुंधला दिखे, अलग-अलग परतों में बंट जाए या उसमें झाग बनने लगे, तो यह भी खराबी की निशानी है। अचार में फफूंदी क्यों लगती है?Pickle में फफूंदी तब लगती है जब उसमें नमी, हवा या गंदगी पहुंच जाती है। कई बार अचार को स्टोर करते समय सावधानी नहीं बरती जाती, जिससे बैक्टीरिया और फंगस तेजी से बढ़ने लगते हैं। अचार को लंबे समय तक सुरक्षित कैसे रखें?Pickle को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए कुछ आसान लेकिन जरूरी सावधानियां अपनानी चाहिए। हमेशा सूखे और साफ चम्मच का इस्तेमाल करें, क्योंकि एक बूंद पानी भी फफूंदी का कारण बन सकती है। जार को हर बार अच्छी तरह बंद करें ताकि हवा अंदर न जा सके। अचार को हमेशा ठंडी और सूखी जगह पर रखें। सीधी धूप और ज्यादा गर्मी मसालों और तेल को खराब कर सकती है। इसके अलावा ध्यान रखें कि अचार पूरी तरह तेल की परत में ढका रहे। अगर तेल कम हो जाए, तो ऊपर से साफ तेल डालकर उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। इन छोटी-छोटी सावधानियों को अपनाकर अचार को लंबे समय तक ताजा और स्वादिष्ट रखा जा सकता है, जिससे उसका असली स्वाद बरकरार रहता है और वह फफूंदी से सुरक्षित रहता है।
Char Dham yatra: बारिश और ओलावृष्टि के बीच चार धाम यात्रा: आस्था का सफर बना चुनौती, यात्रियों के लिए जारी हुए अहम सुरक्षा संकेत

Char Dham yatra: नई दिल्ली । उत्तराखंड के ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में इन दिनों मौसम ने करवट ले ली है और लगातार हो रही भारी बारिश तथा ओलावृष्टि ने चार धाम यात्रा को और अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया है। यह यात्रा, जो आस्था और श्रद्धा का प्रतीक मानी जाती है, अब यात्रियों के लिए सावधानी और तैयारी की परीक्षा बन गई है। पहाड़ी इलाकों में बदलते मौसम ने यात्रा मार्गों पर जोखिम बढ़ा दिया है और प्रशासन लगातार यात्रियों को सतर्क रहने की अपील कर रहा है। चार धाम यात्रा का मार्ग अपने आप में कठिन माना जाता है, लेकिन बारिश के मौसम में यह और भी संवेदनशील हो जाता है। कई जगहों पर भूस्खलन, सड़क फिसलन और अचानक रास्ता बंद होने जैसी परिस्थितियां बन जाती हैं, जिससे यात्रियों की सुरक्षा पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे हालात में बिना तैयारी यात्रा करना खतरनाक साबित हो सकता है और किसी भी समय अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न हो सकती है। यात्रा के दौरान सबसे महत्वपूर्ण बात मौसम की लगातार निगरानी रखना है। पहाड़ों में मौसम बहुत तेजी से बदलता है, जहां कुछ ही घंटों में साफ आसमान अचानक घने बादलों और तेज बारिश में बदल सकता है। इस कारण यात्रियों को यात्रा शुरू करने से पहले और यात्रा के दौरान मौसम के अपडेट पर ध्यान देना जरूरी है। यदि किसी क्षेत्र में खराब मौसम या चेतावनी जैसी स्थिति बनी हो तो यात्रा को कुछ समय के लिए रोक देना सबसे सुरक्षित विकल्प माना जाता है। चार धाम यात्रा को सुरक्षित बनाने के लिए समय प्रबंधन भी बेहद जरूरी भूमिका निभाता है। सुबह के समय यात्रा शुरू करना अधिक सुरक्षित माना जाता है, क्योंकि दिन के शुरुआती हिस्से में मौसम अपेक्षाकृत स्थिर रहता है। वहीं शाम के समय पहाड़ी क्षेत्रों में धुंध और बारिश का असर बढ़ जाता है, जिससे दृश्यता कम हो जाती है और दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए यात्रियों को सलाह दी जाती है कि वे अपनी यात्रा दिन के उजाले में ही पूरी करने की कोशिश करें। यात्रा के दौरान हल्का और आवश्यक सामान ही साथ रखना समझदारी भरा कदम है। भारी बैग और अनावश्यक वस्तुएं पहाड़ी रास्तों पर चलने में कठिनाई पैदा कर सकती हैं। बारिश से बचाव के लिए रेनकोट और वाटरप्रूफ कपड़े, साथ ही मजबूत पकड़ वाले जूते यात्रा का हिस्सा होना चाहिए। विशेष रूप से ट्रैकिंग मार्गों पर फिसलन का खतरा अधिक होता है, इसलिए सही जूते और सावधानी बेहद जरूरी है। स्वास्थ्य सुरक्षा भी इस यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ठंड और कम ऑक्सीजन के कारण थकान, सांस लेने में कठिनाई और कमजोरी जैसी समस्याएं आम हो सकती हैं। बुजुर्गों और बच्चों को इस मौसम में विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। जिन लोगों को पहले से कोई स्वास्थ्य समस्या है, उन्हें यात्रा से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है। इसके साथ ही यात्रियों को यह भी समझना होगा कि मौसम खराब होने पर धैर्य रखना और प्रशासन के निर्देशों का पालन करना सबसे सुरक्षित विकल्प है। कई बार यात्रा को रोकना या मार्ग बदलना असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन यह निर्णय जीवन सुरक्षा के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है। कुल मिलाकर कहा जाए तो चार धाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था का मार्ग नहीं बल्कि प्रकृति की कठिन परिस्थितियों में धैर्य, तैयारी और सावधानी की परीक्षा भी है। सही योजना, सतर्कता और मौसम के प्रति जागरूकता इस पवित्र यात्रा को सुरक्षित और सफल बनाने की सबसे बड़ी कुंजी है।
Shivpuri E-Scooter Distribution: शिवपुरी में 28 दिव्यांगजनों को मिली स्मार्ट ई-स्कूटी, 40 किलोमीटर तक चलेंगी

HIGHLIGHTS: शिवपुरी में दिव्यांगजनों को मिली ई-स्कूटी जापानी तकनीक पर आधारित हैं वाहन 50 लाख रुपए की लागत से हुआ वितरण एक चार्ज में 40 किमी तक चलेगी स्कूटी आत्मनिर्भर बनाने पर प्रशासन का जोर Shivpuri E-Scooter Distribution: मध्यप्रदेश। शिवपुरी में दिव्यांगजनों को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से मंगलम परिसर में ई-मोटराइज्ड स्कूटियों का वितरण किया गया है। बता दें कि कार्यक्रम के दौरान 28 दिव्यांगजनों को जापानी तकनीक पर आधारित ई-स्कूटियां सौंपी गईं। जिले के कुल 31 हितग्राहियों को दो चरणों में इसका लाभ दिया जा रहा है। Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां आत्मनिर्भरता पर दिया गया जोर कार्यक्रम का शुभारंभ संत रघुवीर सिंह गौर और समाजसेवी रेणु सांखला ने किया। इस मौके पर दिव्यांगजन आयुक्त डॉ. अजय खेमरिया और सक्षम संस्था के अध्यक्ष रविन्द्र कोपरगांवकर सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे। वक्ताओं ने कहा कि इन स्कूटियों का उद्देश्य दिव्यांगजनों को आवागमन में आत्मनिर्भर बनाना है। प्रधानमंत्री की अपीलों में कठोर निर्णयों के संकेत 50 लाख की लागत से उपलब्ध कराई गई सुविधा सक्षम संस्था के अध्यक्ष रविन्द्र कोपरगांवकर ने बताया कि संस्था देशभर में दिव्यांगजनों के लिए सेवा कार्य कर रही है। इसी क्रम में शिवपुरी जिले के 31 दिव्यांगजनों को लगभग 50 लाख रुपए की लागत से