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निवेशकों की उम्मीदें चरम पर, Goldline Pharmaceutical IPO की लिस्टिंग से पहले ग्रे मार्केट में जबरदस्त उत्साह

नई दिल्ली । फार्मास्युटिकल सेक्टर की उभरती कंपनी Goldline Pharmaceutical का आईपीओ बाजार में जबरदस्त चर्चा का विषय बना हुआ है। कंपनी के शेयरों की लिस्टिंग से पहले ही निवेशकों के बीच उत्साह चरम पर पहुंच गया है। मजबूत ग्रे मार्केट प्रीमियम और रिकॉर्डतोड़ सब्सक्रिप्शन ने इस आईपीओ को निवेशकों के लिए सबसे चर्चित इश्यू में बदल दिया है। अब सभी की निगाहें कंपनी की लिस्टिंग पर टिकी हुई हैं, जहां निवेशकों को शानदार रिटर्न मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। कंपनी का आईपीओ पूरी तरह फ्रेश इश्यू के रूप में बाजार में आया था और इसका आकार लगभग 11.61 करोड़ रुपये रखा गया था। कंपनी ने अपने शेयरों का प्राइस बैंड 41 से 43 रुपये प्रति शेयर तय किया था। आईपीओ खुलते ही निवेशकों की ओर से जबरदस्त प्रतिक्रिया देखने को मिली और अंतिम दिन तक यह इश्यू कई गुना सब्सक्राइब हो गया। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे आकार के बावजूद कंपनी ने जिस तरह निवेशकों का विश्वास हासिल किया है, वह इसकी कारोबारी संभावनाओं को दर्शाता है। ग्रे मार्केट में कंपनी के शेयरों को लेकर काफी सकारात्मक माहौल दिखाई दे रहा है। बाजार सूत्रों के अनुसार कंपनी का ग्रे मार्केट प्रीमियम करीब 15 रुपये तक पहुंच गया है, जो इसके ऊपरी प्राइस बैंड की तुलना में लगभग 35 प्रतिशत अधिक माना जा रहा है। इसी आधार पर अनुमान लगाया जा रहा है कि कंपनी के शेयर करीब 58 रुपये के आसपास लिस्ट हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो निवेशकों को पहले ही दिन मजबूत लिस्टिंग गेन हासिल हो सकता है। हालांकि बाजार जानकार यह भी मानते हैं कि ग्रे मार्केट केवल संकेत देता है और इसमें उतार-चढ़ाव तेजी से हो सकते हैं। इस आईपीओ की सबसे बड़ी खासियत इसका रिकॉर्ड सब्सक्रिप्शन रहा। रिटेल निवेशकों से लेकर संस्थागत निवेशकों तक सभी श्रेणियों में जबरदस्त मांग देखने को मिली। रिटेल कैटेगरी में भारी आवेदन आने से यह स्पष्ट हो गया कि छोटे निवेशकों को कंपनी की भविष्य की संभावनाओं पर मजबूत भरोसा है। वहीं गैर-संस्थागत निवेशकों और योग्य संस्थागत खरीदारों की तरफ से भी बड़ी भागीदारी देखने को मिली। बाजार में यह धारणा बन गई है कि कंपनी का कारोबार आने वाले वर्षों में तेजी से विस्तार कर सकता है। Goldline Pharmaceutical एसेट-लाइट बिजनेस मॉडल पर काम करती है। इस मॉडल के तहत कंपनी खुद उत्पादन इकाइयों में भारी निवेश करने के बजाय तीसरी पार्टियों से दवाइयों का निर्माण करवाती है और फिर अपने ब्रांड नाम से उन्हें बाजार में बेचती है। कंपनी कार्डियोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स, पीडियाट्रिक्स, डायबिटीज केयर और क्रिटिकल केयर जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते मेडिकल क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी रखती है। यही कारण है कि निवेशकों को कंपनी के कारोबार में लंबी अवधि की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो कंपनी ने पिछले वर्षों में लगातार वृद्धि दर्ज की है। कंपनी की आय में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिली है, वहीं मुनाफे में भी मजबूत उछाल दर्ज किया गया है। यही सकारात्मक वित्तीय आंकड़े निवेशकों के भरोसे को और मजबूत कर रहे हैं। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कंपनी आने वाले समय में अपने कारोबार के विस्तार और वित्तीय प्रदर्शन को इसी तरह बनाए रखती है, तो यह निवेशकों के लिए लंबी अवधि में भी आकर्षक साबित हो सकती है।

राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस: स्वाद, इतिहास और फ्रेंच पाक कला का खास उत्सव