ई-स्कूटियां उपलब्ध कराई जा रही हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में भी इस तरह की मदद जारी रहेगी। BJP KP YADAV CONTROVERSY: केपी यादव समर्थक की सोशल मीडिया पोस्ट पर BJP सख्त, जारी किया नोटिस एक बार चार्ज में 40 किलोमीटर तक चलेगी कार्यक्रम में जानकारी दी गई कि ये ई-व्हीकल आईआईटी मद्रास द्वारा जापानी तकनीक के आधार पर डिजाइन किए गए हैं। एक बार चार्ज होने पर यह स्कूटी करीब 40 किलोमीटर तक चल सकती है। साथ ही इसे घर के अंदर और बाहर दोनों जगह आसानी से उपयोग किया जा सकता है।
chrome ai update: टेक्नोलॉजी और प्राइवेसी पर बहस तेज: Google Chrome के AI फीचर से जुड़ी बड़ी स्टोरेज फाइल को लेकर विवाद

chrome ai update: नई दिल्ली । डिजिटल दुनिया में तेजी से बदलती तकनीक के बीच अब वेब ब्राउज़िंग का अनुभव भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साथ जुड़ता जा रहा है। इसी बीच एक लोकप्रिय ब्राउज़र को लेकर यूजर्स के बीच नई चिंता सामने आई है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि यह सिस्टम अपने आप एक बड़ी AI आधारित फाइल डिवाइस में डाउनलोड कर रहा है, जिसका आकार लगभग 4GB तक बताया जा रहा है। यह फाइल कथित तौर पर ब्राउज़र के ऑन-डिवाइस AI सिस्टम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य कुछ स्मार्ट फीचर्स को सीधे कंप्यूटर या लैपटॉप पर ही चलाना है। इन फीचर्स में स्कैम डिटेक्शन, ऑटोफिल सुझाव और टेक्स्ट लिखने में मदद करने जैसी सुविधाएं शामिल बताई जा रही हैं। इस तकनीक का मकसद यह है कि यूजर को तेज और बेहतर अनुभव मिले, साथ ही क्लाउड सर्वर पर निर्भरता कम हो। लेकिन असली विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ है कि कई यूजर्स को इस भारी-भरकम फाइल के डाउनलोड होने की जानकारी पहले से नहीं दी गई। कई लोगों का कहना है कि सिस्टम में अचानक स्टोरेज कम होने पर उन्होंने जांच की, तब उन्हें इस फाइल का पता चला। यह फाइल सामान्य फोल्डरों में आसानी से दिखाई नहीं देती, जिससे आम यूजर के लिए इसे पहचानना मुश्किल हो जाता है। इस स्थिति ने खासकर उन लोगों को परेशान किया है जिनके सिस्टम में पहले से ही सीमित स्टोरेज है। अचानक कई गीगाबाइट जगह घिर जाने से सिस्टम की परफॉर्मेंस पर भी असर पड़ने की शिकायतें सामने आई हैं। इसी वजह से अब यूजर्स यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह फाइल जरूरी है या इसे हटाया जा सकता है। Shivpuri E-Scooter Distribution: शिवपुरी में 28 दिव्यांगजनों को मिली स्मार्ट ई-स्कूटी, 40 किलोमीटर तक चलेंगी तकनीकी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फाइल ब्राउज़र के AI सिस्टम को लोकल रूप से चलाने के लिए जरूरी हो सकती है, लेकिन यूजर्स को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे इसे रखना चाहते हैं या नहीं। वर्तमान स्थिति में सबसे बड़ी चिंता पारदर्शिता को लेकर है, क्योंकि कई यूजर्स को यह प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट नहीं लग रही है। रिपोर्ट्स और यूजर अनुभवों के आधार पर यह भी बताया जा रहा है कि यह फाइल ब्राउज़र अपडेट के बाद स्वतः सिस्टम में जुड़ जाती है। इसे हटाने के लिए यूजर्स को सेटिंग्स में जाकर AI आधारित फीचर्स को बंद करना पड़ सकता है, अन्यथा यह फाइल दोबारा डाउनलोड