हर वर्ष 18 मई को राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस मनाया जाता है। यह दिवस दुनिया के सबसे लोकप्रिय फ्रेंच व्यंजनों में शामिल “चीज़ सूफ़ले” को समर्पित है। अपने हल्के, मुलायम और फूले हुए स्वाद के कारण यह डिश खाने के शौकीनों के बीच बेहद पसंद की जाती है। राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस का उद्देश्य लोगों को इस पारंपरिक व्यंजन के इतिहास, स्वाद और पाक कला से परिचित कराना है। सूफ़ले शब्द फ्रेंच भाषा के “Souffler” से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है “फूलना” या “उभरना”। यह डिश ओवन में बेक होने के दौरान ऊपर की ओर फूलती है, इसी कारण इसे यह नाम दिया गया। चीज़ सूफ़ले मुख्य रूप से अंडे, चीज़, मक्खन, दूध और मैदा से बनाया जाता है। इसका बाहरी हिस्सा हल्का कुरकुरा जबकि अंदर का भाग बेहद नरम और स्पंजी होता है। इतिहासकारों के अनुसार, सूफ़ले की शुरुआत 18वीं शताब्दी में फ्रांस में हुई थी। माना जाता है कि प्रसिद्ध फ्रेंच शेफ विंसेंट ला शापेल ने पहली बार सूफ़ले बनाने की तकनीक विकसित की थी। बाद में 19वीं शताब्दी में मशहूर फ्रेंच शेफ मैरी-एंटोइन कारेम ने इसे और लोकप्रिय बनाया। उन्होंने सूफ़ले को फ्रेंच हाई-कुज़ीन यानी उच्च स्तर की पाक कला का हिस्सा बना दिया। धीरे-धीरे यह डिश यूरोप और फिर दुनिया के कई देशों में प्रसिद्ध हो गई। राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस कब शुरू हुआ, इसे लेकर कोई आधिकारिक ऐतिहासिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन अमेरिका में “नेशनल फूड डे” की परंपरा के तहत इसे 18 मई को मनाया जाने लगा। इसका उद्देश्य लोगों को अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय व्यंजनों और खास खाद्य परंपराओं से जोड़ना था। समय के साथ यह दिन सोशल मीडिया, होटल इंडस्ट्री और फूड लवर्स के बीच लोकप्रिय हो गया। इस अवसर पर कई रेस्तरां, होटल और बेकरी विशेष चीज़ सूफ़ले तैयार करते हैं। फूड ब्लॉगर और शेफ भी नए फ्लेवर और रेसिपी के जरिए लोगों को आकर्षित करते हैं। कई लोग घरों में भी इसे बनाने की कोशिश करते हैं, हालांकि इसे तैयार करना आसान नहीं माना जाता। सही तापमान, अंडे की फेंटाई और बेकिंग तकनीक इसमें बेहद महत्वपूर्ण होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीज़ सूफ़ले केवल एक डिश नहीं, बल्कि पाक कला की बारीकी और धैर्य का उदाहरण है। इसे बनाने में छोटी सी गलती भी इसका टेक्सचर खराब कर सकती है। यही कारण है कि इसे फ्रेंच कुकिंग की सबसे चुनौतीपूर्ण लेकिन शानदार रेसिपी में गिना जाता है। राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस लोगों को यह संदेश भी देता है कि भोजन केवल स्वाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और कला से भी जुड़ा होता है। यह दिन दुनियाभर की खाद्य परंपराओं को समझने और नए स्वादों का आनंद लेने का अवसर बन चुका है। -राष्ट्रीय चीज़ सूफ़ले दिवस

फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में नई हलचल, उड़द और तुवर दाल कारोबार वाली कंपनी ला रही नया IPO