हो सकती है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर डिजिटल प्राइवेसी और यूजर कंट्रोल पर बहस को जन्म दे दिया है। जहां एक तरफ नई तकनीकें यूजर अनुभव को बेहतर बनाने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ उनके अनजाने में होने वाले बदलाव लोगों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं। कुल मिलाकर यह मामला इस बात की ओर इशारा करता है कि आधुनिक तकनीक में सुविधा और पारदर्शिता दोनों का संतुलन जरूरी है। यूजर्स के लिए यह समझना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि उनके डिवाइस में कौन सा डेटा कब और क्यों स्टोर हो रहा है, ताकि वे अपने सिस्टम और स्टोरेज पर पूरा नियंत्रण रख सकें।
Newborn Baby Bath Tips: नवजात को नहलाने का सही तरीका और जरूरी सावधानियां

Newborn Baby Bath Tips: नई दिल्ली। नवजात शिशु की देखभाल जितनी खुशी देती है, उतनी ही जिम्मेदारी भी मांगती है। खासतौर पर जब बात बच्चे को नहलाने की हो, तो माता-पिता को बेहद सतर्क रहने की जरूरत होती है। जन्म के बाद शुरुआती महीनों में शिशु की त्वचा बहुत कोमल होती है और उसका शरीर बाहरी वातावरण के अनुसार खुद को पूरी तरह ढाल नहीं पाता। ऐसे में नहलाते समय की गई छोटी-सी गलती भी बच्चे के लिए परेशानी का कारण बन सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, नवजात या प्रीमैच्योर बच्चे को नहलाते समय पानी का तापमान सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। पानी हमेशा हल्का गुनगुना होना चाहिए। ज्यादा गर्म पानी बच्चे की त्वचा को नुकसान पहुंचा सकता है, जबकि ठंडा पानी सर्दी-जुकाम या शरीर का तापमान गिरने का कारण बन सकता है। नहलाने से पहले हाथ से पानी का तापमान जरूर जांच लेना चाहिए। बच्चे को लंबे समय तक पानी में रखना भी सही नहीं माना जाता। नवजात शिशु जल्दी ठंड पकड़ लेते हैं, इसलिए उनका स्नान बहुत कम समय में और आरामदायक तरीके से होना चाहिए। कई लोग बच्चे को तेजी से रगड़कर साफ करने लगते हैं, लेकिन ऐसा करना नुकसानदायक हो सकता है। शिशु की त्वचा बेहद संवेदनशील होती है, इसलिए उसे हमेशा मुलायम कपड़े और हल्के हाथों से साफ करना चाहिए। डॉक्टरों का मानना है कि तेज खुशबू वाले साबुन, बॉडी वॉश या केमिकल युक्त प्रोडक्ट नवजात की त्वचा पर बुरा असर डाल सकते हैं। इसलिए बच्चे के लिए केवल माइल्ड और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए प्रोडक्ट का ही इस्तेमाल करना चाहिए। कई मामलों में सिर्फ साफ गुनगुने पानी और मुलायम कपड़े से सफाई करना ही पर्याप्त होता है। नहलाते समय कमरे का तापमान भी सामान्य और आरामदायक होना चाहिए। ठंडी हवा, तेज पंखा या एसी वाले कमरे में बच्चे को नहलाने से वह जल्दी बीमार पड़ सकता है। स्नान के तुरंत बाद बच्चे को मुलायम तौलिए से अच्छी तरह सुखाकर गर्म कपड़े पहनाना जरूरी है। विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि हर दिन नवजात को पानी से नहलाना जरूरी नहीं होता। खासकर प्रीमैच्योर बच्चों के लिए स्पंज बाथ यानी गीले मुलायम कपड़े से शरीर साफ करना ज्यादा सुरक्षित माना जाता है। इससे बच्चा साफ भी रहता है और ठंड लगने का खतरा भी कम होता है। अगर बच्चे को नहलाने के बाद त्वचा लाल हो जाए, ज्यादा रोना आए, सांस लेने में दिक्कत हो या शरीर ठंडा महसूस हो, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। सही देखभाल और सावधानी के साथ ही नवजात शिशु स्वस्थ और सुरक्षित रह सकता है।
प्रधानमंत्री की अपीलों में कठोर निर्णयों के संकेत

– जयसिंह रावतपिछले कुछ सप्ताहों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से की गई अपीलों—जैसे ईंधन की बचत, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग, विदेश यात्राओं में संयम, सोने की खरीद टालने और अनावश्यक खर्चों से बचने—को सामान्य सरकारी सलाह मानकर अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए। राजनीति में शब्द अक्सर संकेत होते हैं और शासन व्यवस्था में सार्वजनिक अपीलें कई बार आने वाले निर्णयों की प्रस्तावना बनती हैं। यदि इन संकेतों को वैश्विक परिस्थितियों, ऊर्जा संकट, युद्धों, बढ़ती महंगाई और भारत की आंतरिक आर्थिक चुनौतियों के साथ जोड़कर देखा जाए तो स्पष्ट दिखाई देता है कि देश एक कठिन आर्थिक दौर की तैयारी कर रहा है। दुनिया इस समय असाधारण अस्थिरता से गुजर रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, विशेषकर ईरान और इजराइल के बीच संघर्ष तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता, केवल क्षेत्रीय संकट नहीं है। विश्व के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो तेल की कीमतों में अचानक भारी वृद्धि होना स्वाभाविक है। भारत जैसे देश, जो अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखा है, लेकिन इसके पीछे सरकार द्वारा लगातार संतुलन साधने की कोशिश रही है। पेट्रोल और डीजल की वास्तविक अंतरराष्ट्रीय कीमतों का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया। तेल विपणन कंपनियों ने भी नुकसान सहा। लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक नहीं चल सकती। यदि वैश्विक संकट लंबा खिंचता है तो सरकार के सामने ईंधन की कीमतें बढ़ाने के अलावा कोई बड़ा विकल्प नहीं बचेगा। इसका सीधा प्रभाव परिवहन, कृषि, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ेगा। महंगाई केवल बाजार में वस्तुओं के महंगे होने का नाम नहीं है। यह धीरे-धीरे आम आदमी की क्रय शक्ति को कमजोर करती है। वेतन उतनी तेजी से नहीं बढ़ते जितनी तेजी से खर्च बढ़ते हैं। मध्यम वर्ग, निम्न मध्यम वर्ग और गरीब परिवार सबसे पहले दबाव महसूस करते हैं। रसोई गैस, बिजली, स्कूल फीस, दवाइयां, किराया और यात्रा—सब कुछ महंगा होने लगता है। ऐसे समय में सरकारों को कई बार अलोकप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। प्रधानमंत्री द्वारा सोने की खरीद कम करने की अपील भी केवल सांकेतिक नहीं है। भारत में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और निवेश का माध्यम माना जाता है लेकिन सोना बड़े पैमाने पर आयात किया जाता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ता है। यदि तेल और सोने दोनों का आयात महंगा होता है तो देश का व्यापार घाटा बढ़ सकता है। इससे रुपये पर दबाव आएगा और रुपया कमजोर होने पर आयात और महंगे हो जाएंगे। यह एक दुष्चक्र बन सकता है। संभव है कि आने वाले समय में सरकार कुछ कठोर आर्थिक कदम उठाए। इनमें ईंधन पर सब्सिडी कम करना, सरकारी खर्चों में कटौती, कुछ योजनाओं की समीक्षा, करों में बदलाव, आयात नियंत्रण, सार्वजनिक उपक्रमों के विनिवेश में तेजी और सरकारी