नई दिल्ली । फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में तेजी से उभर रही एम आर मणिवेनी फूड्स अब शेयर बाजार में अपनी नई पहचान बनाने की तैयारी में है। कंपनी ने लगभग 27 करोड़ रुपये जुटाने के उद्देश्य से अपना SME IPO लाने का फैसला किया है। यह पूरा इश्यू फ्रेश शेयरों के जरिए जारी किया जाएगा, जिसके तहत करीब 52 लाख नए शेयर बाजार में उतारे जाएंगे। कंपनी का यह कदम उसके विस्तार की बड़ी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। यह IPO 22 मई 2026 से निवेशकों के लिए खुलेगा और 26 मई तक इसमें आवेदन किए जा सकेंगे। कंपनी ने शेयरों का प्राइस बैंड 51 से 52 रुपये प्रति शेयर तय किया है। निवेशकों के बीच इस इश्यू को लेकर खास उत्साह देखा जा रहा है क्योंकि फूड प्रोसेसिंग सेक्टर को लंबे समय से स्थिर और लगातार बढ़ने वाला कारोबार माना जाता है। खास तौर पर दाल जैसे रोजमर्रा के खाद्य उत्पादों की मांग देशभर में हमेशा बनी रहती है, जिससे इस बिजनेस मॉडल को मजबूत आधार मिलता है। रिटेल निवेशकों के लिए न्यूनतम आवेदन 2,000 शेयरों का रखा गया है। अपर प्राइस बैंड के अनुसार इसमें निवेश करने के लिए लगभग 2.08 लाख रुपये की जरूरत होगी। वहीं हाई नेटवर्थ निवेशकों के लिए न्यूनतम निवेश राशि 3 लाख रुपये से अधिक रखी गई है। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि SME प्लेटफॉर्म पर आने वाली ऐसी कंपनियां भविष्य में तेजी से विस्तार कर सकती हैं, खासकर तब जब उनका कारोबार दैनिक जरूरतों से जुड़ा हो। कंपनी वर्ष 2010 से फूड प्रोडक्ट्स की प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और वितरण के क्षेत्र में काम कर रही है। फिलहाल इसका मुख्य कारोबार उड़द दाल और तुवर दाल पर केंद्रित है। कंपनी आधुनिक तकनीकों और गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली के जरिए अपने उत्पादों को बेहतर बनाने पर लगातार काम कर रही है। इसके साथ ही मजबूत सप्लाई चेन और साफ-सुथरी पैकेजिंग को भी कंपनी अपनी बड़ी ताकत मानती है। वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो पिछले दो वर्षों में कंपनी ने तेज ग्रोथ दर्ज की है। वित्त वर्ष 2024 में कंपनी की कुल आय लगभग 155 करोड़ रुपये थी, जो अगले वित्त वर्ष में बढ़कर 203 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। वहीं कंपनी का मुनाफा भी लगभग दोगुना हुआ है। वित्त वर्ष 2024 में जहां कंपनी का प्रॉफिट करीब 2 करोड़ रुपये था, वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह बढ़कर 4 करोड़ रुपये से ज्यादा पहुंच गया। यह बढ़ोतरी कंपनी के मजबूत बिजनेस मॉडल और बढ़ती बाजार मांग को दर्शाती है। IPO से जुटाई गई राशि का बड़ा हिस्सा कंपनी अपने विस्तार कार्यों में लगाएगी। नई फैक्ट्री के निर्माण पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाएंगे, जबकि अत्याधुनिक प्लांट और मशीनरी खरीदने की भी तैयारी है। इसके अलावा कुछ राशि सामान्य कॉर्पोरेट जरूरतों और कारोबार को मजबूत बनाने में उपयोग की जाएगी। फूड सेक्टर में लगातार बढ़ती मांग और कंपनी की तेज वित्तीय प्रगति को देखते हुए निवेशकों की नजर अब इस IPO पर टिक गई है। बाजार में यह चर्चा भी तेज है कि आने वाले समय में ऐसी कंपनियां ग्रामीण और शहरी दोनों बाजारों में अपनी मजबूत पकड़ बना सकती हैं। SME IPO सेगमेंट में यह इश्यू निवेशकों के लिए एक नया और दिलचस्प अवसर माना जा रहा है।

मदर व्हिस्लर दिवस: मां के सम्मान और त्याग को समर्पित विशेष दिन

हर वर्ष मई महीने के तीसरे रविवार को मदर व्हिस्लर दिवस मनाया जाता है। यह दिन मां के प्रेम, त्याग, संघर्ष और परिवार के प्रति उनके समर्पण को सम्मान देने के लिए खास माना जाता है। दुनियाभर में अलग-अलग रूपों में मातृत्व का सम्मान किया जाता है और मदर व्हिस्लर दिवस भी उसी भावना को आगे बढ़ाने वाला एक विशेष अवसर है। मां को जीवन का पहला गुरु कहा जाता है। एक बच्चे के जन्म से लेकर उसके जीवन को सही दिशा देने तक मां की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। वह बिना किसी स्वार्थ के अपने बच्चों और परिवार की खुशियों के लिए लगातार मेहनत करती है। मां का प्यार, धैर्य और त्याग हर इंसान के जीवन की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। मदर व्हिस्लर दिवस का उद्देश्य केवल मां को उपहार देना नहीं, बल्कि उनके संघर्ष और योगदान को समझना भी है। आज की व्यस्त जिंदगी में कई बार लोग अपने परिवार और खासकर मां को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। ऐसे में यह दिन रिश्तों को मजबूत करने और मां के प्रति आभार व्यक्त करने का अवसर बन जाता है। इस अवसर पर लोग अपनी मां के साथ समय बिताते हैं, उन्हें उपहार देते हैं, शुभकामनाएं भेजते हैं और उनके प्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। कई स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं में भी इस दिन विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां मातृत्व के महत्व पर चर्चा होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि मां केवल परिवार की जिम्मेदारी नहीं निभाती, बल्कि समाज को संस्कारवान और मजबूत बनाने में भी अहम भूमिका निभाती है। एक मां अपने बच्चों को प्यार, अनुशासन, सहनशीलता और जीवन के मूल्य सिखाती है। मदर व्हिस्लर दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मां का स्थान जीवन में सबसे ऊपर होता है। उनके त्याग और स्नेह का कोई मूल्य नहीं लगाया जा सकता। इसलिए हर व्यक्ति को केवल किसी एक खास दिन ही नहीं, बल्कि हर दिन अपनी मां का सम्मान और आदर करना चाहिए। -मदर व्हिस्लर दिवस

अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस 2026: इतिहास, संस्कृति और विरासत को सहेजने का दिन

हर वर्ष 18 मई को दुनियाभर में अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य लोगों को संग्रहालयों के महत्व के प्रति जागरूक करना और ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा सामाजिक विरासत को संरक्षित करने के लिए प्रेरित करना है। संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं को संभालकर रखने की जगह नहीं होते, बल्कि वे समाज की सभ्यता, कला, संस्कृति और इतिहास को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम भी हैं। अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस की शुरुआत वर्ष 1977 में इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ म्यूजियम्स (ICOM) द्वारा की गई थी। इसके बाद से हर साल एक विशेष थीम के साथ यह दिवस मनाया जाता है। दुनिया के हजारों संग्रहालय इस अवसर पर प्रदर्शनी, कार्यशाला, सांस्कृतिक कार्यक्रम और जागरूकता अभियान आयोजित करते हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग इतिहास और संस्कृति से जुड़ सकें। भारत जैसे सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश में संग्रहालयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। देशभर के संग्रहालय प्राचीन सभ्यताओं, स्वतंत्रता आंदोलन, कला, विज्ञान, जनजातीय संस्कृति और ऐतिहासिक धरोहरों को संजोकर रखे हुए हैं। दिल्ली का राष्ट्रीय संग्रहालय, भोपाल का जनजातीय संग्रहालय, कोलकाता का इंडियन म्यूजियम और मुंबई का छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय देश की विरासत को दर्शाने वाले प्रमुख केंद्र हैं। संग्रहालय विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए भी ज्ञान का बड़ा स्रोत होते हैं। यहां रखी दुर्लभ पांडुलिपियां, मूर्तियां, चित्रकला, हथियार, सिक्के और ऐतिहासिक दस्तावेज अतीत को समझने में मदद करते हैं। आधुनिक दौर में डिजिटल तकनीक के माध्यम से कई संग्रहालय वर्चुअल टूर और ऑनलाइन प्रदर्शनी भी शुरू कर चुके हैं, जिससे लोग घर बैठे इतिहास और संस्कृति से जुड़ पा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि संग्रहालय समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम करते हैं। तेजी से बदलती दुनिया में जहां आधुनिकता का प्रभाव बढ़ रहा है, वहीं संग्रहालय हमारी परंपराओं और ऐतिहासिक पहचान को जीवित रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस पर लोगों से अपील की जाती है कि वे संग्रहालयों का भ्रमण करें, बच्चों को इतिहास और संस्कृति से परिचित कराएं और अपनी धरोहरों के संरक्षण में योगदान दें। यह दिन हमें याद दिलाता है कि किसी भी देश की असली पहचान उसकी संस्कृति, इतिहास और विरासत में छिपी होती है। -अंतर्राष्ट्रीय संग्रहालय दिवस

PM मोदी का करीबी बनकर करोड़ों की ठगी करने वाले आरोपी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, तीन साल जेल में बिताने के बाद मिली जमानत

नई दिल्ली में सामने आए एक चर्चित मनी लॉन्ड्रिंग और ठगी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी काशिफ को जमानत देकर बड़ी राहत प्रदान की है। आरोपी पर आरोप है कि उसने खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई केंद्रीय मंत्रियों का करीबी बताकर लोगों को प्रभाव में लिया और सरकारी नौकरी, ठेके तथा सरकारी विभागों में मदद दिलाने के नाम पर लाखों रुपये की ठगी की। यह मामला लंबे समय से जांच एजेंसियों की निगरानी में था और आरोपी बीते लगभग तीन वर्षों से जेल में बंद था। सुप्रीम कोर्ट ने इसी लंबी न्यायिक हिरासत को ध्यान में रखते हुए जमानत मंजूर की है। सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी की जमानत याचिका पहले खारिज कर दी गई थी। अदालत ने माना कि आरोपी काफी लंबा समय जेल में गुजार चुका है और मामले की सुनवाई अभी जारी है। इसी आधार पर उसे सशर्त जमानत देने का फैसला लिया गया। हालांकि अदालत ने आरोपी को सख्त चेतावनी भी दी कि वह भविष्य में किसी भी संवैधानिक या सरकारी अधिकारी के नाम का इस्तेमाल निजी फायदे के लिए नहीं करेगा। सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आरोपी किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है या जांच प्रक्रिया में सहयोग नहीं करता, तो प्रवर्तन निदेशालय उसकी जमानत रद्द कराने के लिए दोबारा अदालत का रुख कर सकता है। अदालत ने आरोपी को जांच और ट्रायल की हर प्रक्रिया में पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया है। यह मामला अप्रैल 2023 में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा हुआ है, जिसमें धोखाधड़ी, जालसाजी और सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत गंभीर आरोप लगाए गए थे। जांच एजेंसियों के अनुसार आरोपी ने सोशल मीडिया पर अपनी कई एडिट और मॉर्फ की गई तस्वीरें साझा की थीं, जिनमें वह प्रधानमंत्री और कई बड़े नेताओं के साथ दिखाई दे रहा था। इन तस्वीरों के जरिए उसने लोगों के बीच यह संदेश देने की कोशिश की कि उसकी पहुंच सत्ता के सबसे ऊंचे स्तर तक है। जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी लोगों को सरकारी नौकरी दिलाने, बड़े सरकारी ठेके हासिल कराने और विभिन्न सरकारी विभागों में प्रभाव का इस्तेमाल कर काम करवाने का भरोसा देता था। इसके बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था। एजेंसियों का दावा है कि आरोपी ने अपनी फर्जी पहचान और प्रभाव का इस्तेमाल कर कई लोगों को आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाया। प्रवर्तन निदेशालय ने आरोपी से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी भी की थी, जहां से लगभग 1.10 करोड़ रुपये से अधिक की रकम बरामद होने का दावा किया गया। जांच एजेंसी का कहना है कि यह रकम कथित तौर पर अपराध से अर्जित की गई कमाई का हिस्सा थी। मामले की जांच अभी भी जारी है और एजेंसियां इस नेटवर्क से जुड़े अन्य पहलुओं की भी पड़ताल कर रही हैं। इस मामले ने एक बार फिर सोशल मीडिया के जरिए बनाई जा रही फर्जी छवि और प्रभाव के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत ने अपने आदेश के जरिए साफ संकेत दिया है कि कानून ऐसे मामलों को गंभीरता से देखता है, लेकिन लंबे समय तक जेल में रहने और ट्रायल में देरी जैसे पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