विभागों में मितव्ययिता जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। यह भी संभव है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक वाहनों और घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नए नियम लागू करे। लेकिन केवल सरकार ही कठिनाई में नहीं होगी। जनता को भी अपनी जीवनशैली बदलनी पड़ सकती है। पिछले वर्षों में उपभोग आधारित जीवनशैली तेजी से बढ़ी है। आसान ऋण, किस्तों पर खरीदारी और दिखावटी उपभोग ने समाज के बड़े हिस्से को प्रभावित किया है। यदि आर्थिक दबाव बढ़ता है तो परिवारों को खर्चों की प्राथमिकताएं तय करनी होंगी। अनावश्यक यात्राएं, विलासिता की वस्तुएं, अत्यधिक ईंधन उपयोग और दिखावे पर आधारित खर्च कम करने पड़ सकते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि भारत की राजनीति अभी भी मुफ्त योजनाओं और लोकलुभावन घोषणाओं की प्रतिस्पर्धा में फंसी हुई है। चुनावों में मुफ्त बिजली, नकद सहायता, बेरोजगारी भत्ता और अनेक प्रकार की रियायतों की घोषणाएं लगातार बढ़ रही हैं। अल्पकाल में ये योजनाएं जनता को राहत देती हैं, लेकिन दीर्घकाल में सरकारी वित्तीय स्थिति पर भारी बोझ डालती हैं। राज्यों की आर्थिक हालत पहले से दबाव में है। कई राज्य भारी कर्ज के सहारे चल रहे हैं। यदि वैश्विक आर्थिक संकट गहराता है तो राज्यों की स्थिति और कठिन हो सकती है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह विकास और मितव्ययिता के बीच संतुलन कैसे बनाए। केवल खर्च घटाने से अर्थव्यवस्था धीमी हो सकती है। इसलिए संभव है कि सरकार बुनियादी ढांचे पर खर्च जारी रखे ताकि रोजगार और आर्थिक गतिविधियां बनी रहें। सड़क, रेलवे, रक्षा, ऊर्जा और डिजिटल ढांचे में निवेश शायद जारी रहेगा, क्योंकि यही क्षेत्र लंबे समय में अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। कृषि क्षेत्र भी इस संकट से अछूता नहीं रहेगा। डीजल महंगा होने से सिंचाई और परिवहन लागत बढ़ेगी। उर्वरकों की कीमतें बढ़ सकती हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है तो खाद्य महंगाई और बढ़ सकती है। इसका असर सीधे ग्रामीण भारत पर पड़ेगा। किसानों की आय और उपभोक्ताओं की थाली दोनों प्रभावित होंगी। ऐसे समय में सामाजिक धैर्य और राष्ट्रीय अनुशासन की आवश्यकता होती है। इतिहास बताता है कि बड़े आर्थिक संकट केवल सरकारी फैसलों से नहीं, बल्कि जनता के सहयोग से संभाले जाते हैं। 1991 के आर्थिक संकट के समय भारत को सोना गिरवी रखना पड़ा था। आज स्थिति वैसी नहीं है, लेकिन वैश्विक अस्थिरता यह याद दिलाती है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल नारा नहीं बल्कि आवश्यकता है। भारत की एक बड़ी ताकत उसका विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या और मजबूत सेवा क्षेत्र है। यदि सरकार सही समय पर संतुलित निर्णय लेती है और जनता संयम दिखाती है तो यह संकट अवसर भी बन सकता है। घरेलू विनिर्माण, ऊर्जा आत्मनिर्भरता, सार्वजनिक परिवहन, वैकल्पिक ऊर्जा और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा देने का यही समय है। फिर भी यह मान लेना भूल होगी कि आने वाले महीने सामान्य रहेंगे। महंगाई, ईंधन मूल्य वृद्धि, रोजगार की अनिश्चितता और सरकारी सख्ती का असर आम लोगों को महसूस हो सकता है। प्रधानमंत्री के हालिया संदेशों को इसी व्यापक संदर्भ में समझना चाहिए। वे केवल सलाह नहीं, बल्कि आने वाले कठिन समय की चेतावनी भी हो सकते हैं। भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां आर्थिक विवेक, राजनीतिक साहस और सामाजिक अनुशासन तीनों की परीक्षा होने वाली
प्रीमियम स्मार्टफोन मार्केट में हलचल, Galaxy S26 Ultra पर हजारों रुपये की छूट

नई दिल्ली । स्मार्टफोन बाजार में प्रतिस्पर्धा लगातार तेज होती जा रही है और इसका सीधा फायदा ग्राहकों को मिल रहा है। हाल ही में लॉन्च हुआ Samsung का प्रीमियम स्मार्टफोन Galaxy S26 Ultra अब लॉन्च के कुछ ही महीनों के भीतर भारी छूट के साथ उपलब्ध हो गया है। यह फोन शुरुआत में अपने हाई-एंड फीचर्स और प्रीमियम डिजाइन के कारण काफी चर्चा में रहा था, लेकिन अब इसकी कीमत में आई गिरावट ने एक बार फिर इसे सुर्खियों में ला दिया है। Galaxy S26 Ultra को फरवरी में पेश किया गया था और इसे कंपनी का सबसे एडवांस फ्लैगशिप डिवाइस माना जा रहा है। इस स्मार्टफोन में बड़ा और हाई-रिजॉल्यूशन डिस्प्ले दिया गया है, जो स्मूथ और शार्प विजुअल एक्सपीरियंस प्रदान करता है। इसमें नया और पावरफुल प्रोसेसर लगाया गया है, जिसे परफॉर्मेंस और मल्टीटास्किंग को बेहतर बनाने के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है। इसी वजह से यह फोन गेमिंग और हैवी यूज़ के लिए भी काफी सक्षम माना जाता है। कैमरा सेक्शन इस फोन का सबसे बड़ा आकर्षण है, जिसमें हाई-रिजॉल्यूशन मेन सेंसर के साथ मल्टीपल लेंस सेटअप दिया गया है। यह फोन फोटोग्राफी और वीडियो रिकॉर्डिंग के मामले में प्रोफेशनल लेवल का अनुभव देने का दावा करता है। इसके अलावा फ्रंट कैमरा भी हाई-क्वालिटी सेल्फी और वीडियो कॉलिंग के लिए डिजाइन किया गया है। बैटरी बैकअप और अन्य फीचर्स की बात करें तो इसमें बड़ी बैटरी के साथ फास्ट चार्जिंग सपोर्ट मिलता है। साथ ही इसमें कई एडवांस एआई फीचर्स भी शामिल किए गए हैं, जो यूज़र एक्सपीरियंस को और बेहतर बनाते हैं। फोन की प्राइवेसी से जुड़ी एक खास तकनीक भी इसे अन्य डिवाइसेस से अलग बनाती है, जिससे स्क्रीन कंटेंट आसपास के लोगों के लिए कम दिखाई देता है। लॉन्च के समय इस फोन की कीमत काफी प्रीमियम रखी गई थी, लेकिन अब ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर इस पर आकर्षक छूट दी जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह फोन अब अपने शुरुआती दाम से हजारों रुपये सस्ता मिल रहा है। इसके अलावा कुछ बैंक ऑफर्स और अतिरिक्त छूट को जोड़ने पर कुल बचत और भी बढ़ जाती है, जिससे यह डील और ज्यादा आकर्षक बन जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रीमियम स्मार्टफोन सेगमेंट में कीमतों में इस तरह की तेजी से बदलाव आम बात है, क्योंकि कंपनियां बाजार में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए समय-समय पर ऑफर्स और डिस्काउंट देती रहती हैं। इससे ग्राहकों को हाई-एंड टेक्नोलॉजी कम कीमत में उपलब्ध हो जाती है। इसी बीच अन्य ब्रांड्स के फ्लैगशिप मॉडल्स पर भी आकर्षक ऑफर्स देखने को मिल रहे हैं, जिससे स्मार्टफोन बाजार में प्रतिस्पर्धा और बढ़ गई है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जो ग्राहक प्रीमियम फोन खरीदने की योजना बना रहे हैं, उनके लिए यह समय काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।