(पुण्‍य स्‍मरण) सेवा, साधना और संवेदना के पर्याय अनिल माधव दवे

-डॉ. मयंक चतुर्वेदीभारतीय संस्कृति में प्रकृति को चेतना माना गया है। नदियाँ यहां मां हैं, वृक्ष देवता हैं और जल जीवन का आधार। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में जब पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता बनता जा रहा है, तब कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हुए जिन्होंने भारतीय जीवनदृष्टि को आधुनिक पर्यावरणीय चिंताओं से जोड़ने का प्रयास किया। श्रद्धेय अनिल माधव दवे उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। उनके लिए पर्यावरण साधना, सेवा और संस्कार का हिस्सा रहा। नर्मदा के तटों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं तक, उन्होंने भारतीय चिंतन को मजबूती से रखा। नर्मदा से जुड़ा आत्मिक रिश्ताअनिल माधव दवे का नाम लेते ही सबसे पहले नर्मदा का स्मरण होता है। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। उन्होंने नर्मदा को केवल नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की धारा माना।उनके गैर-सरकारी संगठन ‘नर्मदा समग्र’ के माध्यम से उन्होंने नदी संरक्षण के लिए व्यापक अभियान चलाए। नर्मदा किनारे वृक्षारोपण, घाटों की स्वच्छता, जैविक खेती को बढ़ावा और जल संरक्षण जैसे अनेक कार्य उनके नेतृत्व में हुए। उन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए नदी एम्बुलेंस तक शुरू करवाई। नर्मदा के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने सेना विमान से नर्मदा की हवाई परिक्रमा की और फिर पूरी नदी में राफ्टिंग कर उसके भूगोल, समाज और पर्यावरण को करीब से समझा। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि नदी को आत्मा से समझने का प्रयास था। विचार महाकुंभ: परंपरा और आधुनिकता का संगमसाल 2016 में उज्जैन सिंहस्थ के दौरान आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ अनिल माधव दवे की दूरदृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण था। ‘जीवन जीने का सही तरीका’ विषय पर आयोजित इस महाआयोजन में संत, विचारक, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता एक मंच पर आए।इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता थी भारतीय परंपरा को आधुनिक विमर्श से जोड़ना। दवे मानते थे कि समाज के बड़े प्रश्नों का समाधान राजनीतिक बहसों में नहीं, बल्कि सामूहिक बौद्धिक मंथन से निकलता है। इसी चिंतन से ‘सिंहस्थ की सार्वभौमिक घोषणा’ तैयार हुई, जिसमें पर्यावरण, मानवता और सतत विकास को लेकर 51 सूत्र प्रस्तुत किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस आयोजन की सफलता का श्रेय अनिल माधव दवे जी को दिया था। भोजन की बर्बादी को भी मानते थे पर्यावरण संकटअनिल माधव दवे की सोच बड़े मंचों तक सीमित नहीं थी। वे जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारों में भी पर्यावरणीय चेतना देखते थे। विचार महाकुंभ के दौरान जब उन्होंने लगभग 200 किलो भोजन बर्बाद होते देखा, तो वे बेहद व्यथित हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों से कहा, “थाली में उतना ही लें जितना खा सकें। इस अनाज को पैदा करने में प्रकृति का कितना योगदान है, यह समझना होगा।” निश्चित ही उनका यह कथन भारतीय जीवनशैली के उस मूल भाव को सामने लाता था जिसमें अन्न, जल और प्रकृति के प्रति सम्मान सर्वोपरि माना गया है। आरएसएस प्रचारक से पर्यावरण मंत्री तक कीयात्राअनिल माधव दवे का सार्वजनिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। संगठनात्मक क्षमता, सरलता और रणनीतिक सोच के कारण उन्होंने राजनीति में भी अपनी विशेष पहचान बनाई। साल 2003 में मध्य प्रदेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की रणनीति तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बाद में वे राज्यसभा सांसद बने और संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। जुलाई 2016 में उन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री नियुक्त किया गया। मंत्री बनने के बाद उनके सामने कई जटिल चुनौतियां थीं, जलवायु परिवर्तन, विकास परियोजनाओं की मंजूरी, वायु प्रदूषण, जैविक विविधता और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों जैसे विषय। लेकिन उन्होंने हमेशा भारतीय दृष्टिकोण और संतुलन को प्राथमिकता दी। विचारों में मतभेद, संवाद में नहींअनिल माधव दवे की सबसे बड़ी विशेषता थी संवाद की क्षमता। वे वैचारिक मतभेदों को कभी दूरी का कारण नहीं बनने देते थे। गांधीवादी पर्यावरणविद् अनुपम मिश्रा से उनके आत्मीय संबंध इसका उदाहरण हैं। दवे, संघ पृष्ठभूमि से होने के बावजूद, मिश्रा जैसे विचारकों से लगातार सीखते रहे। बीमारी के दौरान वे अस्पताल में घंटों उनके पास बैठे रहते थे। यह उनकी विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाता है। भारतीय दृष्टि से जलवायु परिवर्तन की वकालतसंयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में अनिल माधव दवे ने भारत की स्थिति को मजबूती से रखा। वे मानते थे कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती।उनका स्पष्ट मत था कि प्रकृति के साथ संतुलन भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, इसलिए भारत को पर्यावरण के प्रश्न पर पश्चिमी देशों से सीखने की नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। सादगी में छिपा असाधारण व्यक्तित्वराजनीति के उच्च पदों पर पहुंचने के बावजूद दवे का जीवन अत्यंत सादा रहा। वे दिखावे और व्यक्तिपूजा से दूर रहते थे। उनकी वसीयत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि उनके नाम पर कोई स्मारक या पुरस्कार न बनाया जाए। यदि कोई उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहता है, तो वह वृक्ष लगाए, जल स्रोतों का संरक्षण करे और नदियों को बचाने का प्रयास करे। वस्तुतः यह विचार बताता है कि उनके लिए जीवन का उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज की सेवा था। एक अधूरा लेकिन प्रेरणादायक सफर 18 मई 2017 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। मात्र 61 वर्ष की आयु में उनका जाना देश के लिए बड़ी क्षति थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “व्यक्तिगत क्षति” बताया था। किंतु अनिल माधव दवे उन दुर्लभ लोगों में थे जिन्होंने राजनीति, अध्यात्म और पर्यावरण को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। उन्होंने दिखाया कि विकास और प्रकृति विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टि से दोनों साथ चल सकते हैं। आज जब नदियाँ प्रदूषित हैं, जंगल सिमट रहे हैं और जल संकट गहरा रहा है, तब अनिल माधव दवे की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है। उनका जीवन हमें यह बार-बार याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं, यह तो जीवन जीने की संस्कृति है। शत् शत् नमन ।

पाकिस्तान के आतंकी ने ही खोल दी ‘आतंकिस्तान’ की पोल, कश्मीर पहुंचते ही बदला लश्कर के खूंखार गुर्गे का इरादा

नई दिल्ली । पाकिस्तान द्वारा वर्षों से कश्मीर को लेकर फैलाए जा रहे प्रोपेगेंडा को इस बार किसी भारतीय एजेंसी या नेता ने नहीं, बल्कि खुद पाकिस्तान से भेजे गए एक आतंकी ने ही कठघरे में खड़ा कर दिया। घाटी में आतंक फैलाने के मकसद से भेजा गया लश्कर-ए-तैयबा का प्रशिक्षित आतंकी मोहम्मद उस्मान जट्ट उर्फ ‘चाइनीज’ अब ऐसे खुलासे कर रहा है, जिसने पाकिस्तान के झूठे दावों की परतें उधेड़ दी हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस आतंकी को कश्मीर में हिंसा फैलाने की जिम्मेदारी दी गई थी, वही वहां की वास्तविक स्थिति देखकर अपना इरादा बदल बैठा। जांच एजेंसियों की गिरफ्त में आए मोहम्मद उस्मान जट्ट ने पूछताछ के दौरान बताया कि उसे पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ट्रेनिंग कैंपों में कश्मीर को लेकर एक अलग तस्वीर दिखाई गई थी। उसे यह भरोसा दिलाया गया था कि घाटी में हालात बेहद खराब हैं और वहां के लोग भारत के खिलाफ खड़े हैं। लेकिन जब वह घुसपैठ के जरिए जम्मू-कश्मीर पहुंचा और उसने आम लोगों की जिंदगी को करीब से देखा, तो उसकी सोच पूरी तरह बदल गई। उसने माना कि उसे जो बताया गया था, वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग थी। सूत्रों के मुताबिक, लाहौर निवासी यह आतंकी उत्तरी कश्मीर के रास्ते भारत में दाखिल हुआ था। उसे कई आतंकी हमलों को अंजाम देने के निर्देश दिए गए थे। शुरुआती दिनों में उसने कुछ संदिग्ध गतिविधियों में हिस्सा भी लिया, लेकिन धीरे-धीरे उसका फोकस बदलने लगा। घाटी में सामान्य जनजीवन, बाजारों की रौनक और लोगों की दिनचर्या देखने के बाद वह खुद दुविधा में पड़ गया। यही कारण था कि उसने अपने मिशन से दूरी बनानी शुरू कर दी। जांच के दौरान सामने आई सबसे हैरान करने वाली जानकारी यह रही कि आतंकी ‘चाइनीज’ अपने पुराने शौक को पूरा करने में लग गया था। बताया जा रहा है कि वह श्रीनगर में हेयर ट्रांसप्लांट करवाने पहुंचा था, जहां सुरक्षा एजेंसियों ने उसे पकड़ लिया। एक तरफ जहां उसे बड़े आतंकी मिशन के लिए भेजा गया था, वहीं दूसरी तरफ वह अपनी निजी इच्छाओं में उलझ गया। इसी लापरवाही ने आखिरकार उसे जांच एजेंसियों के शिकंजे तक पहुंचा दिया। पूछताछ में आतंकी ने यह भी स्वीकार किया कि पाकिस्तान में युवाओं को कश्मीर के नाम पर भड़काया जाता है और उन्हें गलत सूचनाएं देकर आतंकी संगठनों में शामिल किया जाता है। उसने माना कि वास्तविकता देखने के बाद उसे महसूस हुआ कि घाटी के लोग शांति और सामान्य जिंदगी चाहते हैं, जबकि सीमा पार बैठे संगठन अपने फायदे के लिए युवाओं का इस्तेमाल करते हैं। इस पूरे मामले के सामने आने के बाद राजनीतिक गलियारों में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं। कई नेताओं ने इसे पाकिस्तान के झूठे नैरेटिव की सबसे बड़ी हार बताया। उनका कहना है कि जब खुद पाकिस्तान से भेजा गया आतंकी ही वहां के प्रोपेगेंडा को झूठा बता रहा है, तो यह पूरी दुनिया के सामने एक बड़ा संदेश है। फिलहाल जांच एजेंसियां आतंकी से जुड़े नेटवर्क, उसके संपर्कों और भारत में उसकी गतिविधियों को लेकर गहन पूछताछ कर रही हैं।

आंध्र प्रदेश की नई पॉपुलेशन पॉलिसी पर विवाद, महिलाओं की स्वायत्तता को लेकर सीपीएम का बड़ा सवाल

नई दिल्ली /आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा ज्यादा बच्चे पैदा करने पर कैश इंसेंटिव देने की नई योजना ने देश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की इस घोषणा पर अब विपक्षी दलों ने खुलकर हमला बोलना शुरू कर दिया है। खासकर सीपीएम नेता बृंदा करात ने इस नीति को महिलाओं की स्वतंत्रता और निजी अधिकारों में हस्तक्षेप बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि सरकार महिलाओं के निजी फैसलों पर प्रभाव डालने की कोशिश कर रही है, जो बेहद चिंताजनक है। दरअसल, राज्य सरकार ने तीसरे बच्चे के जन्म पर 30 हजार रुपये और चौथे बच्चे के जन्म पर 40 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। सरकार का कहना है कि राज्य में लगातार गिर रही जनसंख्या वृद्धि दर को देखते हुए यह कदम जरूरी हो गया है। सरकार का उद्देश्य जनसंख्या संतुलन बनाए रखना और भविष्य में संभावित जनसांख्यिकीय चुनौतियों से निपटना बताया जा रहा है। हालांकि इस योजना को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। बृंदा karat ने कहा कि महिलाओं के शरीर और मातृत्व से जुड़े फैसले पूरी तरह व्यक्तिगत होने चाहिए। सरकार द्वारा आर्थिक लालच देकर महिलाओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रेरित करना उनकी स्वायत्तता पर सीधा हमला है। उनका कहना है कि गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में इस योजना का दबाव सबसे अधिक महिलाओं पर पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि कई परिवारों में महिलाएं दो बच्चों के बाद परिवार पूरा मानती हैं, लेकिन अतिरिक्त आर्थिक सहायता के लालच में उन पर तीसरे और चौथे बच्चे के लिए दबाव बनाया जा सकता है। ऐसे मामलों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता महिलाओं के हाथ में नहीं रह जाती और परिवार या समाज का दबाव बढ़ जाता है। बृंदा करात ने आशंका जताई कि सरकार द्वारा दिए जाने वाले पैसों पर भी महिलाओं का वास्तविक नियंत्रण नहीं होगा। वहीं सरकार का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि दक्षिणी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर लगातार घट रही है, जिसका असर भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक संतुलन पर पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में कामकाजी आबादी घटने से आर्थिक गतिविधियों और विकास पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से राज्य सरकार लोगों को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा केवल जनसंख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भविष्य के परिसीमन और संसदीय सीटों के संतुलन को लेकर भी चिंताएं जुड़ी हुई हैं। दक्षिणी राज्यों में लंबे समय से यह आशंका जताई जाती रही है कि कम जनसंख्या वृद्धि के कारण भविष्य में उनकी संसदीय सीटों का अनुपात प्रभावित हो सकता है। फिलहाल इस योजना ने देशभर में नई बहस को जन्म दे दिया है। एक तरफ सरकार इसे जनसंख्या संतुलन बनाए रखने की दिशा में जरूरी कदम बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे महिलाओं के अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में दखल करार दे रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और ज्यादा गर्मा सकता है।

मुख्यमंत्री योगी का जनता से सीधा संवाद, फरियादियों को दिया भरोसा- हर पीड़ित को मिलेगा न्याय

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर अपनी जनसुनवाई व्यवस्था ‘जनता दर्शन’ के माध्यम से आम लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया। व्यस्त सरकारी कार्यक्रमों के बीच आयोजित इस कार्यक्रम में प्रदेश के अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में लोग अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे। मुख्यमंत्री ने हर व्यक्ति की बात गंभीरता से सुनी और भरोसा दिलाया कि सरकार जनता की सेवा, सुरक्षा और सुशासन के संकल्प के साथ पूरी प्रतिबद्धता से काम कर रही है। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री का संवेदनशील और सहज व्यवहार लोगों के बीच चर्चा का विषय बना रहा। जनता दर्शन में पहुंचे फरियादियों ने भूमि विवाद, कानून व्यवस्था, स्वास्थ्य सुविधाओं और सरकारी योजनाओं से जुड़ी समस्याएं मुख्यमंत्री के सामने रखीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि सभी शिकायतों का तय समय सीमा के भीतर निष्पक्ष और प्रभावी समाधान किया जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी पीड़ित व्यक्ति को न्याय के लिए भटकना नहीं पड़ना चाहिए और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि हर जरूरतमंद तक राहत पहुंचे। मुख्यमंत्री ने जिलाधिकारियों और पुलिस अधीक्षकों को व्यक्तिगत रूप से मामलों की निगरानी करने के निर्देश भी दिए। कार्यक्रम के दौरान एक ऐसा भावुक क्षण भी सामने आया जिसने सभी का ध्यान आकर्षित किया। बिहार से आई एक महिला मुख्यमंत्री से मिलने पहुंची थीं। जब मुख्यमंत्री उनके पास पहुंचे और उनकी समस्या के बारे में पूछा तो महिला ने बताया कि उन्हें कोई परेशानी नहीं है, वह केवल मुख्यमंत्री के दर्शन करने आई हैं। महिला की इस बात पर मुख्यमंत्री मुस्कुराए और आत्मीयता के साथ उनका अभिवादन किया। इसके बाद उन्होंने महिला और वहां मौजूद अन्य लोगों से भीषण गर्मी में सावधानी बरतने और अपने परिवार का विशेष ध्यान रखने की अपील की। मुख्यमंत्री का यह सहज व्यवहार कार्यक्रम में मौजूद लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को यह भी निर्देश दिया कि गरीबों, जरूरतमंदों और पात्र लोगों तक सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी भेदभाव के पहुंचना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से भूमि कब्जाने वाले भू-माफियाओं और दबंग तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए। साथ ही राजस्व और कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर निपटाने पर जोर दिया। मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रशासनिक मशीनरी का उद्देश्य केवल फाइलों का निस्तारण नहीं बल्कि लोगों को वास्तविक राहत पहुंचाना होना चाहिए। जनता दर्शन कार्यक्रम लंबे समय से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली का अहम हिस्सा रहा है। इस मंच के जरिए आम नागरिक सीधे मुख्यमंत्री तक अपनी बात पहुंचा पाते हैं। कार्यक्रम में अक्सर ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहां लोग अपनी समस्याओं के साथ-साथ मुख्यमंत्री के प्रति विश्वास और समर्थन भी व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि जनता दर्शन केवल शिकायत सुनने का मंच नहीं बल्कि सरकार और जनता के बीच संवाद का एक मजबूत माध्यम बन चुका है। सोमवार को आयोजित इस कार्यक्रम ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सरकार प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता बनाए रखने के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी प्राथमिकता दे रही है। जनता की समस्याओं के समाधान के साथ मुख्यमंत्री का सहज व्यवहार और संवेदनशील संवाद लोगों के बीच सकारात्मक संदेश छोड़ गया।